संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Tuesday, October 9, 2007

क्‍या फिल्‍म 'सांवरिया' का शीर्षक गीत जॉर्ज माईकल के 'फेथ' से प्रेरित है ।

हिंदी फिल्‍म संगीत की दुनिया में पश्चिम से गाने उठाने की परंपरा और इससे जुड़ी कई कहानियां प्रचलित रही हैं । अकसर हम एक दूसरे से ये कहते पाये जाते हैं कि फलां गाना वहां से उठाया और फलां गाना यहां से उठाया गया । मुंबई से प्रकाशित होने वाले टेबलॉयड मिड डे ने इन दिनों एक ताज़ा दावा किया है । इस अखबार के प्रतिनिधि तुषार जोशी ने याद दिलाया है कि फिल्‍म सांवरिया का टाईटल ट्रैक जॉर्ज माईकल के मशहूर गीत 'फेथ'(FAITH) से काफी 'मिलता-जुलता' है । आपको याद होगा कि जॉर्ज माईकल (gerge michael) का ये गीत सन 1987 में आया था ।



इस मुद्दे पर रेडियोवाणी पर मैं कोई टिप्‍पणी नहीं कर रहा, हां दोनों गाने आपके सामने पेश किये जा रहे हैं ।
स‍ुनिए और फैसला कीजिए ।

ये रहा जॉर्ज माईकल के मशहूर गीत फेथ का वीडियो ।



और ये है 'फेथ' का ऑडियो

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और सांवरिया का शीर्षक गीत यहां सुना जा सकता है ।
एक लिस्‍ट खुलेगी, जिसमें सबसे नीचे है सांवरिया का टाईटल ट्रैक । उसे सिलेक्‍ट कीजिए और 'प्‍ले सिलेक्‍टेड' पर क्लिक कीजिए ।

और हां अपनी प्रतिक्रिया, ख्‍याल, विचार ज़रूर बताईये ।
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Sunday, September 23, 2007

daughters day और हमारे घरों की बेटियों के नाम दो नग्‍मे




आज है डॉटर्स डे । बेटी दिवस ।
हमारे देश में बेटियों के साथ जैसा बर्ताव किया जाता रहा है उसके परिप्रेक्ष्‍य में 'बेटी दिवस' महत्‍त्‍वपूर्ण हो जाता है । महत्‍त्‍वपूर्ण इस संदर्भ में कि कम से कम माता पिता को अहसास तो हो कि वो बेटी के साथ भेदभाव कर रहे हैं । हम आधुनिकता का चाहे जितना डंका पीट लें, अर्थव्‍यवस्‍था की तरक्‍की के परचम लहरा लें लेकिन इतना तो तय है कि
जब बेटी की उच्‍च शिक्षा की बात आती है तो आज भी मध्‍यवर्गीय परिवारों में बेटे की कीमत पर बेटी को बड़े शहर में होस्‍टल में रहकर पढ़ने नहीं भेजा जाता । आज भी विदेश पढ़ने जाने के लिए बेटे का नंबर तो आ सकता है पर बेटी.... नहीं नहीं । ऐसा कैसे हो सकता है । आज भी बेटा अपनी मर्जी से शादी कर ले तो थोड़ी नाराज़गी के बाद उसे माफ किया जा सकता है । लेकिन बेटी को कभी माफ नहीं किया जाता । ये माना जाता है कि उसने हमारी नाक कटा दी ।

हम दोहरी मानसिकता के किस क़दर शिकार हैं ।
डॉटर्स डे भले ग्रीटिंग कार्ड कंपनियों या उपभोक्‍तावादी समाज रचने वाले बाज़ार का शोशा हो पर किसी ना किसी तरह ये अहसास दिला रहा है कि घर में बेटी भी है । उसकी अपनी खुशियां और ग़म हैं । उसका एक नाज़ुक सा मन है । उसके अपने सपने हैं । उसकी अपनी उड़ान है । वो लोकगीतों वाली पिंजरे की मैना नहीं है । आज जरूरत पड़े तो बेटी पहले मां बाप के काम आती है । उस समय बेटे अपनी पेशेवर मजबूरियों का बहाना बनाकर कन्‍नी काट लेते हैं ।

रेडियोवाणी पर उसी बेटी के नाम दो प्‍यारे से नग्‍मे ।
हालांकि नग्‍मे क्रांति नहीं लाते । लेकिन शायद नग्‍मे अपराधबोध का अहसास करा सकते हैं । इन गानों के ज़रिये मैं अपनी छोटी बहन को भी याद कर रहा हूं ।
हालांकि मुझे खुशी है कि हमारे परिवार ने उसकी सपनों और उसकी उम्‍मीदों को कुचला नहीं । पर ये उन तमाम बहनों के नाम जिन्‍हें पिंजरे वाली मैना समझा गया और समझा जा रहा है ।

ये गीत फिल्‍म सीमा का है । जो सन 1955 में आई थी । बोल हसरत जयपुरी के संगीत शंकर जयकिशन का ।

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और ये सन 1964 में आई फिल्‍म दोस्‍ती का गीत है । लक्ष्‍मी प्‍यारे की जोड़ी की ये पहली रिलीज़ फिल्‍म थी । इस फिल्‍म से ही उन्‍होंने अपने आप को संभावनाशील संगीतकार साबित कर दिया था । अफसोस कि मैं इन गीतों के संगीत का विश्‍लेषण व्‍यस्‍तताओं के रहते नहीं कर पा रहा हूं । ये गीत मजरूह का है ।


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Saturday, July 21, 2007

चिट्ठाजगत ने मिलाया एक पुराने दोस्‍त से



प्रिय मित्रो
रेडियोवाणी को सत्रह अप्रैल को शुरू किया था, काफी हिचक के साथ, मुझे यक़ीन नहीं था कि मैं इस चिट्ठे को चला सकूंगा । नियमित लिख सकूंगा । पर आप सबके प्‍यार ने ‘रेडियोवाणी’ को संगीत की नई दुनिया बनाया है । रेडियोवाणी के ज़रिये मेरा ना जाने कितने लोगों से परिचय हुआ है । नए दोस्‍त बने हैं । मज़ा आ रहा है ।

पुराने मित्र भी रेडियोवाणी को बड़े चाव से पढ़ रहे हैं । लेकिन आज रेडियोवाणी पर मैं आपको बस यही बताना चाहता हूं कि इस चिट्ठे ने मुझे अपने एक पुराने गुमशुदा दोस्‍त से मिलवा दिया । आनंद ने एक दिन इस ब्‍लॉग को देखकर ‘गीता रॉय’ वाली पोस्‍ट पर ये लिखा---


प्रिय यूनुस भाई,
अभी तुम्‍हारा ब्‍लॉग पढ़ा तथा फोटो भी देखा। क्‍या तुम वही यूनुस हो जो जबलपुर थे और उस समय पार्ट/फुल टाइम काम की तलाश कर रहे थे। यदि तुम वही हो, तो मैं तुम्‍हारे उस दौर का साथी हूँ मुझे इस ईमेल पर संपर्क करो:

इसके बाद मैंने आनंद को लिखा--
आनंद भाई
आपका मेल देखा । मैं वही यूनुस हूं जो आकाशवाणी जबलपुर में कैजुअल अनाउंसर था और नौकरी की तलाश कर रहा था । यानी आपने सही पहचाना ।
लेकिन माफ़ कीजिएगा, मैं आपको पहचान नहीं पा रहा हूं ।
याद आया, क्‍या आप विवेचना में थे और एग्रीकल्‍चर यूनीवर्सिटी में पढ़ते थे ।
कुछ याद दिलाएंगे ।
यूनुस

बस इसके बाद आया आनंद का कन्‍फरमेशन-मेल--

यूनुस भाई,
गले मिलकर नमस्‍कार,मैं वही आनंद हूँ जो
विवेचना में था। एग्रीकल्‍चर से M.Sc.पूरा कर चुका था और रोजी रोटी की तलाशमें था।
तुम्‍हारे साथ जबलपुर की लाइब्रेरी के खाक़छाना करता था।
वहाँ Timesof India का Ascent खोजता था‍ कि कहीं कोई मनमाफिक जॉब मिल जाए।
मुझे याद है कि हम दोनों वहीं के लोकल न्‍यूज़पेपर में एक विज्ञापन पढ़कर संभावना तलाशने गए थे
(शायद पत्रकार की जगह के लिए)।
हम मन ही मन तैयारी कर रहे थे कि न्‍यूनतम कितना पैसा मांगना ठीक रहेगा,जबकि वहाँ जाकर पता चला कि पैसा मिलना तोबहुत मुश्किल था, परहमें प्रेस का स्‍टीकार मिलेगा जिससे गाड़ी (साइकिल)स्‍टैंड का किराया नहीं लगेगा।
मैंने बहुत कोशिश की थी कि वहीं जबलपुर में कोई ऐसी जॉब मिलजाए जिससे मेरा खाना-खर्चा चल जाए तो मैं इतमीनान से पूरी जिंदगी थिएटर कर सकता हूँ। जबकि यही मिलना मु‍श्किल था। मैं जून 1996 को वहाँ से दिल्‍ली चला आया था।(बल्कि मेरे दोस्‍तों,शुभचिंतकों ने धकेलधकेल कर भेजा था)।

यहाँ दिल्‍ली में IndianAgricultural Research Institute में एक अस्‍थायी रिसर्च फैलो की पोस्‍ट थी। उसमें एक डेढ़ साल बिताया। फिर इसी तरह दो तीन जगह बदल कर इस समय रेगुलर पोस्‍ट में हूँ।

मैं दिल्‍ली में पिछले 10 साल से हूँ। शुरूआती 3-4 वर्ष भूखे भेंडि़ए की तरह थिएटर देखने के लिए टूट पड़ता था। ( किसीग्रुप को ज्‍वाइन करना मुश्किल था,क्‍योंकि इसके लिए समय का अभाव था, परंतु देख तो सकता था)। तकरीबन रोज़ एक न एक नाटक ज़रूर देखता। फिर... संक्षेप में बताऊँ, तो धीरे धीरे यह शगल कम होता गया। फिर शादी हो गई, फिर एक बच्‍ची हो गई और इस समय तो सब कुछ एक सपना सा लगता है। (मैंने इसे दो लाइन में निपटाया है, पर यह इतना सरल नहीं है, इस पूरी प्रक्रिया में बहुत समय लगा था)।
फिलहाल तो घर से बाहर निकलने में भी आलस्‍य आता है। घूमने भी बहुत कम ही जा पाता हूँ। हाँ इन दिनों इंटरनेट सर्फिंग का शौक लगा है । घर पर ही ब्रॉडबैंड कनेक्‍शन है। इसी कारण तुम्‍हारा ब्‍लॉग पढ़ने को मिला। तुमतो छा गए यार। इतना बढिया ब्‍लॉग !
तुम बताओ, इतने दिन क्‍या किया ? आज किस पोजीशन में हो ?
बाक़ी बातें बाद में लिखूँगा ।
आनंद

आनंद से पूछे बिना पत्र को छाप रहा हूं, सो इसलिये कि इसमें छिपाने जैसा कुछ नहीं है, उन दिनों की याद आ गयी जब मैं पढ़ाई ख़त्‍म करने वाला था और तय किया था कि आकाशवाणी में ही जाना है । उस वक्‍त ‘विविध भारती’ माउंट एवरेस्‍ट जैसा सपना लगती थी । जबलपुर इप्‍टा यानी विवेचना मेरा अड्डा हुआ करता था । आनंद वहां थियेटर करता था और मैं कभी इन नाटकों पर लेख लिखता, कभी परोक्ष सहयोग करता, नियमित रूप से थियेटर करना उन दिनों ‘आकाशवाणी’ की कैजुएल अनाउंसरी के साथ मुमकिन नहीं था । आकाशवाणी, साहित्‍य, दोनों समय लाईब्रेरी में दो दो घंटे बिताना इतनी सारी गतिविधियां थीं । मुझे याद आ रहा है कि बाद में हम तसलीमा नसरीन का ‘लज्‍जा’ करने वाले थे । मैं भी इसमें अभिनय कर रहा था । आनंद था या नहीं याद नहीं आ रहा है, पर शायद सोनू पाहूजा निर्देशन कर रहा था । इसी बीच मेरा सिलेक्‍शन हो गया और नाटक के मंचन से पहले मैं मुंबई आ गया ।

आनंद उन दिनों एग्रीकल्‍चर यूनीवर्सिटी में पढ़ता था और थियेटर का ज़बर्दस्‍त प्रेमी होता था । विवेचना का सक्रिय सदस्‍य ।

आज दुख इसी बात का है कि थियेटर एक पुराना सपना बन गया है आनंद के लिए ।
पर रेडियोवाणी के ज़रिये आनंद से दोबारा जुड़ना सचमुच आनंद का विषय है ।
चिट्ठों के ज़रिए ऐसा भी होता है ।

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Wednesday, July 11, 2007

साल भर पहले आज ही हुए थे धमाके मुंबई की ट्रेनों में






आज से ठीक एक साल पहले ग्‍यारह जुलाई को मुंबई की लोकल ट्रेनों में एक के बाद एक कई धमाके हुए, जिनमें कई मासूम लोगों की असमय मृत्‍यु हो गयी ।

रेडियोवाणी पर उन लोगों को श्रद्धांजली दे रहे हैं, जिनकी मौत उस काले दिन हुई थी ।

हम मुंबई के उस जज़्बे को भी सलाम करते हैं, जिसकी बिना पर इस शहर ने सब कुछ भुला कर नई शुरूआत की ।

आज भी लोकल ट्रेनों में उतनी ही भीड़ है । हालांकि ये जनता की मजबूरी है । उसके सामने कोई और रास्‍ता नहीं ।
विनम्र श्रद्धांजली ।

ये उन धमाकों के बाद की दिल दहला देने वाली तस्‍वीरें हैं ।






इस चिट्ठे के धीनगाना प्‍लेयर पर आज कुछ प्रार्थनाएं एवं भजन लगाये गये हैं ।













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Sunday, July 8, 2007

‘मल्‍टीप्‍लेक्‍स दशक’-तीसरी कड़ी, छोटी फिल्‍में बड़ी कामयाबी


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी



दिल्‍ली के पी.वी.आर. को सात जुलाई को दस साल पूरे हो चुके हैं । ये इस मायने में महत्‍त्‍वपूर्ण है कि ये मल्‍टीप्‍लेक्‍स-दशक रहा है, मल्‍टीप्‍लेक्‍सों ने अब छोटे शहरों में अपने पैर पसारने आरंभ किये हैं । इस परिदृश्‍य पर ‘इंडियन-एक्‍सप्रेस’ ने अपनी श्रृंखला ‘मल्‍टीप्‍लेक्‍स-दशक’ में कई लोगों के विचार देने शुरू किये हैं । ये इस सीरीज़ की तीसरी और अंतिम-कड़ी है ।


फिल्‍म-समीक्षक शुभ्रा गुप्‍ता के विचार


बहुत बरस पहले की बात है, मैंने एक फिल्‍म-वितरक से पूछा, तो क्‍या आपकी फिल्‍म फ्लॉप हो गयी है । मुझे उस फिल्‍म का नाम तो याद नहीं आ रहा है, लेकिन इस फिल्‍म का काफी ऊंचा बजट और ज़बर्दस्‍त स्‍टार-कास्‍ट थी, फिल्‍म को काफी धीमी ओपनिंग मिली और फिर दूसरे हफ्ते तक वो ग़ायब भी हो गई । इस सवाल पर उसने मुझे अपने दफ्तर में बैठाया, जो चांदनी चौक के भागीरथ पैलेस में था, ये वो जगह है जहां दिल्‍ली के फिल्‍म-व्‍यवसाय से जुड़े लोगों के दफ्तर हैं । इसके बाद उसने मुझे कुछ बुनियादी-बातें समझाईं । उसका कहना था कि सारा खेल अंकगणित का है । अगर फिल्‍म काफी कम बजट पर बनाई जाये और वो बहुत पैसा कमा लेती है और उस फिल्‍म से भी आगे निकल जाती है जो बड़े पैसे और बड़ी स्‍टारकास्‍ट को लेकर बनाई गयी थी । और जिसका बॉक्‍स-ऑफिस पर प्रदर्शन ठीक-ठाक था । पर वो लागत और आय के दायरे को ठीक से पाट नहीं पाई ।

उस वितरक ने बताया कि मिथुन चक्रवर्ती की छोटी फिल्‍में इसी तरह की बड़ी हिट साबित होती हैं । मिथुन को लेकर तेज़ी से बनने वाली फिल्‍मों का बजट एक करोड़ के आसपास होता है । वो दक्षिण भारत की संघर्षरत लड़कियों को नायिका बना देते हैं और ऊटी में शूटिंग करते हैं जहां उनका अपना होटल है । ज़ाहिर है कि होटल का पैसा बच जाता है । ये उन फिल्‍मों की बात है, जिन्‍हें ‘बी-ग्रेड’ का माना जाता है, और उत्‍तरप्रदेश तथा बिहार में मिथुन को पसंद करने वाले लोग इन फिल्‍मों को देखते और पसंद करते हैं । ये फिल्‍में निर्माण के खर्च से थोड़ी सी ज्‍यादा क़ीमत पर वितरित की जाती हैं और थियेटर हाउस-फुल हो जाते हैं, इससे सबको मुनाफा होता है ।

मेरे लिए ये एकदम नई जानकारी थी । मुझे उस वितरक की बात से ये समझ में आया कि हिट होने के लिए फिल्‍मों का बड़े बजट का होना जरूरी नहीं है । और छोटे बजट वाली फिल्‍मों को ‘छोटा’ समझना भी एक बड़ी भूल है । आज यही बात मुंबईया फिल्‍म जगत में सच होती नज़र आ रही है । तमाम बड़े बजट की फिल्‍में धड़ाधड़ फ्लॉप होती जा रही हैं । और छोटे बजट की फिल्‍में मुनाफ़ा बटोर रही हैं । मिसाल के लिए आदित्‍य चोपड़ा की मल्‍टी-करोड़ मल्‍टी-स्‍टारर फिल्‍म ‘झूम बराबर झूम’ को ही लीजिये, तीसरे ही दिन इसका दम निकल गया । जबकि सुनील जोशी द्वारा निर्मित और सागर बेल्‍लारी द्वारा निर्देशित ‘भेजा फ्राई’ बनी चौवन लाख में और इसने कमाये बारह करोड़, और अभी भी कमाती चली जा रही है ।

यानी नया फॉर्मूला है---छोटा बजट, बड़ा कन्‍सेप्‍ट और बड़ी हिट ।


एक ज़माना था जब बॉलीवुड की फिल्‍में पूरे देश में हिट होती थीं । फिर 1985 से लेकर नब्‍बे के दशक के उत्‍तरार्द्ध तक वी.सी.आर की क्रांति ने फिल्‍मों को ज़बर्दस्‍त झटका दिया, फिर वी.सी.डी. आ गया । ठीक इसी दौर में मल्‍टीप्‍लेक्‍स के आने से एक नई क्रांति आई । तीन सौ सीटों वाले थियेटर को भरना हज़ार सीटों वाले थियेटर को भरने की तुलना में ज्‍यादा आसान था । और इसका असर फिल्‍मों के सब्‍जेक्‍ट पर भी पड़ा, जैसे ही फिल्‍म बनाने वालों को समझ में आया कि दर्शक ‘मल्‍टीप्‍लेक्‍स-अनुभव’ के लिये तैयार हैं, नए विषयों पर फिल्‍में बनना शुरू हो गया । इससे फिल्‍मकारों और दर्शकों दोनों को चुनाव का मौका मिला, दोनों को एक नई तरह की आज़ादी मिली ।


पी.वी.आर. साकेत जैसे मल्‍टीप्‍लेक्‍सों के आने से भारतीय शहरों में फिल्‍में देखने की परंपरा में बड़ा बदलाव आया है । मल्‍टीप्‍लेक्‍स तेज़ी से बढ़ते चले जा रहे हैं । और इससे ये सुनिश्चित हो गया है कि अब बॉलीवुड में नई तरह की फिल्‍में ना सिर्फ बनेंगी, बल्कि अपना खर्च भी वसूल कर सकेंगी । भले इन फिल्‍मों में सितारे ना हों, लेकिन ये ऐसे कलाकार होंगे जो अपने रोल को बखूबी निभाना जानते हैं । ये ऐसी कहानियां होंगी जिनमें ग्‍लिसरीन से बहाये आंसू नहीं होंगे, जो शहरी दर्शकों को अपील करेंगी । हालांकि मल्‍टीप्‍लेक्‍स के आने से फिल्‍मों से गांव एकदम ग़ायब ही हो गया है, फिल्‍म इक़बाल में भले गांव था, ऐसा गांव जिसका एक अपाहिज युवक भारतीय क्रिकेट टीम में अपनी जगह बनाता है ।

अब मल्‍टीप्‍लेक्‍स का कारवां छोटे शहरों की तरफ बढ़ चला है, ये ऐसे शहर हैं जहां एकल स्‍क्रीन वाली टॉकीज़ें ही नहीं चल रही हैं । सवाल ये है क्‍या दूसरे दर्जे के शहरों में मल्‍टीप्‍लेक्‍स के फैलने से सिनेमा के विषयों में बदलाव आ सकेंगे ।


फिल्‍मों की असिस्‍टेन्‍ट ए‍डीटर हरप्रीत सिंह के विचार—


अवनी जोशी अपने आप को महिला आदित्‍य चोपड़ा समझती है, अरे नहीं वो आदित्‍य चोपड़ा की तरह फिल्‍में नहीं बनातीं, पर वो FDFS सिन्‍ड्रोम से ग्रस्‍त हैं । जानते हैं ये है क्‍या---अरे फर्स्‍ट डे फर्स्‍ट शो सिन्‍ड्रोम । अवनी बचपन से ही ऐसी ही है । और ‘दिल वाले दुल्‍हनिया ले जायेंगे’ बनाने वाले आदित्‍य चोपड़ा की तरह वो भी ‘गेटी-गैलेक्‍सी’ में नियमित रूप से जाती हैं । मुंबई से बाहर के लोगों को बता दें कि ‘गेटी-गैलेक्‍सी’ बांद्रा मुंबई के जी-7 मल्‍टीप्‍लेक्‍स का हिस्‍सा हैं, एक ज़माने से हर शुक्रवार यहां जनता की भीड़ जमा होती रही है । पर जब से अवनी को अंधेरी में खुले मल्‍टीप्‍लेक्‍स फेम, फन और सिनेमैक्‍स का पता चला है, उसने गेटी गैलैक्‍सी में जाना बंद कर दिया है । आज अवनी मल्‍टीप्‍लेक्‍स में सिनेमा देखने और इसका सुख लेने की ज़बर्दस्‍त समर्थक हैं ।


हर शुक्रवार अवनी अपना एक गर्म जैकेट लेती हैं और फिल्‍म देखने जाती हैं, उनका कहना है कि मल्‍टीप्‍लेक्‍स का ए.सी. जानलेवा ठंडा होता है । सिनेमैक्‍स में वो ‘रेड लाउंज’ की ही टिकिटें लेती हैं, क्‍योंकि यहां की ‘रिक्‍लाईनर सीटें’ लेट के सिनेमा देखने का अहसास कराती हैं । अवनी को लगता है मानो वो अपने लिविंग रूम में फिल्‍म देख रही है । उसके हाथ में पॉपर्कान और कोला भी होता है । उसका कहना है कि दिल्‍ली जैसी चाट भी उसे मल्‍टीप्‍लेक्‍स में मिल जाती हैं । पैसों वाली अवनी का कहना है कि मल्‍टीप्‍लेक्‍स की सीटें इतनी आरामदायक हैं कि फिल्‍म बुरी भी हो तो उसके पूरे होने तक बैठा जा सकता है । आजकल बॉलीवुड में जिस तरह की बुरी फिल्‍में बन रही हैं उसमें अवनी का इस तरह पैसा खर्च करना बचपना लग सकता है । पर कम से कम अवनी ईमानदारी से सिनेमा देखने निकलती तो है ।

अवनी की तरह ही है अंगद और उसका परिवार, जिसकी रविवार की हर शाम मल्‍टीप्‍लेक्‍स में सिनेमा देखते बीतती है । ये लोग दोपहर को यहां आते हैं, फिल्‍म देखते हैं और फिर ‘फूड-कोर्ट’ में दावत उड़ाते हैं । क्‍योंकि यहां उन्‍हें खानेपीने की तमाम मनपसंद चीजें मिल जाती हैं । इन दो मिसालों से साबित होता है कि हमारे महानगरों में मल्‍टीप्‍लेक्‍स में फिल्‍में देखना एक रवायत बनता जा रहा है । ये महज़ फिल्‍म देखना नहीं है बल्कि छुट्टी का एक यादगार दिन है । मॉल में सबके लिए कुछ ना कुछ है, बच्‍चों के लिए गेमिंग ज़ोन, बुक शॉप, गिफ्ट शॉप, फूड कोर्ट, शॉपिंग आरकेड और साथ में सिनेमाघर भी । हालांकि मल्‍टीप्‍लेक्‍स के टिकिट थोड़े-से ज्‍यादा हैं, लेकिन मल्‍टीप्‍लेक्‍स की सुविधाएं और आराम इसकी भरपाई कर देता है । अगर फिल्‍म अच्‍छी हो तो क़ीमत वसूल लगती है, अगर बुरी हो तो सुखद सीट पर आप समय तो काट ही सकते हैं । हां सर्दी से बचने के लिए जै‍केट ले जाना मत भूलियेगा ।


इस तीसरी कड़ी के साथ ही ‘मल्‍टीप्‍लेक्‍स दशक’ नामक ये श्रृंखला खत्‍म होती है ।
तीनों लेख इंडियन एक्‍सप्रेस के मुंबई संस्‍करण से साभार ।

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Saturday, July 7, 2007

‘मल्‍टीप्‍लेक्‍स दशक’ दूसरी कड़ी । सिंगल-स्‍क्रीन थियेटर और मल्‍टीप्‍लेक्‍स में सिनेमा देखने के अनुभव में फ़र्क़ है ।



भारत के पहले मल्‍टीप्‍लेक्‍स दिल्‍ली के PVR को सात जुलाई को दस वर्ष पूरे हो रहे हैं, इंडियन एक्‍सप्रेस ने इस अवधि को मल्‍टीप्‍लेक्‍स-दशक का नाम दिया है और अपनी एक लेखमाला के ज़रिए पड़ताल आरंभ की है कि मल्‍टीप्‍लेक्‍सों के आने से हिंदुस्‍तानी सिनेमा की दुनिया कितनी बदल रही है । पहले लेख में मैंने वरिष्‍ठ सिनेकार श्‍याम बेनेगल और युवा निर्दशक सागर बेल्‍लारी के विचारों के अनूदित अंश आप तक पहुंचाये थे । आज प्रस्‍तुत है इस लेखमाला के दूसरे भाग के अंश । जिसमें PVR के CMD अजय बिजली और चाणक्‍य सिनेमा के DIRECTOR आदित्‍य खन्‍ना ने अपनी बातें रखी हैं ।

PVR के CMD अजय बिजली के विचार

1997 में PVR ने अपना पहला मल्‍टीप्‍लेक्‍स शुरू किया था, जो देश का पहला मल्‍टीप्‍लेक्‍स भी था । आज दस साल बाद भारत में सिनेमा देखने के अनुभव में भारी बदलाव आ चुका है । और मल्‍टीप्‍लेक्‍स लगातार क्रांति लाये जा रहे हैं । इसका सबसे प्रमुख कारक ये रहा है कि मल्‍टीप्‍लेक्‍सों ने सिनेमा देखने के अनुभव का स्‍तर काफी ऊंचा किया है । पिछले कुछ सालों में कॉरपोरेट-जगत के आगमन, विस्‍तार के लिए भारी रकम की उपलब्‍धता और मनोरंजन-कर के मामले में सरकारी छूट का भी इस उद्योग को काफी फायदा मिला है । दरअसल भारत में आई रिटेल-क्रांति ने मल्‍टीप्‍लेक्‍स को बहुत बढ़ावा दिया है, क्‍योंकि अब देश के तमाम शहरों में मॉल और शॉपिंग-कॉम्‍पलेक्‍स बनते जा रहे हैं । यही नहीं मल्‍टीप्‍लेक्‍स के आने के बाद फिल्‍म-निर्माण, वितरण और प्रदर्शन पर भी सकारात्‍मक असर पड़ा है । ‘हैदराबाद ब्‍ल्‍यूज़’ जैसी लीक से हटकर बनी फिल्‍मों को सिनेमाघरों में जगह मल्‍टीप्‍लेक्‍सों की वजह से ही मिल सकी है ।

मल्‍टीप्‍लेक्‍सों के आने के बाद सिनेमा की दुनिया में ऐसी फिल्‍मों की जगह बन सकी है, जो देश के कुछ ही हिस्‍सों पर अपना असर डाल सकती हैं । क्षेत्रीय सिनेमा और भाषाई सिनेमा को भी मल्‍टीप्‍लेक्‍सों ने जगह दी है । आज से पांच सात साल पहले ‘इक़बाल’ और ‘पेज-3’ जैसी फिल्‍मों के रिलीज़ होने के टोटे पड़ जाते थे । ऐसी ऑफ बीट फिल्‍मों को थियेटर वाले और वितरक हाथ भी नहीं लगतो थे । उन्‍हें सिर्फ पहली कतार वाले दर्शकों की परवाह होती थी ।

मल्‍टीप्‍लेक्‍सों की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज देश भर में पांच सौ स्‍क्रीनें खुल चुकी हैं, इसका मतलब है लगभग 125 मल्‍टीप्‍लेक्‍स आ चुके हैं । आज देश में रिलीज़ होने वाली किसी भी फिल्‍म के व्‍यवसाय का तीस से चालीस प्रतिशत हिस्‍सा मल्‍टीप्‍लेक्‍सों से आ रहा है । शहरों में मल्‍टीप्‍लेक्‍सों ने युवा वर्ग को खूब आकर्षित किया है, इसका ही नतीजा है कि आज उनकी रूचि के मुताबिक हॉलीवुड की फिल्‍में भारतीय भाषाओं यहां तक कि भोजपुरी में भी डब करके रिलीज़ की जा रही हैं । spiderman 3 इसकी ताज़ा मिसाल है । जिसे पांच भारतीय भाषाओं में डब किया गया था । इससे साबित होता है कि अब लोग टॉकीज़ की तरफ लौट रहे हैं । आपको ये जानकर हैरत होगी कि चीन और भारत हॉलीवुड की फिल्‍मों का सबसे बड़ा बाजार बन चुके हैं ।

आज का अत्‍याधुनिक मल्‍टीप्‍लेक्‍स ग्राहकों का सुविधाजनक-स्‍वर्ग है, जो मध्‍यवर्ग को अपनी तरफ खींच रहा है । आज मल्‍टीप्‍लेक्‍स उन लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं जो शॉपिंग मॉल में सिर्फ खरीददारी करने आये थे । इस तरह मल्‍टीप्‍लेक्‍स ने भारत में रिटेलिंग और एंटरटेनमेन्‍ट को जोड़ दिया है । लेकिन इस उद्योग में अभी विकास की भारी गुंजाईश है । भारत दुनिया के उन देशों में है जहां सिनेमा-स्‍क्रीनों की बहुत कमी है, ज़ाहिर है कि यहां अभी बड़ी तादाद में मल्‍टीप्‍लेक्‍सों की गुंजाइश बची है । संसार में सबसे ज्‍यादा फिल्‍में हमारे यहां बनती हैं, साल में औसतन 900 फिल्‍में, जबकि KPMG के ताज़ा आंकड़े कहते हैं कि भारत में दस लाख लोगों के बीच केवल 12 स्‍क्रीनें हैं । जबकि अमेरिका में दस लाख लोगों के बीच कुल 117 स्‍क्रीनें हैं ।

मल्‍टीप्‍लेक्‍स-क्रांति के पहले चरण में दिल्‍ली, मुंबई, बैंगलोर और कोलकाता जैसे शहरों में मल्‍टीप्‍लेक्‍स खुले । अब लखनऊ, इंदौर, नासिक, औरंगाबाद, लातूर, नागपुर, कानपुर जैसे शहरों में भी मल्‍टीप्‍लेक्‍स आ रहे हैं । लेकिन मल्‍टीप्‍लेक्‍सों का विकास उनकी लोकेशन, शहर की आबादी और जनता की रूचि पर निर्भर करता है । खुद PVR एकल-स्‍क्रीन से ही विकसित हुआ संस्‍थान है, इसलिये हम किसी भी शहर में मॉल में मल्‍टीप्‍लेक्‍स खोलने से पहले जबर्दस्‍त रिसर्च करते हैं । आज फिल्‍म देखने का मतलब नज़दीक के किसी सिनेमाघर में कोई भी फिल्‍म देखना नहीं रहा, अब ये एक अनुभव और लाईफस्‍टाईल-स्‍टेटमेन्‍ट बन गया है । हम टेक्‍नॉलॉजी को उन्‍नत बनाने में लगे हैं, दर्शकों को ज्‍यादा सुविधाएं और विकल्‍प देना चाहते हैं । हो सकता है कि आगे चलकर हम ‘एंटरटेनमेन्‍ट ज़ोन’ बनाने लगें, जिससे दर्शकों को बेहतर अनुभव, सुविधाएं और विकल्‍प मिलें ।


चाणक्‍य सिनेमा के डाइरेक्‍टर आदित्‍य खन्‍ना के विचार

अगर व्‍यापार के नज़रिये से देखें तो ये समझना बहुत ही आसान है कि भारत में एक मल्‍टीप्‍लेक्‍स चलाना, एक सिंगल स्‍क्रीन थियेटर चलाने से कहीं ज्‍यादा फायदेमंद है । लेकिन सिनेमाई अनुभव के नज़रिये से सोचें तो मेरा मानना ये है कि किसी मल्‍टीप्‍लेक्‍स में फिल्‍म देखने की तुलना कभी एकल-स्‍क्रीन में फिल्‍म देखने से नहीं की जा सकती । क्‍योंकि मुझे लगता है कि सिनेमा अपने आप में एक सामुदायिक अनुभव है । हम एक ख़ास माहौल में बहुत सारे लोगों के साथ फिल्‍म देखना चाहते हैं । और इस मामले में जो अनुभव एकल-स्‍क्रीन देती है, मल्‍टीप्‍लेक्‍स नहीं दे पाते । डेढ़ सौ सीटों वाले किसी थियेटर में फिल्‍म देखने में वो मज़ा नहीं जो एक हज़ार सीटों वाले थियेटर में देखने में आता है । इस रोमांच की शुरूआत टिकिट लेने से ही हो जाती है, और फिर जब आप थियेटर में घुसते हैं और बड़ी भीड़ के साथ फिल्‍म देखते हैं तो ये कुछ और ही समां होता है ।

व्‍यक्ति सिनेमाघर के अंधेरे में खुद को भुला देना चाहता है और फिल्‍म में खो जाना चाहता है । लेकिन मल्‍टीप्‍लेक्‍स की तंग दीवारों के बीच ना तो आप फिल्‍म में खो पाते हैं और ना ही उसका मज़ा ले पाते हैं । इसके लिए एक बड़ी जगह और एक ख़ास माहौल चाहिये, जो यहां सिरे से नदारद होता है । टेक्निकल नज़रिये से देखें तो एकल-स्‍क्रीन थियेटर में साउंड की क्‍वालिटी मल्‍टीप्‍लेक्‍स से ज्‍यादा अच्‍छी होती है । दर्शक कोई पेशेवर साउंड इंजीनियर नहीं होता, लेकिन जब अलग अलग दिशाओं से आवाज़ आती है, तो उसे आनंद मिलता है, इससे एक समां बनता है । मल्‍टीप्‍लेक्‍स के सीमित दायरे में ये समां रच ही नहीं पाता । इसके अलावा तीन सौ लोगों की प्रतिक्रियाओं को सुनते हुए फिल्‍म देखने और हज़ार लोगों की प्रतिक्रियाओं को सुनते हुए फिल्‍म देखने का अंतर भी आप खुद ही समझ सकते हैं । जिस तरह की ख़ामोशी निर्देशक फिल्‍म ‘ब्‍लैक’ में रचता है, उसका गहन अनुभव भी एकल स्‍क्रीन के बड़े दायरे में बड़ी शिद्दत से होता है ।

एकल स्‍क्रीन थियेटर में वो मज़ा कहां से आयेगा जो बालकनी में आपको मिलता है, जहां आपको लगता है कि आप गतिविधियों को बहुत ऊपर से, बहुत शाही तरीक़े से देख रहे हैं । टिकिटों की क़ीमत को देखें तो तीन सौ सीटों वाले एक थियेटर में एक-जैसे लोग मौजूद होते हैं । एकल स्‍क्रीन थियेटर में अलग अलग टिकिट दरें होती हैं और अलग अलग वर्गों के लोग एक साथ वहां मौजूद होते हैं । कई बार पहली क़तार से जो फिक़रा कसा जाता है, उस पर आपकी हंसी रोके नहीं रूकती है ।

भारत ऐसा शायद एकमात्र देश होगा, जहां मल्‍टीप्‍लेक्‍स की टिकिटें एकल-स्‍क्रीन थियेटरों से ज्‍यादा हैं और काफी ज्‍यादा हैं । जबकि दोनों ही टॉकीज़ों में वही ज़ेनॉन प्रोजेक्‍टर, वही डिजिटल साउंड, वही स्‍क्रीन होती है । हां मल्‍टीप्‍लेक्‍स को संभालना अपने आप में महंगा ज़रूर होता है । यही नहीं भारत में लोग घर से ही तय करके जाते हैं कि उन्‍हें कौन सी फिल्‍म देखनी है । दो से तीन प्रतिशत लोग ही ऐसे होते हैं जो टिकिट ना मिलने पर कोई और फिल्‍म देखना पसंद करते हैं । इसलिये जो विकल्‍प की बात मल्‍टीप्‍लेक्‍स कह रहे हैं वो महज़ एक छलावा है । जब ‘झूम बराबर झूम’ जैसी कोई चर्चित फिल्‍म आती है तो मल्‍टीप्‍लेक्‍स के सारे स्‍क्रीनों पर प्रदर्शित की जाती है । तब विकल्‍प कहां जाते हैं । दरअसल मल्‍टीप्‍लेक्‍स में जाने पर दर्शक खुद को लुटा हुआ महसूस करते हैं । अब लोग ये पूछ रहे हैं कि जब सारे सिंगल स्‍क्रीन थियेटर मल्‍टीप्‍लेक्‍स बन जायेंगे, तब क्‍या होगा । ये एक बड़ा सवाल है ।

मेरी राय में मल्‍टीप्‍लेक्‍स एक डिपार्टमेन्‍टल स्‍टोर की तरह है और सिंगल स्‍क्रीन थियेटर एक स्‍टोर की तरह । अफ़सोस की जनता और सरकार ये बात समझ नहीं पा रही है और सारी रियायतें मल्‍टीप्‍लेक्‍सों की दी जा रही हैं ।

इंडियन एक्‍सप्रेस से साभार

कल संभवत:अगली कड़ी प्रस्‍तुत की जायेगी ।

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Thursday, July 5, 2007

‘मल्‍टीप्‍लेक्‍स दशक’ भारत के पहले मल्‍टीप्‍लेक्‍स ने पूरे किये दस साल, इस दौरान सिनेमा का हुआ क्‍या हाल ।






सात जुलाई को भारत के पहले मल्‍टीप्‍लेक्‍स दिल्‍ली के PVR को खुले हुए दस साल पूरे हो जायेंगे । इसे इंडियन एक्‍सप्रेस ने ‘दि मल्‍टीप्‍लेक्‍स डेकेड’ यानी मल्‍टीप्‍लेक्‍स के दशक का नाम दिया है । और एक लेखमाला आरंभ की है । जिसमें ये विमर्श किया जा रहा है कि क्‍या मल्‍टीप्‍लेक्‍स ने हमारी फिल्‍मों को बदला है, अगर हां तो कैसे । इस लेखमाला का पहला अंक कल छपा था । उसी के मुख्‍य अनूदित अंश । कोशिश यही रहेगी कि इस लेखमाला के सारे लेख यहां प्रस्‍तुत किये जाएं ।

श्‍याम बेनेगल के विचार---


मल्‍टीप्‍लेक्‍सों के आने से पहले ज्‍यादातर सिनेमाघरों में आठ सौ से तेरह सौ सीटें हुआ करती थीं । फिल्‍मों का कमाया पैसा सब तक पहुंचे इसके लिये ज़रूरी हुआ करता था कि टॉकीज़ कम से कम अस्‍सी प्रतिशत भरे । क्‍योंकि जब टॉकीज़ इतना भरती थी तो प्रोड्यूसर को मुनाफा होना शुरू होता था । इससे कम पर वो नुकसान में ही रहता था । अस्‍सी के दशक के ज़माने में निर्माताओं के सामने ये बड़ी समस्‍या थी कि वो आखिर थियेटरों को भरें कैसे । जब टेलीविजन आया तो फिल्‍मों को और गहरा धक्‍का पहुंचा । टे‍लीविजन ने शहरी मध्‍य वर्ग को सिनेमाघरों से दूर कर दिया । अब सिनेमाघरों तक या तो कामकाजी वर्ग आता था या वो लोग जो टी.वी.खरीदने की ताकत नहीं रखते थे । ऐसे समय में फिल्‍में ज्‍यादा से ज्‍यादा दर्शकों को बटोरने के मकसद से बनाईं जाने
लगीं ।

सत्‍तर के दशक की शुरूआत में कुछ फिल्‍मकारों ने मुहिम चलाई और एक सीमित वर्ग के लिए फिल्‍में बनानी शुरू कीं । ये फिल्‍में कामकाजी मध्‍यवर्ग और छोटे शहरों और क़स्‍बों के पढ़े लिखे वर्ग के लिए बनाई जा रही थीं । इसे तथाकथित रूप से वैकल्‍पक सिनेमा का नाम दिया गया । अस्‍सी के दशक में ऐसी फिल्‍में बड़ी मुसीबत में पड़
गयीं ।

सत्‍तर के दशक में जब वैकल्पिक सिनेमा का दौर आरंभ हुआ तो सिनेमा के सामने कोई प्रतियोगिता नहीं थी । वो क्‍लास और मास दोनों के लिए था । लेकिन जैसे ही टी.वी. सारे देश पर छाया, मध्‍यवर्ग ने सिनेमाघरों से मुंह मोड़ा और टी.वी. से नाता जोड़ा, तो इसका पहला असर इस वैकल्पिक सिनेमा पर ही पड़ा । और धीरे धीरे वो खत्‍म ही हो गया ।

नब्‍बे के दशक के मध्‍य से लेकर आखिर तक हॉलीवुड में भी मल्‍टीप्‍लेक्‍स क्रांति ला चुके थे । वहां पचास के दशक में ही टी.वी. उरूज पर पहुंच चुका था और सिनेमा को नुकसान उठाना पड़ा था । ऐसे में कम सीटों वाले मल्‍टीप्‍लेक्‍सों के आने से हॉलीवुड में तहलका मच गया । ऐसे थियेटरों को भरना ज़रा आसान काम होता था । फिर मल्‍टीप्‍लेक्‍स के आने से दर्शकों को विकल्‍प मिला । बड़े थियेटरों के साथ दिक्‍कत ये थी कि या तो आप फिल्‍म देखिये या छोड़ दीजिये । कोई विकल्‍प नहीं था । सिनेमा से प्‍यार करने वाले हम लोग इसे छोड़ तो सकते नहीं थे, इसलिये जो कुछ परोसा जा रहा था, उसे ही सहते रहे और सिनेमा देखते रहे ।

मल्‍टीप्‍लेक्‍स के आने से सिनेकारों को अहसास हुआ कि जनता सिर्फ भीड़ नहीं है । बल्कि उसमें भी कई वर्ग हैं । और हर वर्ग एक अलग तरह का सिनेमा चाहता है । अब मुमकिन था कि इस तरह के वर्ग के लिए फिल्‍में बनाई जाएं । इसलिये जो धारा सत्‍तर के दशक में शुरू होकर अस्‍सी के दशक में खत्‍म हो गयी थी, वो नब्‍बे के उत्‍तरार्द्ध में फिर से चल पड़ी ।
अब सवाल ये है कि सत्‍तर के दशक के वैकल्पिक सिनेमा और आज की मल्‍टीप्‍लेक्‍स धारा की फिल्‍मों में फर्क क्‍या है । वैसे तो हर पीढ़ी की अपनी चिंताएं,कल्‍पनाएं और सरोकार होते हैं । लेकिन मुझे एक फर्क साफ दिख रहा है । आज की फिल्‍में पहले से ज्‍यादा निजी हैं, लेकिन उनमें सामाजिक या राजनीतिक सरोकारों की कमी नज़र आती
हैं ।

इस दौरान भारत में मध्‍यवर्ग तेज़ी से फैला है । मगर मुझे दुख इस बात का है कि ग्रामीण परिवेश हमारे नक्‍शे से गायब होता चला जा रहा है । और ये बात सिनेमा में भी झलकती है । आज की फिल्‍मों की बजाय सत्‍तर के दशक की फिल्‍मों में ग्रामीण भारत की झलक ज्‍यादा नजर आती थी । इक्‍कीसवीं सदी में ग्रामीण भारत लोगों की चेतना से गायब ही हो गया है ।

मध्‍यवर्ग की सारी चिंताएं और सरोकार केवल खुद को लेकर ही हैं । उनके शहर, उनकी नौकरियां, उनका जीवन बस । अगर कामयाबी के पैमाने पर देखें तो हमारा सिनेमा काफी आगे बढ़ा है, लेकिन विश्‍व स्‍तर पर हमारे सिनेमा की कोई उपस्थिति नहीं है । हम एक ऐसी दुनिया के बारे में सोच रहे हैं जो पश्चिमी यूरोप और अमरीका में तो मौजूद है, पर हमारे अपने देश में नहीं । दुख की बात है कि फिल्‍मकार भी भारत को अपनी महत्‍वाकांक्षाओं के चश्‍मे से ही देखते हैं, इसीलिये वो मुंबई को नहीं देखते, मुंबई में शंघाई को तलाशते हैं ।

युवा निर्देशक सागर बेल्‍लारी के विचार ।
( इनकी ताज़ा फिल्‍म ‘भेजा फ्राइ’ काफी चर्चित रही है )


मैंने ‘भेजा फ्राई’ मल्‍टीप्‍लेक्‍स के लिये नहीं बनाई थी । लेकिन हुआ ये कि इसे पी.वी.आर. और एडलैब्‍स जैसे मल्‍टीप्‍लेक्‍सों की श्रृंखलाओं ने वितरित किया, पर भले ही मल्‍टीप्‍लेक्‍सों ने इसे वितरित किया और जनता तक पहुंचाया, लेकिन मेरा मानना है कि फिल्‍म की कथावस्‍तु और उसका प्रभाव यहां ज्‍यादा महत्‍त्‍वपूर्ण है ।

ये सच है कि एक स्‍क्रीन वाले थियेटर बड़े स्‍टारों की फिल्‍में दिखाते हैं, वहां हमारी फिल्‍में प्रदर्शित करने का खर्च जबर्दस्‍त होता है, ऐसे में मल्‍टीप्‍लेक्‍सों ने मेरे जैसे निर्देशकों के लिए नए मौक़े पैदा किये हैं । अगर पी.वी.आर. जैसा संस्‍थान इसे प्रदर्शित नहीं करता तो शायद मेरी फिल्‍म को इतनी कामयाबी भी हासिल नहीं होती । इससे एक बात साफ हुई है, एक ऐसा कमर्शियल मॉडल सामने आया है, जो हम जैसे निर्देशकों के कलात्‍मक-आग्रह को आर्थिक सफलता से जोड़ता है । पर मैं ये कह देना चाहता हूं कि मैंने अपनी फिल्‍म ‘भेजा फ्राई’ मल्‍टीप्‍लेक्‍स दर्शकों को ध्‍यान में रखकर नहीं बनाई थी बल्कि ‘हिंदी वर्ग’ को ध्‍यान में रखकर बनाई थी ।

हमारे देश में पहले भी छोटी फिल्‍में बनती रहीं हैं, जिन्‍हें वैकल्पिक सिनेमा का नाम दिया जाता रहा है । बासु चैटर्जी, सई परांजपे, ऋशिकेश मुखर्जी जैसे कई निर्देशक इस धारा से जुड़े रहे हैं । ‘भेजा फ्राई’ बनाते हुए मेरे मन में एक ही बात थी, और वो ये कि आज भी एक समझदार कॉमेडी (इंटेलीजेन्‍ट कॉमेडी) की ज़रूरत महसूस की जाती है । जनता खुद ऐसी फिल्‍में चाहती है, और जनता की इस मांग को पहले सई परांजपे ने चश्‍मे बद्दूर जैसी फिल्‍म बनाकर पूरा किया भी है । मैंने भेजा फ्राई बनाकर इस परंपरा को आगे बढ़ाया है, रिवाईव किया है । हालांकि ये सच है कि जैसी तैयार ऑडियेन्‍स मुझे अपनी फिल्‍म के लिए मिली वो ‘चश्‍मेबद्दूर’ को नसीब नहीं हुई । पर ऐसा इसलिये हुआ कि आज बहुत बड़े बदलाव आ चुके हैं । आज लोग ज्‍यादा ट्रैवल करते हैं । उनके पास घर में डी.वी.डी.प्‍लेयर आ चुके हैं, और उस पर वो विश्‍व भर के सिनेमा को देख सकते हैं । दर्शकों की रूचि और उनकी मांग में भी बदलाव आया है । इसलिये नई और तरोताज़ा फिल्‍में बनाने की गुंजाईश बढ़ी है । लेकिन ये बता दूं कि इसकी वजह मल्‍टीप्‍लेक्‍स क्रांति नहीं है । बस मल्‍टीप्‍लेक्‍स इसे भुनाने की कोशिश भर कर रहे हैं ।

सवाल ये है कि क्‍या आज भारत में वाकई सिनेमा की एक ‘नई धारा’ चल पड़ी है । मेरा जवाब होगा---नहीं । ऐसा तो तब कहा जा सकता है जब कम से कम चार पांच ऐसे निर्देशक हों, जो सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विश्‍व स्‍तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहे हों । जबकि हमारा मुख्‍य धारा का पेशेवर सिनेमा दुनिया के सरोकारों को ध्‍यान में रखकर बनाया ही नहीं जाता । मारे पास अच्‍छे निर्देशकों, निर्माताओं और सबसे ज्‍यादा अच्‍छी स्क्रिप्‍टों की भारी कमी है ।

अपनी फिल्‍म ‘भेजा फ्राई’ के लिए मैंने नये और गैर परंपरावादी अभिनेता जमा किये, पर इसके बावजूद ये फिल्‍म लो‍कप्रिय हुई । मैँने कम मशहूर कलाकारों को इसलिये लिया क्‍यों‍कि मैं स्‍टार्स को अफोर्ड ही नहीं कर सकता था । सवाल ये है कि अगर हमारे पास बजट अच्‍छा होता तो मैं क्‍या करता । मेरा जवाब है, मैं बेहतर कॉस्‍ट्यूम चुनता, बेहतर सेट लगाता । लेकिन शायद तब भी मैं बड़े स्‍टारों को नहीं लेता क्‍योंकि वो अपने साथ अपने तरह के दबाव और सीमाएं लेकर आते हैं । और नये ज़माने का फिल्‍मकार होने के नाते मुझे फायदा ये मिला है कि मैं स्‍टार्स के बिना भी काम कर सकता हूं । क्‍योंकि अब फोकस स्‍टारों पर नहीं बल्कि ‘कन्‍टेन्‍ट’ या कथावस्‍तु पर आ टिका है । और ये एक बहुत प्‍यारी सी तरक्‍की है ।

पर मैं फिर से ज़ोर देकर कहना चाहता हूं कि हमारे सिनेमा में कोई नई धारा नहीं आई है, हां उसका इंतज़ार हम सबको है । वो तब तक नहीं आयेगी जब तक हम लगातार आला दर्जे की फिल्‍में नहीं बनायेंगे ।


‘इंडियन एक्‍सप्रेस से साभार’
प्रयास यही रहेगा कि कल अगली कड़ी प्रस्‍तुत करूं ।





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Wednesday, June 27, 2007

कोई बताए कि मदनमोहन वाली पोस्‍ट पर आई ये टिप्‍पणी किस भाषा की है और ये क्‍या लिखा है

प्रिय मित्रो
मदनमोहन के जन्‍मदिन पर मैंने एक पोस्‍ट लिखी थी, और इसके जवाब में आप सबने अपने पसंदीदा गीत बताए थे । इस पोस्‍ट पर किन्‍हीं रोड्रिगो की टिप्‍पणी आई है । जो किसी यूरोपीय भाषा की लग रही है । हो सकता है ये स्‍पेनिश भाषा हो ।

इन्‍होंने अपने ब्‍लॉग का लिंक भी छोड़ा है । जिसे आप सब देख सकते हैं । अगर किसी साथी को ये भाषा समझ आती हो तो कृपया बताएं कि इन्‍होंने क्‍या लिखा है ।


Rodrigo said...
Oi, achei teu blog pelo google tá bem interessante gostei desse post. Quando der dá uma passada pelo meu blog, é sobre camisetas personalizadas, mostra passo a passo como criar uma camiseta personalizada bem maneira. Até mais.
June 27, 2007 6:32 AM

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Wednesday, May 23, 2007

अंतर्धर्म विवाह और हमारा समाज


रविवार के Hindustan Times में तविशी पैठणी रस्‍तोगी और कोलीन ब्रिगान्‍ज़ा ने एक अच्‍छी cover story की है, शीर्षक है beyond belief. इसमें इन दोनों महिला पत्रकारों ने कुछ ऐसे celebrity जोड़ों से बातचीत की है, जिन्‍होंने अंतर्धर्म विवाह किया है । इनमें शामिल हैं—मशहूर अभिनेत्री, भूतपूर्व मॉडल और समाज सेविका नफीसा अली सोढ़ी ( ताज़ा फिल्‍म मेट्रो ) और उनके पति पिकल्‍स सोढ़ी । अभिनेता इरफान खान और उनकी पत्‍नी सुतपा सिकदर । छोटे पर्दे के अभिनेता इक़बाल ख़ान और उनकी पत्‍नी स्‍नेहा छाबड़ा । निर्देशक कबीर खान ( फिल्‍म काबुल एक्‍सप्रेस ) और उनकी पत्‍नी अभिनेत्री मिनी माथुर । नवाब पटौदी और शर्मिला टैगोर । इस लेख में इन तमाम हस्तियों से बातचीत करके ये पड़ताल करने का प्रयास किया गया है कि क्‍या शादी या शादीशुदा जिंदगी में कभी धर्म आड़े आता है । इन पांचों जोड़ों ने इस बात से इंकार किया है कि अंर्तधर्म विवाह के बाद उन्‍हें कोई समस्‍या आई । इनमें ज्‍यादातर जोड़ों का मानना यही रहा कि वो बच्‍चों पर किसी खास धर्म को अपनाने का ज़ोर नहीं डालेंगे । बल्कि उन्‍हें आज़ाद छोड़ देंगे ताकि वो अपनी मरज़ी से किसी धर्म को अपना सकें । पिकल्‍स सोढ़ी ने बड़ी महत्‍त्‍वपूर्ण बात कही अपनी शादी के बारे में, उनका कहना था कि हमने एक दूसरे से विवाह किया था, अपने धर्मों से नहीं । अभिनेता इरफान खान ने बड़ी ही अहम बात कही, उनका कहना था कि धर्म बेहद निजी मामला है, आप जिससे प्रेम करते हैं अगर वो आपका धर्म नहीं अपनाता, तो उससे क्‍या फ़र्क़ पड़ता है, क्‍या इससे उसके प्रति आपका प्‍यार कम हो जाता है, अगर हां तो इसका मतलब ये कि आप उस शख्‍स से सच्‍चा प्‍यार नहीं करते । फिल्‍म निर्देशक कबीर खान ने कहा कि धर्म उनकी या किसी की भी रोज़मर्रा की जिंदगी में कोई असर नहीं डालता । शर्मिला टैगोर ने कहा कि जब दो लोग प्रेम करते हैं तो इस बात से कोई फ़‍र्क़ नहीं पड़ता कि वो मंदिर या मस्जिद जाते हैं या नहीं ।
मुद्दा बहुत ही अहम है । आज विचारधारा बदल रही है । शादी के मामले में नौजवान पीढ़ी धर्म के खांचे से बाहर निकल रही है । अंर्तर्धम विवाह बढ़ रहे हैं । आमतौर पर शुरूआत में तो माता-पिता की सहमति नहीं होती, पर धीरे धीरे मजबूरी के तहत या एडजेस्‍टमेन्‍ट के लिए बुज़ुर्ग पीढ़ी भी इसे स्‍वीकार कर ही लेती है । यक़ीन मानिए अगर माता पिता की सहमति हो जाए तो ये युवा, अदालत या आर्य समाज में जाकर चुपके से शादी क़तई ना करें । पर जैसे ही कोई बेटा या बेटी अपने माता पिता से दूसरे धर्म में शादी करने की बाद कहता है, परिवार में ज्‍वालामुखी फट जाते हैं, भूकंप और सुनामी आने लगते हैं । विचित्र हालात पैदा हो जाते हैं । जान देने की धमकियां दी जाती हैं । और दो ही संभावनाएं बनती हैं, या तो नई पीढ़ी अपने प्‍यार का गला घोंट दे या फिर क्रांति कर दे ।
मैंने देखा है कि जब हिंदू और मुस्लिम धर्मों के बच्‍चे अंतधर्म विवाह की बात करते हैं तब कुछ ज्‍यादा ही हंगामा होता है, क्‍योंकि समाज इन्‍हें परस्‍पर उलट धर्म मानता है । ज्‍यादातर लोगों का यही मानना है कि इन धर्मों के बीच होन वाले शादी के रिश्‍ते ज्‍यादा दूर तक नहीं जा पाते, निभ नहीं पाते । इस आलेख के आरंभ में एक अखबार के बहाने कुछ सेलिब्रिटी जोड़ों की मिसाल दी गयी है । लेकिन मेरा ये कहना है कि केवल मशहूर हस्तियां ही इस तरह की शादी की तरफ क़दम नहीं बढ़ातीं । बल्कि भारत के धूल, धूप और धुंए में सराबोर छोटे शहरों और क़स्‍बों में भी लोग ये साहस करते हैं और तमाम मुश्‍किलों के बावजूद अपने रिश्‍तों को साबित करके दिखाते हैं । मैं इस बात को भी रेखांकित करना चाहता हूं कि मशहूर और कामयाब लोगों का सफर तो फिर भी आसान होता है, क्‍योंकि महानगरों के जिस वर्ग में उनका उठना बैठना है वहां ये सब स्‍वीकार्य है । पर बहुत मध्‍यवर्ग में तो इस तरह की शादियां आज भी कौतुहल और जिज्ञासा का केंद्र होती हैं । लोग चुनौतियां देते हैं कि इनकी ज्‍यादा निभेगी नहीं, सवाल उठाये जाते हैं कि तुम्‍हारे बच्‍चे किस धर्म को अपनायेंगे ।
अब एक और बहुत महत्‍त्‍वपूर्ण मुद्दा । आमतौर पर अगर लड़की हिंदू और लड़का मुस्लिम हुआ तो अकसर ये देखा जाता है कि लड़के का परिवार साम दाम दंड भेद का इस्‍तेमाल करके या इमोशनल ब्‍लैकमेल करके लड़की को कन्‍वर्ट करने को राज़ी करा लेते हैं । और बहुत सारे ‘वर’ अपनी मान्‍यता वश या फिर मां बाप की खुशी के लिए अपनी पत्‍नी को कन्‍वर्ट करवा लेते हैं । अगर दोनों इस बात के लिये बेहिचक राज़ी हैं तो कोई हर्ज नहीं है, लेकिन अगर ऐसा मजबूरी के तहत किया जा रहा है और इससे उनकी पारिवारिक जिंदगी पर असर पड़ता हो तो दिक्‍कत की बात है । बहरहाल हर शहर में आपको कुछ ऐसी मिसालें मिल जायेंगी, जहां कुछ लोगों ने अपने धर्म से बाहर विवाह किया और बिना कन्‍वर्ट हुए या बिना कन्‍वर्ट कराए एक शानदार जिंदगी जी है ।
अब समय आ गया है कि समाज अंर्तधर्म विवाह के लेकर अपने संकीर्ण नज़रिए में बदलाव लाए । और सर्वधर्म एकता के इस साकार रूप को अपनाए, इससे आपके धर्म को कोई नुकसान नहीं होगा । ना ही आपकी संस्‍कृति खतरे में पड़ेगी ।
अगर आप ये सोच रहे हैं कि मैं किस हैसियत से ये बातें कर रहा हूं तो बता दूं कि मैंने स्‍वयं अंर्तधर्म विवाह किया है । और हम मज़े में हैं ।






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