संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Sunday, June 12, 2011

'रहने को घर दो'--मन्‍ना दा की आवाज़ (श्रृंखला 'बीवी और मकान' दूसरा भाग)

रेडियोवाणी पर फिल्‍म 'बीवी और मकान' के गानों की अनियमित श्रृंखला चल रही है। पिछली कड़ी में मैंने आपको एक गीत सुनवाया था--'जब दोस्‍ती होती है, तो दोस्‍ती होती है'। आज इसी फिल्‍म का एक और गीत। लेकिन पहले गुलज़ार की बातें।

गुलज़ार आने गीतों को याद करते हुए फिल्‍मफेयर के एक पुराने अंक में कहते हैं--
ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्‍मों का संगीत अनूठा होता था। उसे कहानी में काफी बारीकी से बुना जाता था। कभी ऐसा नहीं होता था कि गाना चाहिए इसलिए गाना है। ना ही आइटम नंबर का कोई कंसेप्‍ट था। गाने कहानी को आगे बढ़ाते। वो कहानी कहते थे। ऋषि दा और मुझमें कुछ समानताएं थीं। हम दोनों ने फिल्‍म की बारीकियां बिमल रॉय से सीखी थीं। मैं तो ये भी कहूंगा कि अगर बिमल रॉय उस स्‍कूल के प्रिंसिपल थे तो ऋषि दा उसके स्‍कूल-मास्‍टर। मैंने सबसे पहले ऋषि दा के साथ जिस फिल्‍म में काम किया था उसका नाम है--'बीवी और मकान'। पहली बार उन्‍होंने एक संगीत-प्रधान फिल्‍म पर हाथ आज़माया था। फिल्‍म में परिस्थितियां कुछ ऐसी थीं कि कुछ अनूठे गानों की ज़रूरत थी। इसलिए इस फिल्‍म के गाने अनूठे थे।



गुलज़ार की ये बात पूरी तरह सही है। ऋषि दा की फिल्‍मों और ख़ासकर इस फिल्‍म के बारे में तो एकदम सटीक। मिसाल के लिए आज के गाने को ही लीजिए। इसका शीर्षक है--'रहने को घर दो'। इसे मेहमूद पर फिल्‍माया गया है। आगे की कडियों में भी इस फिल्‍म की कहानी के बारे में चर्चा की जाएगी पर फिलहाल तो इतना बता दें कि इस कहानी का ताल्‍लुक महानगर में घर की समस्‍या से है। गांवों से आए अकेले युवकों को कोई शहर में मकान नहीं देता। बस...यही सूत्र है कहानी का। और कमोबेश ये समस्‍या आज तक कायम है।

मन्‍ना दा की अदायगी इस गाने का USP है।
अब हम शब्‍दों में क्‍या कहें। आप ख़ुद सुन लीजिए।





रहने को घर दो
छत पे हो फर्श या फर्श पे छत हो।
खिड़की-विड़की, बिजली-खुजली, घंटी-वंटी कुछ नहीं चईए प्‍यारे।


बस इक छोटा-सा दरवाज़ा हो।।

ईंट पे ईंट जमा कर लो
घर ऊपर ऊपर ज्‍यादा है
आए थे ऊंची बिल्डिंग में
बिल्डिंग से ऊंचा भाड़ा है
फ़र्श पे रहने वाले कैसे अर्श पे जाएं जाएं।


रहने को घर दो।।



थोड़े सा जल, थोड़े से चने
इक चारदीवारी, पांच जने।


पांच पांडवा, युधिष्ठिरा, भीम, अर्जुना, नकुल-सहदेवा
वन फोर फाइव, फाइव परसना।
थोड़ा-सा जल, थोड़े से चने
इक चारदीवारी पांच जने।
शहर में तेरे शरण बिना
शरणार्थी हो गए प्‍यारे।
कुटिया ना सही कोई ख़ाली कुंआ
ऊपर ना सही तहख़ानों में
ख़ाली हो अगर तो जेल सही
शामिल कर लो दीवानों में
आस-पड़ोस उधार मिले तो
कुछ नईं चईये प्‍यारे
रहने को घर दो।।



कहना  ना होगा कि घर की समस्‍या को लेकर लिखा गया गुलज़ार का ये अपने आप में एकदम अनूठा गाना है। रूमानियत ये लबरेज़ 'दो दीवाने शहर में' का मिज़ाज बिल्‍कुल अलग है। अगली बार जब मिलेंगे तो चर्चा करेंगे इसी फिल्‍म के किसी और गाने की।

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Wednesday, May 18, 2011

'जब दोस्‍ती होती है, तो दोस्‍ती होती है' ('बीवी और मकान': पहला भाग)

पिछले कुछ दिनों से हम हेमंत कुमार को सुन रहे हैं। पिछली पोस्‍ट ने भी इसका अंदाज़ा तो दे ही दिया होगा। हेमंत दा की बात हो तो बतौर गायक बात करना इकहरी बात होगी। हेमंत दा हिंदी फिल्‍म संगीत की विलक्षण प्रतिभा थे। सही मायनों में विलक्षण। गायकी तो उनकी प्रतिभा का एक छोटा-सा पहलू है। उनकी संगीतकारी पर सचमुच विस्‍तार से चर्चा की जानी चाहिए। क्‍योंकि उन्‍होंने कुछ बेहद चुनौतीपूर्ण और कालजयी फिल्‍मों में कमाल का संगीत दिया। मोटे तौर पर कुछेक के नाम गिनाना शायद मौज़ूं होगा। नागिन, आनंद-मठ, साहेब बीवी और ग़ुलाम, मिस मैरी, वग़ैरह। एक संगीतकार के रूप में उनकी 'रेन्‍ज' कमाल की रही है।

संगीतकारी के अलावा उन्‍होंने फिल्‍म-निर्माण में भी किया। फिल्‍में बनाने के 2003_hemant_kumar उनके शौक़ की इंतेहा ये थी कि उन्‍होंने बहुत ही साहसिक फिल्‍में बनाईं। पूरी तरह जोखिम भरी। 1959 में उन्‍होंने मृणाल सेन के निर्देशन में बनी फिल्‍म 'नील आकाशेर नीचे' का निर्माण किया। तब उनके प्रोडक्‍शन हाउस का नाम होता था, हेमंत-बाला प्रोडक्‍शन। मैंने ये फिल्‍म नहीं देखी, पर इसके बारे में ये पता है कि कोलकाता की गलियों में भटकने वाली एक चीनी फेरीवाले की कहानी थी ये। आगे चलकर हेमंत दा की फिल्‍म कंपनी का नाम हो गया 'गीतांजली'। इस कंपनी ने बीस साल बाद, बीवी और मकान, फ़रार, राहगीर और ख़ामोशी जैसी फिल्‍में बनाईं। अगर आप इन फिल्‍मों की कथा-वस्‍तु पर ध्‍यान दें तो पायेंगे कि कितना जोखिम उठाने वाले प्रोड्यूसर थे हेमंत दा। इन सभी फिल्‍मों में उनका संगीत था।

मुझे एक लंबे अरसे से 'बीवी और मकान' फिल्‍म के गाने बेहद पसंद रहे हैं। और इसकी एक वजह है। ये एक आम फिल्‍म के आम गीत नहीं हैं। जब मैंने इस श्रृंखला की पूर्व-सूचना फेसबुक पर दी, तो जयपुर के भाई पवन झा ने इसके गानों के बारे में अपनी बेहतरीन टिप्‍पणी दी।
 

One interesting aspect of the songs of this film is male bonding songs.. there are male duets, triplets and quad songs in the soundtrack..
-Anhoni baat (my favorite) features Mukesh, Talat, Manna, Hemant and mehmood all in one song together..
-Aa tha jab janam liya tha features Mukesh, Hemant, Manna da
-Jab dosti hoti hai & Duniya me do sayane both features Hemant & Manna

Apart from the above it also feature a beautiful Asha-Lata duet, Dabe labin se kabhi jo koi salaam le.. and a beautiful Rafi solo Jaane kahan dekha hai.. and not to forget the hindi version of kishoreda's claasic shing nei (lukochuri) in the voice of Manna Dey (khul khuk khullam khulla)
In all a very interesting collage of songs..

पवन ने एकदम सही बात पर ध्‍यान खींचा है। चूंकि कहानी चार युवकों की है, इसलिए हेमंत दा को यहां पुरूष टोली वाले गाने गवाने का मौक़ा मिला। और ऐसा क़तई नहीं था कि गायक-संगीतकारों की तरह उन्‍होंने अपनी आवाज़ का मोह किया हो। जहां ज़रूरी है वहीं उनकी आवाज़ है। यही नहीं इस अलबम में हेमंत दा के गाने अलग ही मिज़ाज लेकर आए हैं।

यहां उनकी बांग्‍ला रूमानियत ज़्यादातर ग़ायब है। ये हल्‍के-फुल्‍के लेकिन बारीक टिप्‍पणियों वाले गाने हैं। intellectual songs. इनमें एक खिलंदड़पन है। एक मस्‍ती है, बेफिक्री है।

श्रृंखला के पहला गाना वो है--जो काफ़ी समय से मेरे ज़ेहन में गूंज रहा है और एक धीमे लेकिन पक्‍के नशे के रूप में इसका असर गहरा होता चला जा रहा है। 

 


song: jab dosti hoti hai to dosti hoti hai
singers:hemant kumar, manna dey, ghulam mohammad, balbir
lyrics: gulzar
music:hemant kumar 



अगर आपने ये फिल्‍म नहीं  देखी तो इसका माहौल आपको मेहमूद के इस संवाद से समझ आ जायेगा। गाना सुनकर इसकी इबारत लिखी गयी है, हो सकता है कि कहीं कहीं कान का धोखा हो गया हो, सुझावों का स्‍वागत है। पर ग़ौरतलब है कि गुलज़ार के लिखे इन गानों की ज़्यादा चर्चा नहीं होती। वाक़ई। कमाल के बोल हैं ये। अपनी बात भी कहते हैं और फिल्‍म का अटूट हिस्‍सा भी हैं।

यहां बलबीर और गु़लाम मोहम्‍मद जैसी आवाज़ों की तरफ़ आपका ध्‍यान खींचना ज़रूरी है। ग़ुलाम मोहम्‍मद मधुमति के गाने--'तन जले मन जलता रहे' में सुनाई देते हैं। और ये संगीतकार ग़ुलाम मोहम्‍मद नहीं हैं। बलवीर मनोज कुमार की कई फिल्‍मों में सुनाई देते रहे हैं।  

'यार किशन ये हद्द हो गयी
यारों की तो भद्द हो गयी
सिर्फ़ अहसान ही बाक़ी रह गये
दोस्‍ती यारी रद्द हो गयी
प्‍यार में दुनियादारी कैसी
मुफ्त की चीज़ नगद हो गयी है
छी छी यार की ये पहचान
दोस्‍ती में कैसा अहसान
जब दोस्‍ती होती है तो.........'


अहसान नहीं होता..
जब दोस्ती होती है तो दोस्ती होती है
और दोस्‍तों में कोई अहसान नहीं होता।

जल बिन तड़पत मछली जैसे नल बिन तरपत पानी
और हाथ पानी बिना चलते....अस्‍नान नहीं होता।।

ये पांचों की पंचायत, जो सोचे सही होगा
हम पांडव हैं भारत के, जो कह दें वही होगा
ओए जम के एक जमा दूं....दूध का दही होगा
मीरा के प्रभु कहत कबीरा, जीवन काज कदम कश्‍तीरा
खात कष्‍ट बिना ये जीवन, आसान नहीं होता।।
जब दोस्‍ती होती है तो....

उंगली से ढीली का जब तक
जोड़ सलामत ..थाह सलामत
छोटी और बड़ी हैं तो क्‍या


पांचों है तो हाथ सलामत
एक एक के हैं पांच मुक़द्दर
तकलीफ़ों से घबराना मत
सांझे जोड़ जवानी बचपन
पांच से पांच मिले तो पचपन
पांचों साथ आए तो....
नुकसान नहीं होता....
जब दोस्‍ती होती है तो दोस्‍ती है
और दोस्‍तों में कोई अहसान नहीं होता।।

(पवन भाई के सहयोग से गाने की इबारत को दुरूस्त कर दिया गया है)
रेडियोवाणी पर फिल्‍म

'बीवी और मकान' के गानों का ये अनियमित सिलसिला जारी है।


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Saturday, September 27, 2008

'कह रही है जिंदगी जी सके तो जी'-'फिर भी चला जाये दूर का राही'-संगीत की दुनिया के एक संत को सलाम ।

रेडियोवाणी पर आज हम हेमंत दा को याद कर रहे हैं । कल हेमंत दा की बरसी थी । और ये कोई आम दिन नहीं था । हेमंत दा के चाहने वालों के लिए ये दिन था एक बार फिर लोभान की भीनी खुश्‍बू जैसी हेमंत दा की आवाज़ से गुज़रने का । कल किसी वजह से हम हेमंत दा को याद नहीं कर पाए, इस क़सर को आज हम पूरा कर रहे हैं ।
hemant
रेडियोवाणी पर हम हेमंत दा को बार बार याद करते रहे हैं । हमें हेमंत दा संगीत-जगत की सबसे पवित्र और सबसे आध्‍यात्मिक आवाज़ लगते हैं । शायद आपको पता हो कि हेमंत दा शिव-शंभु की नगरी बनारस में पैदा हुए । नवकेतन की फिल्‍म 'मुनीमजी' में उन्‍होंने शिव जी की बारात 'पालकी सजाइये भभूती लगाइके शिवजी बिहाने चले' गाकर बनारस के हक़ को अदा कर दिया था । सुनने वाले आज तक हैरत करते हैं कि इतना बढिया उच्‍चारण्‍ा और बनारसी अदा की इत्‍ती अच्‍छी अदायगी आखिर कैसे आई होगी हेमंत कुमार मुखर्जी को
हेमंत कुमार की प्रतिभा के दो पहलू हैं । चूंकि वो गायक थे और मुख्‍य-रूप से उन्‍होंने गायन ही किया इसलिए आम श्रोताओं का ध्‍यान उनके संगीतकार वाले पक्ष की ओर नहीं जाता है ।
लेकिन ज़रा इस सूची पर ध्‍यान दीजिये ।
फिल्‍म आनंद मठ-
वंदे मातरम् और जय जगदीश हरे ।
फिल्‍म अनुपमा-
या दिल की सुनो दुनिया वालो/ कुछ दिल ने कहा/ क्‍यूं मुझे इतनी खुशी दे दी कि घबराता है दिल ।
फिल्‍म बीस साल बाद
कहीं दीप जले कहीं दिल / सपने सुहाने लड़कपन के /ज़रा नज़रों से कह दो
जी / बेक़रार करके हमें यूं ना जाईये ।
फिल्‍म दो दूनी चार-
हवाओं पे लिख दो हवाओं के नाम
फिल्‍म गर्ल फ्रैन्‍ड-
क़श्‍ती का ख़ामोश सफर/ आज रोना पड़ा तो समझे ।
फिल्‍म ख़ामोशी-
हमने देखी है उन आंखों की महकती खुश्‍बू / तुम पुकार लो तुम्‍हारा इंतज़ार है
फिल्‍म कोहरा-
ये नयन डरे डरे / ओ बेक़रार दिल / राह बनी खुद मंजिल
फिल्‍म-नागिन-
जादूगर सैंया / मन डोले / जिंदगी के देने वाले
फिल्‍म-साहिब बीवी और गुलाम-
भंवरा बड़ा नादान/ मेरी बात रही मेरे मन में / पिया ऐसो जिया में समाय गयो रे / ना जाओ सैंया

हम चाहें तो इस सूची को और और लंबा कर सकते हैं । ये सिर्फ झलक है hemant kumar मशहूर फिल्‍मों और गानों की, जिन्‍हें हेमंत दा ने स्‍वरबद्ध किया था । वो हेमंत दा ही थे जिन्‍होंने संगीतकार रवि को अपने सहायक होने के बाजवूद स्‍वतंत्र रूप से संगीत देने को प्रेरित किया और उनके लिए नई ज़मीन तैयार की । खुद संगीतकार और गायक होते हुए भी उन्‍होंने मौक़ा पड़ने पर अपने से मिलती जुलती आवाज़ वाले बंगाली गायक सुबीर सेन को मौक़ा दिया । कोई इनसिक्‍युरिटी कॉम्‍पलैक्‍स नहीं था हेमंत दा में । वो संगीत की दुनिया के संत थे । ( चित्र साभार- सुर-ताल )
इसके अलावा एक और बात का जिक्र जिस पर ज्‍यादा ध्‍यान नहीं दिया जाता । हेमंत दा ने 1959 के आसपास अपना प्रोडक्‍शन हाउस शुरू किया था और सबसे पहले जो फिल्‍म बनाई वो थी मृणाल सेन निर्देशित 'नील आकाशेर नीचे' । जिसमें काली बैनर्जी और मंजू डे ने मुख्‍य भूमिकाएं निभाई थीं । इस फिल्‍म ने राष्‍ट्रपति का स्‍वर्ण-पदक जीता था । फिर उन्‍होंने बीस साल बाद, कोहरा, फरार, राहगीर, खामोशी, बीवी और मकान जैसी फिल्‍मों का निर्माण किया । अगर मुझे सही याद आ रहा है तो जानी-मानी अभिनेत्री मौसमी चैटर्जी हेमंत कुमार की बहू हैं ।
आईये आज रेडियो वाणी पर हेमंत दा के दो अनमोल गाने सुने जायें । सुने-गुनें-बुनें-डूबें-उतरायें-इठलायें और इतरायें ।
ये दोनों गाने एक जीवन-दर्शन को प्रस्‍तुत करते हैं । 'कह रही है जिंदगी जी सके तो जी' जलती निशान फिल्‍म का गीत है । क़मर जलालाबादी ने इसे लिखा है और इसे स्‍वरबद्ध किया है दादा अनिल बिस्‍वास ने । इस गाने में कोरस का अद्भुत खेल है । जिस पर आपका ध्‍यान ज़रूर जायेगा । यूं लगता है जैसे कोई यायावर ऊबड़-खाबड़ रास्‍तों पर पीठ पर अपनी पोटरी लटकाये चला जा रहा है और मस्‍ती में गाए जा रहा है ।

कह रही है जिंदगी जी सके तो जी
एक जाम प्‍यार का पी सके तो पी
जाम ये उसी का है जो आगे बढ़कर थाम ले
इंतज़ार किसलिए जाम उठा जाम ले
आसमां के हाथ से छीन ले खुशी ।
हुस्‍न है खामोश क्‍यों, इश्‍क़ बेक़रार है
सामने बिठा के तुझको, तेरा इंतज़ार है
शोखियों की फुलझड़ी कुछ इधर भी ।।
कह रही है जिंदगी जी सके तो जी ।।



यहां देखिए दूसरा गाना है दूर का राही फिल्‍म का । इस गाने को हम पहले भी रेडियोवाणी पर सुनवा चुके हैं पर दिक्‍कत ये हुई कि कुछ दिनों बाद वो प्‍लेयर नाकाम हो गया । इसलिए दोबारा यहां उस गाने को पेश किया जा रहा है । ये भी जिंदगी की यायावरी का गाना है । फिल्‍म दूर का राही । गीतकार इरशाद । संगीतकार किशोर कुमार । और आवाज़ हेमंत कुमार । क्‍या बढि़या कॉम्बिनेशन है । वैसे इसका उलट कॉम्बिनेशन भी कमाल है । हेमंत कुमार ने बतौर संगीतकार किशोर से बड़े अच्‍छे गाने गवाए हैं ।

चलती चली जाए जीवन की डगर
मंजि़ल की उसे कुछ भी ना ख़बर
फिर भी चला जाए दूर का राही ।।
मुड़ के ना देखे, कुछ भी ना बोले
भेद अपने दिल का राही ना खोले
आया कहां से, किस देश का है
कोई ना जाने, क्‍या ढूंढता है
मंजिल की उसे कुछ भी ख़बर
फिर भी चला जाए दूर का राही ।।
झलके ना कुछ भी, आशा-निराशा
क्‍या कोई समझे, नैनों की भाषा
चेहरा कि जैसे, कोई सफ़ा है * सफा: पन्‍ना
किस्‍मत ने जिस पर कुछ ना लिखा है
मंजिल की उसे कुछ भी ख़बर
फिर भी चला जाए दूर का राही ।।

रेडियोवाणी हेमंत कुमार की स्‍मृति को नमन करता है ।
कल के लिए एक ज़रूरी ऐलान । कल स्‍वर-कोकिला लता मंगेशकर का अस्‍सीवां जन्‍मदिन है । इसलिए रेडियोवाणी पर कल आपको सुनवाया जायेगा इस ख़ाकसार का लिया हुआ लता जी का एक टेलीफोनिक इंटरव्‍यू, जिसमें उनके गानों से ज्‍यादा बातें दूसरी चीजों पर हुई हैं ।

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Thursday, July 3, 2008

भला था कितना अपना बचपन: हेमंत कुमार का कालजयी गैरफिल्‍मी गीत

अस्‍सी के दशक में एक दौर ऐसा आया था जब ग़ैरफिल्‍मी गीतों की भरमार हो गयी थी । ये ग़ज़लों का भी दौर था । ये दौर हमारे लिए एक रिफरेन्‍स पॉइंट बनकर रह गया है । ग़ज़लों और गीतों के दौर के तौर पर इसे ही याद किया जाता है । लेकिन ऐसा नहीं था । इस दौर से पहले भी कई यादगार ग़ैरफिल्‍मी गाने आए और मशहूर हुए । रेडियोवाणी पर हमारी कोशिश रहेगी कि आपको कुछ अनमोल ग़ैरफिल्‍मी गीत सुनवाए जाएं जो बहुत ही पुराने हों ।

बहुत पुराने यानी बहुत ही पुराने । जैसे कि आज मैं आपके लिए लेकर आया bachche हूं हेमंत कुमार का गाया और फै़याज़ हाशमी का लिखा एक ऐसा यादगार गीत....जो संगीत के क़द्रदानों के ज़ेहन में बरसों बरस से गूंज रहा है । शोध करने पर सुराग़ तो यही मिला कि इसे चालीस के दशक में पहली बार रिकॉर्ड किया गया था । आगे बढ़ने से पहले मैं फ़ैयाज़ हाशमी के बारे में कुछ बातें करना चाहता हूं  । फ़ैयाज़ हाशमी की पहचान होती है तलत महमूद के पहले हिट गाने से । जो कि एक ग़ैर फिल्‍मी गीत था- बोल थे--'तस्‍वीर तेरी दिल मेरा बहला ना सकेगी' । और जहां तक मुझे याद आता है रजनी कुमार पंड्या ने अपनी पुस्‍तक में जिक्र किया है कि ये गीत तलत महमूद ने सत्रह-अठारह साल की उम्र में गाया था । एक गै़र फिल्‍मी रिकॉर्ड जारी हुआ था कलकत्‍ता से । और इस गाने ने तलत को शिखर पर पहुंचा दिया था । इसी के बाद तलत मुंबई आए और फिर मशहूर हुए । ख़ैर वो दास्‍तान फिर कभी । फिलहाल तो फ़ैयाज़ हाशमी पर वापस आएं ।

फैयाज़ हाशमी ने 1943 से 1948 तक कलकत्‍ता में ग्रामोफोन कंपनी में काम किया था । 1948 में उन्‍हें ढाका शाखा में भेज दिया गया और 1951 में वो ग्रामोफोन कंपनी के लाहौर ऑफिस में चले गये । उन्‍होंने पाकिस्‍तान में

मुझे ये गाना 'वो काग़ज़ की क़श्‍ती वो बारिश का पानी' जैसे गीत के समकक्ष लगता है । बल्कि अपनी मासूमियत और अल्‍हड़पन में ये उससे भी आगे है । और हेमंत कुमार ने इसे बड़ी ही तरंग में गाया है ।

कई फिल्‍मों के गाने लिखे । लेकिन भारत में उनकी पहचान ग़ैर फिल्‍मी गीतों के लेखक के तौर पर ही होती है । फ़ैयाज़ साहब के लिखे गीत हेमंत कुमार के अलावा जगमोहन सुरसागर, पंकज मलिक और तलत महमूद ने खूब गाए हैं । पंकज मलिक का मशहूर गीत 'ये रातें ये मौसम ये हंसना हंसाना, हमें भूल जाना इन्‍हें ना भुलाना' फै़याज हाशमी ही ने लिखा था । बाद में लता मंगेशकर ने इसे 'श्रद्धांजली' नामक अलबम में गाया था । फ़ैयाज़ के बारे में और जानने के लिए
यहां क्लिक कीजिए ।

मुझे ये गाना 'वो काग़ज़ की क़श्‍ती वो बारिश का पानी' जैसे गीत के समकक्ष लगता है । बल्कि अपनी मासूमियत और अल्‍हड़पन में ये उससे भी आगे है । और हेमंत कुमार ने इसे बड़ी ही तरंग में गाया है । मुझे इस गाने से बेहद प्‍यार है । अगर आपने ये गीत किसी वजह से पहले नहीं सुना है तो ज़रा इत्‍मीनान से सुनिए । मुझे पूरा यक़ीन है कि आपको इस गाने से प्‍यार हो जायेगा ।
 


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भला था कितना अपना बचपन भला था कितना
दिन भर वो पेड़ों के तले, रहती थी पसारी आंचल
और मैं डालों से फेंका करता था तोड़ के फल
माली था बस हमारा दुश्‍मन ।
अपना बचपन । भला था कितना ।।

याद भी है वो खेल की बात जब हम निकालते थे बारात
लड़के मुझको दूल्‍हा बनाते । सखियां तुझको बनातीं दुल्‍हन ।
अपना बचपन । भला था कितना ।।

दिन को खेल में और रातों को खो जाते थे
राजा रानी के किस्‍से सुन सुन के सो जाते थे
आंख में नींद का नाम नहीं था, दिल से कोसों दूर थी धड़कन ।
अपना बचपन । भला था कितना ।।
 

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Tuesday, April 22, 2008

हेमंत कुमार का एक और बंजारा गीत: फिर भी चला जाए दूर का राही ।

रेडियोवाणी पर इन दिनों हेमंत कुमार के गानों का नशा छाया है । ये ऐसा नशा है जो जब चढ़ जाता है तो बहुत दिनों तक नहीं उतरता । इस सिलसिले की पहली पोस्‍ट थी--'जनम जनम बंजारा हूं बंधू' । और मैंने उसमें भी कहा था कि हम अपने मन के बंजारे हैं । अपने मन के बयाबान में विचरण करते रहते हैं । हेमंत दा के कई ऐसे गीत हैं, जिनमें यायावरी का स्‍पर्श है । हेमंत दा यायावरों के गायक हैं ।
अब देखिए ना 'दूर का राही' फिल्‍म का जो गीत आज मैं लेकर आया हूं, वो उस समय आपको बहुत ही अच्‍छा लगेगा जब आप किसी सफर पर निकले हों और ये सफर ट्रेन से हो रहा हो । और आपको खिड़की वाली सीट मिली BrightWhiteLight हो और आप खिड़की के कांच से नाक सटाकर तेज़ी से भागते और पीछे छूटते पेड़ों को देख रहे हों । गांवों को देख रहे हों । और तभी आपको एक चरवाहा टीले पर जबर्दस्‍त फुरसत में बेफिक्र बैठा नज़र आ जाये । और तब आपका जी भीतर तक जल जाए कि आपकी किस्‍मत ऐसी क्‍यों नहीं । ( हालांकि ऐसा होने का आपके भीतर साहस नहीं ) और तब आपके सपनों की दुनिया खुलती चली जाए, जिसमें आप गलियों चौराहों, शहरों कस्‍बों और गांवों, पहाड़ों और नदियों को पार करते हुए चले जा रहे हैं । बस चले जा रहे हैं । ना कोई मंजिल है ना कोई साया है, चुप है ज़मीं दूर आसमां ।
ऐसी यायावरी का गीत है ये । आईये सुना जाए । लेकिन पहले ये भी बता देना मैं अपनी जिम्‍मेदारी समझता हूं कि ये गीत सन 1971 में आई फिल्‍म 'दूर का राही' का है । शैलेंद्र ने इसे लिखा है । संगीत किशोर कुमार का है । इस गाने के ख़ामोश साज़ों और विकल कोरस पर आपको ख़ास ध्‍यान देना है । मुझे ऐसे विकल कोरस खास तौर पर पसंद हैं । और वो भी हेमंत दा की आवाज़ के पीछे । जल्‍दी ही हेमंत दा का एक तूफानी गीत लेकर आऊंगा जिसमें कोरस का बेक़रार खेल है ।




चलती चली जाए जीवन की डगर
मंजि़ल की उसे कुछ भी ना ख़बर
फिर भी चला जाए दूर का राही ।।
मुड़ के ना देखे, कुछ भी ना बोले
भेद अपने दिल का राही ना खोले
आया कहां से, किस देश का है
कोई ना जाने, क्‍या ढूंढता है
मंजिल की उसे कुछ भी ख़बर
फिर भी चला जाए दूर का राही ।।
झलके ना कुछ भी, आशा-निराशा
क्‍या कोई समझे, नैनों की भाषा
चेहरा कि जैसे, कोई सफ़ा है                  * सफा: पन्‍ना
किस्‍मत ने जिस पर कुछ ना लिखा है
मंजिल की उसे कुछ भी ख़बर
फिर भी चला जाए दूर का राही ।।

अगर इस गाने ने आपको यायावरी पर मजबूर किया है, तो बहुत अच्‍छा है । अगर इस गाने ने आपको व्‍यस्‍तताओं से समय निकाल कर छोटा सा पिकनिक मनाने को कहा है तो भी अच्‍छा है ।

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Sunday, April 20, 2008

हेमंत दा की सुरीली तान: ये नयन डरे डरे: फिल्‍म कोहरा 1965 ।

अचानक रेडियोवाणी पर हेमंत कुमार के गानों का सुरूर चढ़ गया है । ऐसा पिछली पोस्‍ट के बंजारे गीत के बाद हुआ है । राहगीर फिल्‍म का जनम जनम बंजारा हूं बंधु । मुझे सब पुराने दिन याद आ गये हैं । जब हेमंत कुमार के गानों के लिए हम भटका करते थे और फिर किसी म्‍यूजि़क शॉप वाले को लिस्‍ट दी जाती और एक 'धांसू' कैसेट तैयार होता जिसे इतना बजाया जाता इतना बजाया जाता कि वो घिसने के कगार पर पहुंच जाता ।

ऐसे समय में मिला था फिल्‍म कोहरा का ये गीत । इस गाने के बोल बड़े  hemantअजीब से हैं । छोटे अंतरे हैं और हेमंत कुमार वाली सादगी है इसमें । मिनिमम म्‍यूजिक वाला गाना है ये । आपको बता दें कि सन 1964 में आई थी फिल्‍म 'कोहरा' । इस फिल्‍म के कलाकार थे विश्‍वजीत, वहीदा रहमान और ललिता पवार वग़ैरह । संगीत हेमंत कुमार का ही था और गीत कैफी आजमी के । बीरेन नाग ने इस फिल्‍म का निर्देशन किया था । आईये ये गीत पढ़ें और सुनें ।




ये नयन डरे डरे, ये जाम भरे-भरे

ज़रा पीने दो ।
कल की किसको ख़बर, इक रात होके निडर
मुझे जीने दो ।
ये नयन डरे डरे ।
रात हंसी ये चांद हंसी तू सबसे हंसीं मेरे दिलबर
और सबसे हसीं तेरा प्‍यार
तू जाने ना ।
ये नयन डरे डरे ।।
प्‍यार में है जीवन की खुशी देती है खुशी कई ग़म भी
मैं मान भी लूं कभी हार
तू माने ना ।
ये नयन डरे डरे ।।


आप इस गाने का आनंद लीजिए । फिलहाल आपको ये भी बता दूं कि रेडियोवाणी की पुरानी पोस्‍टों की धीरे धीरे मरम्‍मत की जा रही है । कई गाने बजने बंद हो गये हैं । कई लिंक पुराने पड़ गये हैं । ये काम सुस्‍ती से होने वाला काम है । पर मैं पूरी तन्‍मयता से इसे करना चाहता हूं । क्‍या आप मुझे 201 वीं पोस्‍ट की बधाई नहीं देंगे ।

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Friday, April 18, 2008

जनम जनम बंजारा हूं बंधू : फिल्‍म राहगीर, हेमंत कुमार की सौंधी आवाज़ ।

रेडियोवाणी पर गुलज़ार के गीतों की चर्चा अकसर ही हुई है । आज भी एक गुलज़ारी गीत की बात की जाए । फिल्‍म 'राहगीर' सन 1969 में आई थी । कलाकार थे-बिस्‍वजीत, संध्‍या राय, शशिकला, इफ्तेख़ार, कन्‍हैयालाल, निरूपा राय और असित सेन । मैंने ये फिल्‍म नहीं देखी । देखने का मौक़ा मिले या नहीं, पता नहीं । लेकिन ये गीत मैं बार-बार सुनता हूं ।

मैं बार-बार अपने इस चिट्ठे और दूसरे चिट्ठे 'तरंग' पर यायावरी करने की hemantapic2अपनी तमन्‍ना की चर्चा हमेशा करता रहता हूं । जो अभी तक पूरी नहीं हो पाई । ख़ैर...आपको नहीं लगता कि हम सब अपने मन के बंजारे हैं । मन की दुनिया में विचरण करते रहते हैं । ये हम बंजारों का गीत है । और हमारे मन के बेहद क़रीब है । पहले हेमंत दा की प्रतिभा को सलाम कीजिए । आप भी उनके मुरीद हैं तो इस पेज पर जाईये जहां से हमने ये तस्‍वीर साभार ली है । ये सुरताल डॉट कॉम की लिंक है । हेमंत दा के बारे में इस पेज पर भरपूर जानकारियां हैं ।

मेरे एक साथी कहते हैं कि हेमंत कुमार की आवाज़ यूं लगती है जैसे किसी मंदिर में धूप-बत्‍ती की खुश्‍बू आ रही हो । जैसे कोई पुजारी तन्‍मयता से गा रहा हो । जैसे रात के सन्‍नाटे में अचानक वीणा की तान सुनाई दे रही हो ।

कुछ इसी तरह का अंदाज़ है हेमंत दा का । हेमंत दा और गुलज़ार की जुगलबंदी कई गानों में हुई है । ख़ासतौर पर इस गाने की बात करते हुए मुझे सुकून मिलता है । ज्‍यादा कुछ नहीं कहना । सुनिए और बताईये ।


जनम से बंजारा हूं बंधु जनम-जनम बंजारा
कहीं कोई घर ना घाट ना अंगनारा ।।
जहां कहीं ठहर गया दिल, हमने डाले डेरे
रात कहीं नमकीन मिली तो मीठे सांझ-सवेरे
सब नगरी छोड़ी, साहिल छोड़ा लिया मंझधारा
बंधु रे........नगरी छोड़ी साहिल छोड़ा लिया मंझधारा
बंधु कहीं कोई घर ना घाट ना अंगनारा ।।
सोच ने जब करवट बदली शौक़ ने पर फैलाए
....के तिनके सारे डाल से उड़ाए
सब रिश्‍ते तोड़े नाते तोड़े छोड़ा कुल-किनारा
बंधु रे.....कहीं कोई घर ना घाट ना अंगनारा ।
जनम से बंजारा ।।

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