संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Friday, July 31, 2020

मोहम्‍मद रफी और मुंशी प्रेमचंद 'पिपरा के पतवा'



आज मोहम्‍मद रफी की याद का दिन है। और आज ही है प्रेमचंद का जन्‍मदिन।
हमने सोचा कि
रेडियोवाणी पर किसी ऐसे गाने की बात की जाए- जिसमें इन दोनों कलाकारों का संगम हुआ हो और ऐसे में गोदानकी याद आना सहज ही था। प्रेमचंद का उपन्‍यास गोदान सबसे पहले सन 1936 में मुंबई से ही प्रकाशित हुआ था। इसके प्रकाशक थे हिंदी ग्रंथ रत्‍नाकर। इस उपन्‍यास को आप ऑनलाइन यहां पढ़ सकते हैं।


                       


 प्रेमचंद और मुंबई का क्‍या यही एकमात्र कनेक्‍शन था। जी नहीं....यहां आपको दिलचस्‍प बात बतायी जाये कि मुंशी प्रेमचंद एक ज़माने में मुंबई आए थे। वो भी फिल्‍मों में अपना भाग्‍य आज़माने के लिए। पर उससे भी पहले उनका मुंबई कनेक्‍शन बन गया था। उनके उपन्‍यास
सेवा-सदनपर बाज़ार-ए-हुस्‍न नाम की फिल्‍म बनाने का क़रार हुआ था और इससे प्रेमचंद बड़े खुश थे। उन्‍होंने 14 फरवरी 1934 को जैनेंद्र कुमार को एक ख़त लिखा जिसमें लिखा--"सेवा सदन का फिल्म हो रहा है. इस पर मुझे साढ़े सात सौ मिले... साढ़े सात सौ."। पर दिक्‍कत ये हुई कि मुंबई की कंपनी महालक्ष्‍मी पिक्‍चर्स ने किताब के अधिकार ले लिये और नानूभाई वकील के निर्देशन में एक दोयम दर्जे की फिल्‍म परोस दी, जिससे प्रेमचंद खासे दुःखी हुए। इसके बाद जब प्रेमचंद की आर्थिक स्थिति ख़राब हुई हंसऔर जागरणको छापना तक मुश्‍किल होने लगा तो भगवतीचरण वर्मा के आग्रह पर प्रेमचंद मुंबई आए थे। और अजंता सिनेटोन में आठ हज़ार रूपए सालाना की नौकरी कर ली थी। 1935 में वो वापस भी लौट गए थे। इस बीच उनकी कहानी पर मोहन भवनानी ने मिल मज़दूरबनायी थी- इस फिल्‍म में प्रेमचंद ने एक रोल भी किया था। फिल्‍म मजदूरों के बीच इतनी हिट हुई कि अँग्रेज़ सरकार को इस पर प्रतिबंध लगाना पड़ गया था।

     
                       



आगे चलकर प्रेमचंद की कृतियों पर कई फिल्‍में बनीं—जिन पर हम बाद में कभी चर्चा करेंगे। सन 1963 में
गोदानपर त्रिलोक जेटली ने इसी नाम की फिल्‍म बनायी थी, जिसमें होरी बने थे राजकुमार, धनिया बनीं कामिनी कौशल और गोबर की भूमिका निभाई महमूद ने। यहां दिलचस्‍प बात ये है कि जब फिल्‍म के लिए गीत-संगीत की जिम्‍मेदारी देने की बारी आयी तो बड़ा ही अनूठा चयन किया गया। फिल्‍म के लिए संगीत का जिम्‍मा मैहर घराने के प्रसिद्ध सितार वादक पंडित रविशंकर को दिया गया और गीतकारी का जिम्‍मा सहज रूप से आया अंजान के नाम। अंजान चूंकि मूल रूप से बनारस के रहने वाले थे—वहां की बोली-बानी को भली-भांति जानते थे इसलिए यह एकदम सही चयन बन गया। कहते हैं कि पंडित रविशंकर ने इस फिल्‍म के संगीत के लिए खूब रिसर्च किया था। बनारस के आसपास के गांवों के लोक-संगीत को गहराई से जाना समझा और तब बना गोदानका संगीत- जो सही मायनों में अमर हो गया। पंडित रविशंकर ने इस फिल्‍म के संगीत में क्‍या कमाल किया था इसे समझने के लिए आपको गोदानका टाइटल म्‍यूजिक ज़रूर सुनना चाहिए। हम आपके लिए इसे खोजकर लाए हैं। ये रहा।





आज हम जिस गाने की बात करने जा रहे हैं- वो है—
पिपरा के पतवा सरीखे डोले मनवा। अद्भुत गीत है ये। गोबर यानी महमूद को होली पर शहर से गांव जाना है। वो अपने सेठ जी से छुट्टी मांगता है और जब छुट्टी मिल जाती है तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता। अब गोबर चल पड़ा है—कांधे पर लाठी—और साथ में एक पोटली। महमूद को हमेशा हास्‍य-भूमिकाओं में देखने की आदत के रहते उनकी ये भूमिका आपको झटका देती है। शहर में नौकरी करने आए गांव के एक युवक गोबर की भूमिका। प्रेमचंद का एक किरदार। मोहम्‍मद रफी गाने की पहली पंक्ति बिना संगीत के गाते हैं—ये एक पुकार है—एक ललक—खुशी, उत्‍साह अपने घर वापस जाने का--





पिपरा के पतवा सरीखे डोले मनवा
कि हियरा में उठत हिलोर
पुरवा के झोंकवा में आयो रे संदेसवा
कि चल आज देसवा की ओर।।


और इसके बाद लोक-वाद्यों का ऐसा संयोजन कि गर्दन और पैर अपने आप ही थिरकने लगते हैं। इस गाने को डूबकर सुनें तो ऐसा अहसास होने लगता है कि आप खुद ही गांव लौट रहे हैं। अपने घर। अपने लोगों के पास। पंडित रविशंकर हों और सितार ना हो संगीत में—ऐसा नहीं हो सकता। बांसुरी
, मैंडोलिन और सितार इंटरल्‍यूड में आपको बहा ले जाता है अपने साथ।


झुकी-झुकी बोले काले काले ये बदरवा
कबसे पुकारे तोहे नैनों का कजरवा
उमर-घुमर जब गरजे बदरिया रे
ठुमुक ठुमुक नाचे मोर
पुरवा के झोंकवा में आयो रे संदेसवा
कि चलो आज देसवा की ओर।। 

अंजान ने भले अमिताभ बच्‍चन की फिल्‍मों के लिए ढेर कमर्शियल गीत रचे हों
, पर इस फिल्‍म के गीतों में उनका भदेस रूप खूब खिला है। ऐसा लगता है जैसे गोदानकी भावभूमि पर उन्‍हें बनारस का क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा मिला और उन्‍होंने इसे खूब निभाया। गाने में यहां सितार के टुकड़े के ज़रिए मोर नाचने का जो प्रभाव पैदा किया गया है—वो अद्भुत से भी परे है।

यहां ये भी ग़ौर करने की बात है कि मोहम्‍मद रफ़ी के गानों में उनका पंजाबी मिज़ाज खूब झलकता रहा है। कुछ शब्‍दों में तो खास तौर पर—जैसे
संगमें वो खास पंजाबी तरीक़े से सांग्‍गगाते हैं और वो बड़ा प्‍यारा भी लगता है। रफी को इस उत्‍तर भारत के इस ग्रामीण गीत को गाने के लिए खासा अभ्‍यास करना पड़ा होगा और उन्‍होंने इसे बड़ी कुशलता से निभाया है। ऊंचे दर्जे के कलाकार ऐसे ही होते हैं।

यहां जब वो गाते हैं
सिमिट सिमिट बोले लंबी ये डगरिया/ जल्‍दी जल्‍दी चल राही अपनी नगरिया... तो आनंद आ जाता है। गाने में जो टेर चाहिए थी—जो उछाह- उसे रफी ने गाने में अपनी आवाज़ से साकार कर दिया है।

सिमिट सिमिट बोले लंबी ये डगरिया
जल्‍दी जल्‍दी चल राही अपनी नगरिया
रहिया तकत बिरहिनिया दुल्हनिया रे
बांधके लगनिया की डोर
पुरवा के झोंकवा में आयो रे संदेसवा
कि चलो आज देसवा की ओर।।

मोहम्‍मद रफी की आवाज़ की मस्‍ती
गोदानके होली गीत में भी खूब खिलती है।
गोदानके किसी भी गाने को सुनें तो आपको केवल बोल नहीं सुनने होते—प्रील्‍यूड और इंटरल्‍यूड में घुली देसी तरंग पर थिरकना भी होता है। एक अच्‍छी फिल्‍म का सही संगीत ऐसा ही होता है। होली खेलत नंदलालमें रफी की आवाज़, अंजान के बोल और पंडित रविशंकर का संगीत कुछ ऐसा जादू रचता है कि गीत खत्‍म होने के बाद भी आप उससे बाहर नहीं निकल पाते। गीत आपके ज़ेहन में गूंजता रहता है।








मोहम्‍मद रफी की याद का दिन है आज और हम उन्‍हें सलाम करते हैं। मुंशी प्रेमचंद का जन्‍मदिन भी- इन दोनों महान कलाकारों को हमारा नमन। 

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Sunday, December 7, 2008

कारवां गुज़र गया गु़बार देखते रहे

नीरज एक ज़माने में हमारे प्रिय कवि थे । हाईस्‍कूल के ज़माने वाले प्रिय
कवि ।
तब तक कविताओं के नाम पर हमारा परिचय ग़ज़लों और मंचीय कविताओं से ही हुआ था । और हम उन्‍हीं में मगन थे ।

तब कवि-सम्‍मेलनों में आज की तरह चुटकुलेबाज़ी नहीं हुआ करती थी । वो दिन अच्‍छी तरह से याद हैं जब 'नीरज' बहुधा कवि सम्‍मेलनों के अंत में खड़े होते और अपनी 'तरंग' में पढ़ते........'खुश्‍बू सी आ रही है इधर ज़ाफ़रान की, लगता है खिड़की खुली है उनके मकान की' या फिर.....'अब तो कोई मज़हब भी ऐसा चलाया जाये, जिसमें आदमी को इंसान बनाया जाये' । और हम धन्‍य-धन्‍य हो जाते थे ।

फिल्‍मी-गीत उन दिनों की दोपहरों में हमारी जिंदगी का अहम हिस्‍सा थे । मुहल्‍ले की गलियों से गुज़रो तो हर घर में रेडियो, और रेडियो पर वही 'मनचाहे गीत' बज रहे होते । यानी पूरा रास्‍ता घरों से छनकर आ रही रेडियो की आवाज़ के सहारे काटा जा सकता था । उन्‍हीं दिनों झुमरीतलैया, टाटानगर, जुगसलाई, राजकोट, इटारसी, खंडवा के श्रोताओं की चिट्ठियों के ढेर सारे नाम खूब लंबी-लंबी सांस लेकर पढ़े जाते, तब रेडियो के उदघोषक सादा-सरल होते, सांस लेते तो पता चल जाता, चोरी से सांस नहीं ली जाती थी, चिट्ठी पढ़ी, गीतकार संगीतकार बताए और ये गाना.....। बृजभूषण साहनी, विजय चौधरी, कांता गुप्‍ता, लड्डूलाल मीणा या श्रद्धा भारद्वाज की आवाज़ होती और फिर ये गीत बजता । और गलियों में अपने 'भौंरे' चलाते हुए या फिर तार के सहारे बेयरिंग का पहिया चलाते हुए, छतों पर दोस्‍तों के साथ कॉमिक्‍स, राजन इकबाल, प्रेमचंद और जेम्‍स हेडली चेइज़ पढ़ते या फिर सायकिल पर आवारागर्दी करते हुए हम धूप में तपते 'काले-ढुस' हो जाते । ठीक उन्‍हीं दिनों ये गाने हमारे अवचेतन में कब और कैसे एक 'संक्रमण' की तरह घुस गए हमें पता नहीं चला ।

हम छोटे शहरों की उन्‍हीं दोपहरों के आवारागर्द, 'काले-ढुस', भयानक पढ़ाकू, चश्‍मू बच्‍चे हैं, जो बड़े शहरों में आकर, अभी भी प्रीतम और हिमेश रेशमिया को नहीं सुनते, पुराने ज़माने के रोशन, शंकर जयकिशन, ओ.पी.नैयर और नीरज, साहिर, शैलेंद्र, फै़ज़ में मगन हैं । ऐसे ही दिनों की विकल-याद में ये गीत आपकी नज़र । हम अकेले नहीं सुनेंगे बल्कि साथ में आपको 'डाउनलोड लिंक' देंगे ताकि ऐसा ना लगे कि खिड़की खोलकर थोड़ी-सी धूप दिखाई और फिर पर्दा लगा दिया ।

कविता-कोश में नीरज को यहां पढि़ये । कविता-कोश ने एक विजेट भी kavita kosh logo तैयार  किया है । ये रहा उसका कोड । आप कविता कोश का विजेट अपने ब्‍लॉग पर लगाकर इसका प्रसार कर सकते हैं । मुझे कविता-कोश एक सहज-संदर्भ-ग्रंथ जैसा लगता है । जब मशहूर कविताओं की जिन पंक्तियों का ध्‍यान आ जाये, फौरन कविता-कोश में जाकर उन्‍हें खोजा-पढ़ा जा सकता है । वरना पुस्‍तकों में खोजना कितना दुष्‍कर और असुविधाजनक हो सकता है ।  

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गीत की डाउनलोड कड़ी

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गए सिंगार सभी बाग़ के बबूल से
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गयी
पाँव जब तलक उठें कि ज़िन्दगी फिसल गयी
पात-पात झर गए कि शाख-शाख जल गयी
चाह तो सकी निकल न पर उमर निकल गयी
गीत अश्क़ बन गए, छंद हो दफ़न गए

साथ के सभी दिए, धुआँ-धुआँ पहन गए
और हम झुके-झुके मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा
क्या सरूप था कि देख आइना सिहर उठा
इस तरफ़ ज़मीन और आसमां उधर उठा
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा
एक दिन मगर यहाँ, ऐसी कुछ हवा चली
लुट गयी कली-कली कि घुट गयी गली-गली
और हम लुटे-लुटे, वक़्त से पिटे-पिटे
साँस की शराब का खुमार देखते रहे
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की संवार दूं
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूं
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूं
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमि पर उतार दूं
हो सका न कुछ मगर, शाम बन गयी सहर
वह उठी लहर कि ढह गए किले बिखर-बिखर
और हम डरे-डरे, नीर नयन में भरे
ओढ़कर कफ़न पड़े मज़ार देखते रहे
कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे

माँग भर चली कि एक जब नयी-नयी किरण
ढोलकें ढुमुक उठीं ठुमुक उठे चरण-चरण
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन
गाँव सब उमड़ पडा बहक उठे नयन-नयन
पर तभी ज़हर भारी, गाज एक वह गिरी
पुंछ गया सिन्दूर तार-तार हुई चूनरी
और हम अजान से, दूर के मकान से
पालकी लिए हुए कहार देखते रहे
कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे

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Monday, December 24, 2007

गोरकी पतरकी रे--मो. रफ़ी के भोजपुरी और बांगला गीत--जन्‍मदिन पर विशेष

आज चौबीस दिसंबर है ।
मो. रफ़ी साहब का जन्‍मदिन । इस दिन को रफ़ी के चाहने वाले बड़े चाव ये याद रखते हैं ।


दिन भर की हड़बड़ी और भागमभाग के बीच भी रफ़ी साहब की याद में मैंने एक गाना रेडियोवाणी पर सुनवाने की ठान रखी थी । और वो है एक भोजपुरी गीत । सन 1979 में आई फिल्‍म बलम परदेसिया का ये गीत मुझे इंटरनेट खंगालने के बाद आखि़रकार मिल ही गया । इसे चित्रगुप्‍त ने स्‍वरबद्ध किया है ।

रफी साहब की ख़ासियत ये थी कि वो किसी भी भाषा का गाना बड़ी सहजता से गा लेते थे । उन्‍होंने भोजपुरी भी गाय, बांगला भी और अंग्रेज़ी भी । यहां तक कि दक्षिण की भाषाओं में भी उनके कुछ गीत हैं । मो. रफ़ी के चाहने वाले उनकी याद में एक वेबसाईट चलाते हैं जिस पर टिप्‍पणियों की तादाद देखकर आपको हैरत होगी । यहां सामग्री भी कमाल की है । मुझे निजी रूप से रफ़ी साहब के गाये भजन और कुछ नाज़ुक रूमानी गाने बेहद पसंद हैं । कुछ गाने यहां पेश हैं । आज रफ़ी साहब को याद करना उनके शैदाईयों के लिए एक रवायत भी है और ज़रूरत भी । रफ़ी की आवाज़ हमारी जिंदगी की खुशनसीबी है ।

पहले सुनिए--फिल्‍म बलम परदेसिया का ये गीत--गोरकी पतरकी रे ।

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जल्‍दी जल्‍दी चल रे कहारा सुरूज डूबे रे नदिया

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ये रहे रफ़ी साहब के गाये कुछ बांगला गीत ।

आज मोधुरो बंसरी बाजे ।।

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कोने चालबाजेर मुखे

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काजी नजरूल इस्‍लाम की रचना रफ़ी साहब की आवाज़ बोल हैं --आधो आधो बोल लाजे.......

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उम्‍मीद है कि रफ़ी साहब के इन गीतों को सुनकर आपकी आज की शाम संवर जायेगी । मैं तो आज रफ़ी साहब की आवाज़ में डूबकर एक दूसरी ही दुनिया में पहुंच गया हूं ।

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Tuesday, July 31, 2007

मो. रफी पर रेडियोवाणी का विशेष आयोजन: तीसरी कड़ी—रफी साहब के गाये मराठी, पंजाबी, बांगला और कन्‍नड़ गीत और साथ में एक ग़ज़ल भी ।

तीसरी कड़ी में मैं आपको सुनवा रहा हूं रफी साहब के गाये अन्‍य भाषाओं के नग्‍मे । सबसे आखिर में एक ग़ज़ल है ग़ालिब की ।
ये रहा रफी साहब का गाया मराठी गीत—शोढीषी मालवा


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पंजाबी गीत’-रब्‍बा रे तेरीयां बेपरवाहियां
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मो0 रफी का गाया बांगला गीत सुनने के लिये यहां क्लिक करें



मो0 रफी का गाया कन्‍नड़ गीत सुनने के लिये
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और ये है कलाम-ऐ-ग़ालिब--

बस के दुश्‍वार है हर काम का आसां होना
आदमी को भी मयस्‍सर नहीं इंसां होना
गिरीयां चाहे है ख़राबी मेरे काशाने की
दरो दीवार से टपका है बयाबां होना
इशरते कत्‍ल गहे अहले तमन्‍ना ना पूछ
ईदे नज्‍जारा है शमशीर का उरियां होना
की मेरे क़त्‍ल के बाद उसने जफ़ा से तौबा
हाय उस दूद-पशेमां का पशेमां होना

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मो.रफी की पुण्‍यतिथि पर ‘रेडियोवाणी’ का विशेष आयोजन:दूसरा भाग—जब रफ़ी ने किशोर कुमार के लिए ‘प्‍लेबैक’ किया ।

मो0 रफी की पुण्‍यतिथि है आज ।

बहुत मुश्किल में हूं कि आपको क्‍या सुनाऊं और क्‍या छोड़ दूं ।
दरअसल रफी साहब इतने वरसेटाईल गायक थे कि उनके गानों में से श्रेष्‍ठ गीत चुनना भी किसी सज़ा से कम नहीं । बड़ी मुश्किल हो जाती है । जहां तक मुझे याद आता है दो मौक़े ऐसे थे जब रफ़ी साहब ने किशोर कुमार के लिए प्‍लेबैक किया था । फिलहाल हम ऐसा ही एक गीत सुनेंगे और उसकी बात करेंगे ।

इसका श्रेय जाता है संगीतकार ओ.पी.नैयर को । नैयर साहब दिलदार आदमी थे । एक पंजाबी जिद उनके भीतर समाई हुई थी । जो सोच लेते वही करते । एक किस्‍सा आपको बताता हूं । गीतकार प्रदीप फिल्‍म ‘संबंध’ के गीत लिख रहे थे । याद कीजिए मुकेश का गाया गीत—‘चल अकेला’ । लेकिन प्रदीप की सूरत पसंद नहीं थी नैयर साहब को । हालांकि वो उनकी इज्‍जत बहुत करते थे । उनकी प्रतिभा से आतंकित भी थे । अजीब बात लगती है, पर नैयर तो नैयर थे । उन्‍होंने प्रदीप को अपने स्‍टूडियो आने से मना कर दिया था । वो फेमस स्‍टूडियो के बाहर अपनी गाड़ी में बैठे रहते और गाना किसी आदमी के ज़रिए स्‍टूडियो में नैयर को पहुंचा देते । और नैयर उसकी धुन बना
लेते । क्‍या गाने हैं फिल्‍म ‘संबंध’ के ।


बहरहाल यही नैयर साहब ही थे जिन्‍होंने रफ़ी की आवाज़ उस फिल्‍म के लिए जिसमें अभिनय कर रहे थे किशोर कुमार । ये फिल्‍म ‘रागिनी’ थी । सन 1958 में आई थी । प्रोड्यूसर उनके अपने भाई अशोक कुमार ।

ओ0पी0 नैयर ने खुद अपने इंटरव्यू में बताया था कि जब किशोर कुमार को पता चला कि ये गीत उनकी बजाय रफी साहब से गवाया जायेगा और फिल्‍माया उन्‍हीं पर जायेगा तो वो बहुत नाराज़ हुए और फिल्‍म के प्रोड्यूसर यानी अपनी बड़े भैया अशोक कुमार के पास पहुंचे । दादा मुनि ने किशोर से कहा कि देखो किशोर, संगीत के बारे में सारे फैसले संगीतकार करेगा । अगर नैयर साहब को लगता है कि इस गाने के लिए रफ़ी साहब ठीक रहेंगे तो इस बारे में मैं क्‍या कर सकता हूं । हारकर किशोर कुमार को राज़ी होना पड़ा । नैयर साहब का कहना था कि ये एक शास्‍त्रीय रचना है और इसे किशोर ठीक से नहीं गा सकेंगे । रफी साहब की शास्‍त्रीयता का किशोर से भला क्‍या मुक़ाबला । जिद्दी नैयर साहब फिल्‍म संसार के एकमात्र ऐसे संगीतकार रहे जिन्‍होंने ये करिश्‍मा किया । तो आईये सुनें फिल्‍म ‘रागिनी’ का ये गीत—जो अपने आप में पक्‍का शास्‍त्रीय गीत है । इस गाने में रफी साहब की गायकी के तो कहने ही क्‍या ।

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मन मोरा बावरा, मन मोरा बावरा
निसदिन गाये गीत मिलन के
मन मोरा बावरा ।।

आशाओं के दीप जलाके
बैठी कब से आस लगाके
आया प्रीतम प्‍यारा
मन मोरा बावरा ।।

मन मंदिर में श्‍याम बिराजे
छुनछुन मोरी पायल बाजे
कैसा जादू डारा
मन मोरा बावरा ।।

है ना कमाल की बात । फिल्‍म-संसार का एक ऐतिहासिक गाना बन गया है ये ।
रफ़ी की आवाज़ का सच्‍चाई, मासूमियत और समर्पण का शिखर है ये गीत ।




रफी साहब को गाते हुए देखने के लिए यहां पर क्लिक करें

रफी साहब के
इस गीत को पूरे हुए साठ साल


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