संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Tuesday, July 19, 2022

आज बिछड़े हैं...भूपी की याद में: यूनुस ख़ान

 




कुछ आवाज़ें हमारी उदासियों की आवाज़ें होती हैं। यक़ीन मानिए जिस तरह ज़िंदगी में हम मुस्‍कानें सहेजते हैं
, उसी तरह सहेज कर रखना होता है उन आवाज़ों को जो गहरी उदासियों में हमें सहलाती हैं। जब हम डूब रहे होते हैं—ये आवाज़ें हमें थाम लेती हैं। ज़िंदगी की दुश्वारियों को सहने का हौसला देती हैं और हम पथरीली राहों पर ठोकरें खाकर आगे बढ़ जाते हैं। भूपिंदर सिंह इसी तरह की आवाज़ हैं।

मैंने
हैंइसलिए कहा क्‍योंकि जब उनके शरीर छोड़ने की ख़बर कल रात आयी, तो पल भर के लिए सन्‍न रह गया। पर सच यही है कि शरीर चले जाते हैं, आत्‍मा कायम रहती है। शरीर चले जाते हैं, आवाज़ें कायम रहती हैं। संगीत की दुनिया के मुसाफिर हम सब यही मानते हैं कि जगजीत भी हमारे क़रीब हैं, एक पुकार पर हाजिर हो जाते हैं हमारे पास और कह उठते हैं—आंखों में नमी, हँसी लबों पर, क्‍या हाल है, क्‍या दिखा रहे हो....जब पुकारें तो मेहदी हाजिर हो जाते हैं—देख तो दिल कि जां से उठता है, ये धुआं कहां से उठता है। आइंस्‍टीन ने संसार को बताया था कि ध्‍वनियां कहीं नहीं जातीं। संसार में सदा कायम रहती हैं।

भूपी हमारी उजली-केसरिया सुबहों और सुरमई-उदास शामों की एक ज़रूरी आवाज़ रहे हैं। सुबहों के माथे पर उनकी आवाज़ चमक बिखेर जाती है जब वो गाते हैं—
ना मंदिर में ना मस्जिद में ना कासी-कैलास में ,मोको कहां ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास रे। भूपिंदर सुरमई शामों में हमारे आसपास गूंजते रहे हैं—या गर्मियों की रात जो पुरवाईयां चले/ ठंडी सफ़ेद चादरों पे जागे देर तक/ तारों को देखते रहें/ छत पर पड़े हुए। भूपिंदर रातों को जुगनू की तरह चमकते हैं—जब उनकी आवाज़ गूंजती है—चौदहवीं रात के इस चाँद तले, सुरमई रात में साहिल के क़रीब, दूधिया जोड़े में आ जाए जो तू। भूपी आते हैं अपने आबो-ताब के साथ ये कहने—कोसा-कोसा लगता है.../ तेरा भरोसा लगता है..../ रात में अपनी थाली में/ चाँद परोसा लगता है। भूपी के गिटार की तरंगें भी जब तक गूंजती हैं। कभी दम मारो दमके इंट्रो का गिटार, कभी मेहबूबा मेहबूबातो कभी चुरा लिया है तुमनेवाला पीस, उनके ख़ज़ाने में यादों की बारातभी है और आने वाला पलभी।

भूपिंदर की आवाज़ में एक अजीब-सा वीतराग नज़र आता है। जैसे वो दुनिया में हैं तो पर वैसे जैसे पत्‍थर ऊपर पानी। जिस वक्‍़त वो आए कितना मुश्किल वक्‍़त था
, इतने सारे सूरज चमक रहे थे, रफ़ी, किशोर, मुकेश, मन्‍ना डे जैसे। उनके बीच एक नया-छोटा-सा तारा आकर पुकारता है—एक एक हर्फ़ जबीं पर उभर आया होगा या
रूत जवां-जवां, रात मेहरबां

भूपी उन लोगों की ख़ासी क़रीब आवाज़ रहे हैं जिन्‍होंने संसार के तयशुदा नियमों को तोड़ा
, जिन्‍होंने लीक पर चलना कभी गवारा नहीं किया। भूपी गिटार की तरंगें लेकर ग़ज़लों की दुनिया में आए। भूपी का अपनी आवाज़ को जब मर्ज़ी खींचना, जब मर्ज़ी अल्फ़ाज़ को हवा में टाँग देना, फिर उठाना और आगे चल देना....पहले हैरान करता था, फिर लुभाने लगा, और अब उसकी आदत पड़ गयी है। शायद इसीलिए वो तमाम एक्सपेरीमेंटललोगों से जुड़े। फिर चाहे गुलज़ार हों, पंचम हों या मदनमोहन और जयदेव। उनकी प्रयोगधर्मिता का बड़े पैमाने पर आकलन किया जाना शायद अभी बाक़ी है।

इन सबके बावजूद भूपी शास्‍त्रीयता की राह के पक्‍के मुसाफ़िर भी हैं।
बीती ना बिताई रैना’, ‘मीठे बोल बोले पायलिया’, ‘आई ऋतु सावन की’, ‘सैंयां बिना घर सूनाजैसे गानों में भूपी कठिन डगर पर कितनी सहजता से क़दम रखते बढ़ निकलते हैं।

भूपी इस बेरहम दुनिया में हताशा की आवाज़ भी रहे हैं।
तेरे जहान में ऐसा नहीं कि प्‍यार न हो/ जहां उम्‍मीद हो इसकी वहां नहीं मिलता। वो गाते हैं—अहले दिल यूं भी निभा लेते हैं/ दर्द सीने में छिपा लेते हैं। भूपिंदर आंखों को छलका देते हैं जब उनकी आवाज़ में गूंजता है सारांश का गाना—अंधियारा गहराया, सूनापन घिर आया/ घबराया मन मेरा/ चरणों में आया/ क्‍यों हो तुम यूं गुमसुम/ किरणों को आने दे/ पत्‍थर की आंखों से करूणा को झरने दो। भूपी घनघोर रात में हमारी धुंआ-धुंआ आंखों को देख हमारा हाथ पकड़कर कहते हैं—चाँद की बिंदी वाली, बिंदी वाली रतियां/ जागी हुई अंखियों में रात ना आई रैना

ज़िंदगी में मुड़कर देखने के कई मौक़े आते हैं। हम सोचते हैं काश ऐसा नहीं होता
, कुछ वैसा होता। हम बदल देते समय के प्रवाह को। भूपी की आवाज़ गूंजती है—जब कभी मुड़कर देखता हूं मैं/ तुम भी कुछ अजनबी सी लगती हो/ मैं भी कुछ अजनबी सा लगता हूं। भूपी तरह तरह से हमारे जीवन में दाखिल होते हैं—ज़िंदगी सिगरेट का धुंआ/ ये धुंआ जाता है कहां/ या कहीं जाता नहीं। भूपी ज़िंदगी के लिए एक तमन्‍ना करते हैं—ज़िंदगी फूलों की नहीं/ फूलों की तरह महकी रहे

बारिश का ये मौसम भूपी का ख़ास मौसम है। अचानक दिल धक से रह जाता है कि हमारी इस सबसे प्रिय आवाज़ वाला शख्‍़स इन बारिशों में ही हमसे रूठ गया। भूपी की गाढ़ी आवाज़ में गूंजती है ये लाइन—
बैरन बिजुरी चमकन लागी, बदरी ताना मारे रे/ ऐसे में कोई जाए पिया....तू रूठो क्‍यों जाए रे/ आई ऋतु सावन की
चाँद परोसा हैसे गुलज़ार साहब के बोल गूंजते हैं—याद है बारिशों के दिन पंचम’….और आखिरी लाइन आती है—मैं अकेला हूं धुंध में पंचम। नहीं सुना हो तो ये कंपोज़ीशन सुनकर ख़ुद को घुला दीजिए बारिशों में। भूपी हर बारिश में जैसे आग लगा जाते हैं दिल में.....बरसता भीगता मौसम धुआं-धुआं होगा, पिघलती शम्‍मों पे दिल का मेरे गुमां होगा, हथेलियां की हिना याद कुछ दिलायेगी। अलफ़ाज़ अलफ़ाज़ ही रहते हैं, भूपी जी की आवाज़ मिलती तो वो चमकते तारे बन जाते हैं। भूपी सावन के इस मौसम में गाते हैं—बिरहा जिया तड़पाये/ दूरी सही ना जाए सजनिया आन मिलो

भूपी बहुत गहन उदासियों से बहुत गहन प्रेम की तरफ़ बहता झरना हैं।
पिया तुझ आशना हूं मैं तू बेगाना ना कर। यही भूपी गाते हैं—बादलों से काट-काटके/ काग़़ज़ों पे नाम जोड़ना/ ये मुझे क्‍या हो गया। हमारे भूपी गुलज़ार साहब को जब-जब गाते हैं तो यूं लगता है दुनिया वाक़ई रहने लायक़ है। मुझको भी तरकीब सिखा दे यार/ मेरे यार जुलाहेयारपर उनकी वो तान। उफ़.....। एक ही ख़्वाब कई बार देखा है मैंनेको सुनते हुए गीतों की राह पर आगे चलें तो बारिश से भीगी रात में भूपी हौले से हमसे कहते हैं—रात में घोलें चाँद की मिसरी/ दिन के ग़म नमकीं लगते हैं/ नमकीन आंखों की नशीली बोलियां

भूपी वसंत देव को भी गाते हैं
, कैफ़ी को भी, गुलज़ार को भी और नक्‍श को भी। भूपी सबको अपनी तरह से गाते हुए बारिश भरी जुलाई की अठारह तारीख़ को हमसे कह जाते हैं—
आज बिछड़े हैं कल का डर भी नहीं/ ज़िंदगी इतनी मुख्‍़तसर भी नहीं। हम उसांस भर कर रह जाते हैं। भूपी जी उदासियां अगर मज़हब हों तो आप उस मज़हब के औलिया होंगे। रहेंगे आप—सदा।  


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Thursday, November 8, 2007

कभी किसी को मुकम्‍मल जहां नहीं मिलता-फिर फिर भूपिंदर



ये ठीक है कि इस वक्‍त आप पर दीपावली की तैयारियों का खुमार चढ़ा होगा लेकिन हम क्‍या करें । भई हमारे ऊपर तो पिछले कई दिनों से भूपेंद्र का हैंगओवर है । ये ऐसा हैंग हो गया है कि ओवर हो ही नहीं रहा है । और सच कहें तो हम चाहते भी नहीं कि ये हैंग.......ओवर हो जाए । क्‍योंकि भूपिंदर की आवाज़ हमें अकेलेपन की साथी लगती है । ब्‍ल्‍यू मूड की इससे बेहतर और मुकम्‍मल आवाज़ शायद दूसरी मिलनी मुश्किल है ।

मुकम्‍मल....इसी शब्‍द का हाथ पकड़कर हम आज आपको निदा फ़ाज़ली की एक ग़ज़ल सुनवा रहे हैं । इस ग़ज़ल का मिसरा एक मुहावरे की तरह इस्‍तेमाल किया जाता है । इंजीनियरिंग एन्‍ट्रेन्‍स में कामयाबी नहीं मिली, सिर झटक कर हम इस मिसरे को कहते हुए खुद को भुलाने की कोशिश करते हैं । जब जब जो चाहा वो नहीं मिला तो ये ग़ज़ल बहुत साथ देती है । ये सच है कि फेस्टिवल सीज़न में इस ग़ज़ल को सुनवाना थोड़ा सा मिसटाईम होगा, लेकिन दिल है कि मानता नहीं ।
आईये शोर भरे इस मौसम में अपने मन के भीतर की ख़ामोश दुनिया से मुलाक़ात करें । और पढ़ें सुनें ये ग़ज़ल ।


कभी किसी को मुकम्‍मल जहां नहीं मिलता
कभी ज़मीं तो कभी आसमां नहीं मिलता ।।
जिसे भी देखिए वो अपने आप में गुम है
ज़बां मिली है मगर हमज़बां न‍हीं मिलता ।।
बुझा सका है भला कौन वक्‍त के शोले
ये ऐसी आग है जिसमें धुंआ नहीं मिलता ।।
तेरे जहान में ऐसा नहीं कि प्‍यार न हो
जहां उम्‍मीद हो इसकी वहां नहीं मिलता ।।

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कल भूपिंदर वाला सिलसिला नहीं होगा । बल्कि कल हम आपको दो ख़ास चीज़ें सुनवायेंगे । इंतज़ार कीजिए ।
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Monday, November 5, 2007

नज़्म उलझी हुई है सीने में--सिलसिला गुलज़ार और भूपेंद्र के साथ का


गुलज़ार और भूपिंदर सिंह की रचनाओं के इस सिलसिले में आज फिर एक मुख्‍तसर सी नज़्म ।
दिलचस्‍प बात ये है कि गुलज़ार की मुख्‍तसर सी रचनाएं भी अपने आप में मुकम्‍मल हैं, संपूर्ण और गहरी हैं ।


इस रचना का शैदाई हूं मैं । बहुत बरस पहले राजेंद्र यादव ने 'राईटर्स- ब्‍लॉक' की बात की थी । ' ना लिखने का कारण' पर हुई बहस काफी लंबी चली गयी थी । हर लेखक की जिंदगी में एक ब्‍लॉक आता है । रूकावट आती है । जब सब कुछ रूक सा जाता है । जब चीज़ें जैसे सीने में अटक-सी जाती हैं बाहर आती ही नहीं । उसी हालत को कितना रूमानी मोड़ दिया है गुलज़ार ने पढि़ये और सुनिए इस नज़्म में ।

इसमें कई जगहों पर भूपिंदर की ख़ालिस आवाज़ रखी है, पीछे कहीं कोई संगीत नहीं है । धुन को शास्‍त्रीय रूप दिया गया है और दूसरे अंतरे पर तबला अपने बेहतरीन चलन के साथ आता है । मुझे भूपिंदर की आवाज़ का एक अलग ही रंग लगता है इस रचना में । आपको क्‍या लगता है ।


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नज़्म उलझी है सीने में
मिसरे अटके हुए हैं होठों पर
उड़ते फिरते हैं तितलियों की तरह
लफ्ज़ काग़ज पे बैठते ही नहीं ।।

कब से बैठा हूं मैं जानम
सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा
बस तेरा नाम ही मुकम्‍मल है
इससे बेहतर भी नज़्म क्‍या होगी ।।

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ऊपर भूपिंदर की एक बहुत पुरानी तस्‍वीर

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Saturday, November 3, 2007

आदतन तुमने कर दिये वादे-फिर भूपिंदर, फिर गुलज़ार




रेडियोवाणी पर गुलज़ार और भूपिंदर की महफिल सजी है पिछले कुछ दिनों से ।

ये महफिल कोई पहले से योजना बनाकर नहीं सजाई गयी । बल्कि सजते सजते सज गयी । मिलते मिलते एक के बाद एक चीज़ें मिलती जा रही हैं । और हम पेश किये जा रहे हैं । एक शेर अर्ज़ है--चूंकि स्‍मृति के आधार पर पेश है इसलिए लफ्ज़ों का हेर-फेर मुमकिन है । अर्ज़ किया है कि--


ये जुनूं भी क्‍या जुनूं ये हाल भी क्‍या हाल है ।
सुनाए जा रहे हैं हम कोई सुनता हो या ना हो ।।

ख़ैर हमें यहां अंदाज़ा है कि कुछ सुधी श्रोता सुन और बुन रहे हैं ।
आज बहुत ही फ़लसफ़ाई और मुहब्‍बती नज़्म पेश है ।

इसकी ख़ासियत है इसका बहुत ही मुख्‍तसर या संक्षिप्‍त होना ।
लेकिन ऐसा सिर्फ अलफ़ाज़ यानी शब्‍दों के मामले में है । असर के मामले में ये बहुत ही गहरी है ।

ज्ञान जी 'मुन्‍नी पोस्‍टों' के इस फैशनेबल समय में हमने भी बहती गंगा में हाथ धोते हुए इस नज़्म को आपके शब्‍दों में कहें तो 'ठेल' दिया है ।

पता नहीं क्‍यूं मुझे ये हमेशा से पॉलिटिकल नज़्म लगती है । अजीब बात है पर ज़रा इसे वादाखिलाफ़ राजनेताओं और ऐतबार करने वाली जनता के संदर्भ में भी सुनिए । फिर देखिए कितनी पॉलिटिकल नज़्म है ।

पर रूकिये । इसे पॉलिटिकिल इंटरप्रिटेशन देने का मतलब ये नहीं कि आप इसके इश्किया मिज़ाज को नज़रअंदाज़ कर दकें । मुझे इस नज़्म की सबसे शानदार पंक्तियां ये लगती हैं --

तेरी राहों में बारहा रूककर
हमने अपना ही इंतज़ार किया ।।

जिन्‍हें जीवन में प्रेम करने का मौक़ा मिला है, वो इस शेर के मर्म को बहुत अच्‍छे से समझ सकते हैं । मुझे लगता है कि हम शायद अपने मेहबूब से प्‍यार नहीं करते । बल्कि खुद से ही करते हैं । इंसानी सेल्फि़शनेस है ये । हम अपने मेहबूब में अपना ही अक्‍स ढूंढते हैं । या फिर जाने अनजाने उसे अपने मुताबिक़ ढाल लेते हैं । यानी किसी और से प्‍यार करना बहुत व्‍यापक अर्थों में खुद से प्‍यार करना ही है । तभी आप ये कह पाते हैं कि तेरी राहों में बारहा रूककर । हमने अपना ही इंतज़ार किया ।

आप इस नज़्म को सुनिए और बुनिए ।
मैं ये चला ।

आदतन तुमने कर दिये वादे
आदतन हमने ऐतबार किया ।

तेरी राहों में बारहा रूककर
हम ने अपना ही इंतज़ार किया ।

अब ना मांगेंगे जिंदगी या रब
ये गुनाह हम ने एक बार किया ।

आदतन तुमने कर दिये वादे ।।


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चलते चलते कह दूं कि ये ऐतबार मत रखिएगा कि कल भी भूपिंदर ही सुनने को मिलेंगे ।
आदतन तुमने कर दिये वादे । आदतन हमने ऐतबार किया ।

वैसे मिल भी सकते हैं ।


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Friday, November 2, 2007

चौदहवीं रात के इस चांद तले--गुलज़ार की एक क्रांतिकारी नज़्म


फिर मुझे भूपेंद्र/भूपिंदर सिंह की आवाज़ का हैंगओवर हो गया है । बरसों पहले जब मध्‍यप्रदेश में एक छोटे-से रेडियो-स्‍टेशन पर युववाणी किया करता था तो भी यही हुआ था । वो कॉलेज के दिन थे । एक तो ग़ज़लों का शौक़ । दूसरे ताज़ा ताज़ा रेडियो शुरू किया था । उन दिनों जिस तरह का ज़ेहन था, ग़ज़लें दिल में गूंजती रहती थीं । बेवजह अच्‍छी लगती थीं । उन दिनों अपन मेहदी हसन की अनसुनी रचनाएं सुनने के लिए रेडियो पाकिस्‍तान ट्यून करते थे । उर्दू सर्विस सुनते ताकि उर्दू से अच्‍छा-सा परिचय हो जाये । बाक़ायदा उर्दू की तालीम विज्ञान की पढ़ाई की वजह से मिली नहीं ।

बहरहाल जगजीत-चित्रा के बाद भूपिंदर-मिताली की जोड़ी के कुछ अलबम उन दिनों दिल पर छाये रहे थे । फिर कुछ और गहराई में उतरे तो भूपिंदर के कुछ experimental एलबम मिल गये । उनमें से एक था वो एल‍बम जिसका एक क्रांतिकारी गीत मैं आपको सुनवा रहा हूं । जैसे ही ये गीत मुझे मिला है मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा । आप समझ नहीं सकते कि कितने अरसे से मैं इस गीत की तलाश में था ।

भूपिंदर की आवाज़ में भावुक रचनाएं बहुत प्‍यारी लगती हैं । उनकी आवाज़ की नरमी उनकी दौलत है । दूसरी ख़ासियत ये है कि जब ज़रूरत हो तो वो अपनी आवाज़ को बहुत ऊंचे सुरों तक ले जाने की काबलियत रखते हैं । आगे चलकर ऐसे कुछ गाने भी आपको सुनवाये जायेंगे । पर अभी ये गीत सुनिए । जिसे गुलज़ार ने लिखा है । संगीत खुद भूपिंदर का है । इस प्रायोगिक अलबम में कई पश्चिमी-शैलियों को अपनाया गया था ।

ज़रा एक शेर सुन लीजिए--
कहते हैं कि इश्‍क नाम के गुज़रे हैं एक बुज़ुर्ग
हम लोग भी फ़कीर उसी सिलसिले के हैं ।।

यहां 'इश्‍क' की जगह गुलज़ार का नाम रख दीजिए, फिर पढि़ये । जी हां हम भी गुलज़ार के शैदाईयों में से हैं । उनके लिखे को कोई भी गाये हम खोज-बीन करके जुटा लेते हैं । सुनते हैं और फिर अपनी बेबाक राय भी देते हैं । शैदाई हैं लेकिन उनकी ऐसी-वैसी रचना को खारिज करने में ज़रा भी चूक नहीं करते । तभी तो सच्‍चे शैदाई कहलाए ना । इस रचना के आगे गुलज़ार की सारी लेखनी को एक तरफ़ कर सकते हैं हम । जी हां । इसलिए, क्‍योंकि ये एक साहसी रचना है । हो सकता है कि लिखते वक्‍त गुलज़ार की कलम भी थरथराई होगी । लेकिन उनके भीतर का हिम्‍मती / हिमाकती शायर अड़ गया हो, कि जो लिख दिया सो लिख दिया । पहेली को उलझाना ठीक नहीं होगा, चलिए इस रचना के बोल पहले पढ़े जायें । ताकि आपके सामने बात साफ़ हो सके ।

चौदहवीं रात के इस चांद तले
सुरमई रात में साहिल के क़रीब *साहिल-किनारा
दूधिया जोड़े में जो आ जाये तू ।

सुरमई रात में साहिल के क़रीब
दूधिया जोड़े में जो आ जाये तू
ईसा के हाथों से गिर जाए सलीब
क़सम से, क़सम से ।

सुरमई रात में साहिल के क़रीब
दूधिया जोड़े में आ जाये जो तू
बुद्ध का ध्‍यान भी उखड़ जाए
क़सम से, क़सम से ।

सुरमई रात में साहिल के क़रीब
दूधिया जोड़े में आ जाये जो तू
तुझको बर्दाश्‍त ना कर पाए ख़ुदा
क़सम से, क़सम से ।

इस गाने में कुछ ऐसी पंक्तियां आपको मिल गयी होंगी जिन पर मज़हबी-मठाधीश हंगामा खड़ा कर सकते थे । लेकिन अच्‍छा हुआ कि ऐसा कुछ नहीं हो सका । उन्‍होंने इसे सुना ही नहीं होगा । गिटार के बेस पर इस नज्‍़म को पिरोया गया है । शानदार कंपोज़ीशन और उससे भी अच्‍छी और नशीली गायकी । सुनिए--
इस नज़्म से पहले गुलज़ार की लंबी-सी कॉमेन्‍ट्री है । ज़रा इसे भी सुनिएगा ध्‍यान से । इसमें उन नज़्मों की बात गुलज़ार कह रहे हैं जो इस अलबम का हिस्‍सा हैं--जैसे- आदतन तुमने कर दिये वादे, वो जो शायर था, बस एक चुप सी लगी है वग़ैरह । फिर ये नज्म आती है ।


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बताईये कि भूपिंदर की इस महफिल का सिलसिला कैसा लग रहा है । क्‍या इसे जारी रखना चाहिए ।

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Thursday, November 1, 2007

एक ही ख्‍वाब कई बार देखा है मैंने- भूपेंद्र, गुलज़ार और आर.डी.बर्मन


रेडियोनामा पर आजकल भूपेंदर सिंग की तरंग चढ़ी हुई है । सर्दीली आवाज़ वाले भूपेंद्र मुझे हमेशा से पसंद रहे हैं । उनकी कुछ ग़ज़लें भी कमाल की हैं । लेकिन हम इस श्रृंखला को नियमित रख सके तो केवल फिल्‍मी गीतों की ही बात करेंगे । हां उनका एक ग़ैरफिल्‍मी गीत है जो मिला तो मैं ज़रूर सुनवाना चाहूंगा । बोल हैं--चौदहवीं रात के इस चांद तले, दूधिया
जोड़े में जो आ जाए तू, बुद्ध का ध्‍यान भी भटक जाए । इसे गुलज़ार ने लिखा है ।

बहरहाल, मैंने पहले ही सोच रखा था कि इस श्रृंखला का दूसरा गीत 'किनारा' का होगा । और कुछ पाठकों ने भी इसकी फ़रमाईश कर डाली है । तो चलिए आज एक और मासूम और नाज़ुक गीत से रूबरू हो जाएं ।

फिल्‍म 'किनारा' 1977 में आई थी । गुलज़ार इसके निर्देशक थे । धर्मेंद्र, जीतेंद्र और हेमामालिनी प्रमुख कलाकार थे । हिंदी सिनेमा की बहुत समझदार फिल्‍मों में इसकी गिनती होती है । इस फिल्‍म में संगीत राहुलदेव बर्मन का था ।

दिलचस्‍प बात ये है कि गुलज़ार और राहुलदेव बर्मन में एक रचनात्‍मक भिड़ंत सदा-सर्वदा चलती रही । उसका कारण था गुलज़ार की लेखनी । पंचम यानी राहुलदेव बर्मन गुलज़ार से कहते थे कि कल को आप एक अख़बार ले आयेंगे और कहेंगे ऐसा करो इस वाली ख़बर को कंपोज़ कर दो । दरअसल गुलज़ार की बीहड़ लेखनी को सुरों में पिरोना वाक़ई जिगर वाले संगीतकारों के ही बस की बात है । और ये गाना भी इसी की मिसाल है ।

फिल्‍म-संसार के बेहद नाज़ुक और बेहद रूमानी गीतों में इस गाने का शुमार होता है ।
आप इसे सुनकर खुद ही ज़ेहन में गुलाबी-गुलाबी सा महसूस करेंगे । इसके संगीत में गिटार का अद्भुत प्रयोग है । यहां आपको ये बता देना ज़रूरी है कि भूपिंदर बरसों बरस गिटार प्‍लेयर के तौर पर काम करते रहे हैं । उन्‍होंने कई मशहूर गीतों में शानदार गिटार बजाया है । जैसे 'हरे रामा हरे कृष्‍णा' का गीत 'दम मारो दम' का आरंभ सुनिए । ये रहा केवल आरंभ ।



इसी तरह 'ज्‍वेल थीफ़' के गीत 'होठों में ऐसी बात' में भी उन्‍होंने गिटार बजाया है । साथ में 'हो शालू' वाली पुकार भी भूपेंद्र की ही है । नाज़ुकी और रूमानियत भूपेंद्र की खासियत है ।
इसलिए उन्‍हें कई ऐसे गीत मिले हैं, जिनमें अकेलापन है, या फिर शिद्दत से प्‍यार करने का जज्‍़बा है । या फिर जिंदगी के ग़मों का नीला समंदर है । इस तरह के कई और गाने रेडियोवाणी पर आपको सुनने मिलेंगे । पर फिलहाल सुनिए, पढि़ये और देखिए--ये गीत

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एक ही ख्‍वाब कई बार देखा है मैंने
तूने साड़ी में उड़स ली हैं मेरी चाभियां घर की
और चली आई है बस यूं ही मेरा हाथ पकड़ कर
एक ही ख्‍वाब कई बार देखा है मैंने ।

मेज़ पर फूल सजाते हुए देखा है कई बार
और बिस्‍तर से कई बार जगाया है तुझको
चलते-फिरते तेरे क़दमों की वो आहट भी सुनी है
एक ही ख्‍वाब कई बार देखा है मैंने ।

क्‍यों । चिट्ठी है या कविता ।
अभी तक तो कविता है । ( सुलक्षणा पंडित का नाज़ुक आलाप )

गुनगुनाती हुई निकली है नहाके जब भी
और, अपने भीगे हुए बालों से टपकता पानी
मेरे चेहरे पे छिटक देती है तू टीकू की बच्‍ची
एक ही ख्‍वाब कई बार देखा है मैंने ।

ताश के पत्‍तों पे लड़ती है कभी-कभी खेल में मुझसे
और लड़ती है ऐसे कि बस खेल रही है मुझसे
और आग़ोश में नन्‍हे को लिए
will you shut up?

और जानती है टीकू, जब तुम्‍हारा ये ख्‍वाब देखा था ।
अपने बिस्‍तर पे मैं उस वक्‍त पड़ा जाग रहा था ।।



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Tuesday, October 30, 2007

आज बिछड़े हैं तो कल का डर भी नहीं--सर्दीली आवाज़ वाले भूपेंद्र की आवाज़


सन 1980 में एक फिल्‍म आई थी 'थोड़ी सी बेवफाई' । इस्‍माईल श्रॉफ ने इसे बनाया था । अपने गानों के लिए ये फिल्‍म हमेशा याद की जाएगी । गुलज़ार ने इस फिल्‍म के गीत लिखे थे । आज मैं आपको इस फिल्‍म का सबसे कम सुना गया गाना सुनवा रहा हूं । भूपेंद्र ने इसे गाया था । इस गाने में एक विकलता है । एक दर्द है । एक हल्‍की-सी तल्‍ख़ी भी है । लेखनी के नज़रिए से देखा जाए तो बहुत अजीब-सा गीत है । शायद ख़ैयाम को इसे स्‍वरबद्ध करने में ख़ासी परेशानी हुई होगी ।
भूपेंद्र की आवाज़ के तो कहने ही क्‍या । उनकी सर्दीली, ज़ुकामी से आवाज़ मुझे बहुत पसंद है । आगे चलकर रेडियोवाणी पर आपको भूपेंद्र के गाये कुछ और गीत सुनवाए जायेंगे । पर फिलहाल इस गीत का मज़ा लीजिए और बताईये कि कैसा लगा ।


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आज बिछड़े हैं कल का डर भी नहीं
जिंदगी इतनी मुख्‍तसर भी नहीं ।।

ज़ख़्म दिखते नहीं अभी लेकिन

ठंड होगे तो दर्द निकलेगा
तैश उतरेगा वक्‍त का जब भी
चेहरा अंदर से ज़र्द निकलेगा
आज बिछड़े हैं ।।

कहने वालों का कुछ नहीं जाता
सहने वाले कमाल करते हैं
कौन ढूंढे जवाब दर्दों के
लोग तो बस सवाल करते हैं
आज बिछड़े हैं ।।




ज़रा इन पंक्तियों पर ध्‍यान दीजिएगा ख़ासतौर पर--
कहने वालों का कुछ नहीं जाता
सहने वाले कमाल करते हैं
कौन ढूंढे जवाब दर्दों के
लोग तो बस सवाल करते हैं ।




अकेली सूनी उजाड़ जिंदगी का गीत है ये । बीहड़ और खंडहर जिंदगी का गीत ।
क्‍या आपको नहीं लगता कि हम सबकी जिंदगी में ऐसे लम्‍हे ज़रूर आते हैं जब जिंदगी बीहड़-सी बन जाती है । नहीं भी आएं तो भी दुनिया में दर्द भरे गानों को पसंद करने वालों का कारवां बहुत बड़ा है । हम भी उसी में शामिल हैं ।


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