संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Sunday, May 15, 2011

'कहां ले चले हो बता दो मुसाफि़र' : हेमंत कुमार के लाइव-कंसर्ट से

हम उस पीढ़ी से नहीं, जिसे हेमंत दा को साक्षात देखने और सुनने का मौक़ा मिलता।

हां उस पीढ़ी से ज़रूर हैं जिसने हेमंत दो को सुनना सीखा। याद आता है कि दूरदर्शन पर 'रांगोली' में अकसर देव आनंद को देखते थे। ट्रेन के डिब्‍बे में बदमाशी करते हुए वो गाते--
'है अपना दिल तो आवारा'। माउथ-ऑर्गन की इन तरंगों ने हमें इस बाजे की तरफ ला धकेला। (बाद में पता चला कि गाने में ये राहुल देव बर्मन का कमाल था।) लेकिन अपनी किस्‍मत में बदा नहीं था कि कोई 'बाजा' बजाना सीखें। हां, ये अलग बात है कि हमें भी पता नहीं था कि हम 'बाजे' पर बोलने की तरफ़ धकेले जा रहे हैं। इस गाने में देव साहब के 'कॉलर-अप' हैं। इसे देखकर कभी 'कॉलर-अप' किए तो पापा की डांट खा ली।

माउथ-ऑर्गन तो नहीं सीखा। पर हेमंत दा की आवाज़ मन में बस गई। फिर उनके कई-कई गीत मन में बस गए। ख़ास तौर पर
'राही तू रूक मत जाना'। पता नहीं क्‍यों ये आवाज़ हमें किसी और ही दुनिया से आती हुई लगती और किसी और ही दुनिया में हमें ख़ुद भी ले जाती। हेमंत दा के जिस गाने से हमें प्‍यार हुआ वो था—'या दिल की सुनो दुनिया वालो'। फिल्‍म 'अनुपमा'।

हाई-स्‍कूल के उन दिनों में बाद में पता चला कि जिस संत सरीखी आवाज़ को हम अटूट प्‍यार करते रहे, वो तो संगीतकार भी हैं। इंटरनेटी खोजबीन का दौर नहीं था। छोटे शहरों के कैसेट-शॉप वाले बहुत भाव खाते। लिस्‍ट देखकर 'टिक' और 'क्रॉस' लगाते जाते। और बुदबुदाते---'जे गाना है', 'जे नईं है', 'जे है', 'जे कौन सा है'। ऐसे चिढ़कू दुकानदार हमें अजीब नज़रों से देखते। 'कहां कहां से ले आते हैं गाने'। फिर नब्‍बे मिनिट का कैसेट तैयार होकर आता। सब गाने हेमंत कुमार के। और फिलिप्‍स के उस मोनो टेप-रिकॉर्डर पर बजता रहता---'हे हे हे हे, हूं हूं हूं'।

हेमंत दा के बारे में सलिल चौधरी ने कहा था कि अगर ईश्‍वर कभी गाए तो अपने लिए हेमंत दा की आवाज़ ही चुनेगा। इसके आगे कुछ कहने की गुंजाईश बची नहीं रह जाती। विविध-भारती आने से कुछेक साल पहले ही ह‍में हेमंत दा के ग़ैर-फिल्‍मी गानों से भी प्‍यार हो चला था। ख़ासकर एक गाना--जिसे हम हमेशा अपने साथ रखना चाहेंगे--'कल तेरी तस्‍वीर को सजदे किए हैं रात भर, हमने तेरी याद के आंसू पिये हैं रात भर'। और ये भी--
'भला था कितना अपना बचपन'। 

जिंदगी में कभी परेशानियां कम नहीं थीं। बेरोज़गारी के दिनों से लेकर भरपूर रोज़गार के दिनों तक....हमेशा चांद अकेला नज़र आता। रात उदास दिखती। सपनों के चकनाचूर होने का डर हमेशा रहता। प्रेम में पड़े तो उन दिनों भी हेमंत दा ही काम आए। 'याद किया दिल ने कहां हो तुम'। उनकी संगीतकारी काम आई।
'हवाओं पे लिख दो हवाओं के नाम'। वो किस्‍सा फिर कभी।

हेमंत दा संसार का सबसे ललित स्‍वर हैं। इंटरनेट आने के बाद जब उनके कुछ कंसर्ट्स की रिकॉर्डिंग देखी तो वो और भी सौम्‍य लगे। अगर संसार में मंच पर सभ्‍यता से गाने की मिसालें देखनी हैं तो हेमंत दा और तलत को देखिए और मन्‍ना दा को भी। मंच पर हारमोनियम लेकर जिस तरह हेमंत दा गाते हैं--यूं लगता है किसी पहाड़ी टीले पर बने मंदिर में अगरबत्‍ती और धूप की खुश्‍बू फैल रही है। हमेशा लगता रहा है कि भयंकर भभ्‍भड़ वाली इस दुनिया से अचकचाए मन को हेमंत दा की पनाह मिलती तो है तो सुकून मिलता है। 

इंटरनेटी यायावरी में उनके कुछ वीडियोज़ मिले हैं। जो यू-ट्यूब की माया से यहां टांगे जा रहे हैं। हमारे अपने संग्रह में भी इन्‍हें रख लिय गया है। जब तक यू-ट्यूब पर ये पत्‍ते टंगे रहेंगे, यहां भी रौनक रहेगी। वरना हम कुछ करेंगे इंतज़ाम।   
  
 



इसका ऑडियो ये रहा-
song: kahan le chale ho bata do musafir
singer: hemant kumar version (origionally sung by lata-hemant)
lyrics: rajinder krishan
music: hemant munar
year: 1956.


आपको बता दें कि मूल रूप से ये गाना लता-हेमंत की आवाज़ों में है। वो तो कंसर्ट में हेमंत दा ने इसे गा दिया तो हमें ये संस्करण नसीब हो गया।

हेमंत कुमार के कुछ और लाइव-वीडियोज़ भी हैं।
ये रहे लिंक--
1.
'जिंदगी कितनी खूबसूरत है'
2. 'ना तुम हमें जानो'
3. ये रात ये चांदनी फिर कहां।
4. जाग दर्दे-इश्‍क़ जाग

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Saturday, September 27, 2008

'कह रही है जिंदगी जी सके तो जी'-'फिर भी चला जाये दूर का राही'-संगीत की दुनिया के एक संत को सलाम ।

रेडियोवाणी पर आज हम हेमंत दा को याद कर रहे हैं । कल हेमंत दा की बरसी थी । और ये कोई आम दिन नहीं था । हेमंत दा के चाहने वालों के लिए ये दिन था एक बार फिर लोभान की भीनी खुश्‍बू जैसी हेमंत दा की आवाज़ से गुज़रने का । कल किसी वजह से हम हेमंत दा को याद नहीं कर पाए, इस क़सर को आज हम पूरा कर रहे हैं ।
hemant
रेडियोवाणी पर हम हेमंत दा को बार बार याद करते रहे हैं । हमें हेमंत दा संगीत-जगत की सबसे पवित्र और सबसे आध्‍यात्मिक आवाज़ लगते हैं । शायद आपको पता हो कि हेमंत दा शिव-शंभु की नगरी बनारस में पैदा हुए । नवकेतन की फिल्‍म 'मुनीमजी' में उन्‍होंने शिव जी की बारात 'पालकी सजाइये भभूती लगाइके शिवजी बिहाने चले' गाकर बनारस के हक़ को अदा कर दिया था । सुनने वाले आज तक हैरत करते हैं कि इतना बढिया उच्‍चारण्‍ा और बनारसी अदा की इत्‍ती अच्‍छी अदायगी आखिर कैसे आई होगी हेमंत कुमार मुखर्जी को
हेमंत कुमार की प्रतिभा के दो पहलू हैं । चूंकि वो गायक थे और मुख्‍य-रूप से उन्‍होंने गायन ही किया इसलिए आम श्रोताओं का ध्‍यान उनके संगीतकार वाले पक्ष की ओर नहीं जाता है ।
लेकिन ज़रा इस सूची पर ध्‍यान दीजिये ।
फिल्‍म आनंद मठ-
वंदे मातरम् और जय जगदीश हरे ।
फिल्‍म अनुपमा-
या दिल की सुनो दुनिया वालो/ कुछ दिल ने कहा/ क्‍यूं मुझे इतनी खुशी दे दी कि घबराता है दिल ।
फिल्‍म बीस साल बाद
कहीं दीप जले कहीं दिल / सपने सुहाने लड़कपन के /ज़रा नज़रों से कह दो
जी / बेक़रार करके हमें यूं ना जाईये ।
फिल्‍म दो दूनी चार-
हवाओं पे लिख दो हवाओं के नाम
फिल्‍म गर्ल फ्रैन्‍ड-
क़श्‍ती का ख़ामोश सफर/ आज रोना पड़ा तो समझे ।
फिल्‍म ख़ामोशी-
हमने देखी है उन आंखों की महकती खुश्‍बू / तुम पुकार लो तुम्‍हारा इंतज़ार है
फिल्‍म कोहरा-
ये नयन डरे डरे / ओ बेक़रार दिल / राह बनी खुद मंजिल
फिल्‍म-नागिन-
जादूगर सैंया / मन डोले / जिंदगी के देने वाले
फिल्‍म-साहिब बीवी और गुलाम-
भंवरा बड़ा नादान/ मेरी बात रही मेरे मन में / पिया ऐसो जिया में समाय गयो रे / ना जाओ सैंया

हम चाहें तो इस सूची को और और लंबा कर सकते हैं । ये सिर्फ झलक है hemant kumar मशहूर फिल्‍मों और गानों की, जिन्‍हें हेमंत दा ने स्‍वरबद्ध किया था । वो हेमंत दा ही थे जिन्‍होंने संगीतकार रवि को अपने सहायक होने के बाजवूद स्‍वतंत्र रूप से संगीत देने को प्रेरित किया और उनके लिए नई ज़मीन तैयार की । खुद संगीतकार और गायक होते हुए भी उन्‍होंने मौक़ा पड़ने पर अपने से मिलती जुलती आवाज़ वाले बंगाली गायक सुबीर सेन को मौक़ा दिया । कोई इनसिक्‍युरिटी कॉम्‍पलैक्‍स नहीं था हेमंत दा में । वो संगीत की दुनिया के संत थे । ( चित्र साभार- सुर-ताल )
इसके अलावा एक और बात का जिक्र जिस पर ज्‍यादा ध्‍यान नहीं दिया जाता । हेमंत दा ने 1959 के आसपास अपना प्रोडक्‍शन हाउस शुरू किया था और सबसे पहले जो फिल्‍म बनाई वो थी मृणाल सेन निर्देशित 'नील आकाशेर नीचे' । जिसमें काली बैनर्जी और मंजू डे ने मुख्‍य भूमिकाएं निभाई थीं । इस फिल्‍म ने राष्‍ट्रपति का स्‍वर्ण-पदक जीता था । फिर उन्‍होंने बीस साल बाद, कोहरा, फरार, राहगीर, खामोशी, बीवी और मकान जैसी फिल्‍मों का निर्माण किया । अगर मुझे सही याद आ रहा है तो जानी-मानी अभिनेत्री मौसमी चैटर्जी हेमंत कुमार की बहू हैं ।
आईये आज रेडियो वाणी पर हेमंत दा के दो अनमोल गाने सुने जायें । सुने-गुनें-बुनें-डूबें-उतरायें-इठलायें और इतरायें ।
ये दोनों गाने एक जीवन-दर्शन को प्रस्‍तुत करते हैं । 'कह रही है जिंदगी जी सके तो जी' जलती निशान फिल्‍म का गीत है । क़मर जलालाबादी ने इसे लिखा है और इसे स्‍वरबद्ध किया है दादा अनिल बिस्‍वास ने । इस गाने में कोरस का अद्भुत खेल है । जिस पर आपका ध्‍यान ज़रूर जायेगा । यूं लगता है जैसे कोई यायावर ऊबड़-खाबड़ रास्‍तों पर पीठ पर अपनी पोटरी लटकाये चला जा रहा है और मस्‍ती में गाए जा रहा है ।

कह रही है जिंदगी जी सके तो जी
एक जाम प्‍यार का पी सके तो पी
जाम ये उसी का है जो आगे बढ़कर थाम ले
इंतज़ार किसलिए जाम उठा जाम ले
आसमां के हाथ से छीन ले खुशी ।
हुस्‍न है खामोश क्‍यों, इश्‍क़ बेक़रार है
सामने बिठा के तुझको, तेरा इंतज़ार है
शोखियों की फुलझड़ी कुछ इधर भी ।।
कह रही है जिंदगी जी सके तो जी ।।



यहां देखिए दूसरा गाना है दूर का राही फिल्‍म का । इस गाने को हम पहले भी रेडियोवाणी पर सुनवा चुके हैं पर दिक्‍कत ये हुई कि कुछ दिनों बाद वो प्‍लेयर नाकाम हो गया । इसलिए दोबारा यहां उस गाने को पेश किया जा रहा है । ये भी जिंदगी की यायावरी का गाना है । फिल्‍म दूर का राही । गीतकार इरशाद । संगीतकार किशोर कुमार । और आवाज़ हेमंत कुमार । क्‍या बढि़या कॉम्बिनेशन है । वैसे इसका उलट कॉम्बिनेशन भी कमाल है । हेमंत कुमार ने बतौर संगीतकार किशोर से बड़े अच्‍छे गाने गवाए हैं ।

चलती चली जाए जीवन की डगर
मंजि़ल की उसे कुछ भी ना ख़बर
फिर भी चला जाए दूर का राही ।।
मुड़ के ना देखे, कुछ भी ना बोले
भेद अपने दिल का राही ना खोले
आया कहां से, किस देश का है
कोई ना जाने, क्‍या ढूंढता है
मंजिल की उसे कुछ भी ख़बर
फिर भी चला जाए दूर का राही ।।
झलके ना कुछ भी, आशा-निराशा
क्‍या कोई समझे, नैनों की भाषा
चेहरा कि जैसे, कोई सफ़ा है * सफा: पन्‍ना
किस्‍मत ने जिस पर कुछ ना लिखा है
मंजिल की उसे कुछ भी ख़बर
फिर भी चला जाए दूर का राही ।।

रेडियोवाणी हेमंत कुमार की स्‍मृति को नमन करता है ।
कल के लिए एक ज़रूरी ऐलान । कल स्‍वर-कोकिला लता मंगेशकर का अस्‍सीवां जन्‍मदिन है । इसलिए रेडियोवाणी पर कल आपको सुनवाया जायेगा इस ख़ाकसार का लिया हुआ लता जी का एक टेलीफोनिक इंटरव्‍यू, जिसमें उनके गानों से ज्‍यादा बातें दूसरी चीजों पर हुई हैं ।

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Thursday, June 12, 2008

तू स्‍वपन गो फान्‍याचेम: गोआ का एक और गीत- हेमंत कुमार

रेडियोवाणी पर मैंने आपको अपनी एक पोस्‍ट में पिछले दिनों गोआ का एक गीत हेमंत कुमार की आवाज़ में सुनवाया था । कुछ गीत ऐसे होते हैं जिनके अर्थ ना भी समझ में आएं तब भी वो हमारे दिलों में उतर जाते हैं । आप सभी ने बताया कि धुन अच्‍छी लगी । हालांकि बोल समझ में नहीं आए । मेरे कुछ मित्र हैं जो कोंकण से हैं । कोशिश रहेगी कि उनसे इन गीतों का अनुवाद करवा दिया जाये । बहरहाल । हेमंत कुमार और हेलेन डी. क्रूज़ की आवाज़ें और इस बार फिर एक कोंकणी गीत ।

जो आपको बारिश के इस मौसम में गोआ ले जायेगा । दो वर्ष पहले हम बारिश में गोआ निकल लिये थे । तरंगित व्‍यक्ति हैं । कुछ भरोसा नहीं कब मन कर जाए और हम बारिश की पिनक में चल पड़ें गोआ की ओर ।

मुंबई से गोआ इतना नज़दीक है कि सात माले की हमारी इमारत की छत से दिखता है । सही कहा ना ।

तो चलिए फिलहाल छत से गोआ को देखते हैं और गोआइन गीत का आनंद लेते हैं । इस गाने के बोल मुझे कोंकणी संगीत को समर्पित एक ब्‍लॉग से मिल गए  । वो भी हाजिर हैं । एक बार फिर बता दें कि आवाज़ें हेमंत कुमार और हेलेन डी क्रूज़ की हैं ।

 Male: Thum swapon go faanthyaachem
Hyaa sobhith saunsaraanthlem
Thum ful go them baaginthlem
Kaadun maalunk chinthlem ||2||
Both: Kithlo sobhith tho saunsaar
Melaath thor thuzo saangaath
Udelim thaaraan thim molbaar
Uzwaad bhorlaa kaalzaanth ||2||
Female: Thum fudaaraacho divo
Thum gondo re kaalzaacho
Thum amar re prem aamcho
Kedinch visronk nozo ||2||
Both: Thond vaaren bhonvthim maarthaana
Fulaan modlo suvaad vaalthana
Kaalzaam dogainchim vengthaana
Thuje vine saunsaar naa ||2||
Male: Thum swapon go faanthyaachem
Hyaa sobhith saunsaraanthlem
Thum ful go them baaginthlem
Kaadun maalunk chinthlem
Kaadun maalunk chinthlem
Kaadun maalunk chinthlem..

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Monday, June 9, 2008

हेमंत कुमार की आवाज़ में गोआ का लोकगीत

कुछ दिनों पहले इंटरनेट की गलियों में घुमक्‍कड़ी करते हुए कुछ कोंकणी और गोआइन गीत मिल गये । जब हेमंत कुमार की आवाज़ सुनाई दी तो ज़रा आश्‍चर्य हुआ कि दादा ने कितनी भाषाओं में गाया है । फिर पीछे से रफ़ी साहब भी सुनाई दे गये एक गाने में । मुझे अच्‍छा लगा । तो लीजिए पेश है हेमंत कुमार की आवाज़ में एक गोआइन गीत ।

                       goa-folk-dance

ना तो मुझे इस गाने के बोल समझ आए और ना ही आशय । प्‍यार मुहब्‍बत का गाना लगता है । अरे कोई है गोआ में जो मदद करे ।

फिलहाल आपकी नज़र--जूलियाना ।।

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Tuesday, April 22, 2008

हेमंत कुमार का एक और बंजारा गीत: फिर भी चला जाए दूर का राही ।

रेडियोवाणी पर इन दिनों हेमंत कुमार के गानों का नशा छाया है । ये ऐसा नशा है जो जब चढ़ जाता है तो बहुत दिनों तक नहीं उतरता । इस सिलसिले की पहली पोस्‍ट थी--'जनम जनम बंजारा हूं बंधू' । और मैंने उसमें भी कहा था कि हम अपने मन के बंजारे हैं । अपने मन के बयाबान में विचरण करते रहते हैं । हेमंत दा के कई ऐसे गीत हैं, जिनमें यायावरी का स्‍पर्श है । हेमंत दा यायावरों के गायक हैं ।
अब देखिए ना 'दूर का राही' फिल्‍म का जो गीत आज मैं लेकर आया हूं, वो उस समय आपको बहुत ही अच्‍छा लगेगा जब आप किसी सफर पर निकले हों और ये सफर ट्रेन से हो रहा हो । और आपको खिड़की वाली सीट मिली BrightWhiteLight हो और आप खिड़की के कांच से नाक सटाकर तेज़ी से भागते और पीछे छूटते पेड़ों को देख रहे हों । गांवों को देख रहे हों । और तभी आपको एक चरवाहा टीले पर जबर्दस्‍त फुरसत में बेफिक्र बैठा नज़र आ जाये । और तब आपका जी भीतर तक जल जाए कि आपकी किस्‍मत ऐसी क्‍यों नहीं । ( हालांकि ऐसा होने का आपके भीतर साहस नहीं ) और तब आपके सपनों की दुनिया खुलती चली जाए, जिसमें आप गलियों चौराहों, शहरों कस्‍बों और गांवों, पहाड़ों और नदियों को पार करते हुए चले जा रहे हैं । बस चले जा रहे हैं । ना कोई मंजिल है ना कोई साया है, चुप है ज़मीं दूर आसमां ।
ऐसी यायावरी का गीत है ये । आईये सुना जाए । लेकिन पहले ये भी बता देना मैं अपनी जिम्‍मेदारी समझता हूं कि ये गीत सन 1971 में आई फिल्‍म 'दूर का राही' का है । शैलेंद्र ने इसे लिखा है । संगीत किशोर कुमार का है । इस गाने के ख़ामोश साज़ों और विकल कोरस पर आपको ख़ास ध्‍यान देना है । मुझे ऐसे विकल कोरस खास तौर पर पसंद हैं । और वो भी हेमंत दा की आवाज़ के पीछे । जल्‍दी ही हेमंत दा का एक तूफानी गीत लेकर आऊंगा जिसमें कोरस का बेक़रार खेल है ।




चलती चली जाए जीवन की डगर
मंजि़ल की उसे कुछ भी ना ख़बर
फिर भी चला जाए दूर का राही ।।
मुड़ के ना देखे, कुछ भी ना बोले
भेद अपने दिल का राही ना खोले
आया कहां से, किस देश का है
कोई ना जाने, क्‍या ढूंढता है
मंजिल की उसे कुछ भी ख़बर
फिर भी चला जाए दूर का राही ।।
झलके ना कुछ भी, आशा-निराशा
क्‍या कोई समझे, नैनों की भाषा
चेहरा कि जैसे, कोई सफ़ा है                  * सफा: पन्‍ना
किस्‍मत ने जिस पर कुछ ना लिखा है
मंजिल की उसे कुछ भी ख़बर
फिर भी चला जाए दूर का राही ।।

अगर इस गाने ने आपको यायावरी पर मजबूर किया है, तो बहुत अच्‍छा है । अगर इस गाने ने आपको व्‍यस्‍तताओं से समय निकाल कर छोटा सा पिकनिक मनाने को कहा है तो भी अच्‍छा है ।

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Sunday, April 20, 2008

हेमंत दा की सुरीली तान: ये नयन डरे डरे: फिल्‍म कोहरा 1965 ।

अचानक रेडियोवाणी पर हेमंत कुमार के गानों का सुरूर चढ़ गया है । ऐसा पिछली पोस्‍ट के बंजारे गीत के बाद हुआ है । राहगीर फिल्‍म का जनम जनम बंजारा हूं बंधु । मुझे सब पुराने दिन याद आ गये हैं । जब हेमंत कुमार के गानों के लिए हम भटका करते थे और फिर किसी म्‍यूजि़क शॉप वाले को लिस्‍ट दी जाती और एक 'धांसू' कैसेट तैयार होता जिसे इतना बजाया जाता इतना बजाया जाता कि वो घिसने के कगार पर पहुंच जाता ।

ऐसे समय में मिला था फिल्‍म कोहरा का ये गीत । इस गाने के बोल बड़े  hemantअजीब से हैं । छोटे अंतरे हैं और हेमंत कुमार वाली सादगी है इसमें । मिनिमम म्‍यूजिक वाला गाना है ये । आपको बता दें कि सन 1964 में आई थी फिल्‍म 'कोहरा' । इस फिल्‍म के कलाकार थे विश्‍वजीत, वहीदा रहमान और ललिता पवार वग़ैरह । संगीत हेमंत कुमार का ही था और गीत कैफी आजमी के । बीरेन नाग ने इस फिल्‍म का निर्देशन किया था । आईये ये गीत पढ़ें और सुनें ।




ये नयन डरे डरे, ये जाम भरे-भरे

ज़रा पीने दो ।
कल की किसको ख़बर, इक रात होके निडर
मुझे जीने दो ।
ये नयन डरे डरे ।
रात हंसी ये चांद हंसी तू सबसे हंसीं मेरे दिलबर
और सबसे हसीं तेरा प्‍यार
तू जाने ना ।
ये नयन डरे डरे ।।
प्‍यार में है जीवन की खुशी देती है खुशी कई ग़म भी
मैं मान भी लूं कभी हार
तू माने ना ।
ये नयन डरे डरे ।।


आप इस गाने का आनंद लीजिए । फिलहाल आपको ये भी बता दूं कि रेडियोवाणी की पुरानी पोस्‍टों की धीरे धीरे मरम्‍मत की जा रही है । कई गाने बजने बंद हो गये हैं । कई लिंक पुराने पड़ गये हैं । ये काम सुस्‍ती से होने वाला काम है । पर मैं पूरी तन्‍मयता से इसे करना चाहता हूं । क्‍या आप मुझे 201 वीं पोस्‍ट की बधाई नहीं देंगे ।

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Friday, April 18, 2008

जनम जनम बंजारा हूं बंधू : फिल्‍म राहगीर, हेमंत कुमार की सौंधी आवाज़ ।

रेडियोवाणी पर गुलज़ार के गीतों की चर्चा अकसर ही हुई है । आज भी एक गुलज़ारी गीत की बात की जाए । फिल्‍म 'राहगीर' सन 1969 में आई थी । कलाकार थे-बिस्‍वजीत, संध्‍या राय, शशिकला, इफ्तेख़ार, कन्‍हैयालाल, निरूपा राय और असित सेन । मैंने ये फिल्‍म नहीं देखी । देखने का मौक़ा मिले या नहीं, पता नहीं । लेकिन ये गीत मैं बार-बार सुनता हूं ।

मैं बार-बार अपने इस चिट्ठे और दूसरे चिट्ठे 'तरंग' पर यायावरी करने की hemantapic2अपनी तमन्‍ना की चर्चा हमेशा करता रहता हूं । जो अभी तक पूरी नहीं हो पाई । ख़ैर...आपको नहीं लगता कि हम सब अपने मन के बंजारे हैं । मन की दुनिया में विचरण करते रहते हैं । ये हम बंजारों का गीत है । और हमारे मन के बेहद क़रीब है । पहले हेमंत दा की प्रतिभा को सलाम कीजिए । आप भी उनके मुरीद हैं तो इस पेज पर जाईये जहां से हमने ये तस्‍वीर साभार ली है । ये सुरताल डॉट कॉम की लिंक है । हेमंत दा के बारे में इस पेज पर भरपूर जानकारियां हैं ।

मेरे एक साथी कहते हैं कि हेमंत कुमार की आवाज़ यूं लगती है जैसे किसी मंदिर में धूप-बत्‍ती की खुश्‍बू आ रही हो । जैसे कोई पुजारी तन्‍मयता से गा रहा हो । जैसे रात के सन्‍नाटे में अचानक वीणा की तान सुनाई दे रही हो ।

कुछ इसी तरह का अंदाज़ है हेमंत दा का । हेमंत दा और गुलज़ार की जुगलबंदी कई गानों में हुई है । ख़ासतौर पर इस गाने की बात करते हुए मुझे सुकून मिलता है । ज्‍यादा कुछ नहीं कहना । सुनिए और बताईये ।


जनम से बंजारा हूं बंधु जनम-जनम बंजारा
कहीं कोई घर ना घाट ना अंगनारा ।।
जहां कहीं ठहर गया दिल, हमने डाले डेरे
रात कहीं नमकीन मिली तो मीठे सांझ-सवेरे
सब नगरी छोड़ी, साहिल छोड़ा लिया मंझधारा
बंधु रे........नगरी छोड़ी साहिल छोड़ा लिया मंझधारा
बंधु कहीं कोई घर ना घाट ना अंगनारा ।।
सोच ने जब करवट बदली शौक़ ने पर फैलाए
....के तिनके सारे डाल से उड़ाए
सब रिश्‍ते तोड़े नाते तोड़े छोड़ा कुल-किनारा
बंधु रे.....कहीं कोई घर ना घाट ना अंगनारा ।
जनम से बंजारा ।।

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Tuesday, July 17, 2007

आईये आज एक मांझी गीत सुनें


मुंबई में पिछले दस सालों से हूं, मराठी खूब समझ में आती है । थोड़ी थोड़ी बोल भी लेता हूं । मराठी संगीत खूब सुना है, पर केवल वही जो अच्‍छा लगा । जैसे कुछ लोकगीत, कुछ अभंग और ज्‍यादातर कोळी गीत । ये गीत सबसे पहले मैंने म.प्र. में अपने एक मराठी मित्र के घर पुराने ज़माने के रिकॉर्ड प्‍लेयर पर सुना था । फिर बरसों बाद विविध भारती में सुना । अब अकसर सुनता हूं ।

आपको बता दूं कि इसे सुनने के लिए मराठी का ज्ञान होना आवश्‍यक नहीं है । बल्कि कोई भी भाषा ना आती हो तो भी चलेगा । संगीत की यही ख़ासियत है कि वो अकसर भाषाओं के परे चले जाता है । हां ये अलग बात है कि अच्‍छे गीतों की कविता को समझे बिना हम गीत का रसास्‍वादन नहीं कर पाते । लेकिन ये तो मांझी गीत है और इसका मतलब समझना भी बहुत आसान है ।

मांझी गीतों के साथ बंगाल का नाम बिल्‍कुल चस्‍पां हो गया है । सचिन देव बर्मन ने हिंदी फिल्‍मों में कई मांझी गीत दिये और इन पर कभी अलग से इसी चिट्ठे पर बात होगी । बंगाल के कई बेहतरीन लोकगीत भी हैं । भटियाली परंपरा के । पर आज इस मराठी लोकगीत की तरंग में खो जाईये ज़रा ।


जब मैंने अपने इस लेख को छापा, तो इस मराठी गीत का अर्थ नहीं दिया था, अगले ही दिन अमेरिका से लावण्‍या जी ने इसका अर्थ इन पंक्तियों के साथ भेजा, जिसे यहां जोड़ा जा रहा है । उन्‍हें ये अर्थ किन्‍हीं सीताराम चंदावरकर ने बताया है । लावण्‍या जी के योगदान से अब इसे सुनने का मज़ा दोगुना हो जायेगा ।



इस गीत को कई कई बार सुना है -बेहद लुभावना है --प्रस्तुति के लिये शुक्रिया युनूस भाई साहब !
इसका भाव... ये रहा..~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

लावण्या जीमराठी के इस प्रसिद्ध 'कोळीगीत' (मछुआरों का गीत) के लिए धन्यवाद! जो सदस्यमराठी से वाक़िफ़ नहीं हैं, उन के लिये इस गीत का सरल रूपान्तर करने की चेष्टा कीहै :

(पुरुष) चलाओ पतवार, रे मांझी, चलाओ पतवारमैं 'डोलकर'*,
डोलकर दरिया का राजा
पानी में है घर मेरा,
बंदर पर आता जाता ...मैं डोलकर
स्त्री) मांबाबू की मैं हूं छोरी लाडली
पीली चोली पहनी है अंजीरी साडी
बालों में डाला है फूला चंपा
खुशबू से हवा करती झकझोरी
नाक में नाज़ुक नथनी,
गले सोने के मणी
कोलीवाडे की मैं रानी
पुनमी रात में नाचती करती मज़ा
पुरुष) मैं डोलकर, डोलकर दरिया का राजा(
पुरुष) इस दरिया की प्रतिष्ठा है महान
कभी उठती हैं मौजें पहाड समान
कभी मिल जाता है नाव को आस्मान
स्त्री) बाट जोहता है जब प्यार
तब आती है दरिया में बाढ
पानी से भीगती है धरती
आएगा मिलने भ्रतार मेरा
पुरुष) मैं डोलकर, डोलकर दरिया का राजा
पुरुष) पूनम की रात पी रही चांदनी
देखो मच्छी भी चांदी की बनी
खुद ही मेरे जालों में आ गयी
ले जाऊंगा बाजार मछली ताज़ा
मैं डोलकर, डोलकर दरिया के राजा
*मछली पकडने के ज़हाज़ को मराठी में कहते हैं.
सस्नेह
सीताराम चंदावरकर



कल रेडियोवाणी पर आप सुन सकेंगे साहिर लुधियानवी के कुछ अशआर खुद उनकी आवाज़ में । बहुत दुर्लभ रिकॉर्डिंग्‍स । मेरे मित्र शिरीष कोयल के सौजन्‍य से ।

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