संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Tuesday, July 19, 2022

आज बिछड़े हैं...भूपी की याद में: यूनुस ख़ान

 




कुछ आवाज़ें हमारी उदासियों की आवाज़ें होती हैं। यक़ीन मानिए जिस तरह ज़िंदगी में हम मुस्‍कानें सहेजते हैं
, उसी तरह सहेज कर रखना होता है उन आवाज़ों को जो गहरी उदासियों में हमें सहलाती हैं। जब हम डूब रहे होते हैं—ये आवाज़ें हमें थाम लेती हैं। ज़िंदगी की दुश्वारियों को सहने का हौसला देती हैं और हम पथरीली राहों पर ठोकरें खाकर आगे बढ़ जाते हैं। भूपिंदर सिंह इसी तरह की आवाज़ हैं।

मैंने
हैंइसलिए कहा क्‍योंकि जब उनके शरीर छोड़ने की ख़बर कल रात आयी, तो पल भर के लिए सन्‍न रह गया। पर सच यही है कि शरीर चले जाते हैं, आत्‍मा कायम रहती है। शरीर चले जाते हैं, आवाज़ें कायम रहती हैं। संगीत की दुनिया के मुसाफिर हम सब यही मानते हैं कि जगजीत भी हमारे क़रीब हैं, एक पुकार पर हाजिर हो जाते हैं हमारे पास और कह उठते हैं—आंखों में नमी, हँसी लबों पर, क्‍या हाल है, क्‍या दिखा रहे हो....जब पुकारें तो मेहदी हाजिर हो जाते हैं—देख तो दिल कि जां से उठता है, ये धुआं कहां से उठता है। आइंस्‍टीन ने संसार को बताया था कि ध्‍वनियां कहीं नहीं जातीं। संसार में सदा कायम रहती हैं।

भूपी हमारी उजली-केसरिया सुबहों और सुरमई-उदास शामों की एक ज़रूरी आवाज़ रहे हैं। सुबहों के माथे पर उनकी आवाज़ चमक बिखेर जाती है जब वो गाते हैं—
ना मंदिर में ना मस्जिद में ना कासी-कैलास में ,मोको कहां ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास रे। भूपिंदर सुरमई शामों में हमारे आसपास गूंजते रहे हैं—या गर्मियों की रात जो पुरवाईयां चले/ ठंडी सफ़ेद चादरों पे जागे देर तक/ तारों को देखते रहें/ छत पर पड़े हुए। भूपिंदर रातों को जुगनू की तरह चमकते हैं—जब उनकी आवाज़ गूंजती है—चौदहवीं रात के इस चाँद तले, सुरमई रात में साहिल के क़रीब, दूधिया जोड़े में आ जाए जो तू। भूपी आते हैं अपने आबो-ताब के साथ ये कहने—कोसा-कोसा लगता है.../ तेरा भरोसा लगता है..../ रात में अपनी थाली में/ चाँद परोसा लगता है। भूपी के गिटार की तरंगें भी जब तक गूंजती हैं। कभी दम मारो दमके इंट्रो का गिटार, कभी मेहबूबा मेहबूबातो कभी चुरा लिया है तुमनेवाला पीस, उनके ख़ज़ाने में यादों की बारातभी है और आने वाला पलभी।

भूपिंदर की आवाज़ में एक अजीब-सा वीतराग नज़र आता है। जैसे वो दुनिया में हैं तो पर वैसे जैसे पत्‍थर ऊपर पानी। जिस वक्‍़त वो आए कितना मुश्किल वक्‍़त था
, इतने सारे सूरज चमक रहे थे, रफ़ी, किशोर, मुकेश, मन्‍ना डे जैसे। उनके बीच एक नया-छोटा-सा तारा आकर पुकारता है—एक एक हर्फ़ जबीं पर उभर आया होगा या
रूत जवां-जवां, रात मेहरबां

भूपी उन लोगों की ख़ासी क़रीब आवाज़ रहे हैं जिन्‍होंने संसार के तयशुदा नियमों को तोड़ा
, जिन्‍होंने लीक पर चलना कभी गवारा नहीं किया। भूपी गिटार की तरंगें लेकर ग़ज़लों की दुनिया में आए। भूपी का अपनी आवाज़ को जब मर्ज़ी खींचना, जब मर्ज़ी अल्फ़ाज़ को हवा में टाँग देना, फिर उठाना और आगे चल देना....पहले हैरान करता था, फिर लुभाने लगा, और अब उसकी आदत पड़ गयी है। शायद इसीलिए वो तमाम एक्सपेरीमेंटललोगों से जुड़े। फिर चाहे गुलज़ार हों, पंचम हों या मदनमोहन और जयदेव। उनकी प्रयोगधर्मिता का बड़े पैमाने पर आकलन किया जाना शायद अभी बाक़ी है।

इन सबके बावजूद भूपी शास्‍त्रीयता की राह के पक्‍के मुसाफ़िर भी हैं।
बीती ना बिताई रैना’, ‘मीठे बोल बोले पायलिया’, ‘आई ऋतु सावन की’, ‘सैंयां बिना घर सूनाजैसे गानों में भूपी कठिन डगर पर कितनी सहजता से क़दम रखते बढ़ निकलते हैं।

भूपी इस बेरहम दुनिया में हताशा की आवाज़ भी रहे हैं।
तेरे जहान में ऐसा नहीं कि प्‍यार न हो/ जहां उम्‍मीद हो इसकी वहां नहीं मिलता। वो गाते हैं—अहले दिल यूं भी निभा लेते हैं/ दर्द सीने में छिपा लेते हैं। भूपिंदर आंखों को छलका देते हैं जब उनकी आवाज़ में गूंजता है सारांश का गाना—अंधियारा गहराया, सूनापन घिर आया/ घबराया मन मेरा/ चरणों में आया/ क्‍यों हो तुम यूं गुमसुम/ किरणों को आने दे/ पत्‍थर की आंखों से करूणा को झरने दो। भूपी घनघोर रात में हमारी धुंआ-धुंआ आंखों को देख हमारा हाथ पकड़कर कहते हैं—चाँद की बिंदी वाली, बिंदी वाली रतियां/ जागी हुई अंखियों में रात ना आई रैना

ज़िंदगी में मुड़कर देखने के कई मौक़े आते हैं। हम सोचते हैं काश ऐसा नहीं होता
, कुछ वैसा होता। हम बदल देते समय के प्रवाह को। भूपी की आवाज़ गूंजती है—जब कभी मुड़कर देखता हूं मैं/ तुम भी कुछ अजनबी सी लगती हो/ मैं भी कुछ अजनबी सा लगता हूं। भूपी तरह तरह से हमारे जीवन में दाखिल होते हैं—ज़िंदगी सिगरेट का धुंआ/ ये धुंआ जाता है कहां/ या कहीं जाता नहीं। भूपी ज़िंदगी के लिए एक तमन्‍ना करते हैं—ज़िंदगी फूलों की नहीं/ फूलों की तरह महकी रहे

बारिश का ये मौसम भूपी का ख़ास मौसम है। अचानक दिल धक से रह जाता है कि हमारी इस सबसे प्रिय आवाज़ वाला शख्‍़स इन बारिशों में ही हमसे रूठ गया। भूपी की गाढ़ी आवाज़ में गूंजती है ये लाइन—
बैरन बिजुरी चमकन लागी, बदरी ताना मारे रे/ ऐसे में कोई जाए पिया....तू रूठो क्‍यों जाए रे/ आई ऋतु सावन की
चाँद परोसा हैसे गुलज़ार साहब के बोल गूंजते हैं—याद है बारिशों के दिन पंचम’….और आखिरी लाइन आती है—मैं अकेला हूं धुंध में पंचम। नहीं सुना हो तो ये कंपोज़ीशन सुनकर ख़ुद को घुला दीजिए बारिशों में। भूपी हर बारिश में जैसे आग लगा जाते हैं दिल में.....बरसता भीगता मौसम धुआं-धुआं होगा, पिघलती शम्‍मों पे दिल का मेरे गुमां होगा, हथेलियां की हिना याद कुछ दिलायेगी। अलफ़ाज़ अलफ़ाज़ ही रहते हैं, भूपी जी की आवाज़ मिलती तो वो चमकते तारे बन जाते हैं। भूपी सावन के इस मौसम में गाते हैं—बिरहा जिया तड़पाये/ दूरी सही ना जाए सजनिया आन मिलो

भूपी बहुत गहन उदासियों से बहुत गहन प्रेम की तरफ़ बहता झरना हैं।
पिया तुझ आशना हूं मैं तू बेगाना ना कर। यही भूपी गाते हैं—बादलों से काट-काटके/ काग़़ज़ों पे नाम जोड़ना/ ये मुझे क्‍या हो गया। हमारे भूपी गुलज़ार साहब को जब-जब गाते हैं तो यूं लगता है दुनिया वाक़ई रहने लायक़ है। मुझको भी तरकीब सिखा दे यार/ मेरे यार जुलाहेयारपर उनकी वो तान। उफ़.....। एक ही ख़्वाब कई बार देखा है मैंनेको सुनते हुए गीतों की राह पर आगे चलें तो बारिश से भीगी रात में भूपी हौले से हमसे कहते हैं—रात में घोलें चाँद की मिसरी/ दिन के ग़म नमकीं लगते हैं/ नमकीन आंखों की नशीली बोलियां

भूपी वसंत देव को भी गाते हैं
, कैफ़ी को भी, गुलज़ार को भी और नक्‍श को भी। भूपी सबको अपनी तरह से गाते हुए बारिश भरी जुलाई की अठारह तारीख़ को हमसे कह जाते हैं—
आज बिछड़े हैं कल का डर भी नहीं/ ज़िंदगी इतनी मुख्‍़तसर भी नहीं। हम उसांस भर कर रह जाते हैं। भूपी जी उदासियां अगर मज़हब हों तो आप उस मज़हब के औलिया होंगे। रहेंगे आप—सदा।  


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Saturday, April 9, 2016

'दो नैनों के पंख लगाके' - फिल्म 'शक' का गीत.. रेडियोवाणी की नौवीं सालगिरह पर विशेष

वक्‍त की रफ्तार कितनी तेज़ है।
यूं लग रहा है कि अभी-अभी तो ब्‍लॉगिंग शुरू की थी और देखिए ना आज 'रेडियोवाणी' की नौंवीं सालगिरह भी आ गयी। ये सच है कि पिछले कुछ बरस से रेडियोवाणी का कारवां रूक रूक कर चल रहा है या रूका ही हुआ है।

पर कल से रेडियोवाणी पर निरंतरता की कोशिश शुरू की गयी है। नौवीं सालगिरह को ख़ास बनाया जाए गुलज़ार के एक अनमोल गाने से...जिसे मिली एक
अनमोल आवाज़। बरसों बरस से हम ये गाना सुनते आ रहे हैं। रेडियो पर जब भी अनाउंस करते-- 'आवाज़ कुमारी फैयाज़ की है'....तो हमेशा मन में सवाल उठता कि कुमारी फ़ैयाज़ कौन हैं और कहां हैं। कुछ मित्रों ने भी इस बारे में जानकारी चाही। पर इस सवाल का जवाब नहीं मिलना था तो नहीं मिला।

पर पिछले बरस मुंबई में जब 'चौपाल' में संगीतकार जयदेव जी को याद किया गया तो वहां कुमारी फ़ैयाज़ को देखने और उनसे बातें करने का मौक़ा हाथ आ गया। असल में मराठी नाट्य-जगत से उतना ज़्यादा परिचय ना होने की वजह से हमें पता ही नहीं लगा कि वे तो मराठी की जानी-मानी अभिनेत्री हैं। मंच पर पचास वर्षों से सक्रिय हैं। उनका सबसे मशहूर नाटक रहा है--'कट्यार काळजात घुसली' जिस पर हाल ही में एक चर्चित फिल्‍म भी आयी है। और इस फिल्‍म के लिए महेश काळे को सर्वश्रेष्‍ठ पार्श्‍वगायक का राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार मिला है।

बहरहाल, कुमारी फैयाज़ ने इस नाटक में कद्दावर कलाकार पंडित वसंत राव देशपांडे के साथ काम किया है। फैयाज़ ने नाट्य-संगीत, ग़ज़ल, लावणी, उपशास्‍त्रीय संगीत वग़ैरह सब गाया है। उनके कुछ प्रसिद्ध मराठी गीत हैं--'कोण्‍यात झोपसली सतार', फिल्‍म 'घरकुल' संगीतकार सी. रामचंद्र। और मराठी नाटक ''वीज म्‍हणाली धरतीला' का गीत--'चार होते पक्षिणी'। संशय का मनी आळा' वग़ैरह। 


आज रेडियोवाणी की नौवीं सालगिरह पर पेश है कुमारी फ़ैयाज़ का एक अनमोल गाना। फिल्‍म 'शक' के गुलज़ार के लिखे इस गाने को स्‍वरबद्ध किया है वसंत देसाई ने। इस गाने को सुनकर मन जैसे डूब-सा जाता है। कुमारी फ़ैयाज़ की आवाज़ की बहुत अलग-सी डायमेन्‍शन गाने को जैसे एक नया रंग देती है। सुनिए।


और हां 'रेडियोवाणी' के क़द्रदान नौवीं सालगिरह की बधाईयां देंगे तो अच्‍छा लगेगा।
कुमारी फ़ैयाज़ के कुछ और गाने यहीं जल्‍दी ही।

Song: do nainon ke pankh lagaake
Singer: Kumari Faiyaz
Film: Shaque (1976)
Lyrics: Gulzar
Music: Vasant Desai
Duration:  3:30






दो नैनों के पंख लगाकर मन पाखी उड़ जाये
हाथ छुड़ाकर दूर चला है दूर से पास से बुलाए।

जाने-बूझे चेहरे मन को अनजाने लगते हैं
कोई मुझसे आकर मेरी फिर पहचान कराए।

नीलगगन में सागर देखे, सागर में आकाश
अनहोनी को रोए मनवा, होनी पे घबराए।

दो नैनों के पंख लगाकर।। 


फिल्‍म 'शक़' का एक और गाने पर रेडियोवाणी की पुरानी पोस्‍ट पढ़ने के लिए यहां क्लिक कीजिए। 

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Sunday, December 29, 2013

'हम चीज़ हैं बड़े काम की यारम' : गुलज़ार

इसमें कोई शक नहीं कि हम गुलज़ार के शैदाई हैं। हम उन लोगों से रात भर शास्‍त्रार्थ कर सकते हैं जिन्‍हें ''आंखों की महकती खुश्‍बू'' पर शक है। या जिनकी भौंहें  ''बिरहा की सीली सीली रात'' के जलने पर तन जाती हैं। हमें उन लोगों को देखकर 'इब्‍ने-बतूता' गाने में बड़ा आनंद मिलता है। हम तो 'जाड़ों की नर्म धूप में आंगन में लेटकर'' गुनगुनाने वाले और 'बर्फीली सर्दियों में किसी भी पहाड़ पर/ वादी में गूंजती हुई खामोशियां'' सुनने वाले लोग हैं।

वक्‍त बदल रहा है। पर हम अपनी धुन पर कायम हैं। और इसकी वजह है।
बड़ी अजीब-सी बात है। इतने तो हम अपने अज़ीज़ फ़नकार जगजीत सिंह की राहों पर नहीं टिके रहे। त‍करीबन नब्बे के दशक के बाद के उनके काम से हमने मुंह फेर लिया था। लेकिन बाबा...बाबा गुलज़ार तो अलफ़ाज़ की दुनिया के औलिया हैं। उनकी कलम से उतरते हैं लोभान के खुश्‍बूदार साए। और हम सब किसी और ही दुनिया में होते हैं उसके बाद।

जी हम गुलज़ार के शैदाई हैं।
बीतते हुए इस बरस गुलज़ार के इस साल के काम की एक झलक।
फिल्‍म थी 'एक थी डायन'। ऐसा नहीं कि इस फिल्‍म का यही एक गीत हमें पसंद हो।
पर सबसे ज्‍यादा पसंद ज़रूर है।
देखिए वक्‍त के साथ गुलज़ार के अलफ़ाज़ और अहसास किस तरह बदल रहे हैं।
इस गाने में वो क्‍या लिखते हैं इसकी एक झलक।

पीछे पीछे दिन भर, घर दफ्तर में लेके चलेंगे हम
तुम्हारी फाइलें, तुम्हारी डायरी
गाडी की चाबियां, तुम्हारी ऐनकें
तुम्हारा लैपटॉप, तुम्हारी कैप
और अपना दिल, कुंवारा दिल
प्यार में हारा, बेचारा दिल
और अपना दिल, कुंवारा दिल
प्यार में हारा, बेचारा दिल
यारम।
अगर आप मानते हैं कि ये गानों में अलफ़ाज़ के गहरी खाई में गिर जाने का युग है-- तो हमारी गुज़ारिश ये है कि इतनी निराशा अच्‍छी नहीं। ज़रा ध्‍यान से कुछ गाने सुनिएगा इस साल के। अच्‍छा ठीक है... हम ही कुछ बेहतरीन गाने यहां रेडियोवाणी पर सुनवाए देते हैं अगले कुछ दिनों में...। फिलहाल गुलज़ार गुलज़ार। यारम। यारम।

नीचे गाने के बोल हमने कविता-कोश के इस पन्‍ने से लिए हैं। शुक्रिया ललित।

Song: Yaaram
Singer: Sunidhi, Clinton
Lyrics: Gulzar
Music: Vishal
Film: Ek thi daayan





हम चीज़ हैं बड़े काम की, यारम
हमें काम पे रख लो कभी, यारम
हम चीज़ हैं बड़े काम की, यारम
हो सूरज से पहले जगायेंगे
और अखबार की सब सुर्खियाँ हम
गुनगुनाएँगे
पेश करेंगे गरम चाय फिर
कोई खबर आई न पसंद तो एंड बदल देंगे
हो मुंह खुली जम्हाई पर
हम बजाएं चुटकियाँ
धूप न तुमको लगे
खोल देंगे छतरियां
पीछे पीछे दिन भर
घर दफ्तर में लेके चलेंगे हम
तुम्हारी फाइलें, तुम्हारी डायरी
गाडी की चाबियां, तुम्हारी ऐनकें
तुम्हारा लैपटॉप, तुम्हारी कैप
और अपना दिल, कुंवारा दिल
प्यार में हारा, बेचारा दिल
और अपना दिल, कुंवारा दिल
प्यार में हारा, बेचारा दिल
यह कहने में कुछ रिस्क है, यारम
नाराज़ न हो, इश्क है, यारम
हो रात सवेरे, शाम या दोपहरी
बंद आँखों में लेके तुम्हें ऊंघा करेंगे हम
तकिये चादर महके रहते हैं
जो तुम गए
तुम्हारी खुशबू सूंघा करेंगे हम
ज़ुल्फ़ में फँसी हुई खोल देंगे बालियाँ
कान खिंच जाए अगर
खा लें मीठी गालियाँ
चुनते चलें पैरों के निशाँ
कि उन पर और न पाँव पड़ें
तुम्हारी धडकनें, तुम्हारा दिल सुनें
तुम्हारी सांस सुनें, लगी कंपकंपी
न गजरे बुनें, जूही मोगरा तो कभी दिल
हमारा दिल, प्यार में हारा, बेचारा दिल
हमारा दिल, हमारा दिल
प्यारा में हारा, बेचारा दिल

फिल्म - एक थी डायन(2013)

अब चलते हैं यारम। रेडियोवाणी पर गीतों का कारवां जारी यारम।

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Sunday, June 12, 2011

'रहने को घर दो'--मन्‍ना दा की आवाज़ (श्रृंखला 'बीवी और मकान' दूसरा भाग)

रेडियोवाणी पर फिल्‍म 'बीवी और मकान' के गानों की अनियमित श्रृंखला चल रही है। पिछली कड़ी में मैंने आपको एक गीत सुनवाया था--'जब दोस्‍ती होती है, तो दोस्‍ती होती है'। आज इसी फिल्‍म का एक और गीत। लेकिन पहले गुलज़ार की बातें।

गुलज़ार आने गीतों को याद करते हुए फिल्‍मफेयर के एक पुराने अंक में कहते हैं--
ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्‍मों का संगीत अनूठा होता था। उसे कहानी में काफी बारीकी से बुना जाता था। कभी ऐसा नहीं होता था कि गाना चाहिए इसलिए गाना है। ना ही आइटम नंबर का कोई कंसेप्‍ट था। गाने कहानी को आगे बढ़ाते। वो कहानी कहते थे। ऋषि दा और मुझमें कुछ समानताएं थीं। हम दोनों ने फिल्‍म की बारीकियां बिमल रॉय से सीखी थीं। मैं तो ये भी कहूंगा कि अगर बिमल रॉय उस स्‍कूल के प्रिंसिपल थे तो ऋषि दा उसके स्‍कूल-मास्‍टर। मैंने सबसे पहले ऋषि दा के साथ जिस फिल्‍म में काम किया था उसका नाम है--'बीवी और मकान'। पहली बार उन्‍होंने एक संगीत-प्रधान फिल्‍म पर हाथ आज़माया था। फिल्‍म में परिस्थितियां कुछ ऐसी थीं कि कुछ अनूठे गानों की ज़रूरत थी। इसलिए इस फिल्‍म के गाने अनूठे थे।



गुलज़ार की ये बात पूरी तरह सही है। ऋषि दा की फिल्‍मों और ख़ासकर इस फिल्‍म के बारे में तो एकदम सटीक। मिसाल के लिए आज के गाने को ही लीजिए। इसका शीर्षक है--'रहने को घर दो'। इसे मेहमूद पर फिल्‍माया गया है। आगे की कडियों में भी इस फिल्‍म की कहानी के बारे में चर्चा की जाएगी पर फिलहाल तो इतना बता दें कि इस कहानी का ताल्‍लुक महानगर में घर की समस्‍या से है। गांवों से आए अकेले युवकों को कोई शहर में मकान नहीं देता। बस...यही सूत्र है कहानी का। और कमोबेश ये समस्‍या आज तक कायम है।

मन्‍ना दा की अदायगी इस गाने का USP है।
अब हम शब्‍दों में क्‍या कहें। आप ख़ुद सुन लीजिए।





रहने को घर दो
छत पे हो फर्श या फर्श पे छत हो।
खिड़की-विड़की, बिजली-खुजली, घंटी-वंटी कुछ नहीं चईए प्‍यारे।


बस इक छोटा-सा दरवाज़ा हो।।

ईंट पे ईंट जमा कर लो
घर ऊपर ऊपर ज्‍यादा है
आए थे ऊंची बिल्डिंग में
बिल्डिंग से ऊंचा भाड़ा है
फ़र्श पे रहने वाले कैसे अर्श पे जाएं जाएं।


रहने को घर दो।।



थोड़े सा जल, थोड़े से चने
इक चारदीवारी, पांच जने।


पांच पांडवा, युधिष्ठिरा, भीम, अर्जुना, नकुल-सहदेवा
वन फोर फाइव, फाइव परसना।
थोड़ा-सा जल, थोड़े से चने
इक चारदीवारी पांच जने।
शहर में तेरे शरण बिना
शरणार्थी हो गए प्‍यारे।
कुटिया ना सही कोई ख़ाली कुंआ
ऊपर ना सही तहख़ानों में
ख़ाली हो अगर तो जेल सही
शामिल कर लो दीवानों में
आस-पड़ोस उधार मिले तो
कुछ नईं चईये प्‍यारे
रहने को घर दो।।



कहना  ना होगा कि घर की समस्‍या को लेकर लिखा गया गुलज़ार का ये अपने आप में एकदम अनूठा गाना है। रूमानियत ये लबरेज़ 'दो दीवाने शहर में' का मिज़ाज बिल्‍कुल अलग है। अगली बार जब मिलेंगे तो चर्चा करेंगे इसी फिल्‍म के किसी और गाने की।

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Wednesday, May 18, 2011

'जब दोस्‍ती होती है, तो दोस्‍ती होती है' ('बीवी और मकान': पहला भाग)

पिछले कुछ दिनों से हम हेमंत कुमार को सुन रहे हैं। पिछली पोस्‍ट ने भी इसका अंदाज़ा तो दे ही दिया होगा। हेमंत दा की बात हो तो बतौर गायक बात करना इकहरी बात होगी। हेमंत दा हिंदी फिल्‍म संगीत की विलक्षण प्रतिभा थे। सही मायनों में विलक्षण। गायकी तो उनकी प्रतिभा का एक छोटा-सा पहलू है। उनकी संगीतकारी पर सचमुच विस्‍तार से चर्चा की जानी चाहिए। क्‍योंकि उन्‍होंने कुछ बेहद चुनौतीपूर्ण और कालजयी फिल्‍मों में कमाल का संगीत दिया। मोटे तौर पर कुछेक के नाम गिनाना शायद मौज़ूं होगा। नागिन, आनंद-मठ, साहेब बीवी और ग़ुलाम, मिस मैरी, वग़ैरह। एक संगीतकार के रूप में उनकी 'रेन्‍ज' कमाल की रही है।

संगीतकारी के अलावा उन्‍होंने फिल्‍म-निर्माण में भी किया। फिल्‍में बनाने के 2003_hemant_kumar उनके शौक़ की इंतेहा ये थी कि उन्‍होंने बहुत ही साहसिक फिल्‍में बनाईं। पूरी तरह जोखिम भरी। 1959 में उन्‍होंने मृणाल सेन के निर्देशन में बनी फिल्‍म 'नील आकाशेर नीचे' का निर्माण किया। तब उनके प्रोडक्‍शन हाउस का नाम होता था, हेमंत-बाला प्रोडक्‍शन। मैंने ये फिल्‍म नहीं देखी, पर इसके बारे में ये पता है कि कोलकाता की गलियों में भटकने वाली एक चीनी फेरीवाले की कहानी थी ये। आगे चलकर हेमंत दा की फिल्‍म कंपनी का नाम हो गया 'गीतांजली'। इस कंपनी ने बीस साल बाद, बीवी और मकान, फ़रार, राहगीर और ख़ामोशी जैसी फिल्‍में बनाईं। अगर आप इन फिल्‍मों की कथा-वस्‍तु पर ध्‍यान दें तो पायेंगे कि कितना जोखिम उठाने वाले प्रोड्यूसर थे हेमंत दा। इन सभी फिल्‍मों में उनका संगीत था।

मुझे एक लंबे अरसे से 'बीवी और मकान' फिल्‍म के गाने बेहद पसंद रहे हैं। और इसकी एक वजह है। ये एक आम फिल्‍म के आम गीत नहीं हैं। जब मैंने इस श्रृंखला की पूर्व-सूचना फेसबुक पर दी, तो जयपुर के भाई पवन झा ने इसके गानों के बारे में अपनी बेहतरीन टिप्‍पणी दी।
 

One interesting aspect of the songs of this film is male bonding songs.. there are male duets, triplets and quad songs in the soundtrack..
-Anhoni baat (my favorite) features Mukesh, Talat, Manna, Hemant and mehmood all in one song together..
-Aa tha jab janam liya tha features Mukesh, Hemant, Manna da
-Jab dosti hoti hai & Duniya me do sayane both features Hemant & Manna

Apart from the above it also feature a beautiful Asha-Lata duet, Dabe labin se kabhi jo koi salaam le.. and a beautiful Rafi solo Jaane kahan dekha hai.. and not to forget the hindi version of kishoreda's claasic shing nei (lukochuri) in the voice of Manna Dey (khul khuk khullam khulla)
In all a very interesting collage of songs..

पवन ने एकदम सही बात पर ध्‍यान खींचा है। चूंकि कहानी चार युवकों की है, इसलिए हेमंत दा को यहां पुरूष टोली वाले गाने गवाने का मौक़ा मिला। और ऐसा क़तई नहीं था कि गायक-संगीतकारों की तरह उन्‍होंने अपनी आवाज़ का मोह किया हो। जहां ज़रूरी है वहीं उनकी आवाज़ है। यही नहीं इस अलबम में हेमंत दा के गाने अलग ही मिज़ाज लेकर आए हैं।

यहां उनकी बांग्‍ला रूमानियत ज़्यादातर ग़ायब है। ये हल्‍के-फुल्‍के लेकिन बारीक टिप्‍पणियों वाले गाने हैं। intellectual songs. इनमें एक खिलंदड़पन है। एक मस्‍ती है, बेफिक्री है।

श्रृंखला के पहला गाना वो है--जो काफ़ी समय से मेरे ज़ेहन में गूंज रहा है और एक धीमे लेकिन पक्‍के नशे के रूप में इसका असर गहरा होता चला जा रहा है। 

 


song: jab dosti hoti hai to dosti hoti hai
singers:hemant kumar, manna dey, ghulam mohammad, balbir
lyrics: gulzar
music:hemant kumar 



अगर आपने ये फिल्‍म नहीं  देखी तो इसका माहौल आपको मेहमूद के इस संवाद से समझ आ जायेगा। गाना सुनकर इसकी इबारत लिखी गयी है, हो सकता है कि कहीं कहीं कान का धोखा हो गया हो, सुझावों का स्‍वागत है। पर ग़ौरतलब है कि गुलज़ार के लिखे इन गानों की ज़्यादा चर्चा नहीं होती। वाक़ई। कमाल के बोल हैं ये। अपनी बात भी कहते हैं और फिल्‍म का अटूट हिस्‍सा भी हैं।

यहां बलबीर और गु़लाम मोहम्‍मद जैसी आवाज़ों की तरफ़ आपका ध्‍यान खींचना ज़रूरी है। ग़ुलाम मोहम्‍मद मधुमति के गाने--'तन जले मन जलता रहे' में सुनाई देते हैं। और ये संगीतकार ग़ुलाम मोहम्‍मद नहीं हैं। बलवीर मनोज कुमार की कई फिल्‍मों में सुनाई देते रहे हैं।  

'यार किशन ये हद्द हो गयी
यारों की तो भद्द हो गयी
सिर्फ़ अहसान ही बाक़ी रह गये
दोस्‍ती यारी रद्द हो गयी
प्‍यार में दुनियादारी कैसी
मुफ्त की चीज़ नगद हो गयी है
छी छी यार की ये पहचान
दोस्‍ती में कैसा अहसान
जब दोस्‍ती होती है तो.........'


अहसान नहीं होता..
जब दोस्ती होती है तो दोस्ती होती है
और दोस्‍तों में कोई अहसान नहीं होता।

जल बिन तड़पत मछली जैसे नल बिन तरपत पानी
और हाथ पानी बिना चलते....अस्‍नान नहीं होता।।

ये पांचों की पंचायत, जो सोचे सही होगा
हम पांडव हैं भारत के, जो कह दें वही होगा
ओए जम के एक जमा दूं....दूध का दही होगा
मीरा के प्रभु कहत कबीरा, जीवन काज कदम कश्‍तीरा
खात कष्‍ट बिना ये जीवन, आसान नहीं होता।।
जब दोस्‍ती होती है तो....

उंगली से ढीली का जब तक
जोड़ सलामत ..थाह सलामत
छोटी और बड़ी हैं तो क्‍या


पांचों है तो हाथ सलामत
एक एक के हैं पांच मुक़द्दर
तकलीफ़ों से घबराना मत
सांझे जोड़ जवानी बचपन
पांच से पांच मिले तो पचपन
पांचों साथ आए तो....
नुकसान नहीं होता....
जब दोस्‍ती होती है तो दोस्‍ती है
और दोस्‍तों में कोई अहसान नहीं होता।।

(पवन भाई के सहयोग से गाने की इबारत को दुरूस्त कर दिया गया है)
रेडियोवाणी पर फिल्‍म

'बीवी और मकान' के गानों का ये अनियमित सिलसिला जारी है।


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Sunday, August 9, 2009

अठन्‍नी-सी ये जिंदगी : फिर रविवार-फिर गुलज़ार

 

 

कुछ गाने कैसे अनायास याद दिला दिए जाते हैं । 'फेसबुक' पर पवन झा ने आज लिखकर टांग दिया 'कभी चांद की तरह टपकी, कभी राह में पड़ी पाई, अठन्‍नी-सी ये जिंदगी' । और ये गाना अचानक हमारे ज़ेहन में ताज़ा हो गया । जहां तक याद आता है, मुंबई में हमारे शुरूआती साल ही थे जब ये फिल्‍म आई थी । और वो कैसेट्स का ही ज़माना था । ज़ाहिर है कि ये कैसेट हमने छोड़ा नहीं । अब भी संग्रह में है ।



गुलज़ार अपने 'एक्‍सप्रेशन' में कितने कमाल हैं यहां । ज़रा-सा गाना है तीन मिनिट बारह1223037839 सेकेन्‍ड का । लेकिन दिलो-दिमाग़ पर छा जाता है । ये वही टीम है 'कमीने' वाली । यानी गुलज़ार और विशाल भारद्वाज की टीम । विशाल अपनी इस कंपोज़ीशन में उसी तरह 'एक्‍सपेरीमेन्‍टल' हैं जैसे वो हमेशा होते हैं । हरिहरन पर तो आंख मूंदकर भरोसा किया जा सकता है कि वो जब भी गायेंगे और जो भी गायेंगे अच्‍छा ही गायेंगे । तो आईये अपनी जिंदगी को 'अठन्‍नी-सी जिंदगी' कहें । और इस गाने से होकर गुज़रें ।


song-aththanni si zindagi
singer-hariharan
lyrics:gulzar
music-vishal
film-jahan tum le chalo
duration-3-12




कभी चांद की तरह टपकी कभी राह में पडी पाई
अठन्नी सी ज़िन्दगी, ये ज़िन्दगी
कभी छींक की तरह खनकी कभी जेब से निकल आई
अठन्नी-सी ज़िन्दगी, ये ज़िन्दगी
कभी चेहरे पे जड़ी देखी..
कभी मोड़ पे पडी देखी
शीशे के मर्तबानो मे दुकान पे पड़ी देखी
चौकन्नी-सी ज़िन्दगी, ये ज़िन्दगी
तमगे़ लगाके मिलती है मासूमियत सी खिलती है
कभी फूल हाथ में लेकर शाख़ों पे बैठी मिलती है
अठन्नी-सी ज़िन्दगी, ये ज़िन्दगी


ये इस गाने का वीडियो तो नहीं है पर एक प्रेजेन्‍टेशन ज़रूर है ।

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Monday, July 27, 2009

यार जुलाहे : गुलज़ार की नज़्म के दो रूप ।

'रेडियोवाणी' पर मैंने पहले भी गुलज़ार, विशाल भारद्वाज और सुरेश वाडकर के अलबम 'बूढ़े पहाड़ों पर' की चर्चा की थी । लेकिन तब 'सुनवाने' की उन तकनीकों का ज्ञान नहीं था, जिनका प्रयोग अब 'रेडियोवाणी' पर अब किया जाता है । बहरहाल पिछले कुछ दिनों से भूपिंदर-मिताली और गुलज़ार का अलबम 'चांद परोसा है' सुन रहा था, इसमें मुझे एक ऐसा गीत मिला जिसे 'बूढ़े पहाड़ों पर' में शामिल किया गया है । लेकिन दोनों ही प्रस्‍तुतियों में बहुत बड़ा फ़र्क़ है । इसलिए आज 'रेडियोवाणी' पर हम एक शायर की एक ही रचना की दो प्रस्‍तुतियों से होकर गुज़रेंगे और ये भी पहचानेंगे कि जब दो कलाकार अपने अलग-अलग तरीक़े से किसी रचना को गाते हैं तो उसका रूप कैसे बदल जाता है ।

'बूढ़े पहाड़ों पर' हमारे कॉलेज के दिनों का अलबम है, और कैसेट की शक्‍ल में अभी-भी हमारे संग्रह का हिस्‍सा है । अपनी बनावट और रचनात्‍मकता में ये अलबम उन बहुत थोड़े नॉन-फिल्‍म-अलबमों की लिस्‍ट का हिस्‍सा बनता है, जो एकदम संपूर्ण हैं । जिनमें कोई भी कोर-कसर बाक़ी नहीं रखी गयी है । सुरेश वाडकर का गाया ये गीत सुनिए, जिसमें विशाल भारद्वाज ने इस बात का ख्‍याल रखा है कि जज़्बात एकदम से तरल ना हो जाएं । उनका गाढ़ापन बचा रहे ।    
album:Boodhe pahadon par
song: Yaar julahe.
singer:Suresh Wadkar
lyrics:Gulzar.




यार जुलाहे यार जुलाहे
मुझको भी तरकीब सिखा कोई
अकसर तुझको देखा है कि ताना बुनते
जब कोई तागा टूट गया तो और सिरा कोई जोड़के उसमें
आगे बुनने लगते हो
तेरे इस ताने में लेकिन एक भी गांठ भी रहे बुनकर की
देख नहीं सकता है कोई
..............................................................................
(यहां आकर गाने की गति बदल जाती है और गाना बेहद मार्मिक हो जाता है )
मैंने तो एक बार बुना था एक ही रिश्‍ता
लेकिन उसकी सारी गिरहें साफ़ नज़र आती हैं यार ।


यही गीत जब 'चांद परोसा है' में भूपिंदर गाते हैं तो पूरी आधुनिकता के साथ गाते हैं । भूपी ने इस गाने को थोड़ा 'लाउड' रखा है । 

 
album: Chand parosa hai.
singer: Bhupinder singh.
lyrics:Gulzar.




मुझको भी हां, मुझको भी हां, मुझको भी तरकीब सिखा दे यार
मेरे यार जुलाहे
अकसर तुझको देखा है कि ताना बुनते
जब कोई तागा टूट गया या खत्‍म हुआ


फिर से बांध के, और सिरा कोई जोड़के उसमें
आगे बुनने लगते हो ।
तेरे उस ताने में लेकिन
एक भी गांठ भी रहे बुनकर की
देख नहीं सकता है कोई ।
......................................................................
(यहां भूपिंदर भी अपने स्‍वर को उदास कर देते हैं, पर इन पंक्तियों के बाद गाना फिर से अपनी 'मस्‍ती' पर पहुंच जाता है ।)
मैंने तो एक बार बुना था एक ही रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिरहें साफ़ नज़र आती हैं ।

मुझे तो ये दोनों संस्‍करण दिलचस्‍प लगते हैं । चूंकि सुरेश वाडकर वाला गीत एक अरसे से सुनते आ रहे हैं इसलिए उससे ज्‍यादा अनुराग हो गया है । वैसे आपको बता दें कि 'बूढ़े पहाड़ों पर' आप यहां सुन भी सकते हैं और प्राप्‍त भी कर सकते हैं । ये याद रखिएगा कि यहां इस अलबम की टैगिंग ग़लत की गयी है । दरअसल ये सुरेश वाडकर, गुलज़ार और विशाल भारद्वाज का अलबम है । ना कि जगजीत सिंह का ।

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Friday, May 15, 2009

कोई दिन गर जिंदगानी और है-विनोद सहगल के बहाने सीरियल मिर्जा़ ग़ालिब की याद ।

पिछले कुछ दिनों से कानों में विनोद सहगल की आवाज़ गूंज रही थी । 'कोई दिन गर जिंदगानी और है, अपने दिल में हमने ठानी और है' । शायद आप‍ विनोद को जानते हों, शायद नहीं जानते हों । विनोद एक ग़ज़ल गायक हैं । अस्‍सी के दशक में जगजीत सिंह ने ग़ज़ल की दुनिया की कुछ नई प्रतिभाओं को मौक़ा दिया था । और दो LP रिकॉर्डों का एक सेट जारी किया था । नाम था ‘chitra-jagjit singh presents the talents of eighties’ । इस अलबम में विनोद सहगल, घनश्‍याम वासवानी, अशोक खोसला, सीमा शर्मा, सुमिता चक्रवर्ती और जुनैद अख़्तर जैसे युवा कलाकार शामिल थे । यहां से विनोद का सफ़र शुरू तो हुआ पर लंबा नहीं चला । इन प्रतिभाओं में से अशोक खोसला का तो फिर भी काफ़ी नाम हुआ बाक़ी कलाकार जैसे गुमनामी की धुंध में खोते चले गए । यही वो अलबम है जिसमें अशोक खोसला ने 'अजनबी शहर के अजनबी रास्‍ते' ग़ज़ल गाई थी । जिसे डॉ. राही मासूम रज़ा ने लिखा था ।


विनोद मुंबई की सेंट्रल रेलवे लाइन के एक बेहद सुदूर उपनगर में रहते हैं । संघर्ष तब भी था, अब भी है । पर विनोद की आवाज़ पता नहीं क्‍यों मेरे कानों में गाहे-बगाहे गूंजती रहती है । मेरा मानना है कि विनोद की आवाज़ में एक अजीब सी सूफियत है । आपको याद होगा कि सन 1988 में गुलज़ार ने दूरदर्शन के लिए एक नामचीन धारावाहिक बनाया था 'मिर्ज़ा ग़ालिब' । नसीर ने इसमें मुख्‍य भूमिका की थी और कुछ इस गेट-अप में नज़र आए थे ।
mirza-ghalib
ये धारावाहिक 'मिर्ज़ा ग़ालिब' में शामिल ग़ज़लों के HMV द्वारा जारी किए गए अलबम का 'जैकेट' है । शायद आपको याद हो, ये सीरियल इस शेर से शुरू होता था---


'हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्‍छे
कहते हैं कि ग़ालि‍ब का है अंदाज़-ए-बयां और'


इसके बाद गुलज़ार की वो कमेन्‍ट्री है जिसे 'इब्तिदा' के नाम से जाना जाता है । ये रही उस कमेन्‍ट्री की इबारत--
बल्‍लीमारान के मुहल्‍ले की वो पेचीदा दलीलों की सी गलियां
सामने टाल के नुक्‍कड़ पे बटेरों के वो क़शीदे
गुड़गुड़ाती हुई पान की पीकों में वो दाद वो वाह वाह
चंद दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा से कुछ टाट के परदे
एक बकरी के मिमियाने की आवाज़
और धुंधलाई हुई शाम के बेनूर अंधेरे,
ऐसे दीवारों से मुंह जोड़के चलते हैं यहां
चूड़ीवालान के कटरे की बड़ी बी जैसे,
अपनी बुझती हुई आंखों से दरवाज़े टटोलें
इसी बेनूर अंधेरी सी गली-क़ासिम से
एक तरतीब चराग़ों की शुरू होती है
एक क़ुराने सुख़न का सफा खुलता है
असद उल्‍ला ख़ां ग़ालिब का पता मिलता है ।

इब्तिदा यहां सुनिए
 




इसे विनोद सहगल ने ही गाया था । यहां क्लिक करके आप इस धारावाहिक की पहली कड़ी (और कई अन्‍य कडियों ) को तसल्‍ली से इंटरनेट पर ही देख सकते हैं । विनोद सहगल की आवाज़ एकदम शुरू में ही आपको मिल जायेगी । बरसों पहले फिल्‍म माचिस में उन्‍होंने हरिहरन के साथ ‘छोड़ आए हम वो गलियां’ गाया था । विनोद की आवाज़ में आज हम आपको 'मिर्ज़ा ग़ालिब' सीरियल में शामिल एक ग़ज़ल सुनवा रहे हैं । कहते हैं कि मिर्ज़ा ग़ालिब ने एक फ़कीर को अपनी यही ग़ज़ल गाकर भीख मांगते हुए देखा था । और उन्‍हें बड़ा अच्‍छा लगा था ।


कोई दिन गर जिंदगानी और है
अपने जी में हमने ठानी और है
बारहा देखीं हैं उनकी रंजिशें
पर कुछ अब के सरगिरानी और है
देके ख़त मुंह देखता है नामाबर
कुछ तो पैगाम-ऐ-ज़बानी और है
हो चुकीं गालिब बलाएँ सब तमाम
एक मर्ग-ए-नागहानी और है

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Friday, April 18, 2008

जनम जनम बंजारा हूं बंधू : फिल्‍म राहगीर, हेमंत कुमार की सौंधी आवाज़ ।

रेडियोवाणी पर गुलज़ार के गीतों की चर्चा अकसर ही हुई है । आज भी एक गुलज़ारी गीत की बात की जाए । फिल्‍म 'राहगीर' सन 1969 में आई थी । कलाकार थे-बिस्‍वजीत, संध्‍या राय, शशिकला, इफ्तेख़ार, कन्‍हैयालाल, निरूपा राय और असित सेन । मैंने ये फिल्‍म नहीं देखी । देखने का मौक़ा मिले या नहीं, पता नहीं । लेकिन ये गीत मैं बार-बार सुनता हूं ।

मैं बार-बार अपने इस चिट्ठे और दूसरे चिट्ठे 'तरंग' पर यायावरी करने की hemantapic2अपनी तमन्‍ना की चर्चा हमेशा करता रहता हूं । जो अभी तक पूरी नहीं हो पाई । ख़ैर...आपको नहीं लगता कि हम सब अपने मन के बंजारे हैं । मन की दुनिया में विचरण करते रहते हैं । ये हम बंजारों का गीत है । और हमारे मन के बेहद क़रीब है । पहले हेमंत दा की प्रतिभा को सलाम कीजिए । आप भी उनके मुरीद हैं तो इस पेज पर जाईये जहां से हमने ये तस्‍वीर साभार ली है । ये सुरताल डॉट कॉम की लिंक है । हेमंत दा के बारे में इस पेज पर भरपूर जानकारियां हैं ।

मेरे एक साथी कहते हैं कि हेमंत कुमार की आवाज़ यूं लगती है जैसे किसी मंदिर में धूप-बत्‍ती की खुश्‍बू आ रही हो । जैसे कोई पुजारी तन्‍मयता से गा रहा हो । जैसे रात के सन्‍नाटे में अचानक वीणा की तान सुनाई दे रही हो ।

कुछ इसी तरह का अंदाज़ है हेमंत दा का । हेमंत दा और गुलज़ार की जुगलबंदी कई गानों में हुई है । ख़ासतौर पर इस गाने की बात करते हुए मुझे सुकून मिलता है । ज्‍यादा कुछ नहीं कहना । सुनिए और बताईये ।


जनम से बंजारा हूं बंधु जनम-जनम बंजारा
कहीं कोई घर ना घाट ना अंगनारा ।।
जहां कहीं ठहर गया दिल, हमने डाले डेरे
रात कहीं नमकीन मिली तो मीठे सांझ-सवेरे
सब नगरी छोड़ी, साहिल छोड़ा लिया मंझधारा
बंधु रे........नगरी छोड़ी साहिल छोड़ा लिया मंझधारा
बंधु कहीं कोई घर ना घाट ना अंगनारा ।।
सोच ने जब करवट बदली शौक़ ने पर फैलाए
....के तिनके सारे डाल से उड़ाए
सब रिश्‍ते तोड़े नाते तोड़े छोड़ा कुल-किनारा
बंधु रे.....कहीं कोई घर ना घाट ना अंगनारा ।
जनम से बंजारा ।।

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Saturday, March 8, 2008

हाथ बढ़ा ऐ जिंदगी आंख मिलाके बात कर-- हिप हिप हुर्रे फिल्‍म का गीत ।

कुछ गाने मन के भीतर कहीं अपनी जगह बना लेते हैं । फिर यादों की परतें चढ़ती जाती हैं और गाना कहीं भीतर दबकर रह जाता है । गाहे-बगाहे गाना इन निचली परतों के भीतर से झांककर अपनी मौजूदगी का अहसास करता रहता है...ऐसे ही एक गाने की याद किसी ने दिला दी है । मुझे याद है दूरदर्शन के ज़माने में मैंने प्रकाश झा की ये फिल्‍म बड़े ही चाव से देखी थी--'हिप हिप हुर्रे' । इस फिल्‍म में राजकिरण और दीप्‍ती नवल की जोड़ी थी । मुझे इस खेल-फिल्‍म के गाने बहुत पसंद आए थे । वक्‍त वक्‍त पर ये गीत मैं रेडियोवाणी पर प्रस्‍तुत करने का प्रयास करूंगा ।

विविध भारती में आने के बाद मुझे प्रकाश झा से बातचीत का भी मौक़ा मिला और दीप्‍ती नवल से तो उनके अपने घर पर जाकर बातचीत की । दोनों ने इस फिल्‍म को बड़ी शिद्दत से याद किया । क्‍योंकि दोनों की ही जिंदगी में इस फिल्‍म के बड़ा महत्‍त्‍व रहा है । दोनों इस फिल्‍म के ज़रिए क़रीब आए थे । शादी के रास्‍ते पर चल पड़े थे ।

.... रोज़ तेरे जीने के लिए एक सुबह मुझे मिल जाती है मुरझाती है...कोई शाम अगर तो रात कोई खिल जाती है मैं रोज़ सुबह तक आता हूं और रोज़ शुरू करता हूं सफ़र हाथ बढ़ा ऐ जिंदगी आंख मिला के बात कर ।।

विविध भारती में आने के बाद मुझे 'हिप हिप हुर्रे' के गाने तसल्‍ली से सुनने को मिले । और अब इंटरनेट पर ई स्निप्‍स से जुगाड़ कर ये गाने आप तक पहुंचाए जा रहे हैं Happy 

गुलज़ार के बोल हैं । और बहुत ख़ास हैं । संयोग देखिए कि रेडियोवाणी पर पिछली पोस्‍ट भी वनराज भाटिया के गाने की ही थी--जिसके बोल थे--'ये फासले तेरी गलियों के हमसे तय ना हुए' । और इसके फ़ौरन बाद मैं जिस गाने का जिक्र कर रहा हूं वो भी वनराज भाटिया ने ही स्‍वरबद्ध किया है । ये गुलज़ार का गीत है । ठेठ गुलज़ारी गीत । अपने व्‍याकरण और अपनी भावनाओं के लिहाज़ से अव्‍वल नंबर है ये गीत । आईये इसके संगीत की बात की जाए । येसुदास की आवाज़ है इस गाने में । यानी वनराज भाटिया, गुलज़ार और येसुदास की दुर्लभ तिकड़ी ।

vb gulzar ysd

येसुदास ने इस गाने को बहुत अंडरप्‍ले करते हुए गाया है, कोई कलाबाज़ी नहीं है । सुनने वालों को इंप्रेस करने की कोई कोशिश नहीं है । बस एक नर्म गाने को निभा ले जाने की कोशिश ज़रूर है । चूंकि गाना खेल-जीवन से जुड़ा है इसलिए रिदम फास्‍ट रखा गया है । ग्रुप वायलिन का बेहतरीन इस्‍तेमाल किया है वनराज भाटिया ने ।

.... इस प्लेयर के बारे में भी राय दीजिएगा । इंटरनेट आर्काइव पर मिल गया और स्ट्रीमिंग में तेज़ तो लग ही रहा है । मुद्दा ये भी है कि संभवत: इस पर राईट क्लिक करके आप गाने को डाउनलोड कर सकेंगे ।

आपको बता दें कि वनराज भाटिया ने बाक़ायदा वेस्‍टर्न क्‍लासिकल म्‍यूजिक की सालों-साल ट्रेनिंग की और फिलहारमोनिक ऑक्रेस्‍ट्रा में शामिल भी रहे हैं । भारतीय शास्‍त्रीय संगीत और वेस्‍टर्न क्‍लासिकल के ऐसे ज्ञाता कम ही होते हैं । वनराज भाटिया के पहले अगर ऐसा कोई ज़ोरदार नाम आता है तो वो हैं हमारे प्‍यारेलाल जी, लक्ष्‍मी-प्‍यारे की जोड़ी वाले । वो भी इस मामले में माहिर व्‍यक्ति हैं । बहरहाल...इतना तो तय है कि साढ़े तीन मिनिट के इस गाने को आप एक बार सुनकर संतुष्‍ट नहीं होंगे । बार बार सुनेंगे । मेरे ज़ेहन में तो पिछले तीन-चार दिनों से ये गीत लगातार गूंज रहा है । आप क्‍या कहते हैं । और हां इस प्‍लेयर के बारे में भी राय दीजिएगा । इंटरनेट आर्काइव पर मिल गया और स्‍ट्रीमिंग में तेज़ तो लग ही रहा है । मुद्दा ये भी है कि संभवत: इस पर राईट क्लिक करके आप गाने को डाउनलोड कर सकेंगे । Happy

 

एक सुबह एक मोड़ पर मैंने कहा कहा उसे रोककर

हाथ बढ़ा ऐ जिंदगी । आंख मिलाके बात कर ।।

रोज़ तेरे जीने के लिए एक सुबह मुझे मिल जाती है

मुरझाती है...कोई शाम अगर तो रात कोई खिल जाती है

मैं रोज़ सुबह तक आता हूं और रोज़ शुरू करता हूं सफ़र

हाथ बढ़ा ऐ जिंदगी आंख मिला के बात कर ।।

तेरे हज़ारों चेहरों इक चेहरा है मुझसे मिलता है

आंख का रंग मिलता है आवाज़ का अंग भी मिलता है

सच पूछो तो हम दो जुड़वां हैं, तू शाम मेरी मैं तेरी सहर

हाथ बढ़ा ऐ जिंदगी आंख मिलाके बात कर ।।

एक सुबह एक मोड़ पर मैंने कहा उसे रोककर

मैंने कहा उसे रोककर ।।

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Tuesday, March 4, 2008

फलक पकड़ के उठो और हवा पकड़ के चलो, तुम चलो तो हिंदुस्‍तान चले ।

रेडियोवाणी पर हम हमेशा कहते रहे हैं कि हम गुलज़ार के शैदाईयों में से हैं, गुलज़ार की रचनाओं पर हमारी पैनी नज़र रहती है । पिछले दिनों जब टाईम्‍स ऑफ इंडिया ने lead india का आयोजन किया था तो इसके विज्ञापनों पर अपनी भी नज़र गयी थी । गुलज़ार इनमें नज़र आए थे । पर ध्‍यान ज्‍यादा नहीं दिया था । अभी तीन दिन पहले हमारी एक मित्र डॉ. वृंदा देशमुख ने एक लिंक भेजा और कहा कि ये वीडियो देखिए.....ज़ाहिर है कि फ़ौरन देखा ।

वीडियो इतना असरदार था कि मन में कई सवाल उठने लगे । सड़क पर पेड़ गिर गया है । ट्रैफिक जाम है और लोग बग़लें झांक रहे हैं । फिर आगे क्‍या होता है खुद देखिए वीडियो में । बहरहाल.....सवाल उठा कि आखि़र ये गीत किसने लिखा होगा, फौरन यू-ट्यूब पर जा पहुंचे और 'लीड इंडिया' की बाक़ी फिल्‍में खोजीं । तो पता चला कि ये तो अपने गुलज़ारए बाबू हैं । लीड इंडिया कैम्‍पेन में इस गीत को 'new anthem' कहा गया था । ज़रा देखिए कि कितने 'प्रोवोकिंग' हैं ये वीडियो । और कितना प्रेरक है ये गीत ।

शंकर अहसान लॉय इस तरह के गीतों को तैयार करने में बड़े माहिर हैं ।

फलक पकड़ के उठो और हवा पकड़ के चलो

तुम चलो तो हिंदुस्‍तान चले ।

तुम चलो तो हिंदुस्‍तान चले ।

लगाओ हाथ के सूरज सुबह निकाला करे । 

हथेलियों में भरे धूप और उछाला करे ।

उफ़क़ पे पांव रखो और चलो अकड़ के चलो ।

फ़लक पकड़ के उठो और हवा पकड़ के चलो ।

तुम चलो तो हिंदुस्‍तान चले ।

तुम चलो तो हिंदुस्‍तान चले ।

हिंदुस्‍तान चले ।।

  

कहिए कैसी रही दोस्‍तो ।

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Tuesday, January 15, 2008

रोज़ रोज़ आंखों तले एक ही सपना चले-फिर गुलज़ार

मैंने कई बार ये बात कही है कि कुछ फिल्‍में ऐसी होती हैं जो बर्दाश्‍त से बाहर होती हैं, उन्‍हें आप देख ही नहीं सकते, लेकिन ऐसी ही कुछ फिल्‍में ऐसी होती हैं जिनके कुछ गाने या हो सकता है कि जिनका एकाध गाना बहुत खूबसूरत बन पड़ता है । इसका मतलब साफ़ है कि गाने ज़्यादातर एक Independant entity की तरह होते हैं । उनका फिल्‍म से केवल विजुअल रिश्‍ता होता है, पर जब वो एक ऑडियो हैं, तो वो एक आज़ाद-ख्‍़याल की तरह होते हैं । और ये बहुत बढि़या-सी बात है ।

इसी वजह से हमें कुछ बेमिसाल गाने मिले हैं । आज मैं जो गीत लेकर आया हूं, उसकी फिल्‍म इतनी बुरी है कि किसी से बदला लेना हो तो इस फिल्‍म के साथ उसे कमरे में बंद कर दिया जाए । लेकिन दिलचस्‍प बात है कि इस फिल्‍म में गुलज़ार के गाने थे और आर डी बर्मन का संगीत । इस सबके बावजूद एक गाना ऐसा है जिसने फिल्‍म की सीमाओं को तोड़कर अपनी जगह बनाई । और गुलज़ार के अच्‍छे-प्‍यारे से गानों में ख़ुद को शामिल करवा लिया । मैं फिल्‍म 'जीवा' की बात कर रहा हूं । संजय दत्‍त और मंदाकिनी के अभिनय वाली इस फिल्‍म के निर्देशक राज एन सिप्‍पी थे । चलिए छोडि़ये इस फिल्‍म की बातें क्‍या करनी हैं । फिल्‍म संगीत के शौकीन इस गाने की फ़रमाईश करते हैं रेडियो पर । क्‍योंकि ये ज़्यादा बजता नहीं है । अगर आप कहीं बाज़ार जाकर किसी म्‍यूजिक शॉप में फिल्‍म जीवा का नाम लेंगे तो हो सकता है कि सेल्‍समैन आपको दूसरे ग्रह से आया हुआ प्राणी समझे । पर हम तो इस गाने के शैदाई हैं । वो इसलिए क्‍योंकि हम गुलज़ार के शैदाई हैं ।

बहुत अजीब-गीत है ये । जैसे गुलज़ार के ज़्यादातर गीत हुआ करते हैं । आप पढ़ेंगे तो पायेंगे कि कुल जमा तीन अंतरे हैं । संक्षिप्‍त से अंतरे । दो लाईनों वाले । लेकिन इस गाने की धुन और ऑरकेस्‍ट्रेशन कमाल है । मुझे रिदम का ये पैटर्न खासतौर पर पसंद है । पंचम ने अपने गानों में इस रिदम को काफी इस्‍तेमाल किया है । जैसे ही आप प्‍लेयर पर क्लिक करेंगे, आपको गाने का इंट्रो म्‍यूजिक एक दूसरी ही दुनिया में ले जाएगा । पता नहीं क्‍यों मन करता है कि ऐसे गानों को मिंट की गोली की तरह बस देर तक चूसते रहो, तन्‍हाई की महफि़ल सजाकर बैठे रहो और जब ये गाना हमसे बात करे तो कोई दूसरा कुछ ना बोले ।

एक और मज़ेदार बात । इस गाने में आशा भोसले के सहगायक हैं अमित कुमार । जो सिर्फ़ दो लाईनें गाने के लिए ही आते हैं । जब आशा जी इन पंक्तियों को गा लेती हैं--जीना तो सीखा है मरके, मरना सिखा दो तुम ...तो आते हैं अमित कुमार मुखड़ा गाने के लिए । और एक रिलीफ़ की तरह आती है उनकी आवाज़ । उनके हिस्‍से में गाने का आखि़री अंतरा ही आया है । बस....। पर अच्‍छा लगता है । 'बेचारे से कुछ ख्‍़वाबों की नींद उड़ा दी है । गुलज़ार की कल्‍पनाओं की उड़ान भी बहुत ही आवारगी भरी है । अब बस यही कहना बाक़ी है कि अगर आपके जीवन में इन पंक्तियों को पढ़ने के साथ-साथ पूरे आठ मिनिट का समय हो तो इस गाने को सुनिएगा । थोड़ा-सा लंबा है ये गीत । सुनिए और बताईये क्‍या आपको भी ये उतना ही पसंद है जितना मुझे ।  

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रोज़ रोज़ आंखों तले एक ही सपना चले

रात भर काजल जले

आंख में जिस तरह ख्‍वाब का दिया जले ।।

जब से तुम्‍हारे नाम की मिसरी होंठ लगाई है

मीठा-सा ग़म है और मीठी-सी तनहाई है

रोज़-रोज़ आंखों तले ।।

छोटी-सी दिल की उलझन है ये सुलझा दो तुम

जीना तो सीखा है मरके, मरना सिखा दो तुम ।।

रोज़ रोज़ आंखों तले ।।

आंखों पर कुछ ऐसे तुमने ज़ुल्‍फ़ गिरा दी है

बेचारे से कुछ ख्‍़वाबों की नींद उड़ा दी है ।।

रोज़ रोज़ आंखों तले ।।

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