संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Sunday, December 10, 2017

|| शशि कपूर के जाने का मतलब ||



शशि कपूर का जाना हिंदी के एक बड़े हीरो का जाना ही नहीं है।
 
असल में शायद हम समझ नहीं रहे हैं कि दृश्‍य से उनके अनुपस्थित हो जाने का क्‍या मतलब है। शशि केवल शरीर से मौजूद थे। मन से वो कब के अपने भीतर विलुप्‍त हो चुके थे।
उनके जाने के मायने हैं रंगमंच के एक बड़े स्‍तंभ का जाना।
पृथ्वी थियेटर मुंबई में रंगमंच का गढ़ है। पृथ्‍वी अब सांस्‍कृतिक अड्डा है। पृथ्‍वी में अपनी प्रस्‍तुति देना तमाम कलाकारों का सपना होता है। उनकी ललक होती है बार बार पृथ्‍वी के मंच पर अपनी पेशकश देने की। पृथ्‍वी को सजाया संवारा शशि ने है।
शशि के बारे में आप तमाम बातें तो जानते पढ़ते ही रहे हैं। अभी उनके निधन के बाद और भी सब पढ़ने को मिला ही होगा। आपको शशि होने का मतलब समझाया जाए।
सन 1975 में चलिए। शशि की मशहूर फिल्‍में आयी हैं—‘प्रेम कहानी’, ‘चोरी मेरा काम’ और ‘कभी कभी’। इसके बाद ‘फकीरा’, ‘ईमान-धरम’, ‘मुक्ति’, ‘दूसरा आदमी’ और ‘सत्‍यम शिवम सुंदरम’। यानी सन 75 से 77 के बीच शशि ठेठ फिल्‍मी काम कर रहे हैं। वो पेड़ के इर्द गिर्द हीरोइन के साथ गाना गा रहे हैं। वो सौंदर्य के पुजारी नज़र आ रहे हैं। लेकिन परदे के पीछे क्‍या चल रहा है इसे भी देखा जाए।
1978 में रिलीज़ होती है ‘जुनून’ जो रस्किन बॉन्‍ड की रचना ‘फ्लाइट ऑफ अ पिजन’ पर आधारित है। जुनून श्‍याम बेनेगल की सातवीं फिल्‍म है। वो समांतर सिनेमा के एक बड़े स्‍तंभ बन चुके हैं। अंकुर, चरणदास चोर,निशांत, मंथन, भूमिका और कोंडुरा जैसी फिल्‍में उन्‍हें दिग्‍गजों की कतार में ले जाती हैं। और पेशेवर सिनेमा का एक खिलंदड़ हीरो उनकी अगली फिल्‍म को प्रोड्यूस करता है। जुनून को तीन नेशनल अवॉर्ड मिलते हैं। और एक फिल्‍म फेयर भी।
इसके बाद श्‍याम बेनेगल की अगली फिल्‍म ‘कलयुग’ का निर्माण भी शशि ही करते हैं। कलयुग आधुनिक महाभारत है। ये फिल्‍म 24 जुलाई 1981 को रिलीज़ होती है। ज़रा देखिए कि तकरीबन इन्‍हीं दिनों में शशि परदे पर क्रांति, शान, सिलसिला जैसी फिल्‍मों में दिखते हैं। और ‘कलयुग’ फिल्‍म फेयर पुरस्‍कार जीतती है।
शशि यहां रूकते नहीं हैं। अभिनेत्री अपर्णा सेन को वो निर्देशिका बना देते हैं। और इस तरह 1981 में आती है‘छत्‍तीस चौरंगी लेन’। जिसकी बातें करते लोग आज भी नहीं थकते। बल्कि लोग अलग अलग दृश्‍यों और उनसे जुड़े अहसासों, स्‍मृतियों की बात करते हैं। इस फिल्‍म में शशि की जीवन संगिनी जेनिफर अपनी पूरी गरिमा के साथ हैं।
जिन दिनों में शशि ‘नमक हलाल’ में ‘रात बाक़ी….’जैसे गाने पर प्‍याले छलका रहे हैं—उन्‍हीं दिनों में फिल्‍म् उत्‍सवों और गंभीर सिनेमा के हलकों में कमाल कर रही है गोविंद निहलानी की फिल्‍म ‘विजेता’। वो ‘जुनून’ के लिए सिनेमेटोग्राफर के रूप में नेशनल अवॉर्ड जीत चुके हैं। ‘आक्रोश’ बना चुके हैं और अगले बरस वो फिल्‍म लेकर आने वाले हैं जो उनकी पहचान बन जायेगी। अर्धसत्‍य 1983 में आती है। विजेता के बाद। विजेता के लिए गोविंद बतौर सिनेमेटोग्राफर फिर अवॉर्ड जीतते हैं।
शशि चुपके चुपके अपना काम कर रहे है। ये वो दिन हैं जब पृथ्‍वी भी युवा अभिनेताओं का अड्डा बन चुका है। 1978 में जुहू में पृथ्‍वी की शुरूआत हुई थी। पहली बार जो नाटक हुआ था उसमें नसीर, ओमपुरी और बेंजामिन गिलानी ने अभिनय किया था। पु. ल. देशपांडे का‘उध्वस्त धर्मशाळा’। जा़हिर है कि शशि का काम कई स्‍तरों पर चल रहा था। एक तरफ पृथ्‍वी थियेटर चुपके चुपके एक क्रांति को रच रहा था। दूसरी तरफ अपनी तरह का सिनेमा वो प्रोड्यूस कर रहे थे।
अब आया 1984 जब शशि कपूर ने एक और बेमिसाल फिल्‍म का निर्माण किया। शूद्रक के नाटक‘मृच्‍छकटिकम’ पर आधारित फिल्‍म ‘उत्‍सव’। इसका निर्देशन किया गिरीश कार्नाड ने। इस फिल्‍म को एक राष्‍ट्रीय और दो फिल्‍म फेयर पुरस्‍कार मिले। जाहिर है कि शशि को फिल्‍म में घाटा ही सहना पड़ा। ऊपर जिन फिल्‍मों की चर्चा हुई है, उन तमाम फिल्‍मों में शशि ने पैसे लगाए। और शायद ही वो पैसे वापस आए। फिर वो क्‍या जुनून था कि मसाला फिल्‍मों से कमाया पैसा शशि यहां फूंकते जा रहे थे। इसके अलावा कौन था उनका समकालीन जो ये काम कर रहा था। हालांकि इसके बाद शशि ने एक बड़ी ग़लती की, अमिताभ बच्‍चन को लेकर फिल्‍म ‘अजूबा’ बनाने की। और फिर उन्‍होंने किसी फिल्‍म का निर्माण नहीं किया। पर शशि ने जो पाँच फिल्‍में बनायीं—उन्‍होंने कई कलाकारों, लेखकों और निर्देशकों को नाम दिया। सबको नाम दिया।
शशि में बेहतर सिनेमा का जो जुननू था उसी ने उनसे‘मुहाफिज’ या ‘इन कस्‍टडी’, ‘न्‍यू डेल्‍ही टाइम्‍स’, ‘सिद्धार्थ’, ‘बॉम्‍बे टॉकी’, ‘शेक्‍सपीयरवाला’ और ‘हाउस होल्‍डर’ जैसी फिल्‍में करवायीं। शशि के जाने का मतलब है अच्‍छे सिनेमा के एक बड़े पैरोकार का जाना। एक जुनून का तिरोहित हो जाना। विनम्र नमन। 
--यूनुस खान।✍🏻 *यूनुस खान*
शशि कपूर का जाना हिंदी के एक बड़े हीरो का जाना ही नहीं है।
असल में शायद हम समझ नहीं रहे हैं कि दृश्‍य से उनके अनुपस्थित हो जाने का क्‍या मतलब है। शशि केवल शरीर से मौजूद थे। मन से वो कब के अपने भीतर विलुप्‍त हो चुके थे।
उनके जाने के मायने हैं रंगमंच के एक बड़े स्‍तंभ का जाना।
पृथ्वी थियेटर मुंबई में रंगमंच का गढ़ है। पृथ्‍वी अब सांस्‍कृतिक अड्डा है। पृथ्‍वी में अपनी प्रस्‍तुति देना तमाम कलाकारों का सपना होता है। उनकी ललक होती है बार बार पृथ्‍वी के मंच पर अपनी पेशकश देने की। पृथ्‍वी को सजाया संवारा शशि ने है।
शशि के बारे में आप तमाम बातें तो जानते पढ़ते ही रहे हैं। अभी उनके निधन के बाद और भी सब पढ़ने को मिला ही होगा। आपको शशि होने का मतलब समझाया जाए।
सन 1975 में चलिए। शशि की मशहूर फिल्‍में आयी हैं—‘प्रेम कहानी’, ‘चोरी मेरा काम’ और ‘कभी कभी’। इसके बाद ‘फकीरा’, ‘ईमान-धरम’, ‘मुक्ति’, ‘दूसरा आदमी’ और ‘सत्‍यम शिवम सुंदरम’। यानी सन 75 से 77 के बीच शशि ठेठ फिल्‍मी काम कर रहे हैं। वो पेड़ के इर्द गिर्द हीरोइन के साथ गाना गा रहे हैं। वो सौंदर्य के पुजारी नज़र आ रहे हैं। लेकिन परदे के पीछे क्‍या चल रहा है इसे भी देखा जाए।
1978 में रिलीज़ होती है ‘जुनून’ जो रस्किन बॉन्‍ड की रचना ‘फ्लाइट ऑफ अ पिजन’ पर आधारित है। जुनून श्‍याम बेनेगल की सातवीं फिल्‍म है। वो समांतर सिनेमा के एक बड़े स्‍तंभ बन चुके हैं। अंकुर, चरणदास चोर,निशांत, मंथन, भूमिका और कोंडुरा जैसी फिल्‍में उन्‍हें दिग्‍गजों की कतार में ले जाती हैं। और पेशेवर सिनेमा का एक खिलंदड़ हीरो उनकी अगली फिल्‍म को प्रोड्यूस करता है। जुनून को तीन नेशनल अवॉर्ड मिलते हैं। और एक फिल्‍म फेयर भी।
इसके बाद श्‍याम बेनेगल की अगली फिल्‍म ‘कलयुग’ का निर्माण भी शशि ही करते हैं। कलयुग आधुनिक महाभारत है। ये फिल्‍म 24 जुलाई 1981 को रिलीज़ होती है। ज़रा देखिए कि तकरीबन इन्‍हीं दिनों में शशि परदे पर क्रांति, शान, सिलसिला जैसी फिल्‍मों में दिखते हैं। और ‘कलयुग’ फिल्‍म फेयर पुरस्‍कार जीतती है।
शशि यहां रूकते नहीं हैं। अभिनेत्री अपर्णा सेन को वो निर्देशिका बना देते हैं। और इस तरह 1981 में आती है‘छत्‍तीस चौरंगी लेन’। जिसकी बातें करते लोग आज भी नहीं थकते। बल्कि लोग अलग अलग दृश्‍यों और उनसे जुड़े अहसासों, स्‍मृतियों की बात करते हैं। इस फिल्‍म में शशि की जीवन संगिनी जेनिफर अपनी पूरी गरिमा के साथ हैं।
जिन दिनों में शशि ‘नमक हलाल’ में ‘रात बाक़ी….’जैसे गाने पर प्‍याले छलका रहे हैं—उन्‍हीं दिनों में फिल्‍म् उत्‍सवों और गंभीर सिनेमा के हलकों में कमाल कर रही है गोविंद निहलानी की फिल्‍म ‘विजेता’। वो ‘जुनून’ के लिए सिनेमेटोग्राफर के रूप में नेशनल अवॉर्ड जीत चुके हैं। ‘आक्रोश’ बना चुके हैं और अगले बरस वो फिल्‍म लेकर आने वाले हैं जो उनकी पहचान बन जायेगी। अर्धसत्‍य 1983 में आती है। विजेता के बाद। विजेता के लिए गोविंद बतौर सिनेमेटोग्राफर फिर अवॉर्ड जीतते हैं।
शशि चुपके चुपके अपना काम कर रहे है। ये वो दिन हैं जब पृथ्‍वी भी युवा अभिनेताओं का अड्डा बन चुका है। 1978 में जुहू में पृथ्‍वी की शुरूआत हुई थी। पहली बार जो नाटक हुआ था उसमें नसीर, ओमपुरी और बेंजामिन गिलानी ने अभिनय किया था। पु. ल. देशपांडे का‘उध्वस्त धर्मशाळा’। जा़हिर है कि शशि का काम कई स्‍तरों पर चल रहा था। एक तरफ पृथ्‍वी थियेटर चुपके चुपके एक क्रांति को रच रहा था। दूसरी तरफ अपनी तरह का सिनेमा वो प्रोड्यूस कर रहे थे।
अब आया 1984 जब शशि कपूर ने एक और बेमिसाल फिल्‍म का निर्माण किया। शूद्रक के नाटक‘मृच्‍छकटिकम’ पर आधारित फिल्‍म ‘उत्‍सव’। इसका निर्देशन किया गिरीश कार्नाड ने। इस फिल्‍म को एक राष्‍ट्रीय और दो फिल्‍म फेयर पुरस्‍कार मिले। जाहिर है कि शशि को फिल्‍म में घाटा ही सहना पड़ा। ऊपर जिन फिल्‍मों की चर्चा हुई है, उन तमाम फिल्‍मों में शशि ने पैसे लगाए। और शायद ही वो पैसे वापस आए। फिर वो क्‍या जुनून था कि मसाला फिल्‍मों से कमाया पैसा शशि यहां फूंकते जा रहे थे। इसके अलावा कौन था उनका समकालीन जो ये काम कर रहा था। हालांकि इसके बाद शशि ने एक बड़ी ग़लती की, अमिताभ बच्‍चन को लेकर फिल्‍म ‘अजूबा’ बनाने की। और फिर उन्‍होंने किसी फिल्‍म का निर्माण नहीं किया। पर शशि ने जो पाँच फिल्‍में बनायीं—उन्‍होंने कई कलाकारों, लेखकों और निर्देशकों को नाम दिया। सबको नाम दिया।
शशि में बेहतर सिनेमा का जो जुननू था उसी ने उनसे‘मुहाफिज’ या ‘इन कस्‍टडी’, ‘न्‍यू डेल्‍ही टाइम्‍स’, ‘सिद्धार्थ’, ‘बॉम्‍बे टॉकी’, ‘शेक्‍सपीयरवाला’ और ‘हाउस होल्‍डर’ जैसी फिल्‍में करवायीं। शशि के जाने का मतलब है अच्‍छे सिनेमा के एक बड़े पैरोकार का जाना। एक जुनून का तिरोहित हो जाना। विनम्र नमन। 
                                                                                                                  --यूनुस खान।

मुहाफिज़ का एक दृृृृश्‍य ।।

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Saturday, July 1, 2017

शीतल मंजुल कोमल तेरा आंचल मेरी सुधियों में लहराया... चरित्रहीन सीरियल का शीर्षक गीत

पिछले दिनों फेसबुक पर मैंने अंतरा चौधरी की चर्चा की अपनी सीरीज़ 'वक्‍त की धुंध' में। उन आवाज़ों की बातें इस सीरीज़ में की जा रही हैं जो वक्‍त की धुंध में खो गयीं। जब अंतरा के गाने मैंने वहां लगाये, जिनमें 'काली रे काली रे' और अन्‍य गाने शामिल थे, तो सबने पुराने ज़माने के टीवी सीरियत 'चरित्रहीन' का टाइटल सॉन्‍ग बहुत याद किया। इसलिए आज 'रेडियोवाणी' पर मैं वही गीत लेकर आया हूं।


शरतचंद्र के उपन्‍यास पर आधारित 'चरित्रहीन' पर आधारित येे  धारावाहिक हम सबकी स्‍मृतियों में कायम है। उस दौर के टीवी सीरियलों के बारे में खोज तो ये लिंक मिली। शायद आप सबके काम आ जाये, पुरानी यादों को दोहरा सकें आप। 


बहरहाल.. चरित्रहीनका ये टाइटल-सॉन्‍ग सलिल चौधरी ने बनाया था, इसे कृष्‍ण राघव लिखा था और आवाजें थीं सैकत मित्रा और अंतरा चौधरी की।  

serial: charitraheen
singer: saikat mitra, antara chowdhury
lyrics: krishna raghav
music: salil chowdhury
ये रहे इस गाने के बोल।
शीतल मंजुल कोमल, तेरा आँचल
मेरी सुधियों में लहराया
झल-मल झल-मल
और एक शाम मैंने तेरे नाम लिख दी
हौले, हौले-हौले; पुरवा डोले, पुरवा डोले
ढलते दिन की अरुणाई में सपने घोले; सपने घोले
सपने घोले
और एक शाम मैंने तेरे नाम लिख दी
पंछी एक बिचारा, टूटा हारा, टूटा हारा
सुने नभ में उड़ता फ़िरता, मारा-मारा
मारा-मारा
और एक शाम मैंने तेरे नाम लिख दी
शीतल मंजुल कोमल, तेरा आँचल
मेरी सुधियों में लहराया
झल-मल झल-मल

और एक शाम मैंने तेरे नाम लिख दी
इस गानेे का एक संस्‍करण अंतरा चौधरी ने अपने अलबम 'मधुर स्‍मृति' में गाया था। वो भी सुन लीजिए


इसी सीरियल का एक और गीत हेमंंती शुक्‍‍‍ला की आवाज़़ मेंं

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Monday, April 10, 2017

बरसे घन सारी रात--रघुवीर सहाय का लिखा गीत, लता मंगेशकर की आवाज। रेडियोवाणी के दस बरस।

'रेडियोवाणी' को अचानक ही नौ अप्रैल 2007 को शुरू किया था। यानी कल हमने बाक़ायदा ब्‍लॉगिंग के दस बरस पूरे कर लिए। ब्‍लॉगिंग की दुनिया उन दिनों हरी भरी हुआ करती थी।तब ब्‍लॉग-वाणीजैसा बेमिसाल एग्रीगेटर हुआ करता था। ब्‍लॉगिंग की इस यात्रा ने बेमिसाल दोस्‍त दिये। परिचय का दायरा बढ़ाया। रचनात्‍मकता को नये आयाम दिये। 
और उस छटपटाहट को कम किया जो हमारे भीतर हमेशा से थी संगीत पर लिखने की। इधर के कुछ सालों में ब्‍लॉगिंग पर ध्‍यान कुछ कम हुआ है। ऐसा केवल हमारे संग नहींं हुआ, तकरीबन सभी समकालीनोंं के साथ हुआ है।

ऐसा नहीं है कि गानों से हमारा प्‍यार खत्‍म हो गया हो। या गानों पर लिखना खत्‍म हो गया हो। आज रेडियोवाणी की सालगिरह पर हम लेकर आए हैं एक बहुत ही दुर्लभ और अनमोल गाना। हम चाहते हैं कि रेडियोवाणी इसी तरह के अनमोल गानों के लिए जाना जाए।

बहुत बरस पहले ये गाना मैंने संगीतकार वनराज भाटिया से लिया था। इत्‍तेफाक ये है कि मित्र और लेखक पंकज सुबीर के यू-ट्यूब चैनल पर यह बरामद हुआ। आपमें से कुछ साथियों को ये जानकर हैरत हो सकती है कि ये गीत हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि रघुवीर सहाय ने कुमार शाहनी की फिल्‍म
तरंगके लिए लिखा था। ये फिल्‍म सन 1984 में आयी थी। लता जी इसे अपने बहुत ही अनमोल गीतों में शामिल करती हैं। 


इस गाने में अद्भुुुत मादकता है। और लता जी ने उसे किस तरह निभाया है। इस अभिव्‍यक्ति के बहुत ही दुर्लभ और अमूल्‍य गीतों में से एक।
रेडियोवाणी की दसवीं सालगिरह हम सभी को मुबारक। 


Song: Barse Ghan Saari Raat 
Film-Tarang
Singer- Lata Mangeshkar Lyrics: Raghuveer sahay
Music: Vanraj Bhatia
Year: 1984




बरसे घन सारी रात,
संग सो जाओ
आओ रे,
प्रिय आओ रे
संग सो जाओ।।

नहलाओ साँसों से तन मेरा
शीतल पानी याद आए
सागर नदिया याद आए
शबनम धुला सवेरा,
होंठों से तपन बुझाओ,
प्रियतम आओ,
आओ रे संग सो जाओ।।

कुम्हलाया उजियारा मेरे मन में
अँधियारा घिर आया दर्पन में
क्यों तन सिहरे
छाया डोले
क्या तुम आए
बाहें खोले
नींद आई मधुर समर्पन में
अंतिम सिसकी
चुम्बन से चुप कर जाओ
प्रियतम आओ,
आओ रे प्रियतम आओ
संग सो जाओ।।

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Thursday, February 16, 2017

जब तेरी राह से होकर गुज़रे- गुलाम अली की आवाज़

उम्र यूं गुजरी है जैसे सर से
सनसनाता हुआ पत्‍थर गुज़रे।


वो एक डबल कैसेट अलबम था।
एक ही अलबम में दो दो सौग़ातें।
हमारी बोसीदा दोपहरियों का अलबम। तब गुलाम अली धूप होते थे।
वो सुकून होते थे। वो किनारा भी होते थे और सहारा भी।

गुलाम अली का मतलब सिर्फ
चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद हैया आवारगीनहीं है। उनके पंजाबी गीत भी सुने जाने चाहिए। और उनकी कुछ कम मशहूर ग़ज़लें भी। इस लगभग बे-ग़ज़ल ज़माने में पुरानी चीज़ें ही रह गयी हैं दोहराने को। और पुरानी नग़्मे, पुरानी ग़ज़लें हमारे लिए पुरानी तस्‍वीरों की तरह फ्लैश-बैक होती हैं—हमें उस गली, उस शहर, उस दौर में ले जाती हैं।
 सुनने का सही मज़ा तब ही तो होता था। आज हर तरफ गाने हैं। मोबाइल से लेकर डेस्‍कटॉप तक और स्‍टूडियो से लेकर रेडियो-सेट तक। पर सुनने का लुत्‍फ वो क्‍यों नहीं।

Ghazal: jab teri raah se hokar guzre
Singer: Ghulam ali
Shayar: Bashar Nawaz
Duration: 5 35




आज जाने क्‍यों बेसबब ये ग़ज़ल याद आ गयी।


जब तेरी राह से होकर गुज़रे
आँख से कितने ही मंजर गुज़रे।।
तेरी तपती हुई सांसों की तरह
कितने झोंके मुझे छूकर गुज़रे।।
उम्र यूं गुज़री है जैसे सर से
सनसनाता हुआ पत्‍थर गुजरे।
जानते हैं कि वहां कोई नहीं
फिर भी उस राह से अकसर गुज़रे।।
अब कोई ग़म न कोई याद बशर
वक्‍त गुज़रे भी तो क्‍यों कर गुज़रे।। 

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