संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
ध्वनि-तरंगों की ताल पर
विविध-भारती पर मुझे सुनिए:
वंदनवार:रविवार सुबह 6-05 त्रिवेणी: रविवार सुबह 7-45 छायागीत: रविवार रात 10-00 जिज्ञासा- शनिवार शाम 7-45 और रविवार सुबह 9-15
आज चौबीस दिसंबर है । मो. रफ़ी साहब का जन्मदिन । इस दिन को रफ़ी के चाहने वाले बड़े चाव ये याद रखते हैं ।
दिन भर की हड़बड़ी और भागमभाग के बीच भी रफ़ी साहब की याद में मैंने एक गाना रेडियोवाणी पर सुनवाने की ठान रखी थी । और वो है एक भोजपुरी गीत । सन 1979 में आई फिल्म बलम परदेसिया का ये गीत मुझे इंटरनेट खंगालने के बाद आखि़रकार मिल ही गया । इसे चित्रगुप्त ने स्वरबद्ध किया है ।
रफी साहब की ख़ासियत ये थी कि वो किसी भी भाषा का गाना बड़ी सहजता से गा लेते थे । उन्होंने भोजपुरी भी गाय, बांगला भी और अंग्रेज़ी भी । यहां तक कि दक्षिण की भाषाओं में भी उनके कुछ गीत हैं । मो. रफ़ी के चाहने वाले उनकी याद में एक वेबसाईट चलाते हैं जिस पर टिप्पणियों की तादाद देखकर आपको हैरत होगी । यहां सामग्री भी कमाल की है । मुझे निजी रूप से रफ़ी साहब के गाये भजन और कुछ नाज़ुक रूमानी गाने बेहद पसंद हैं । कुछ गाने यहां पेश हैं । आज रफ़ी साहब को याद करना उनके शैदाईयों के लिए एक रवायत भी है और ज़रूरत भी । रफ़ी की आवाज़ हमारी जिंदगी की खुशनसीबी है ।
पहले सुनिए--फिल्म बलम परदेसिया का ये गीत--गोरकी पतरकी रे ।
उम्मीद है कि रफ़ी साहब के इन गीतों को सुनकर आपकी आज की शाम संवर जायेगी । मैं तो आज रफ़ी साहब की आवाज़ में डूबकर एक दूसरी ही दुनिया में पहुंच गया हूं ।
कल बैंगलोर के हमारे मित्र शिरीष कोयल ने संदेश भेजा कि रफ़ी साहब की पुण्यतिथि पर उनसे जुड़े कुछ अनजान तथ्य पेश किए जाएं ।
उनका सुझाव अच्छा है, इसलिये सिर आंखों पर ।
मो.रफ़ी चाय और मीठे के बड़े शौक़ीन थे । संगीतकार जोड़ी लक्ष्मी-प्यारे के प्यारेलाल जी ने बताया कि उनकी चाय बड़ी शाही हुआ करती थी और सबको नसीब नहीं होती थी । चूंकि लक्ष्मी-प्यारे युवा थे इसलिये अपना बचपना दिखाकर हिमाक़त कर लेते थे और रफ़ी साहब से ‘चाय’ मांग लिया करते थे । प्यारेलाल जी बताते हैं कि रफ़ी साहब की चाय कैसे बनती थी—एक सेर दूध को ओटा कर आधा सेर कीजिए, उसमें बादाम पिस्ता, काजू वग़ैरह पीस कर डालिए । फिर थर्मस में भरिए और रिकॉर्डिंग पर लेकर चल पडिये । अगर रफ़ी साहब ने चाय दिलवा दी तो चुपचाप पीने पर वो ख़फ़ा हो जाते थे । इस चाय को ज़ोरदार वाहवाही करते हुए पीना पड़ता था ।
रफ़ी साहब फ़क़ीरों जैसी तबियत रखते थे । उनके भीतर व्यापारिक-बुद्धि नहीं थी । कितने-कितने संगीतकारों और निर्माताओं से उन्होंने पैसे नहीं लिए । कितने ही छोटे प्रोड्यूसर ऐसे थे जिनके गीत केवल अनुनय-विनय करने पर रफ़ी साहब ने गा लिये, कई बार शगुन के तौर पर थोड़े-बहुत पैसे लिये, पर ज़्यादातर बिल्कुल पैसे नहीं लिए । आपके रफ़ी साहब के कई शानदार गाने ऐसे मिलेंगे जो बहुत ही छोटी फिल्मों के हैं । इन फिल्मों का कोई नामलेवा आज नहीं है, लेकिन रफ़ी के गानों को हम सिर-आंखों पर रखते हैं ।
क्या आपको पता है कि मो. रफ़ी का आखिरी नग़्मा कौन-सा है । 31 जुलाई 1980 को रफ़ी साहब ने फिल्म ‘आसपास’ का गीत रिकॉर्ड किया था । ये गाना था-‘तू कहीं आसपास है दोस्त-दिल फिर भी उदास है दोस्त’ । इस रिकॉर्डिंग के बाद ही उनकी तबियत ख़राब हो गयी थी । और बॉम्बे हॉस्पिटल उन्हें ले जाया गया । जहां उनकी रूह दुनिया को छोड़ चली गयी । वो मीडिया का दौर नहीं था, इंडस्ट्री को बहुत देर से इसकी ख़बर मिली थी । ये रहा वो गाना । इसे सुनिए तो लगेगा जैसे रफ़ी को अहसास हो गया था कि उनके हिस्से में सांसों का ख़ज़ाना ख़त्म हो चुका है । जैसे वो भरे मन से दुनिया को अलविदा कह रहे हैं ।
मो.रफ़ी जब फिल्म ‘नीलकमल’ के गाने ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’ की रिकॉर्डिंग कर रहे थे तो उन्हें अपनी बेटी की विदाई का ख्याल आ गया, उन दिनों जल्दी ही उसकी शादी होने वाली थी । इस अहसास ने इस गाने को और भी दर्दीला बना दिया है ।
मो. रफ़ी से जुड़ी कुछ अनमोल तस्वीरें देखने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं । याद रहे कि इससे रफ़ी के फ़ोटो अलबम का पहला पृष्ठ खुलेगा । पेज के नीचे एक नीली पट्टी है, जिस पर पेज नंबर दिये हुए हैं, उन्हें क्लिक करके आप आगे के पन्ने देखना मत भूलिएगा । इस फ़ोटो अलबम में कुल चार सौ बावन तस्वीरें हैं । एक से एक अनूठी और अनमोल । इसे रफ़ी के जुनूनी दीवानों ने जमा किया है ।
मो. रफ़ी इतना मद्धम बोलते थे कि बगल में बैठा व्यक्ति भी ना सुन सके । रफ़ी के शैदाई और मेरे परिचित मुंबई के ख़लीक अमरोहवी बताते हैं कि रफ़ी साहब बहुत ही नाज़ुक-ज़बान थे । वो बहुत कम बोलते थे । बस मुस्कुराते रहते थे । आपको हैरत होगी कि ना तो विविध-भारती के पास और ना ही दुनिया के किसी अन्य रेडियो-चैनल के पास रफ़ी साहब का इंटरव्यू है । हां बी.बी.सी. ने ज़रूर रफ़ी साहब का एक छोटा-सा इंटरव्यू किया है । जो आज यहां प्रस्तुत किया जा रहा है ।
शायद आपको पता न हो कि लता मंगेशकर और ओ.पी.नैयर दोनों से अलग-अलग रफ़ी साहब से ख़फ़ा हो गये थे । लता जी उन दिनों गायकों को रॉयल्टी के पैसे दिलवाने की मुहिम चला रही थीं । कई गायक उनके साथ थे । रफ़ी साहब रॉयल्टी के पैसों के लिए संघर्ष करने से इत्तेफ़ाक नहीं रखते थे । बस इसी बात पर लता जी थोड़े दिन के लिए ख़फ़ा हो गयीं । बातचीत बंद । पर दोनों ने गाने साथ-साथ गाए । नैयर साहब के ख़फ़ा होने की वजह शायद रफ़ी साहब का एक बार स्टूडियो में देर से आना रही । उन्होंने महेंद्र कपूर से गवाना शुरू कर दिया था । लेकिन नैयर साहब रफ़ी से बहुत प्यार करते थे । उनका कहना था कि उनके गाने अगर कोई गा सकता था तो वो रफ़ी ही थे ।
ये तो सभी जानते हैं कि रफ़ी साहब ने पहला गीत पंजाबी फिल्म ‘गुल-बलोच’ के लिए गाया था । गाना था-‘सोणिए हीरीए’ । मुंबई में जब वो नौशाद से मिले तो नौशाद को उनकी आवाज़ पर इतना विश्वास नहीं था । इसलिए एक फिल्म में उन्होंने रफ़ी को कुंदनलाल सहगल के पीछे कोरस में गवाया था । ये रहा वो गीत । इसके आखिर में एक कोरस आता है-जिसमें रफ़ी साहब की आवाज़ साफ़ पहचान में आ रही है ।
रफ़ी साहब शराब को छूते भी नहीं थे । लेकिन शराबियों के जो गीत उन्होंने गाये हैं वो कमाल हैं । मदनमोहन का स्वरबद्ध किया फिल्म शराबी का गीत ‘कभी ना कभी कहीं ना कहीं कोई ना कोई तो आयेगा, अपना मुझे बनाएगा’ इसकी सबसे अच्छी मिसाल है ।