'जब वी मेट' के निर्देशक इम्तियाज़ अली के लिए गुलज़ार का गीत--फिर से आईयो बदरा बिदेसी
विविध भारती के लिए इस शुक्रवार को jab we met के निर्देशक इम्तियाज़ अली से बातचीत करने का मौक़ा मिला । इस इंटरव्यू के दौरान मैंने इम्तियाज़ से ऑन-रिकॉर्ड और ऑफ़-रिकॉर्ड बहुत सारी बातें कीं । उनकी जिंदगी और उनकी पसंद के बारे में जाना । आज रेडियोवाणी पर इम्तियाज़ की पसंद का गीत लगाया जा रहा है । और वो भी कुछ दिलचस्प बातों के साथ ।
किसी भी कामयाब आदमी की मुंबई आने और स्ट्रगल करने की कहानी सुनने में बड़ा मज़ा आता है । हम रेडियो वाले अपने श्रोताओं को जानी-मानी हस्तियों की जिंदगी में झांकने का मौक़ा देते हैं । ये कई मायनों में प्रेरक भी होता है और मनोरंजक भी । इम्तियाज़ अली की फिल्म 'जब वी मेट' साल 2007 की कामयाब और सराही गयी फिल्मों में से एक रही है । दिलचस्प बात ये है कि इसे बहुत ज़बर्दस्त 'रिस्क' लेकर रिलीज़ किया गया था । जहां तक मुझे याद आता है कि इसे अपनी असर कायम करने के लिए तकरीबन दो-तीन हफ्तों का ही वक्त मिला था । इसके बाद 'ओम शांति ओम' और 'सांवरिया' रिलीज़ हो गयी थीं । लेकिन तूफानी प्रचार वाली इन 'बड़ी' फिल्मों के आने के बहुत दिनों बाद भी jab we met ने सिनेमाघरों में डटी रही और ये एक बड़ी कामयाबी मानी गयी । इसकी वजह थी कहानी कहने का नया और ताज़ा अंदाज़ और कहानी की मज़बूती ।
बहरहाल यहां मैं इस फिल्म पर नहीं 'फिल्मवाले' पर बात कर रहा हूं । इम्तियाज़ के बारे में लोग ज्यादा नहीं जानते । वे मूलरूप से जमशेदपुर झारखंड के रहने वाले हैं । उनके ख़ानदान के कुछ लोगों की तीन टॉकीज़ें है जमशेदपुर शहर में । जहां उन्होंने बचपन में खूब फिल्में देख रखी हैं । उन्होंने स्कूल के ज़माने से ही रंगमंच शुरू किया और दिल्ली में हिंदू कॉलेज में गए तो वहां अपने ग्रुप 'इब्तिदा' का गठन किया । वैसे वो पियूष मिश्रा वाले थियेटर ग्रुप 'एक्ट वन' के भी सदस्य रहे । दिल्ली के बाद फिल्मों में कुछ करने की तमन्ना उन्हें ले आई मुंबई । यहां पहले तो ज़ी टी वी में प्रोडक्शन अस्सिटेन्टी की और फिर बड़ी तेज़ी के साथ इम्तियाज़ ने तरक्की करनी शुरू की । उनकी पहली फिल्म थी 'सोचा ना था' । जिसने तारीफ़ खूब बटोरी थी । अब अगर इम्तियाज़ के बारे में सारी बातें यहां बता दूंगा तो इंटरव्यू कौन सुनेगा भाई । इसलिए विविध भारती पर इम्तियाज़ अली से पूरी और लंबी बातचीत आपको ज़रूर सुननी है । इस कार्यक्रम के प्रसारण की ख़बर आपको रेडियोनामा के ज़रिए दे दी जाएगी ।
मुझे इम्तियाज़ की सहजता और सरलता बड़ी अच्छी लगी । इम्तियाज़ अपनी फिल्में निर्देशित ही नहीं करते बल्कि खुद ही लिखते हैं । उनका कहना था कि वो एक छोटे-शहर के लड़के हैं । मध्यवर्गीय जज़्बात उनकी पूंजी हैं । उन्होंने कहा कि जिस तरह सिग्नल रेडियो सेट तक पहुंच जाते हैं उसी तरह कहानी भी अपने लेखक को खोज लेती है । फिर आप बस एक माध्यम होते हैं । कहानी अपनी शक्ल तय करती चली जाती है । उन्होंने जब वी मेट के निर्माण से जुड़े कई दिलचस्प किस्से भी सुनाए जो आपको इस कार्यक्रम में ही सुनने मिलेंगे । लेकिन ऑफ रिकॉर्ड और ऑन रिकॉर्ड हम फिल्मी गीतों पर पहुंच गये और पता चला कि इम्तियाज़ को गुलज़ार के कुछ गीत बड़े पसंद हैं ।
दरअसल इस बातचीत का सिरा तब शुरू हुआ, जब फौजी भाईयों के लिए 'जयमाला' कार्यक्रम प्रस्तुत करते हुए इम्तियाज़ ने 'नमकीन' फिल्म का वो गीत सुनवाना चाहा--'राह पे चलते हैं' । और मैंने कहा कि बहुत दिनों बाद मुझे इस गाने की याद आई है । फिर तो कुछ और गानों की बातचीत चल पड़ी । उन्होंने 'फिर से आईयो बदरा बिदेसी' को याद किया । ये भी नमकीन फिल्म का ही गीत है । इसी तरह देवता के उस गाने के बारे में भी बात हुई--जिसके बोल हैं 'ये साए हैं ये दुनिया है परछाईयों की' । फिर जीवा का वो गीत जो थोड़े दिन पहले मैंने रेडियोवाणी पर सुनवाया था, रोज़ रोज़ आंखों तले । इम्तियाज़ ने कहा कि वो गीत भी उनको पसंद है---सीली हवा छू गयी, गीला बदन जल गया । इस बातचीत के दौरान इम्तियाज़ ने कहा कि हमारी पसंद काफी मिलती जुलती है । ये ऐसे गाने हैं जो बहुत कम सुनाई देते हैं ।
तो चलिए रेडियोवाणी पर आज इम्तियाज़ के बहाने आप सबको सुनवाया जाए गुलज़ार का नमकीन फिल्म का गीत । इसे हम गायिक आशा भोसले को भी समर्पित कर रहे हैं । उन्हें इस वर्ष का पद्म विभूषण दिया गया है । पच्चीस जनवरी की शाम इस घोषणा के फौरन बाद बैंगलोर से भाई शिरीष कोयल का संदेश आया । इस संदेश में आशा जी पर कोई पोस्ट लिखने का आग्रह छिपा था । आशा जी के कुछ और गीत आगे चलकर सुनवाए जाएंगे ।
ये बड़ा ही नाज़ुक गीत है । आशा जी ने इसे बड़े लाड़ से गाया है । अदाकारी और इमोशन का मधुर संयोग है ये गीत ।
ये गीत गुलज़ार की कॉमेन्ट्री के साथ है । ताकि सुनने में ज्यादा मज़ा आए ।
गुलज़ार यहां कहते हैं ।
गीत बूढ़े नहीं होते उनके चेहरे पर झुर्रियां नहीं गिरतीं । वो पलते रहते हैं चलते रहते हैं । सुनने वालों की उम्र बदल जाती है तो कहते हैं । हां वो उस पहाड़ का टीला जब बादलों से ढंक जाता था तो एक आवाज़ सुनाई देती थी.........
