संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Tuesday, July 19, 2022

आज बिछड़े हैं...भूपी की याद में: यूनुस ख़ान

 




कुछ आवाज़ें हमारी उदासियों की आवाज़ें होती हैं। यक़ीन मानिए जिस तरह ज़िंदगी में हम मुस्‍कानें सहेजते हैं
, उसी तरह सहेज कर रखना होता है उन आवाज़ों को जो गहरी उदासियों में हमें सहलाती हैं। जब हम डूब रहे होते हैं—ये आवाज़ें हमें थाम लेती हैं। ज़िंदगी की दुश्वारियों को सहने का हौसला देती हैं और हम पथरीली राहों पर ठोकरें खाकर आगे बढ़ जाते हैं। भूपिंदर सिंह इसी तरह की आवाज़ हैं।

मैंने
हैंइसलिए कहा क्‍योंकि जब उनके शरीर छोड़ने की ख़बर कल रात आयी, तो पल भर के लिए सन्‍न रह गया। पर सच यही है कि शरीर चले जाते हैं, आत्‍मा कायम रहती है। शरीर चले जाते हैं, आवाज़ें कायम रहती हैं। संगीत की दुनिया के मुसाफिर हम सब यही मानते हैं कि जगजीत भी हमारे क़रीब हैं, एक पुकार पर हाजिर हो जाते हैं हमारे पास और कह उठते हैं—आंखों में नमी, हँसी लबों पर, क्‍या हाल है, क्‍या दिखा रहे हो....जब पुकारें तो मेहदी हाजिर हो जाते हैं—देख तो दिल कि जां से उठता है, ये धुआं कहां से उठता है। आइंस्‍टीन ने संसार को बताया था कि ध्‍वनियां कहीं नहीं जातीं। संसार में सदा कायम रहती हैं।

भूपी हमारी उजली-केसरिया सुबहों और सुरमई-उदास शामों की एक ज़रूरी आवाज़ रहे हैं। सुबहों के माथे पर उनकी आवाज़ चमक बिखेर जाती है जब वो गाते हैं—
ना मंदिर में ना मस्जिद में ना कासी-कैलास में ,मोको कहां ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास रे। भूपिंदर सुरमई शामों में हमारे आसपास गूंजते रहे हैं—या गर्मियों की रात जो पुरवाईयां चले/ ठंडी सफ़ेद चादरों पे जागे देर तक/ तारों को देखते रहें/ छत पर पड़े हुए। भूपिंदर रातों को जुगनू की तरह चमकते हैं—जब उनकी आवाज़ गूंजती है—चौदहवीं रात के इस चाँद तले, सुरमई रात में साहिल के क़रीब, दूधिया जोड़े में आ जाए जो तू। भूपी आते हैं अपने आबो-ताब के साथ ये कहने—कोसा-कोसा लगता है.../ तेरा भरोसा लगता है..../ रात में अपनी थाली में/ चाँद परोसा लगता है। भूपी के गिटार की तरंगें भी जब तक गूंजती हैं। कभी दम मारो दमके इंट्रो का गिटार, कभी मेहबूबा मेहबूबातो कभी चुरा लिया है तुमनेवाला पीस, उनके ख़ज़ाने में यादों की बारातभी है और आने वाला पलभी।

भूपिंदर की आवाज़ में एक अजीब-सा वीतराग नज़र आता है। जैसे वो दुनिया में हैं तो पर वैसे जैसे पत्‍थर ऊपर पानी। जिस वक्‍़त वो आए कितना मुश्किल वक्‍़त था
, इतने सारे सूरज चमक रहे थे, रफ़ी, किशोर, मुकेश, मन्‍ना डे जैसे। उनके बीच एक नया-छोटा-सा तारा आकर पुकारता है—एक एक हर्फ़ जबीं पर उभर आया होगा या
रूत जवां-जवां, रात मेहरबां

भूपी उन लोगों की ख़ासी क़रीब आवाज़ रहे हैं जिन्‍होंने संसार के तयशुदा नियमों को तोड़ा
, जिन्‍होंने लीक पर चलना कभी गवारा नहीं किया। भूपी गिटार की तरंगें लेकर ग़ज़लों की दुनिया में आए। भूपी का अपनी आवाज़ को जब मर्ज़ी खींचना, जब मर्ज़ी अल्फ़ाज़ को हवा में टाँग देना, फिर उठाना और आगे चल देना....पहले हैरान करता था, फिर लुभाने लगा, और अब उसकी आदत पड़ गयी है। शायद इसीलिए वो तमाम एक्सपेरीमेंटललोगों से जुड़े। फिर चाहे गुलज़ार हों, पंचम हों या मदनमोहन और जयदेव। उनकी प्रयोगधर्मिता का बड़े पैमाने पर आकलन किया जाना शायद अभी बाक़ी है।

इन सबके बावजूद भूपी शास्‍त्रीयता की राह के पक्‍के मुसाफ़िर भी हैं।
बीती ना बिताई रैना’, ‘मीठे बोल बोले पायलिया’, ‘आई ऋतु सावन की’, ‘सैंयां बिना घर सूनाजैसे गानों में भूपी कठिन डगर पर कितनी सहजता से क़दम रखते बढ़ निकलते हैं।

भूपी इस बेरहम दुनिया में हताशा की आवाज़ भी रहे हैं।
तेरे जहान में ऐसा नहीं कि प्‍यार न हो/ जहां उम्‍मीद हो इसकी वहां नहीं मिलता। वो गाते हैं—अहले दिल यूं भी निभा लेते हैं/ दर्द सीने में छिपा लेते हैं। भूपिंदर आंखों को छलका देते हैं जब उनकी आवाज़ में गूंजता है सारांश का गाना—अंधियारा गहराया, सूनापन घिर आया/ घबराया मन मेरा/ चरणों में आया/ क्‍यों हो तुम यूं गुमसुम/ किरणों को आने दे/ पत्‍थर की आंखों से करूणा को झरने दो। भूपी घनघोर रात में हमारी धुंआ-धुंआ आंखों को देख हमारा हाथ पकड़कर कहते हैं—चाँद की बिंदी वाली, बिंदी वाली रतियां/ जागी हुई अंखियों में रात ना आई रैना

ज़िंदगी में मुड़कर देखने के कई मौक़े आते हैं। हम सोचते हैं काश ऐसा नहीं होता
, कुछ वैसा होता। हम बदल देते समय के प्रवाह को। भूपी की आवाज़ गूंजती है—जब कभी मुड़कर देखता हूं मैं/ तुम भी कुछ अजनबी सी लगती हो/ मैं भी कुछ अजनबी सा लगता हूं। भूपी तरह तरह से हमारे जीवन में दाखिल होते हैं—ज़िंदगी सिगरेट का धुंआ/ ये धुंआ जाता है कहां/ या कहीं जाता नहीं। भूपी ज़िंदगी के लिए एक तमन्‍ना करते हैं—ज़िंदगी फूलों की नहीं/ फूलों की तरह महकी रहे

बारिश का ये मौसम भूपी का ख़ास मौसम है। अचानक दिल धक से रह जाता है कि हमारी इस सबसे प्रिय आवाज़ वाला शख्‍़स इन बारिशों में ही हमसे रूठ गया। भूपी की गाढ़ी आवाज़ में गूंजती है ये लाइन—
बैरन बिजुरी चमकन लागी, बदरी ताना मारे रे/ ऐसे में कोई जाए पिया....तू रूठो क्‍यों जाए रे/ आई ऋतु सावन की
चाँद परोसा हैसे गुलज़ार साहब के बोल गूंजते हैं—याद है बारिशों के दिन पंचम’….और आखिरी लाइन आती है—मैं अकेला हूं धुंध में पंचम। नहीं सुना हो तो ये कंपोज़ीशन सुनकर ख़ुद को घुला दीजिए बारिशों में। भूपी हर बारिश में जैसे आग लगा जाते हैं दिल में.....बरसता भीगता मौसम धुआं-धुआं होगा, पिघलती शम्‍मों पे दिल का मेरे गुमां होगा, हथेलियां की हिना याद कुछ दिलायेगी। अलफ़ाज़ अलफ़ाज़ ही रहते हैं, भूपी जी की आवाज़ मिलती तो वो चमकते तारे बन जाते हैं। भूपी सावन के इस मौसम में गाते हैं—बिरहा जिया तड़पाये/ दूरी सही ना जाए सजनिया आन मिलो

भूपी बहुत गहन उदासियों से बहुत गहन प्रेम की तरफ़ बहता झरना हैं।
पिया तुझ आशना हूं मैं तू बेगाना ना कर। यही भूपी गाते हैं—बादलों से काट-काटके/ काग़़ज़ों पे नाम जोड़ना/ ये मुझे क्‍या हो गया। हमारे भूपी गुलज़ार साहब को जब-जब गाते हैं तो यूं लगता है दुनिया वाक़ई रहने लायक़ है। मुझको भी तरकीब सिखा दे यार/ मेरे यार जुलाहेयारपर उनकी वो तान। उफ़.....। एक ही ख़्वाब कई बार देखा है मैंनेको सुनते हुए गीतों की राह पर आगे चलें तो बारिश से भीगी रात में भूपी हौले से हमसे कहते हैं—रात में घोलें चाँद की मिसरी/ दिन के ग़म नमकीं लगते हैं/ नमकीन आंखों की नशीली बोलियां

भूपी वसंत देव को भी गाते हैं
, कैफ़ी को भी, गुलज़ार को भी और नक्‍श को भी। भूपी सबको अपनी तरह से गाते हुए बारिश भरी जुलाई की अठारह तारीख़ को हमसे कह जाते हैं—
आज बिछड़े हैं कल का डर भी नहीं/ ज़िंदगी इतनी मुख्‍़तसर भी नहीं। हम उसांस भर कर रह जाते हैं। भूपी जी उदासियां अगर मज़हब हों तो आप उस मज़हब के औलिया होंगे। रहेंगे आप—सदा।  


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Thursday, April 21, 2022

आईये 'सारे जहां से अच्‍छा' और 'लब पे आती है दुआ' वाले अल्‍लाम इक़बाल को पहचानें

 



आज अल्‍लामा इक़बाल की याद का दिन है। बचपन से हम सब अल्‍लामा इक़बाल को याद करते रहे हैं उनके लिए
तराना-ए-हिंदीके लिए। इक़बाल का लिखा यह तराना सबसे पहले 16 अगस्‍त 1904 में इत्‍तेहाद रिसाले में छपा था। बाद में उनकी किताब बांग-ए-दरामें इसे शामिल किया गया। आज़ादी की लड़ाई के दौरान ये गीत ब्रिटिश सरकार के विरोध का एक बड़ा ज़रिया बन गया था। इसे सबसे पहले सरकारी कॉलेज लाहौर में पढ़कर सुनाया गया था।

यहां ये ज़िक्र ज़रूरी है कि इसकी धुन 1950 के आसपास भारतरत्‍न पंडित रविशंकर ने तैयार की थी और इसे सुर-साम्राज्ञी भारत-रत्‍न लता मंगेशकर ने गाया था। ये भी ज़िक्र ज़रूरी है कि जब अस्‍सी के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा से पूछा के ऊपर से आपको भारत कैसा नज़र आता है तो उनका जवाब था—
सारे जहां से अच्‍छा


सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिस्ताँ हमारा

ग़ुरबत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में
समझो वहीं हमें भी, दिल हो जहाँ हमारा

परबत वो सबसे ऊँचा, हमसाया आसमाँ का
वो संतरी हमारा, वो पासबाँ हमारा

गोदी में खेलती हैं, जिसकी हज़ारों नदियाँ
गुलशन है जिसके दम से, रश्क-ए-जिनाँ हमारा

ऐ आब-ए-रूद-ए-गंगा! वो दिन है याद तुझको
उतरा तेरे किनारे, जब कारवाँ हमारा

मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा

यूनान-ओ-मिस्र-ओ- रोमा, सब मिट गए जहाँ से
अब तक मगर है बाकी, नाम-ओ-निशाँ हमारा

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जहाँ हमारा

'इक़बाल' कोई महरम, अपना नहीं जहाँ में
मालूम क्या किसी को, दर्द-ए-निहाँ हमारा

सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिसताँ हमारा



इक़बाल को क़रीब से पहचानना इसलिए ज़रूरी है ताकि अहसास हो कि वो कितने बड़े स्‍कॉलर थे। कई सालों तक वो लाहौर के ओरिएंटल कॉलेज में अरबी पढ़ाते रहे और उसके बाद जब जर्मनी गयी तो म्‍यूनिख यूनिवर्सिटी से फ़ि‍लॉसफ़ी में पीएचडी की। लंदन से बैरिस्‍ट्री का इम्तिहान भी पास किया। और लाहौर में फ़ि‍लॉसफ़ी के प्रोफ़ेसर बन गये। साथ ही वकालत भी करते रहे।

इक़बाल को आप
सारे जहां से अच्‍छाके लिए तो याद करते ही हैं। लेकिन उनके कई ऐसे शेर हैं जिनका हम आम ज़िंदगी में इस्‍तेमाल करते हैं और इस अहसास के बिना कि ये इक़बाल के अशआर हैं। जैसे ये शेर--

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।।


कमाल की बात ये है कि इस शेर का इस्‍तेमाल
RM आर्ट की फिल्‍मों की शुरूआत में किया जाता रहा। निर्माता रतन मोहन की ये फिल्‍में थीं—संग्राम, ज्‍वाला, हातिमताई, प्राण जाये पर वचन ना जाए, हीरा-मोती, जग्‍गू, महा-शक्तिशाली वग़ैरह।


अल्‍लामा इक़बाल का एक और मशहूर शेर है--

हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है 

बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा।।


 इसके अलावा इस शेर का भी ख़ूब इस्‍तेमाल किया जाता है--


न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्ताँ वालो

तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों में।।


ये शेर भी अल्‍लामा इक़बाल का लिखा हुआ ही है--


सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं


 अदब की महफिलों में इस शेर का ज़िक्र भी अकसर होता है-


अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल

लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे।।


आईये अब आपको बताते हैं गुलज़ार के इक़बाल कनेक्‍शन के बारे में। गुलज़ार साहब को फिल्‍म
राज़ीके ए वतनगाने के लिए सर्वश्रेष्‍ठ गीतकार का फ़िल्‍मफ़ेयर पुरस्‍कार मिला है। आपको बता दें कि इस गाने की रचना-प्रक्रिया बड़ी मजेदार रही है। बात ये है कि देशभक्ति गीतों के अकाल के इस समय में किसी फिल्‍म में ऐसा गीत आये जो अल्‍लामा इकबाल से प्रेरित होतो इसे एक बड़ी घटना क्‍यों ना माना जाए। अपने एक इंटरव्‍यू में गुलज़ार ने कहा भी है कि इस गीत की प्रेरणा उन्‍हें बचपन में गाये जाने वाले इकबाल के एक गीत से मिली। ये गीत गुलज़ार के स्‍कूल में गाया जाता था। जिन पंक्तियों ने गुलज़ार को प्रेरित किया हैवो हैंलब पे आती है दुआ बनके तमन्‍ना मेरी/ जिंदगी शम्‍मा की सूरत हो खुदाया मेरी

अल्‍लामा इकबाल की ये रचना
बच्‍चे की दुआ सन 1902 की है और कई स्‍कूलों में इसे प्रार्थना के तौर पर गाया जाता है। गुलज़ार ने इन पंक्तियों को भी गाने में शामिल किया है। इसी गाने के लिए अरिजीत सिंह को सर्वश्रेष्‍ठ गायक का फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार मिला है। तो चलिए अल्‍लामा इक़बाल की बच्‍चे की दुआपढ़ी जाए।

लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी
ज़िन्दगी शमा की सूरत[1] हो ख़ुदाया मेरी

दूर दुनिया का मेरे दम से अँधेरा हो जाये
हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाये

हो मेरे दम से यूँ ही मेरे वतन की ज़ीनत[2]
जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत

ज़िन्दगी हो मेरी परवाने की सूरत या रब
इल्म की शम्मा[3] से हो मुझको मोहब्बत या रब

हो मेरा काम ग़रीबों की हिमायत[4] करना
दर्द-मंदों से ज़इफ़ों[5] से मोहब्बत करना

मेरे अल्लाह बुराई से बचाना मुझको
नेक जो राह हो उस राह पे चलाना मुझको


सभी कविताएं कविता-कोश से साभार  

  1.  दीपक की भाँति
  2. ऊपर जायें शोभा
  3. ऊपर जायें ज्ञान का दीपक
  4. ऊपर जायें सहानुभूति
  5. ऊपर जायें दुर्बल

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Sunday, March 24, 2019

कायम है जादू गुलज़ार का।।




ये सच है कि फिल्‍म-फेयर पुरस्‍कारों में अब वो चमक बाक़ी नहीं रह गयी
, जो किसी ज़माने में हुआ करती थी। शायद इसकी एक वजह है पुरस्‍कारों की बढ़ती भीड़...। वैसे भी हर बेहतरीन परंपरा की चमक कभी ना कभी फीकी पड़ ही जाती है। इस बार के फिल्‍मफेयर पुरस्‍कारों की फेहरिस्‍त से गुज़रते हुए मुझे एक दिलचस्‍प तथ्‍य नज़र आया और यही इस लेख का कारण बन गया है। इस बार फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार एक पिता-पुत्री की जोड़ी ने जीता है। हरिंदर सिक्‍का की पुस्‍तक कॉलिंग सहमतपर आधारित मेघना गुलज़ार की फिल्‍म राज़ीने सर्वश्रेष्‍ठ फिल्‍म का पुरस्‍कार तो जीता ही है, आलिया भट्ट सर्वश्रेष्‍ठ अभिनेत्री करार दी गयीं, अरिजीत सिंह सर्वश्रेष्‍ठ गायक बने हैं। मज़ेदार बात ये है कि मेघना गुलज़ार ने सर्वश्रेष्‍ठ निर्देशक का पुरस्‍कार जीता है और उनके पिता गुलज़ार बने हैं सर्वश्रेष्‍ठ गीतकार।

चलिए पहले तथ्‍यों के गलियारों में एक चक्‍कर काट लिया जाए। संभवत: यह पहला मौक़ा है जब पिता पुत्री की जोड़ी को फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार मिला है। यहां ये भी बता दिया जाए कि गुलज़ार के पास फिल्‍मफेयर अवॉर्ड की एक लंबी क़तार है। गुलज़ार के पास अलग-अलग कैटेगरी के कुल 21 फिल्‍मफेयर अवॉर्ड हैं। और इस फेहरिस्‍त में वो सबसे ऊपर हैं। पहली बार उन्‍होंने फिल्‍म
आनंद के लिए सर्वश्रेष्‍ठ संवाद लेखक का फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार जीता था। फिर नमक हरामके लिए भी संवाद लेखक का पुरस्‍कार। बतौर गीतकार उन्‍होंने कुल 12 बार फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार जीता है। और मुझे लगता है कि ज़रूरी है कि हम उन सभी पुरस्‍कारों का जिक्र कर दें।

1978 में फिल्‍म
घरौंदाके गाने दो दीवाने शहर मेंके लिए सर्वश्रेष्‍ठ गीतकार का पहला फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार उन्‍होंने जीता था।


  


उसके बाद
गोलमाल’, ‘थोड़ी-सी बेवफाई’, ‘मासूम’, ‘इजाज़त’, ‘लेकिन’, ‘दिल से’, ‘साथिया’, ‘बंटी और बबली’, ‘इश्‍किया’, ‘जब तक है जानऔर अब राज़ी। यहां मैंने गानों के बोल जान-बूझकर नहीं दिये हैं। आप आसानी से इन्‍हें खोज सकते हैं।


गुलज़ार को फिल्‍म
राज़ीके ए वतनगाने के लिए सर्वश्रेष्‍ठ गीतकार का फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार मिला है।






आपको बता दें कि इस गाने की रचना-प्रक्रिया बड़ी मजेदार रही है। बात ये है कि
देशभक्ति गीतों के अकाल के इस समय में किसी फिल्‍म में ऐसा गीत आये जो अल्‍लामा इकबाल से प्रेरित होतो इसे एक बड़ी घटना क्‍यों ना माना जाए। अपने एक इंटरव्‍यू में गुलज़ार ने कहा भी है कि इस गीत की प्रेरणा उन्‍हें बचपन में गाये जाने वाले इकबाल के एक गीत से मिली। ये गीत गुलज़ार के स्‍कूल में गाया जाता था। जिन पंक्तियों ने गुलज़ार को प्रेरित किया हैवो हैं—‘लब पे आती है दुआ बनके तमन्‍ना मेरी/ जिंदगी शम्‍मा की सूरत हो खुदाया मेरी। अल्‍लामा इकबाल की ये रचना बच्‍चे की दुआ सन 1902 की है और कई स्‍कूलों में इसे प्रार्थना के तौर पर गाया जाता है। गुलज़ार ने इन पंक्तियों को भी गाने में शामिल किया है। इसी गाने के लिए अरिजीत सिंह को सर्वश्रेष्‍ठ गायक का फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार मिला है।


एक और दिलचस्‍प तथ्‍य आपके सामने रख दिया जाए। गुलज़ार ने बतौर गीतकार भले ही 12 फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार जीते हैं पर मजेदार बात ये है कि उन्‍हें कुल 36 बार नॉमिनेट किया जा चुका है। यानी तकरीबन हर बरस उनका कोई ना कोई गाना नामांकित ज़रूर होता है।


 बहरहाल.. सवाल ये है कि वो क्‍या है जो गुलज़ार को इतना बड़ा गीतकार बनाता है। बहुत सारे लोग
, बल्कि ये कहें कि गुलज़ार के आलोचक उन्‍हें सजावटी गीतकार मानते हैं, शब्‍दों का बाज़ीगर कहते हैं। मुझे लगता है कि इस तरह हम उनके काम को रिड्यूस नहीं कर सकते। गुलज़ार अपनी गीतकारी से अहसास ये उस धरातल तक जाते हैं—जहां बहुत ही विरले गीतकार जा सके हैं। उनके बहुत सारे गानों को भले ही मजरूह जैसी क्‍लासिक गीतकारी के दर्जे में नहीं खड़ा किया जा सकता, पर वे अनमोल गीत हैं। उनमें शब्‍दों और संवेदना की बेहतरीन कारीगरी देखने को मिलती है। मजरूह कहते थे कि गाना फिल्‍म की कहानी और उसके किरदारों में बड़ी गहराई से धंसा होना चाहिए। इसलिए वो कभी गे गे गेली ज़रा टिम्‍बकटूतो कभी अंग्रेजी में कहते हैं कि आय लव यूजैसे गाने लिखते हुए देखे तो कभी हम हैं मता-ए-कूचओ बाज़ार की तरह भी लिखते दिखे

बहरहाल... गुलज़ार का पहला गीत सन 1963 में फिल्‍म
बंदिनीमें आया था—मोरा गोरा अंग लै ले




बीते 56 सालों में गीतकारी का पूरा व्‍याकरण ही बदल गया है पर फिर भी गुलज़ार के गानों के कुछ प्रयोगों की बानगी देखिए—

नीली नीली इक नदिया/ अंखियों के दो बजरे/
घाट से फिरी नदिया/ बिखर गये गजरे/
डूबे डूबे मितवा बीत मंझधारे/
भिड़े रे भिड़े नैना/ नैना बंजारे





अल्‍ला जाने मेरी छत पे
क्‍यों इतना कम सिग्‍नल है
पैदल है या ऊँट पे निकला
या माइकल की साइकिल है
आज दिल दौड़े सौ मीटर
कहके हैलो हैलो हैलो


  


फसलें जो काटीं उगती नहीं हैं
बेटियां जो ब्‍याही जायें मुडती नहीं हैं
ऐसी बिदाई हो तो
, लंबी जुदाई हो तो
दहलीज़ दर्द की पार करा दे





निद्रा में किसने याद कियो रे
जगाए सारी रैना रे
पिया जगावै
, जिया जगावै, दिया जगावै रे
आवै रे हिचकी

संदेसा आयो ना
, चिठिया भी जाई
सावण में सूखे नैना रे
तलैया सूखी
, कीकर सूखा, भीतर सूखा रे
आवै रे हिचकी...






चलिए गुलज़ार के आपके पसंदीदा गानों और उनके तत्‍वों की बात करें। और जिन लोगों को गुलज़ार पसंद नहीं—वो भी अपनी बात कहें।



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Sunday, January 27, 2008

'जब वी मेट' के निर्देशक इम्तियाज़ अली के लिए गुलज़ार का गीत--फिर से आईयो बदरा बिदेसी

विविध भारती के लिए इस शुक्रवार को jab we met के निर्देशक इम्तियाज़ अली से बातचीत करने का मौक़ा मिला । इस इंटरव्‍यू के दौरान मैंने इम्तियाज़ से ऑन-रिकॉर्ड और ऑफ़-रिकॉर्ड बहुत सारी बातें कीं । उनकी जिंदगी और उनकी पसंद के बारे में जाना । आज रेडियोवाणी पर इम्तियाज़ की पसंद का गीत लगाया जा रहा है । और वो भी कुछ दिलचस्‍प बातों के साथ । 

किसी भी कामयाब आदमी की मुंबई आने और स्‍ट्रगल करने की कहानी सुनने में बड़ा मज़ा आता है  । हम रेडियो वाले अपने श्रोताओं को जानी-मानी हस्तियों की जिंदगी में झांकने का मौक़ा देते हैं । ये कई मायनों में प्रेरक भी होता है और मनोरंजक भी । इम्तियाज़ अली की फिल्‍म 'जब वी मेट'  साल 2007 की कामयाब इम्तियाज़ अली विविध भारती में और सराही गयी फिल्‍मों में से एक रही है । दिलचस्‍प बात ये है कि इसे बहुत ज़बर्दस्‍त 'रिस्‍क' लेकर रिलीज़ किया गया था । जहां तक मुझे याद आता है कि इसे अपनी असर कायम करने के लिए तकरीबन दो-तीन हफ्तों का ही वक्‍त मिला था । इसके बाद 'ओम शां‍ति ओम' और 'सांवरिया' रिलीज़ हो गयी थीं । लेकिन तूफानी प्रचार वाली इन 'बड़ी' फिल्‍मों के आने के बहुत दिनों बाद भी jab we met ने सिनेमाघरों में डटी रही और ये एक बड़ी कामयाबी मानी गयी । इसकी वजह थी कहानी कहने का नया और ताज़ा अंदाज़ और कहानी की मज़बूती ।

बहरहाल यहां मैं इस फिल्‍म पर नहीं 'फिल्‍मवाले' पर बात कर रहा हूं । इम्तियाज़ के बारे में लोग ज्‍यादा नहीं जानते । वे मूलरूप से जमशेदपुर झारखंड के रहने वाले हैं । उनके ख़ानदान के कुछ लोगों की तीन टॉकीज़ें है जमशेदपुर शहर में । जहां उन्‍होंने बचपन में खूब फिल्‍में देख रखी हैं । उन्‍होंने स्‍कूल के ज़माने से ही रंगमंच शुरू किया और दिल्‍ली में हिंदू कॉलेज में गए तो वहां अपने ग्रुप 'इब्तिदा' का गठन किया । वैसे वो पियूष मिश्रा वाले थियेटर ग्रुप 'एक्‍ट वन' के भी सदस्‍य रहे । दिल्‍ली के बाद फिल्‍मों में कुछ करने की तमन्‍ना उन्‍हें ले आई मुंबई । यहां पहले तो ज़ी टी वी में प्रोडक्‍शन अस्सिटेन्‍टी की और फिर बड़ी तेज़ी के साथ इम्तियाज़ ने तरक्‍की करनी शुरू की । उनकी पहली फिल्‍म थी 'सोचा ना था' । जिसने तारीफ़ खूब बटोरी थी ।  अब अगर इम्तियाज़ के बारे में सारी बातें यहां बता दूंगा तो  इंटरव्‍यू कौन सुनेगा भाई । इसलिए विविध भारती पर इम्तियाज़ अली से पूरी और लंबी बातचीत आपको ज़रूर सुननी है । इस कार्यक्रम के प्रसारण की ख़बर आपको रेडियोनामा के ज़रिए दे दी जाएगी ।

मुझे इम्तियाज़ की सहजता और सरलता बड़ी अच्‍छी लगी । इम्तियाज़ अपनी फिल्‍में निर्देशित ही नहीं करते बल्कि खुद ही लिखते हैं । उनका कहना था कि वो एक छोटे-शहर के लड़के हैं । मध्‍यवर्गीय जज्‍़बात उनकी पूंजी हैं । उन्‍होंने कहा कि जिस तरह सिग्‍नल रेडियो सेट तक पहुंच जाते हैं उसी तरह कहानी भी अपने लेखक को खोज लेती है । फिर आप बस एक माध्‍यम होते हैं । कहानी अपनी शक्‍ल तय करती चली जाती है । उन्‍होंने जब वी मेट के निर्माण से जुड़े कई दिलचस्‍प किस्‍से भी सुनाए जो आपको इस कार्यक्रम में ही सुनने मिलेंगे । लेकिन ऑफ रिकॉर्ड और ऑन रिकॉर्ड हम फिल्‍मी गीतों पर पहुंच गये और पता चला कि इम्तियाज़ को गुलज़ार के कुछ गीत बड़े पसंद हैं ।

दरअसल इस बातचीत का सिरा तब शुरू हुआ, जब फौजी भाईयों के लिए 'जयमाला' कार्यक्रम प्रस्‍तुत करते हुए इम्तियाज़ ने 'नमकीन' फिल्‍म का वो गीत सुनवाना चाहा--'राह पे चलते हैं'  । और मैंने कहा कि बहुत दिनों बाद मुझे इस गाने की याद आई है । फिर तो कुछ और गानों की बातचीत चल पड़ी । उन्‍होंने 'फिर से आईयो बदरा बिदेसी' को याद किया । ये भी नमकीन फिल्‍म का ही गीत है । इसी तरह देवता के उस गाने के बारे में भी बात हुई--जिसके बोल हैं 'ये साए हैं ये दुनिया है परछाईयों की' । फिर जीवा का वो गीत जो थोड़े दिन पहले मैंने रेडियोवाणी पर सुनवाया था, रोज़ रोज़ आंखों तले । इम्तियाज़ ने कहा कि वो गीत भी उनको पसंद है---सीली हवा छू गयी, गीला बदन जल गया । इस बातचीत के दौरान इम्तियाज़ ने कहा कि हमारी पसंद काफी मिलती जुलती है । ये ऐसे गाने हैं जो बहुत कम सुनाई देते हैं ।

तो चलिए रेडियोवाणी पर आज इम्तियाज़ के बहाने आप सबको सुनवाया जाए गुलज़ार का नमकीन फिल्‍म का गीत । इसे हम गायिक आशा भोसले को भी समर्पित कर रहे हैं । उन्‍हें इस वर्ष का पद्म विभूषण दिया गया है । पच्‍चीस जनवरी की शाम इस घोषणा के फौरन बाद बैंगलोर से भाई शिरीष कोयल का संदेश आया । इस संदेश में आशा जी पर कोई पोस्‍ट लिखने का आग्रह छिपा था । आशा जी के कुछ और गीत आगे चलकर सुनवाए जाएंगे ।

ये बड़ा ही नाज़ुक गीत है । आशा जी ने इसे बड़े लाड़ से गाया है । अदाकारी और इमोशन का मधुर संयोग है ये गीत ।

ये गीत गुलज़ार की कॉमेन्‍ट्री के साथ है । ताकि सुनने में ज्‍यादा मज़ा आए ।

गुलज़ार यहां कहते हैं ।

गीत बूढ़े नहीं होते उनके चेहरे पर झुर्रियां नहीं गिरतीं । वो पलते रहते हैं चलते रहते हैं । सुनने वालों की उम्र बदल जाती है तो कहते हैं । हां वो उस पहाड़ का टीला जब बादलों से ढंक जाता था तो एक आवाज़ सुनाई देती थी.........

 

फिर से आईयो, बदरा बिदेसी । तेरे पंखों में पे मोती जड़ूंगी ।

भरके जाईयो हमारी तलैंया, मैं तलैया के नारे मिलूंगी ।

तुझे मेरे काले कमली वाले की सौं ।

तेरे जाने की रूत मैं जानती हूं, मुड़के आने की रीत है कि नहीं ।

हो काले दरग़ाह से पूछूंगी जाके तेरे मन में प्रीत है कि नहीं ।

कच्‍ची पुलिया से होके बजरिया, कच्‍ची पुलिया के नारे मिलूंगी ।

फिर से आईयो बदरा बिदेसी ।।

तू जो रूक जाए, मेरी अटरिया, मैं अटरिया पे झालर लगा दूं ।

डालूं चार ताबीज़ गले में अपने काजल से बिंदिया लगा दूं ।

छूके जाईयो, हमारी बगीची, मैं पीपल के आंडे मिलूंगी ।

फिर से आईयो बदरा बिदेसी ।।

इस बातचीत ने कुछ और गानों की यादें ताज़ा की हैं । जो समय समय पर आपको सुनवाए जाएंगे । फिलहाल तो ये बताईये कि ये गीत आपको कैसा लगा । और कितने दिनों बाद सुनने मिला आपको ये ।

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