संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Wednesday, May 23, 2007

अंतर्धर्म विवाह और हमारा समाज


रविवार के Hindustan Times में तविशी पैठणी रस्‍तोगी और कोलीन ब्रिगान्‍ज़ा ने एक अच्‍छी cover story की है, शीर्षक है beyond belief. इसमें इन दोनों महिला पत्रकारों ने कुछ ऐसे celebrity जोड़ों से बातचीत की है, जिन्‍होंने अंतर्धर्म विवाह किया है । इनमें शामिल हैं—मशहूर अभिनेत्री, भूतपूर्व मॉडल और समाज सेविका नफीसा अली सोढ़ी ( ताज़ा फिल्‍म मेट्रो ) और उनके पति पिकल्‍स सोढ़ी । अभिनेता इरफान खान और उनकी पत्‍नी सुतपा सिकदर । छोटे पर्दे के अभिनेता इक़बाल ख़ान और उनकी पत्‍नी स्‍नेहा छाबड़ा । निर्देशक कबीर खान ( फिल्‍म काबुल एक्‍सप्रेस ) और उनकी पत्‍नी अभिनेत्री मिनी माथुर । नवाब पटौदी और शर्मिला टैगोर । इस लेख में इन तमाम हस्तियों से बातचीत करके ये पड़ताल करने का प्रयास किया गया है कि क्‍या शादी या शादीशुदा जिंदगी में कभी धर्म आड़े आता है । इन पांचों जोड़ों ने इस बात से इंकार किया है कि अंर्तधर्म विवाह के बाद उन्‍हें कोई समस्‍या आई । इनमें ज्‍यादातर जोड़ों का मानना यही रहा कि वो बच्‍चों पर किसी खास धर्म को अपनाने का ज़ोर नहीं डालेंगे । बल्कि उन्‍हें आज़ाद छोड़ देंगे ताकि वो अपनी मरज़ी से किसी धर्म को अपना सकें । पिकल्‍स सोढ़ी ने बड़ी महत्‍त्‍वपूर्ण बात कही अपनी शादी के बारे में, उनका कहना था कि हमने एक दूसरे से विवाह किया था, अपने धर्मों से नहीं । अभिनेता इरफान खान ने बड़ी ही अहम बात कही, उनका कहना था कि धर्म बेहद निजी मामला है, आप जिससे प्रेम करते हैं अगर वो आपका धर्म नहीं अपनाता, तो उससे क्‍या फ़र्क़ पड़ता है, क्‍या इससे उसके प्रति आपका प्‍यार कम हो जाता है, अगर हां तो इसका मतलब ये कि आप उस शख्‍स से सच्‍चा प्‍यार नहीं करते । फिल्‍म निर्देशक कबीर खान ने कहा कि धर्म उनकी या किसी की भी रोज़मर्रा की जिंदगी में कोई असर नहीं डालता । शर्मिला टैगोर ने कहा कि जब दो लोग प्रेम करते हैं तो इस बात से कोई फ़‍र्क़ नहीं पड़ता कि वो मंदिर या मस्जिद जाते हैं या नहीं ।
मुद्दा बहुत ही अहम है । आज विचारधारा बदल रही है । शादी के मामले में नौजवान पीढ़ी धर्म के खांचे से बाहर निकल रही है । अंर्तर्धम विवाह बढ़ रहे हैं । आमतौर पर शुरूआत में तो माता-पिता की सहमति नहीं होती, पर धीरे धीरे मजबूरी के तहत या एडजेस्‍टमेन्‍ट के लिए बुज़ुर्ग पीढ़ी भी इसे स्‍वीकार कर ही लेती है । यक़ीन मानिए अगर माता पिता की सहमति हो जाए तो ये युवा, अदालत या आर्य समाज में जाकर चुपके से शादी क़तई ना करें । पर जैसे ही कोई बेटा या बेटी अपने माता पिता से दूसरे धर्म में शादी करने की बाद कहता है, परिवार में ज्‍वालामुखी फट जाते हैं, भूकंप और सुनामी आने लगते हैं । विचित्र हालात पैदा हो जाते हैं । जान देने की धमकियां दी जाती हैं । और दो ही संभावनाएं बनती हैं, या तो नई पीढ़ी अपने प्‍यार का गला घोंट दे या फिर क्रांति कर दे ।
मैंने देखा है कि जब हिंदू और मुस्लिम धर्मों के बच्‍चे अंतधर्म विवाह की बात करते हैं तब कुछ ज्‍यादा ही हंगामा होता है, क्‍योंकि समाज इन्‍हें परस्‍पर उलट धर्म मानता है । ज्‍यादातर लोगों का यही मानना है कि इन धर्मों के बीच होन वाले शादी के रिश्‍ते ज्‍यादा दूर तक नहीं जा पाते, निभ नहीं पाते । इस आलेख के आरंभ में एक अखबार के बहाने कुछ सेलिब्रिटी जोड़ों की मिसाल दी गयी है । लेकिन मेरा ये कहना है कि केवल मशहूर हस्तियां ही इस तरह की शादी की तरफ क़दम नहीं बढ़ातीं । बल्कि भारत के धूल, धूप और धुंए में सराबोर छोटे शहरों और क़स्‍बों में भी लोग ये साहस करते हैं और तमाम मुश्‍किलों के बावजूद अपने रिश्‍तों को साबित करके दिखाते हैं । मैं इस बात को भी रेखांकित करना चाहता हूं कि मशहूर और कामयाब लोगों का सफर तो फिर भी आसान होता है, क्‍योंकि महानगरों के जिस वर्ग में उनका उठना बैठना है वहां ये सब स्‍वीकार्य है । पर बहुत मध्‍यवर्ग में तो इस तरह की शादियां आज भी कौतुहल और जिज्ञासा का केंद्र होती हैं । लोग चुनौतियां देते हैं कि इनकी ज्‍यादा निभेगी नहीं, सवाल उठाये जाते हैं कि तुम्‍हारे बच्‍चे किस धर्म को अपनायेंगे ।
अब एक और बहुत महत्‍त्‍वपूर्ण मुद्दा । आमतौर पर अगर लड़की हिंदू और लड़का मुस्लिम हुआ तो अकसर ये देखा जाता है कि लड़के का परिवार साम दाम दंड भेद का इस्‍तेमाल करके या इमोशनल ब्‍लैकमेल करके लड़की को कन्‍वर्ट करने को राज़ी करा लेते हैं । और बहुत सारे ‘वर’ अपनी मान्‍यता वश या फिर मां बाप की खुशी के लिए अपनी पत्‍नी को कन्‍वर्ट करवा लेते हैं । अगर दोनों इस बात के लिये बेहिचक राज़ी हैं तो कोई हर्ज नहीं है, लेकिन अगर ऐसा मजबूरी के तहत किया जा रहा है और इससे उनकी पारिवारिक जिंदगी पर असर पड़ता हो तो दिक्‍कत की बात है । बहरहाल हर शहर में आपको कुछ ऐसी मिसालें मिल जायेंगी, जहां कुछ लोगों ने अपने धर्म से बाहर विवाह किया और बिना कन्‍वर्ट हुए या बिना कन्‍वर्ट कराए एक शानदार जिंदगी जी है ।
अब समय आ गया है कि समाज अंर्तधर्म विवाह के लेकर अपने संकीर्ण नज़रिए में बदलाव लाए । और सर्वधर्म एकता के इस साकार रूप को अपनाए, इससे आपके धर्म को कोई नुकसान नहीं होगा । ना ही आपकी संस्‍कृति खतरे में पड़ेगी ।
अगर आप ये सोच रहे हैं कि मैं किस हैसियत से ये बातें कर रहा हूं तो बता दूं कि मैंने स्‍वयं अंर्तधर्म विवाह किया है । और हम मज़े में हैं ।






16 comments:

परमजीत बाली May 23, 2007 at 2:14 PM  

आप का लेख बहुत सही विचारो को रख रहा है। यदि लड़का व लड़की अपनें अपनें धर्म का पालन करते हुए।बिना एक दूसरे पर धर्म परिवर्तन पर दबाव डाले, विवाह बन्धन मे बधे तो लोगो का विरोध भी कम होगा।

धुरविरोधी May 23, 2007 at 2:19 PM  

वाह यूनुस भाई;
बहुत अच्छा लिखते हो.
अ.धर्म बेहद निजी मामला है.
ब.समाज अंर्तधर्म विवाह के लेकर अपने संकीर्ण नज़रिए में बदलाव लाए । और सर्वधर्म एकता के इस साकार रूप को अपनाए, इससे आपके धर्म को कोई नुकसान नहीं होगा । ना ही आपकी संस्‍कृति खतरे में पड़ेगी।

Shirish May 23, 2007 at 3:06 PM  

My compliments, Yunus, on touching upon an issue that is needlessly oversensitive in Indian society. I fully agree with you that neither party in an inter-religion marriage should convert. All this talk of culture being violated is meaningless.
Marriages between people of different religions are the only way to bridge barriers, the true way to communal harmony and national unity.
Here let me quote Sahir Ludhianvi Sahab, who put it very correctly:
Nafraton ke jahan mein humko
Pyaar ki bastiyaan basaani hain
Door rehna koi kamaal nahin
Paas aao toh koi baat bane

Anonymous,  May 23, 2007 at 3:20 PM  

Meri samajh main hum samaaj main rahate hai isiliye shaadi aur Dharm keval niji mamalaa nahi ho sakta.

Ek hi dharm ka arth hota hai ek hi type ke log. ek jaise mahol main rah kar hum apne aap ko zyada protective mahsoos karte hai.

Ho sakta hai hamare jeevan main koi unpleasent, unexpected situation aa jaye tho hum apne mahole main shayad zyada comfartable feel kare.

Aakhir jinhone samaj ke niyam banaaye onhone soch-vichaar kiya hi hoga.

kabhi bhi mahole shayad itna nahi badaltha ki humara dum apno ki beech hi ghutane lage.

isiliye main anterdharm vivaah se sahmat nahi hoon.

Annapurna

mahashakti May 23, 2007 at 7:46 PM  

मै सहमत नही हूँ।

इसके अलावा मुझे कुछ नही कहना है।

mamta May 23, 2007 at 9:33 PM  

हम आपकी पोस्ट पढ़ते हुए यही सोच रहे थे की आपने अपना जिक्र क्यों नही किया पर अंत मे जब पढा तो अच्छा लगा। बहुत सही लिखा है

मैं इस बात को भी रेखांकित करना चाहता हूं कि मशहूर और कामयाब लोगों का सफर तो फिर भी आसान होता है, क्‍योंकि महानगरों के जिस वर्ग में उनका उठना बैठना है वहां ये सब स्‍वीकार्य है । पर बहुत मध्‍यवर्ग में तो इस तरह की शादियां आज भी कौतुहल और जिज्ञासा का केंद्र होती हैं । लोग चुनौतियां देते हैं कि इनकी ज्‍यादा निभेगी नहीं, सवाल उठाये जाते हैं कि तुम्‍हारे बच्‍चे किस धर्म को अपनायेंगे ।

Manish May 23, 2007 at 10:41 PM  

आपने अच्छी तरह अपनी बात कही है । इस बारे में आपके विचारों से मेरी पूर्ण सहमति है । हाल ही में इस संबंध में इस तरह के विवाहों के संबंध में गोरा पुस्तक में टैगोर के विचार
के विचार रखे थे । वहाँ विपरीत धर्म की बात तो नहीं थी पर मामला उस वक्त के हिन्दू और मूर्ति पूजा को ना मानने वाले ब्राह्म समाज पर था। टैगोर का कहना था कि अगर सच्चे प्रेम के साथ कष्ट सहते हुए अपने पथ पर चलें तो वो पथ गलत नहीं हो सकता।

और हाँ एक बात और आपकी पोस्ट का क्लाइमैक्स जोरदार रहा :p

Anonymous,  May 23, 2007 at 11:36 PM  

शादी मे धर्म - जाती - वर्ण - देश आदी मिलाने वाले लोगो का अपना स्वार्थ ही होता है। अगर पति-पत्नी एक दुसरे के लिए के समर्पित है तो कोई भेद बीच मे नही आता है। जो लोग इससे सहमत नही है, शायद उन्होने केवल अपने आस-पास की छोटी दुनिया ही देखी है। उनकी गलती नही है, उनके आस-पास के मौहाल और लोगो ने उनके सोच को सिमित कर के रखा है। अत: आप ऐसे लोगो की टिप्पणियाँ गंभीरता से न ले।

आखिर इंसान जीता तो एक बार ही है। जीवन एक उत्सव हो, बस और क्या चाहिए। आप अपने प्यार को सहजे और बदले मे अगर आपको कोई प्यार करे, इससे बड़ी और कोई खुशी है क्या? धर्म-समाज यह सब उन पलो के सामने कुछ भी नही।

Raag May 23, 2007 at 11:50 PM  

यूनूस भाई बढ़िया लिखा है। कुछ एसे ही विचार मैंने भी कभी लिखे थे, यहाँ पर।
इस विषय पर तो नहीं लेकिन आप Hotel Rwanda ज़रूर देखिए, जिसमें दो अलग अलग जातियों का एक जोड़ा है और रवांडा में उन्हीं दोनों जातियों के बीच संघर्ष हो जाता है।

अनुनाद सिंह May 24, 2007 at 9:22 AM  

यूनूस मियां,

आपसे पूरी तरह असहमत हूँ क्योंकि आपने इसमें अपने एकांगी विचारों को ही जगह दी है और सुविधा के लिये सत्य का गला घोंट दिया है।

अंतरधर्म विवाह से अधिक महत्वपूर्ण है कि भारत मे 'समान नागरिक संहिता' (common civil code) लागू हो। इससे अधिक जरूरी है कि मुस्लिम समाज भी हिन्दू समाज की तरह से खुला दिमाग अपनाये।
उदाहरण के लिये बुरका पद्धति और चार-चार शादियाँ, तीन बार तलाक-तलाक-तलाक की प्रथा की सब जगह भर्तसना हो।

कारण यह है कि जब तक देश में समान नागरिक कानून नहीं होगा तब तक अन्तर-धर्म विवाह की बात करना बेमानी है, क्योंकि विवाह एक समानता के धरातल पर किया जाने वाला विशेष प्रकार का बन्धन है। ये समानता का धरातल क्या हो सकता है - बस समान नागरिक संहिता, इस्लाम कतईं नहीं। सामाजिक सुधार की शुरुवात सही जगह से की जानी चाहिये। इसके लिये जरूरी है कि इस्लाम भी अपनी जेहादी परम्परा को छोडकर आधुनिक बने और 'धर्म' कहलाने की पात्रता हासिल करे। मेरा खयाल है कि आप मजहब और धर्म का अन्तर समझते हैं।

yunus May 24, 2007 at 10:08 AM  

अनुनाद जी मुझे लगता है कि मुद्दे से आप भटक गये हैं । आप उस सड़क पर जा रहे हैं जिसका कोई जिक्र मैं करना ही नहीं चाहता । देखिए बुरक़ा प्रथा, चार चार शादियां और तीन बार तलाक़ कहने जैसी चीज़ों की तो सभ्‍य समाज सदा से भर्त्‍सना करता रहा है । अगर आप इसे इस्‍लाम की पहचान मानते हैं तो मुझे खेद है । क्‍योंकि इस चीज का जनरलाईजेशन नहीं किया जा सकता । अपने आसपास देखिए कितने लोग तीन बार तलाक कहकर बीवी को छोड़ रहे हैं । कितने लोगों ने चार शादियां की हैं । इस तरह के लोगों की तादाद गिनी चुनी है । और हम सब इस जहालत की बहुत बहुत बहुत भर्त्‍सना करते हैं । समान आचार संहिता अगर लागू नहीं हो रही है तो उसकी वजह है राजनीतिक स्‍वार्थ ।
बहरहाल मेरा मुद्दा अंतर्धर्म विवाह का था । जो हिंदू-ईसाई, मुस्लिम ईसाई, हिंदु मुस्लिम किसी भी धर्म के बीच हो सकते हैं । आप अपनी संकीर्ण मानसिकता के तहत निहायत संगीन मुद्दे को उठाकर विषयांतर कर रहे हैं ।
मेरा कहना ये है कि अपने अपने धर्म को मानते हुए भी बिना कन्‍वर्ट किये-कराए अंर्तधर्म विवाह कामयाब हो रहे हैं और हो भी सकते हैं । मेरा मुद्दा था कि आज के आधुनिक समाज में हमें अंर्तधर्म विवाहों के बारे में गंभीरता से सोचना होगा । और ज्‍येष्‍ठ पीढ़ी को अपने बच्‍चों को इसकी अनुमति देनी होगी ।
अंतर्धर्म विवाह से आपका धर्म खतरे में नहीं पड़ रहा है । और मैं किसी धर्म विशेष की बात नहीं कर रहा । मैं कह रहा हूं कि ऐसा किसी भी धर्म में हो सकता है । सभी से अनुरोध है कि कृपया इस चिट्ठे को हिंदू मुस्लिम विवाद का केंद्र ना बनाएं ।

yunus May 24, 2007 at 10:14 AM  

परमजीत, धुरविरोधी, भाई शिरीष कोयल, ममता, मनीष और अन्‍नपूर्णा जी, महाशक्ति और anonymous टिप्‍पणी के लिये शुक्रिया । ये एक ऐसा मुद्दा है जिससे सहमति और असहमति की अपार संभावनाएं हैं । अन्‍नपूर्णा जी ने अपनी बात विस्‍तार से रखी है और उनका कहना सही है कि एक ही धर्म की शादियों में हम ज्‍यादा सिक्‍योर फील करते हैं । लेकिन गड़बडियां तो बहुत देखभाल कर तय की गई शादियों में भी हो जाती हैं । अगर आपसी समझ बूझ हो और आप एक कठिन राह पर संतुलित तरीके से चल पायें तभी अंर्तधर्म विवाह की ओर क़दम बढ़ाना चाहिये ।
एनोनिमस जी अगर आप अपने नाम के साथ टिप्‍पणी करते तो अच्‍छा लगता ।

पूनम मिश्रा May 24, 2007 at 1:50 PM  

अंतरधर्म विवाह के निबाह के लिये भी वही आवश्यक है जो स्वधर्म विवाह में......परिपक्वता,विश्वास,सूझबूझ,विचारों मे लचक और प्यार.बहुत अच्छा लगा आपका लेख पढकर.मैं मानती हूँ की 'बॉटमलाइन' सिर्फ़ एक है कि हम सब मानव जाति के हैं और मानव धर्म का निर्वाह कर लें उससे बढकर कुछ नहीं .

Vikas May 25, 2007 at 3:35 PM  

Yunusbhai,
Main apne parivar ke saath Sikkim ghumne chala gaya tha Isliye Internet aur apke blog se door tha. Ye vishay chhedneke liye hardik badhai. Tabhi main sochu aapse acchi tuning jamneka ehsas mujhe kyun hota hain. Main Hindu hun aur meri biwi Bohri Musalman hain. Orkut pe hamne ek community banai hain 'Hindu Muslim Love Marriage'. Wo aap dekhiye aur join kijiye.

Suresh Chiplunkar May 26, 2007 at 1:24 PM  

यूनुस भाई
एक संवेदनशील मुद्दे को छूने के लिये साधुवाद, लेकिन जैसा कि हमेशा होता है ऐसे विवादास्पद मुद्दों पर "मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्नाः" होती ही हैं, इसलिये मुझे मजरूह साहब वाला पोस्ट ज्यादा पसन्द आया, वही जारी रखें ज्यादा मजा आयेगा... ऐसे मुद्दों पर बहस / लेखन के लिये ढेर सारे ब्लॉगर हैं, आप की पहचान "कुछ अलग" देने के लिये है... भीड़ का हिस्सा ना बनें बस इतना इशारा काफ़ी है आपके लिये...

yunus May 26, 2007 at 5:18 PM  

विकास भाई आपके बारे में जानकर अच्‍छा लगा, मैं कई ऐसे लोगों को जानता हूं जिन्‍होंने अंर्तधर्म विवाह किया है और बहुत अच्‍छी तरह जीवन बिता रहे हैं । कुछ की तो हमने स्‍वयं मदद भी की है । भाई सुरेश चिपलूणकर जी आपने बिल्‍कुल सही कहा है । पर मुझे लगा था कि इस मुद्दे को उठाना चाहिये । ये सोचा नहीं था कि इतने विवाद जैसा हो जायेगा । पर आपने ठीक कहा है, बाक़ी बहुत विषय हैं, जिनपे चाहकर भी नहीं लिख पा रहा हूं । टिप्‍पणी के लिए धन्‍यवाद ।

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