संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Wednesday, May 1, 2019

खेला फुटबॉल खेला-- मन्‍ना डे के जन्‍मदिन पर विशेष




आज मज़दूर दिवस है और आज ही है हमारे प्रिय गायक मन्‍ना डे का जन्‍मदिन भी। जब तक मन्‍ना डे हयात थे, फोन पर उन्‍हें बधाई देते थे और कृतज्ञता ज्ञापन भी कि आपने हमारी जिंदगी को अपनी आवाज़ से सुनहरा बनाया है।

आज मन्‍ना डे के जन्‍मदिन के मौक़े पर उनके एक अनमोल गाने की याद और उसकी कहानी। 16 अगस्‍त 1980 को कोलकाता के ईडन गार्डन्‍स में भारत के दो सबसे पुराने और पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी क्‍लबों मोहन बागान और ईस्‍ट बंगाल के बीच
कोलकाता डर्बीनामक मुक़ाबला हो रहा था। मोहन बागान के कप्‍तान थे--कॉम्‍प्‍टन दत्‍ता और ईस्‍ट बंगाल के कप्‍तान थे—सत्‍यजीत मित्रा। इस मैच में हुआ ये कि बार-बार फाउल के बावजूद जब एक टीम के खिलाडियों को रेफरी ने कार्ड नहीं दिखाया, उन्‍हें सज़ा नहीं दी तो स्‍टेडियम में दोनों टीमों के समर्थकों के बीच ज़ोरदार झड़प हो गयी। आमतौर पर दोनों टीमों के समर्थकों को अलग अलग गैलेरीज़ में बैठाया जाता था पर जाने क्‍यों उस दिन मिले-जुले समर्थक बैठे थे। स्‍टेडियम में ज़ोरदार हिंसा हुई। ऐसे में दर्शक अपनी जान बचाने के लिए गेट की तरफ भागे। कुछ लोगों ने ऊँचाई से कूदकर भागने की भी कोशिश की। गेट संकरे थे, पुलिस की व्‍यवस्‍था पर्याप्‍त नहीं थी, इस वजह से कुल 16 लोगों की इस अशांति में मौत हो गयी थी और बड़ी तादाद में लोग घायल भी हुए थे।

नतीजा ये हुआ कि
कोलकाता डर्बीके आगे के सारे मैच रद्द कर दिए गए और दोनों टीमों पर भारी मात्रा में फाइन भी लगाया गया। कोलकाता के फुटबॉल के दीवानों को इस घटना से भारी झटका लगा। आगे चलकर इसका असर ये हुआ कि फुटबॉल के पारंपरिक बांग्‍ला फैन्‍स ने मैदान में मैच देखना आना कम कर दिया। परिवार के लोगों ने सुरक्षा के मद्देनज़र जमकर विरोध किया। लोगों को जाने ही नहीं दिया जाता था। इससे उबरने में तकरीबन दो दशक लग गये।

भारतीय फुटबॉल फेडरेशन ने मारे गये लोगों की याद में इस दिन को
फुटबॉल लवर्स डेघोषित कर दिया। इस मौक़े पर मन्‍ना दा ने एक गाना गाया- जिसके बोल थे—खेला फुटबॉल खेला। इस गाने को लिखा था-सत्‍या बंदोपाध्‍याय ने और कंपोज़ किया था सुपर्ण कांति घोष ने। इस गाने के बाद लोगों से पैसे जमा किये गये और इस तरह जमा रकम मृतकों के परिजनों को सौंप दी गयी थी। इस गाने का संदेश था खेल को प्रेम से खेला जाये। मिल जुलकर रहा जाये। खेल के नाम पर हिंसा ना की जाए। फुटबॉल से जुड़ा ये सारी दुनिया में अपनी तरह का अनूठा गीत है।

आपको ये भी बता दें कि मन्‍ना दा और सचिन देव बर्मन फुटबॉल के परम दीवानों में से रहे हैं। अपनी टीम के कट्टर समर्थक। आज मन्‍ना डे के सौवें जन्‍मदिन और उनकी जन्‍मशती की शुरूआत के मौक़े पर ये बहुत ही खा़स गीत आप सबकी नज़र। 


Song: khela Football Khela
Singer: Manna Dey
Lyrics: Satya Bandopadhyay
Music: Suparn kanti Ghosh
Duration: 06:08 






ये रहे इस गाने के अधूरे बोल
(पूरे बोल किसी के पास रोमन में हों तो कृपया भेजें)

khela football khela
khela football khela
khoka dekhte gelo
sei sakal bela
khela football khela…..

chhoto baro teami er khela
shato shato loker mela
khoka dekhte gelo
sei sakal bela
khela football khela…..
oi oi oi jarsi pore
namlo duto dal hajar hajar lok hoye othe chanchal
khokar mukhe ghamer alpona
chokher taray utte jona
khokar mukhe ghamer alpona
chokher taray utte jona
ke jete ke hare ke kata gol kare
ke kata gol kare
ke kata gol kare
referir huisel khela holo shuru
kapchhe buk aj duru duru
chhutchhe je bal e gol theke o gole
mete uthechhe math lokeder bhishon kalorole
uttejonay fatchhe mather buk
alo adhari hochchhe khokar mukh
hathath khelte khelte kheloarder laglo thokathuki
sange sange darshok der hate iter lofalufi
nimeshete khelar mather aj bodle gelo rup
ranokhetro ar kake bale khoka bhaye chup
praner bhaye chhutlo manush
sabai dishshara
sara mathe boye gelo
rakto gangar dhara
sabar sathe chhutlo





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Tuesday, April 9, 2019

मुखड़ा मजरूह का--अंतरे हसरत के




आज हमारा ये संगीत-ब्‍लॉग
रेडियोवाणीअपने बारह वर्ष पूरे करने जा रहा है।

एक ज़माना था जुनून था ब्‍लॉगिंग का। हालांकि हर बरस हम यह सोचते हैं कि अब ब्‍लॉगिंग को और आगे बढ़ाया जाएगा—पर अनेक कारणों से ऐसा हो नहीं पा रहा है। बीते कुछ बरस से तो फेसबुक पर संगीत पर लिखने के अपने शौक़ को आगे बढ़ाया जा रहा था पर फिलहाल तो हम
अन्‍य व्‍यस्‍तताओं के चलतेे फेसबुक से कुछ दिनों के लिए दूर हैै।  हमारे लिए
रेडियोवाणीकी सालगिरह बहुत ही ख़ास दिन होता है, ब्‍लॉगिंग के सुनहरे दौर ने जीवन की बेमिसाल यादें दी हैं।

रेडियोवाणी के ज़रिए बीते इन सालों में हमने संगीत के सागर में गहरी डुबकी लगायी है और जो कुछ हमें अच्‍छा लगा
, मन भाया उसे पेश किया है। ख़ैयाम साहब की बात हमेशा मन में गूंजती है कि संगीत एक इबादत है और लोग इसे भूलते जा रहे हैं। फिर मजरूह का शेर रेडियोवाणी का नारा बन चुका है-हम तो आवाज़ हैं दीवारों से छन जाते हैं

रेडियोवाणी की सालगिरह के इस मौक़े पर हम अपने बहुत ही प्रिय गीतकार मजरूह को ही नमन कर रहे हैं। इसकी एक वजह ये भी है कि ये बरस मजरूह का जन्‍मशती वर्ष है। मजरूह के शैदाईयों के लिए जश्‍न मनाने का बरस। कोशिश रहेगी कि इस बरस भर हम मजरूह की बातें करते रहें
, बतौर शायर भी और बतौर गीतकार भी।

एक बड़ी ही दिलचस्‍प बात बीते कुछ बरसों से मन में गूंज रही थी। और वो ये कि मजरूह ने
तीसरी क़सम का एक गीत लिखा था। पर ऐसा कोई साक्ष्‍य नहीं था हमारे पास। रिकॉर्ड में खोजबीन की—तो भी बात नहीं बनी। क्‍योंकि मजरूह के क्रेडिट वाला रिकॉर्ड हाथ नहीं लगा। पता नहीं है भी या नहीं।



बहरहाल...अज़ीज दोस्‍त पवन झा ने बताया कि वह गाना है—
दुनिया बनाने वाले क्‍या तेरे मन में समाई/ काहे को दुनिया बनायी। इसका मुखड़ा मजरूह का था और इसे आगे चलकर हसरत जयपुरी ने पूरा किया था। आगे चलकर इस खोजबीन में मदद की एक और अज़ीज़ दोस्‍त असद-उर-रहमान किदवई ने। उन्‍होंने यूट्यूब से खोजकर हमें यह वीडियो भेजा। इसे आप भी देखिए और सुनिए--






इस वीडियो को सुनने से पहले ये समझना ज़रूरी है कि मजरूह यूनानी चिकित्‍सा में डिप्लोमा थे और मुंबई के एक प्रसिद्ध मुशायरे में नामचीन शायर जिगर मुरादाबादी के साथ आए थे। इसी दौरान जाने माने निर्माता निर्देशक ए.आर. कारदार ने मजरूह को फिल्‍मों में गाने लिखने का न्‍यौता दिया था। ये 1946 की बात है जब मजरूह ने
जब दिल ही टूट गयाऔर ‘ग़म दिए मुस्‍तकिल’ जैसे कालजयी गीत रच दिए थे- और इन्‍हें सहगल ने गाया था। संगीत नौशाद का था। मजरूह तरक्‍कीपसंद शायर थे। यानी वो उस टोली के शायर थे जिसमें साहिर लुधियानवी, अली सरदार जाफरी और कैफी आज़मी जैसे सितारे जगमगा रहे थे और जो चाहते थे कि दुनिया में सबको रोशनी बराबर मिले, सबका हक़ बराबर हो। कोई छोटा बड़ा ना हो।

बहरहाल... जैसा कि वीडियो में मजरूह बता रहे हैं कि जब सन 1948 में राजकपूर
आग बना रहे थे—तो उन्‍हें एक गाने की ज़रूरत थे, जो बतौर तोहफा मजरूह ने राजकपूर को दे दिया था। वो गाना था ये--'रात को जी चमकें तारे' 

ये वो दौर था जब एक गाने की फीस औसतन ढाई सौ रूपए होती थी
, यानी डिप्टी कलेक्‍टर की तनख्‍वाह के बराबर। पर मजरूह ने पैसे नहीं लिए तो नहीं लिए। सन 1950 में जब अंदाज़बहुत कामयाब हुई और इसके गाने जनता की ज़बान पर चढ़ गए—उन्‍हीं दिनों में समाजवाद का सपना मजरूह को टूटा हुआ सा दिख रहा था और उन्‍होंने तब के हालात का विरोध करते हुए लिखा था-

कौन कहता है इस धरती पर अमन का झंडा लहराने ना पाए
ये भी हिटलर का चेला है मार दे साथी जाने ना पाए


इस गाने का जो संदेश था
, इसके जुर्म में मजरूह के नाम का वॉरंट निकल गया। और उनके जेल जाने की नौबत आ गयी। जब ये बात राजकपूर को पता चली तो वो मजरूह के पास आए और उनसे कहा कि देखिए आपने एक गाना आगमें लिखा था, एक और लिख दीजिए—गाने का विषय कुछ ये है कि ऊपर वाले तूने ये दुनिया क्‍यों बनायी। तो मजरूह ने मुखड़ा लिखा—

दुनिया बनाने वाले क्‍या तेरे मन में समायी/
तूने काहे ये दुनिया बनायी
 
 
संभवत: मजरूह ने इसके अंतरे भी लिखे होंगे
, जिनका इस्‍तेमाल ना किया गया हो। या हो सकता है कि केवल मुखड़ा दिया हो और आगे का गाना राजकपूर या शैलेंद्र ने हसरत जयपुरी से लिखवाया हो और राजकपूर ने इसके बदले में मजरूह को एक हजार रूपए दिए थे ताकि अगर जेल हो भी जाए तो उनके परिवार की मदद हो जाए। कोई दिक्‍कत ना पेश हो।

जो भी हो गाना—
तीसरी क़समका ये गाना बड़ा ही अद्भुत बन पड़ा है और जीवन की राहों में अकसर ये सवाल हमारे मन में उठ खड़ होता है—बिलकुल इन्‍हीं शब्‍दों में यह सवाल हमारे मन में आता है।

इस गाने का असली आनंद संवादों के साथ है। इसलिए आज रेडियोवाणी पर हम संवादों वाला संस्‍करण ही लाए हैं।




पवन झा के सौजन्‍य सेे इस गाने का सुमन कल्‍याणपुर वाला कम सुना संस्‍करण






ये रही इस गाने की इबारत

काहे बनाये तूने माटी के पुतले
धरती ये प्‍यारी प्‍यारी मुखड़े ये उजले
काहे बनाया तूने दुनिया का खेला
जिसमें लगाया
जवानी का मेला
गुपचुप तमाशा देखे
, वाह रे तेरी खुदाई
काहे को दुनिया बनायी।।

तू भी तो तड़पा होगा मन को बनाकर
तूफां ये प्‍यार का मन में छुपाकर
कोई छबि तो होगी आंखों में तेरी
आंसू भी छलके होंगे पलकों से तेरी
बोल क्‍या सूझी तुझको
, काहे को प्रीत जगायी
काहे को दुनिया बनायी।।

प्रीत बनाके तूने जीना सिखाया
हंसना सिखाया रोना सिखाया
जीवन के पथ पर मीत मिलाए
मीत मिलाके तूने सपने जगाए
सपने जगाके तूने काहे को दे दी जुदाई
काहे को दुनिया बनायी।।



तो रेडियोवाणी की बारहवीं सालगिरह पर ये थी एक विशेष पोस्‍ट।
अगली पोस्‍ट में जिस विषय पर बातें होंगी
, वो है--
'मुखड़ा किसी और का—गाने किसी और का'।

तो सोच क्‍या रहे हैं
, बधाई नहीं देंगे क्‍या हमें।


तीसरी कसम का पोस्‍टर cinestaan से साभार 



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Sunday, March 24, 2019

कायम है जादू गुलज़ार का।।




ये सच है कि फिल्‍म-फेयर पुरस्‍कारों में अब वो चमक बाक़ी नहीं रह गयी
, जो किसी ज़माने में हुआ करती थी। शायद इसकी एक वजह है पुरस्‍कारों की बढ़ती भीड़...। वैसे भी हर बेहतरीन परंपरा की चमक कभी ना कभी फीकी पड़ ही जाती है। इस बार के फिल्‍मफेयर पुरस्‍कारों की फेहरिस्‍त से गुज़रते हुए मुझे एक दिलचस्‍प तथ्‍य नज़र आया और यही इस लेख का कारण बन गया है। इस बार फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार एक पिता-पुत्री की जोड़ी ने जीता है। हरिंदर सिक्‍का की पुस्‍तक कॉलिंग सहमतपर आधारित मेघना गुलज़ार की फिल्‍म राज़ीने सर्वश्रेष्‍ठ फिल्‍म का पुरस्‍कार तो जीता ही है, आलिया भट्ट सर्वश्रेष्‍ठ अभिनेत्री करार दी गयीं, अरिजीत सिंह सर्वश्रेष्‍ठ गायक बने हैं। मज़ेदार बात ये है कि मेघना गुलज़ार ने सर्वश्रेष्‍ठ निर्देशक का पुरस्‍कार जीता है और उनके पिता गुलज़ार बने हैं सर्वश्रेष्‍ठ गीतकार।

चलिए पहले तथ्‍यों के गलियारों में एक चक्‍कर काट लिया जाए। संभवत: यह पहला मौक़ा है जब पिता पुत्री की जोड़ी को फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार मिला है। यहां ये भी बता दिया जाए कि गुलज़ार के पास फिल्‍मफेयर अवॉर्ड की एक लंबी क़तार है। गुलज़ार के पास अलग-अलग कैटेगरी के कुल 21 फिल्‍मफेयर अवॉर्ड हैं। और इस फेहरिस्‍त में वो सबसे ऊपर हैं। पहली बार उन्‍होंने फिल्‍म
आनंद के लिए सर्वश्रेष्‍ठ संवाद लेखक का फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार जीता था। फिर नमक हरामके लिए भी संवाद लेखक का पुरस्‍कार। बतौर गीतकार उन्‍होंने कुल 12 बार फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार जीता है। और मुझे लगता है कि ज़रूरी है कि हम उन सभी पुरस्‍कारों का जिक्र कर दें।

1978 में फिल्‍म
घरौंदाके गाने दो दीवाने शहर मेंके लिए सर्वश्रेष्‍ठ गीतकार का पहला फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार उन्‍होंने जीता था।


  


उसके बाद
गोलमाल’, ‘थोड़ी-सी बेवफाई’, ‘मासूम’, ‘इजाज़त’, ‘लेकिन’, ‘दिल से’, ‘साथिया’, ‘बंटी और बबली’, ‘इश्‍किया’, ‘जब तक है जानऔर अब राज़ी। यहां मैंने गानों के बोल जान-बूझकर नहीं दिये हैं। आप आसानी से इन्‍हें खोज सकते हैं।


गुलज़ार को फिल्‍म
राज़ीके ए वतनगाने के लिए सर्वश्रेष्‍ठ गीतकार का फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार मिला है।






आपको बता दें कि इस गाने की रचना-प्रक्रिया बड़ी मजेदार रही है। बात ये है कि
देशभक्ति गीतों के अकाल के इस समय में किसी फिल्‍म में ऐसा गीत आये जो अल्‍लामा इकबाल से प्रेरित होतो इसे एक बड़ी घटना क्‍यों ना माना जाए। अपने एक इंटरव्‍यू में गुलज़ार ने कहा भी है कि इस गीत की प्रेरणा उन्‍हें बचपन में गाये जाने वाले इकबाल के एक गीत से मिली। ये गीत गुलज़ार के स्‍कूल में गाया जाता था। जिन पंक्तियों ने गुलज़ार को प्रेरित किया हैवो हैं—‘लब पे आती है दुआ बनके तमन्‍ना मेरी/ जिंदगी शम्‍मा की सूरत हो खुदाया मेरी। अल्‍लामा इकबाल की ये रचना बच्‍चे की दुआ सन 1902 की है और कई स्‍कूलों में इसे प्रार्थना के तौर पर गाया जाता है। गुलज़ार ने इन पंक्तियों को भी गाने में शामिल किया है। इसी गाने के लिए अरिजीत सिंह को सर्वश्रेष्‍ठ गायक का फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार मिला है।


एक और दिलचस्‍प तथ्‍य आपके सामने रख दिया जाए। गुलज़ार ने बतौर गीतकार भले ही 12 फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार जीते हैं पर मजेदार बात ये है कि उन्‍हें कुल 36 बार नॉमिनेट किया जा चुका है। यानी तकरीबन हर बरस उनका कोई ना कोई गाना नामांकित ज़रूर होता है।


 बहरहाल.. सवाल ये है कि वो क्‍या है जो गुलज़ार को इतना बड़ा गीतकार बनाता है। बहुत सारे लोग
, बल्कि ये कहें कि गुलज़ार के आलोचक उन्‍हें सजावटी गीतकार मानते हैं, शब्‍दों का बाज़ीगर कहते हैं। मुझे लगता है कि इस तरह हम उनके काम को रिड्यूस नहीं कर सकते। गुलज़ार अपनी गीतकारी से अहसास ये उस धरातल तक जाते हैं—जहां बहुत ही विरले गीतकार जा सके हैं। उनके बहुत सारे गानों को भले ही मजरूह जैसी क्‍लासिक गीतकारी के दर्जे में नहीं खड़ा किया जा सकता, पर वे अनमोल गीत हैं। उनमें शब्‍दों और संवेदना की बेहतरीन कारीगरी देखने को मिलती है। मजरूह कहते थे कि गाना फिल्‍म की कहानी और उसके किरदारों में बड़ी गहराई से धंसा होना चाहिए। इसलिए वो कभी गे गे गेली ज़रा टिम्‍बकटूतो कभी अंग्रेजी में कहते हैं कि आय लव यूजैसे गाने लिखते हुए देखे तो कभी हम हैं मता-ए-कूचओ बाज़ार की तरह भी लिखते दिखे

बहरहाल... गुलज़ार का पहला गीत सन 1963 में फिल्‍म
बंदिनीमें आया था—मोरा गोरा अंग लै ले




बीते 56 सालों में गीतकारी का पूरा व्‍याकरण ही बदल गया है पर फिर भी गुलज़ार के गानों के कुछ प्रयोगों की बानगी देखिए—

नीली नीली इक नदिया/ अंखियों के दो बजरे/
घाट से फिरी नदिया/ बिखर गये गजरे/
डूबे डूबे मितवा बीत मंझधारे/
भिड़े रे भिड़े नैना/ नैना बंजारे





अल्‍ला जाने मेरी छत पे
क्‍यों इतना कम सिग्‍नल है
पैदल है या ऊँट पे निकला
या माइकल की साइकिल है
आज दिल दौड़े सौ मीटर
कहके हैलो हैलो हैलो


  


फसलें जो काटीं उगती नहीं हैं
बेटियां जो ब्‍याही जायें मुडती नहीं हैं
ऐसी बिदाई हो तो
, लंबी जुदाई हो तो
दहलीज़ दर्द की पार करा दे





निद्रा में किसने याद कियो रे
जगाए सारी रैना रे
पिया जगावै
, जिया जगावै, दिया जगावै रे
आवै रे हिचकी

संदेसा आयो ना
, चिठिया भी जाई
सावण में सूखे नैना रे
तलैया सूखी
, कीकर सूखा, भीतर सूखा रे
आवै रे हिचकी...






चलिए गुलज़ार के आपके पसंदीदा गानों और उनके तत्‍वों की बात करें। और जिन लोगों को गुलज़ार पसंद नहीं—वो भी अपनी बात कहें।



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Sunday, December 10, 2017

|| शशि कपूर के जाने का मतलब ||



शशि कपूर का जाना हिंदी के एक बड़े हीरो का जाना ही नहीं है।
 
असल में शायद हम समझ नहीं रहे हैं कि दृश्‍य से उनके अनुपस्थित हो जाने का क्‍या मतलब है। शशि केवल शरीर से मौजूद थे। मन से वो कब के अपने भीतर विलुप्‍त हो चुके थे।
उनके जाने के मायने हैं रंगमंच के एक बड़े स्‍तंभ का जाना।
पृथ्वी थियेटर मुंबई में रंगमंच का गढ़ है। पृथ्‍वी अब सांस्‍कृतिक अड्डा है। पृथ्‍वी में अपनी प्रस्‍तुति देना तमाम कलाकारों का सपना होता है। उनकी ललक होती है बार बार पृथ्‍वी के मंच पर अपनी पेशकश देने की। पृथ्‍वी को सजाया संवारा शशि ने है।
शशि के बारे में आप तमाम बातें तो जानते पढ़ते ही रहे हैं। अभी उनके निधन के बाद और भी सब पढ़ने को मिला ही होगा। आपको शशि होने का मतलब समझाया जाए।
सन 1975 में चलिए। शशि की मशहूर फिल्‍में आयी हैं—‘प्रेम कहानी’, ‘चोरी मेरा काम’ और ‘कभी कभी’। इसके बाद ‘फकीरा’, ‘ईमान-धरम’, ‘मुक्ति’, ‘दूसरा आदमी’ और ‘सत्‍यम शिवम सुंदरम’। यानी सन 75 से 77 के बीच शशि ठेठ फिल्‍मी काम कर रहे हैं। वो पेड़ के इर्द गिर्द हीरोइन के साथ गाना गा रहे हैं। वो सौंदर्य के पुजारी नज़र आ रहे हैं। लेकिन परदे के पीछे क्‍या चल रहा है इसे भी देखा जाए।
1978 में रिलीज़ होती है ‘जुनून’ जो रस्किन बॉन्‍ड की रचना ‘फ्लाइट ऑफ अ पिजन’ पर आधारित है। जुनून श्‍याम बेनेगल की सातवीं फिल्‍म है। वो समांतर सिनेमा के एक बड़े स्‍तंभ बन चुके हैं। अंकुर, चरणदास चोर,निशांत, मंथन, भूमिका और कोंडुरा जैसी फिल्‍में उन्‍हें दिग्‍गजों की कतार में ले जाती हैं। और पेशेवर सिनेमा का एक खिलंदड़ हीरो उनकी अगली फिल्‍म को प्रोड्यूस करता है। जुनून को तीन नेशनल अवॉर्ड मिलते हैं। और एक फिल्‍म फेयर भी।
इसके बाद श्‍याम बेनेगल की अगली फिल्‍म ‘कलयुग’ का निर्माण भी शशि ही करते हैं। कलयुग आधुनिक महाभारत है। ये फिल्‍म 24 जुलाई 1981 को रिलीज़ होती है। ज़रा देखिए कि तकरीबन इन्‍हीं दिनों में शशि परदे पर क्रांति, शान, सिलसिला जैसी फिल्‍मों में दिखते हैं। और ‘कलयुग’ फिल्‍म फेयर पुरस्‍कार जीतती है।
शशि यहां रूकते नहीं हैं। अभिनेत्री अपर्णा सेन को वो निर्देशिका बना देते हैं। और इस तरह 1981 में आती है‘छत्‍तीस चौरंगी लेन’। जिसकी बातें करते लोग आज भी नहीं थकते। बल्कि लोग अलग अलग दृश्‍यों और उनसे जुड़े अहसासों, स्‍मृतियों की बात करते हैं। इस फिल्‍म में शशि की जीवन संगिनी जेनिफर अपनी पूरी गरिमा के साथ हैं।
जिन दिनों में शशि ‘नमक हलाल’ में ‘रात बाक़ी….’जैसे गाने पर प्‍याले छलका रहे हैं—उन्‍हीं दिनों में फिल्‍म् उत्‍सवों और गंभीर सिनेमा के हलकों में कमाल कर रही है गोविंद निहलानी की फिल्‍म ‘विजेता’। वो ‘जुनून’ के लिए सिनेमेटोग्राफर के रूप में नेशनल अवॉर्ड जीत चुके हैं। ‘आक्रोश’ बना चुके हैं और अगले बरस वो फिल्‍म लेकर आने वाले हैं जो उनकी पहचान बन जायेगी। अर्धसत्‍य 1983 में आती है। विजेता के बाद। विजेता के लिए गोविंद बतौर सिनेमेटोग्राफर फिर अवॉर्ड जीतते हैं।
शशि चुपके चुपके अपना काम कर रहे है। ये वो दिन हैं जब पृथ्‍वी भी युवा अभिनेताओं का अड्डा बन चुका है। 1978 में जुहू में पृथ्‍वी की शुरूआत हुई थी। पहली बार जो नाटक हुआ था उसमें नसीर, ओमपुरी और बेंजामिन गिलानी ने अभिनय किया था। पु. ल. देशपांडे का‘उध्वस्त धर्मशाळा’। जा़हिर है कि शशि का काम कई स्‍तरों पर चल रहा था। एक तरफ पृथ्‍वी थियेटर चुपके चुपके एक क्रांति को रच रहा था। दूसरी तरफ अपनी तरह का सिनेमा वो प्रोड्यूस कर रहे थे।
अब आया 1984 जब शशि कपूर ने एक और बेमिसाल फिल्‍म का निर्माण किया। शूद्रक के नाटक‘मृच्‍छकटिकम’ पर आधारित फिल्‍म ‘उत्‍सव’। इसका निर्देशन किया गिरीश कार्नाड ने। इस फिल्‍म को एक राष्‍ट्रीय और दो फिल्‍म फेयर पुरस्‍कार मिले। जाहिर है कि शशि को फिल्‍म में घाटा ही सहना पड़ा। ऊपर जिन फिल्‍मों की चर्चा हुई है, उन तमाम फिल्‍मों में शशि ने पैसे लगाए। और शायद ही वो पैसे वापस आए। फिर वो क्‍या जुनून था कि मसाला फिल्‍मों से कमाया पैसा शशि यहां फूंकते जा रहे थे। इसके अलावा कौन था उनका समकालीन जो ये काम कर रहा था। हालांकि इसके बाद शशि ने एक बड़ी ग़लती की, अमिताभ बच्‍चन को लेकर फिल्‍म ‘अजूबा’ बनाने की। और फिर उन्‍होंने किसी फिल्‍म का निर्माण नहीं किया। पर शशि ने जो पाँच फिल्‍में बनायीं—उन्‍होंने कई कलाकारों, लेखकों और निर्देशकों को नाम दिया। सबको नाम दिया।
शशि में बेहतर सिनेमा का जो जुननू था उसी ने उनसे‘मुहाफिज’ या ‘इन कस्‍टडी’, ‘न्‍यू डेल्‍ही टाइम्‍स’, ‘सिद्धार्थ’, ‘बॉम्‍बे टॉकी’, ‘शेक्‍सपीयरवाला’ और ‘हाउस होल्‍डर’ जैसी फिल्‍में करवायीं। शशि के जाने का मतलब है अच्‍छे सिनेमा के एक बड़े पैरोकार का जाना। एक जुनून का तिरोहित हो जाना। विनम्र नमन। 
--यूनुस खान।✍🏻 *यूनुस खान*
शशि कपूर का जाना हिंदी के एक बड़े हीरो का जाना ही नहीं है।
असल में शायद हम समझ नहीं रहे हैं कि दृश्‍य से उनके अनुपस्थित हो जाने का क्‍या मतलब है। शशि केवल शरीर से मौजूद थे। मन से वो कब के अपने भीतर विलुप्‍त हो चुके थे।
उनके जाने के मायने हैं रंगमंच के एक बड़े स्‍तंभ का जाना।
पृथ्वी थियेटर मुंबई में रंगमंच का गढ़ है। पृथ्‍वी अब सांस्‍कृतिक अड्डा है। पृथ्‍वी में अपनी प्रस्‍तुति देना तमाम कलाकारों का सपना होता है। उनकी ललक होती है बार बार पृथ्‍वी के मंच पर अपनी पेशकश देने की। पृथ्‍वी को सजाया संवारा शशि ने है।
शशि के बारे में आप तमाम बातें तो जानते पढ़ते ही रहे हैं। अभी उनके निधन के बाद और भी सब पढ़ने को मिला ही होगा। आपको शशि होने का मतलब समझाया जाए।
सन 1975 में चलिए। शशि की मशहूर फिल्‍में आयी हैं—‘प्रेम कहानी’, ‘चोरी मेरा काम’ और ‘कभी कभी’। इसके बाद ‘फकीरा’, ‘ईमान-धरम’, ‘मुक्ति’, ‘दूसरा आदमी’ और ‘सत्‍यम शिवम सुंदरम’। यानी सन 75 से 77 के बीच शशि ठेठ फिल्‍मी काम कर रहे हैं। वो पेड़ के इर्द गिर्द हीरोइन के साथ गाना गा रहे हैं। वो सौंदर्य के पुजारी नज़र आ रहे हैं। लेकिन परदे के पीछे क्‍या चल रहा है इसे भी देखा जाए।
1978 में रिलीज़ होती है ‘जुनून’ जो रस्किन बॉन्‍ड की रचना ‘फ्लाइट ऑफ अ पिजन’ पर आधारित है। जुनून श्‍याम बेनेगल की सातवीं फिल्‍म है। वो समांतर सिनेमा के एक बड़े स्‍तंभ बन चुके हैं। अंकुर, चरणदास चोर,निशांत, मंथन, भूमिका और कोंडुरा जैसी फिल्‍में उन्‍हें दिग्‍गजों की कतार में ले जाती हैं। और पेशेवर सिनेमा का एक खिलंदड़ हीरो उनकी अगली फिल्‍म को प्रोड्यूस करता है। जुनून को तीन नेशनल अवॉर्ड मिलते हैं। और एक फिल्‍म फेयर भी।
इसके बाद श्‍याम बेनेगल की अगली फिल्‍म ‘कलयुग’ का निर्माण भी शशि ही करते हैं। कलयुग आधुनिक महाभारत है। ये फिल्‍म 24 जुलाई 1981 को रिलीज़ होती है। ज़रा देखिए कि तकरीबन इन्‍हीं दिनों में शशि परदे पर क्रांति, शान, सिलसिला जैसी फिल्‍मों में दिखते हैं। और ‘कलयुग’ फिल्‍म फेयर पुरस्‍कार जीतती है।
शशि यहां रूकते नहीं हैं। अभिनेत्री अपर्णा सेन को वो निर्देशिका बना देते हैं। और इस तरह 1981 में आती है‘छत्‍तीस चौरंगी लेन’। जिसकी बातें करते लोग आज भी नहीं थकते। बल्कि लोग अलग अलग दृश्‍यों और उनसे जुड़े अहसासों, स्‍मृतियों की बात करते हैं। इस फिल्‍म में शशि की जीवन संगिनी जेनिफर अपनी पूरी गरिमा के साथ हैं।
जिन दिनों में शशि ‘नमक हलाल’ में ‘रात बाक़ी….’जैसे गाने पर प्‍याले छलका रहे हैं—उन्‍हीं दिनों में फिल्‍म् उत्‍सवों और गंभीर सिनेमा के हलकों में कमाल कर रही है गोविंद निहलानी की फिल्‍म ‘विजेता’। वो ‘जुनून’ के लिए सिनेमेटोग्राफर के रूप में नेशनल अवॉर्ड जीत चुके हैं। ‘आक्रोश’ बना चुके हैं और अगले बरस वो फिल्‍म लेकर आने वाले हैं जो उनकी पहचान बन जायेगी। अर्धसत्‍य 1983 में आती है। विजेता के बाद। विजेता के लिए गोविंद बतौर सिनेमेटोग्राफर फिर अवॉर्ड जीतते हैं।
शशि चुपके चुपके अपना काम कर रहे है। ये वो दिन हैं जब पृथ्‍वी भी युवा अभिनेताओं का अड्डा बन चुका है। 1978 में जुहू में पृथ्‍वी की शुरूआत हुई थी। पहली बार जो नाटक हुआ था उसमें नसीर, ओमपुरी और बेंजामिन गिलानी ने अभिनय किया था। पु. ल. देशपांडे का‘उध्वस्त धर्मशाळा’। जा़हिर है कि शशि का काम कई स्‍तरों पर चल रहा था। एक तरफ पृथ्‍वी थियेटर चुपके चुपके एक क्रांति को रच रहा था। दूसरी तरफ अपनी तरह का सिनेमा वो प्रोड्यूस कर रहे थे।
अब आया 1984 जब शशि कपूर ने एक और बेमिसाल फिल्‍म का निर्माण किया। शूद्रक के नाटक‘मृच्‍छकटिकम’ पर आधारित फिल्‍म ‘उत्‍सव’। इसका निर्देशन किया गिरीश कार्नाड ने। इस फिल्‍म को एक राष्‍ट्रीय और दो फिल्‍म फेयर पुरस्‍कार मिले। जाहिर है कि शशि को फिल्‍म में घाटा ही सहना पड़ा। ऊपर जिन फिल्‍मों की चर्चा हुई है, उन तमाम फिल्‍मों में शशि ने पैसे लगाए। और शायद ही वो पैसे वापस आए। फिर वो क्‍या जुनून था कि मसाला फिल्‍मों से कमाया पैसा शशि यहां फूंकते जा रहे थे। इसके अलावा कौन था उनका समकालीन जो ये काम कर रहा था। हालांकि इसके बाद शशि ने एक बड़ी ग़लती की, अमिताभ बच्‍चन को लेकर फिल्‍म ‘अजूबा’ बनाने की। और फिर उन्‍होंने किसी फिल्‍म का निर्माण नहीं किया। पर शशि ने जो पाँच फिल्‍में बनायीं—उन्‍होंने कई कलाकारों, लेखकों और निर्देशकों को नाम दिया। सबको नाम दिया।
शशि में बेहतर सिनेमा का जो जुननू था उसी ने उनसे‘मुहाफिज’ या ‘इन कस्‍टडी’, ‘न्‍यू डेल्‍ही टाइम्‍स’, ‘सिद्धार्थ’, ‘बॉम्‍बे टॉकी’, ‘शेक्‍सपीयरवाला’ और ‘हाउस होल्‍डर’ जैसी फिल्‍में करवायीं। शशि के जाने का मतलब है अच्‍छे सिनेमा के एक बड़े पैरोकार का जाना। एक जुनून का तिरोहित हो जाना। विनम्र नमन। 
                                                                                                                  --यूनुस खान।

मुहाफिज़ का एक दृृृृश्‍य ।।

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