संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Wednesday, April 25, 2007

रफी साहब के इस गीत को पूरे हुए साठ साल




मो0 रफी के गाये फिल्‍म ‘जुगनू’ के गीत ‘यहां बदला वफा का बेवफाई के सिवा क्‍‍या है’ को आए साठ साल पूरे हो चुके हैं । (दिलीप कुमार और नूरजहां के अभिनय से सजी इस फिल्‍‍म के गीतकार थे तनवीर नकवी और संगीतकार फीरोज़ निज़ामी । ये वही तनवीर नक़वी हैं जिन्‍‍होंने अनमोल घड़ी फिल्‍‍म के गीत लिखे थे)
बहरहाल इस अवसर पर मशहूर पत्रकार होशांग के0 कात्रक ने मुंबई के अंग्रेज़ी दैनिक में एक लेख लिखा है । ये पोस्‍ट उसी लेख का लगभग अनुवाद है । होशांग लिखते हैं-----


मैं मो0 रफी के गीत सी0डी0 पर सुन रहा हूं, अचानक सी0डी0 का जैकेट पढ़कर मेरे दिमाग़ में कई विचार घुमड़ पड़ते हैं । सन 1947 में रफी साहब ने ये गाना मलिका-ऐ-तरन्‍नुम नूरजहां के साथ गाया था और इसके कुछ दिनों बाद विभाजन के वक्‍त नूरजहां सरहद के उस पार पाकिस्‍तान चली गयी थीं ।
इस गाने को आप यहां सुन सकते हैं ।






कुछ दिन पहले मैंने डेरेक बोस की लिखी किशोर कुमार की आत्‍‍मकथा-Method in Madness पढ़ी थी । इस पुस्‍तक ‍ में एक जगह डेरेक ने लिखा है: ‘सन 1969 में फिल्‍म आराधना के आने के बाद एक ही झटके में किशोर कुमार ने मो0 रफी, तलत महमूद, और मन्‍‍नाडे की छुट्टी कर दी थी । तब से वो संगीत के बेताज बादशाह बने रहे’

किसी लेखक के लिए जीवनी लिखते हुए इस तरह की स्‍थापना देना मुनाफ़े का सौदा हो सकता है, लेकिन फिल्‍म-संगीत का अल्‍पज्ञानी भी इस तरह के दावे का खोखलापन समझ जायेगा ।

ऐसा नहीं है कि फिल्‍म आराधना और एस0डी0 या आर0डी0 बर्मन ने किशोर की डूबती हुई नैया को बचा लिया था, क्‍योंकि इससे पहले भी वो हर साल कम से कम एक हिट गाना तो दे ही रहे थे । जैसे सन 1968 में उन्‍होंने पड़ोसन का ‘मेरे सामने वाली खिड़की में’ दिया ।
यहां सुनिए । फिर 1967 में ज्‍वेल थीफ का ‘ये दिल ना होता बेचारा’ दिया । यहां सुनिए । 1969 में तो किशोर के तीन एकल हिट गीत आये थे, तीनों लोकप्रिय हुए थे । मेरे नसीब में ऐ दोस्‍त तेरा प्‍यार नहीं (फिल्‍म-दो रास्‍‍ते) यहां सुनिए , वो शाम कुछ अजीब थी (फिल्‍म-खामोशी) यहां सुनिए, और तुम बिन जाऊं कहां (फिल्‍म-प्‍यार का मौसम ) यहां सुनिए

फिल्‍म आराधना से काफी पहले तलत महमूद का समय खत्‍म हो गया था । उनकी आखिरी हिट फिल्‍म थी सन 1964 में आई ‘जहांआरा’ । 1964 से 1969 तक उन्‍होंने केव दस गीत ही गाए ।
रही बात मुकेश की, तो उन्‍हें राजकपूर की आवाज़ कहा जाता था, लेकिन 1964 में
फिल्‍म संगम के बाद राजकपूर का कैरियर बतौर अभिनेता फीका हो गया था । लेकिन मैंने एक दिलचस्‍प अध्‍ययन किया जिससे कई अनोखे आंकड़े सामने आये हैं । फिल्‍म आराधना के आने के पहले के पांच सालों में मुकेश ने कुल 138 गीत गाये । और फिल्‍म आराधना आने के बाद के पांच सालों में उन्‍होंने कुल 139 गीत गाए । यहां तक कि 1970 से 1976 के बीच तो उन्‍होंने तीन तीन फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार भी जीते ।

अब मन्‍ना डे की बात । उन्‍हें राजकपूर और मेहमूद भाईजान की आवाज़ कहा जाता था, पर शास्‍त्रीय गीतों और क़व्‍वालियों के लिये सदा उन्‍हें ही याद किया जाता रहा । सन 1971 में
फिल्‍म मेरा नाम जोकर के गीत ‘ऐ भाई’ के लिए उन्‍हें फिल्‍मफेयर अवॉर्ड भी मिला । यहां सुनिए ।

रफी साहब ने 1970 से 1980 के बीच कुल 1258 गीत गाये और किशोर कुमार ने गाये 1266 गीत । अगर अकेले सन 1969 की बात करें जब आराधना
फिल्‍म आई, तो इस साल रफी साहब ने किशोर से कहीं ज्‍‍यादा गीत गाये । कुल 190 गीत । जबकि किशोर ने गाए कुल 20 गीत ।

रफी साहब के कैरियर में ढलान दरअसल शम्‍मी कपूर, जॉनी वॉकर, दिलीप कुमार और राजेंद्र कुमार के कैरियरों के ढलने से आया था । ये ढलान ओ0 पी0 नैयर, रवि, शंकर जयकिशन और चित्रगुप्‍‍त का काम घटने से आया था । रफी साहब के एक चौथाई गीत इन संगीतकारों के साथ ही हैं । इसकी एक वजह ये भी थी कि अब किशोर अभिनय की बजाय गाने पर ज्‍यादा ध्‍‍यान दे रहे थे ।

आईये अब रफी साहब के आखिरी
फिल्‍मफेयर की बात करें । वो गाना था ‘क्‍या हुआ तेरा वादा’ (फिल्‍म हम किसी से कम नहीं, सन 1977, मजरूह/आर0डी0बर्मन) । इसे सुनिये, आप पायेंगे कि अंत तक उनकी आवाज़ में वो कशिश थी । किशोर ने शास्‍‍त्रीय संगीत की तालीम नहीं ली थी, जबकि रफी साहब शास्‍‍त्रीय संगीत की मज़बूत बुनियाद लेकर आये थे । आज भी कोई ऐसा दिन नहीं बीतता जब दुनिया के किसी भी हिंदुस्‍तानी रेडियो स्‍टेशन पर रफी की आवाज़ ना गूंजती हो । रीमिक्‍स के पागलपन वाले युग को बढ़ावा देने वाले एफ0एम0 स्‍टेशन भी रफी साहब के ओरीजनल गाने बजा लेते हैं ।

मित्रो होषांग कात्रक ने वाक़ई एक अहम मुद्दे पर ध्‍यान खींचा है । आमतौर पर लोग बिना किसी आधार या शोध के साबित करने लगते हैं कि कौन गायक किस गायक से ज्‍‍यादा बड़ा था । और हम सब इन बातों पर यक़ीन भी कर लेते हैं । अच्‍‍छा हो कि हम भी स्‍वयं तथ्‍यों को परखें और फिर किसी भी दावे पर यक़ीन करें ।
बहरहाल चर्चा हो रही थी जुगनू फिल्‍म
के इस गाने की । जरा इसके बोलों पर एक नजर डालिये । एक पंक्ति रफी गाते हैं अगली नूरजहां गाती हैं ।

यहां बदला वफा का बेवफाई के सिवा क्‍या है
मुहब्‍बत करके भी देखा मुहब्‍‍बत में भी धोखा है ।।
कभी सुख है, कभी दुख है, अभी क्‍या था अभी क्‍या है
यूं ही दुनिया बदलती है, इसी का नाम दुनिया है
तड़पने भी नहीं देती हमें मजबूरियां अपनी
मुहब्‍‍बत करने वालों का तड़पना किसने देखा है
मुहब्‍‍बत करके भी देखा मुहब्‍‍बत में भी धोखा है
बड़े अरमान से वादों ने दिल में घर बसाया था
वो दिन जब याद आते हैं कलेजा मुंह को आता है
भुला दे वो जमाना जब मुझे अपना बनाया था
भुला दो नामे-उल्‍‍फत जब तुम्‍हारे लब पे आया था
भुलादो वो क़सम जो दिलाई थी कभी तुमने
भुला दो वो क़सम जो कि खाई थी कभी तुमने
भूला दो दिल से तुम गुजरे हुए रंगीन जमाने को
भुला दो हां भुला दो इश्‍‍क़ के ताज़ा फसाने को
तमन्‍नाओं की बस्‍ती में अंधेरा ही अंधेरा है
किसे अपना कहूं कोई जो अपना था पराया है
यूं ही दुनिया बदलती है, इसी का नाम दुनिया है
कभी सुख है, कभी दुख है अभी क्‍या था अभी क्‍या है
मुहब्‍बत करने वालों का तड़पना किसने देखा है
यहां बदला वफा का बेवफाई के सिवा क्‍या है ।

18 comments:

Unknown April 25, 2007 at 6:44 PM  

बहुत खूब यूनुस भाई,
रफ़ी साहब जैसी हस्ती के बारे में जितना भी लिखा जाये कम ही होगा और आप तो एक ऐसा गीत छाँट कर लाये हैं कि मजा आ गया...
शोधपरक लेख के लिये साधुवाद

Anonymous,  April 25, 2007 at 6:47 PM  

बहुत अच्छा लिखा आपने रफि साहब के बारे में।

Anonymous,  April 25, 2007 at 7:10 PM  

आपने रफी साहब के बारे में बहुत विस्तार से जानकारी दी है।

Pramendra Pratap Singh April 25, 2007 at 7:12 PM  

bahut achchhi jankaari diya aapne.

Anonymous,  April 25, 2007 at 7:35 PM  

हिन्दी फिल्म गीत संगीत के इतिहास पर अच्छा लिख रहे हैं आप....(इस लेख के लिये होषांग को साधुवाद)..

ऐसे और लेखों का इन्तजार रहेगा..

सुनीता शानू April 25, 2007 at 7:38 PM  

बहुत-बहुत शुक्रिया रफ़ी साहेब वैसे तो हमे हमेशा याद रह्ते है मगर आज आपने और बहुत कुछ बता कर उनकी यादें ताजा़ कर दी हैं ।
सुनीता(शानू)

Sagar Chand Nahar April 25, 2007 at 8:32 PM  

रफी साहब, तलत महमूद, मन्नाडे, हेमन्त कुमार और किशोरदा सबकी अपनी अपनी गायन शैली थी, किसी की एक दूसरे से तुलना करना ठीक नहीं होगा। सभी अपने आप में एक विशिष्ट गायक थे। जहाँ किशोरदा रोमेंटिक गानों के लिये जाने जाते थे वहीं तल साहब अपनी मखमली आवाज की वजह से गजलों के लिये और मन्नाडे शास्त्रीय गानों के लिये। हेमन्त दा की अपनी अलग ही शैली थी।
रफी साहब हर तरह के गानों में फिट हो जाते थे।
जिन गानों के लिये रफ़ी साहब को जाना जाता है उनका जिक्र आप इस लेख में नहीं कर पाये। उनमें से कुछेक ये हैं। फिल्म के नाम अभी नहीं दे रहा हूँ।
दिल में छुपा के प्यार का तूफ़ान ले चले, हम आज अपनी मौत का सामान ले चले।
आना है तो आ राह में कुछ देर नहीं है, भगवान के घर देर है अन्धेर नहीं है।
चल उड़ जा रे पंछी कि अब यह देश हुआ बेगाना
हिन्दुस्तां के हम हैं हिन्दुस्ता हमारा हिन्दू मुस्लिम की आंखों का तारा।
लिस्ट बहु लम्बी है शेष फिर कभी :)

sagarchand.nahar@gmail.com

dhurvirodhi April 25, 2007 at 11:18 PM  

हम तो रफ़ी साहब और किशोर साहब दोनों के पाले में हैं. दोनों ही हमारे पसंददीदा है.
आपने बहुत प्यारा गीत सुन्वाये हैं धन्यवाद यूनुस साहब

azdak April 25, 2007 at 11:21 PM  

यूनुस महाराज,

पहली दफे आपके ब्‍लॉग की तरफ झांकता आया था.. फिल्‍मी संगीत की अच्‍छी संगत सजा रखी है.. शुक्रिया।

Manish Kumar April 26, 2007 at 12:55 AM  

उस जमाने के सारे गायकों की अपनी खासियत थी , इनको एक दूसरे से छोटा ‍बड़ा बताना मूर्खता है ।

उन्मुक्त April 26, 2007 at 8:16 AM  

रफी साहब तो सबके दिल के मालिक थे।

Anonymous,  April 26, 2007 at 9:57 AM  

रफी, किशोर, मुकेश और मन्नाडे की आपस मे तुलना ? किस बात पर ?
सब के सब अलग अलग है, सभी के सभी गायकी के भगवान है !
हम तो इन सभी के बडे़ पंखे है !

Voice Artist Vikas Shukla विकासवाणी यूट्यूब चॅनल April 26, 2007 at 11:53 AM  

Yunus Bhai,
Yeh bhram to mai bhi pale hue tha ki Kishor Kumar ke Aradhana aur Rajesh Khanna dwara chha jane ke baad Rafi Saab pichhe hut gaye the. Accha hua aapne mera vo bhram tod diya. Bahuthi interesting article ko aapne badi acche tarah se anuwadit kiya hain. Dhanyavad.

Anonymous,  April 26, 2007 at 1:25 PM  

Hydarabad se Annapurna

Yunus khan jee

Ek baat ki ore aapka dyan dilana chahungi. Geet tum bin jaaon kahan film Mere jeevan Saathi ka shayad nahi hai. Yeh geet shayad Pyar ka Mausam film ka hai. Is geet ko Bharat Bhushan per filmaya gaya tha yeh geet film main baar-baar Bharat Bhushan Gitar bajathe huve gaate hai aur yeh geet poori film ke mood se alag hai. Aap please ek baar check kar leejiye.

Yunus Khan April 26, 2007 at 1:51 PM  

अन्‍नपूर्णा जी धन्‍यवाद इस गफलत की ओर ध्‍यान दिलाने के लिए । लगता है आपने मेरी पोस्‍ट पर क्लिक करके गाना नहीं सुना । जिस वेबसाईट से ये गाना बजता है, वहां सही नाम लिखा है । पता नहीं कैसे मुझे ही संशय हो गया था, जिसकी वजह से मैंने फिल्‍म मेरे जीवन साथी लिख दिया । बहरहाल आपकी बात ये याद आया कि यही वो गीत है जिसे रफी साहब ने भी गाया है । और फिल्‍म के रिकॉर्ड पर वो संस्‍करण है तो मगर उसे कोई भी नहीं बजाता । रेडियो पर आपने उसे एकाध बार ही सुना होगा । बहरहाल गफलत की ओर ध्‍यान खींचने का शुक्रिया ।

Anonymous,  April 26, 2007 at 1:58 PM  

Hyderabad se Tejeshwari

Yunus jee

Rafi saheb ka naam aate hi yaad aa jate hai Baiju Bawara ke bhajan. Is film se Bharat Bhushan tho star ka darja mila sath hi Rfi ne bhi nai bulandeeyen chooi jiske baad Teesari manzil main Shammi Kapur ke liya gaa kar R.D.Burman ke sangeet se nai shuruvaat dee. yahi haal Kishore Kumar ka hai Zindagi ek safar hai suhaanaa main anokhi awaz dee tho Zahareelaa Insaan film ke liye shant prem geet O hansini gaya Rafi aur kishore mere nazer main bharteeya film sangeet ki do ankhen inme tulna kaisi ?

Divine India April 26, 2007 at 10:58 PM  

यूनुस भाई,
बहुत व्यस्तता होने के कारण जल्द न आ सका…।
रफी साहब तो महान थे ही उनके नगमों को बस एक बार सुन लेना ही बहुत होता है…उनकी आवाज
खुदा की बनावट थी…।
i m in Mumbai and doing Film Direction u can mail me at
divyabh.aryan@gmail.com 4 further contact we will manage...thnx

शैलेश भारतवासी April 27, 2007 at 10:39 AM  

यूनुस जी,

इधर थोड़ी व्यस्तता थी, इसलिए आपका ब्लॉग देख नहीं पाया। आज देखा तो पाया कि आपने मेरे पसंदिदा गायक रफी के बारे बहुत-सी उपयोगी जानकारियाँ दी हैं। आपके चिट्ठा जगत में आ जाने से ऐसा लगने लगा है कि हमारा हिन्दी-संगीत का ज्ञान, फिल्मी ज्ञान दुरुस्त होगा।

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