संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Friday, April 27, 2007

मन्‍ना दा का गैर फिल्‍मी गीत- ये आवारा रातें

मन्‍ना दा मेरे प्रिय गायक हैं । नौंवी क्‍लास में था जब उनके गाने सुनने की लत लगी थी । मुझे उनके जिस पहले गीत का नशा चढ़ा था वो था फिल्‍म सीमा का गीत – तू प्‍यार का सागर है तेरी एक बूंद के प्‍यासे हम । उस गाने में जब मन्‍ना दा गाते हैं ‘घायल मन का पागल पंछी उड़ने को बेक़रार’ तो दिल में अजीब सा तूफान मच जाता था । उसके बाद तो हम सब मित्रों ने मन्‍ना दा के ऐसे ऐसे गाने ढूंढ ढूंढकर जमा किये कि पूछिये मत । संगीत के सुधि श्रोताओं को मन्‍ना दा का फिल्‍म फैशनेबल वाईफ का वो गीत याद होगा—धूप हो या छांव हो चाहे थके पांव हों, चलता चल ।
या फिर बहुत बाद की फिल्‍म प्रहार का गीत- हमारी ही मुट्ठी में आकाश सारा । बहरहाल अगर मन्‍ना दा के सारे शानदार गीतों की महफिल सजाई, तो ये चिट्ठा कई किलोमीटर लंबा हो जायेगा । इतना जरूर बता दूं कि मन्‍ना दा से दो बार मुलाक़ात का और एक बार उनका लाईव कंसर्ट सुनने का अवसर मुझे मिला
है । और ये तीनों दिन मेरी जिंदगी के सबसे खुशनसीब दिन रहे हैं ।

आपके लिए मैं जो गीत लाया हूं, उसे इंटरनेट पर खोजने में मुझे काफी वक्‍त लगा । आपको ये बता दूं कि वो गीत मेरे अपने निजी संग्रह में तब से है जब मैं स्‍कूल कॉलेज का विद्यार्थी था और अपने जेबखर्च से दो कैसेट का वो संग्रह खरीदा था जो आजकल ‘आउट आफ प्रिंट’ है । ये मन्‍ना डे के गैरफिल्‍मी हिंदी गीतों का अनमोल संग्रह है, जिसमें कुल सत्रह गीत हैं । आने वाले दिनों में एक एक करके मैं इसके हर गीत की विस्‍तृत चर्चा करना चाहूंगा क्‍योंकि ये गाने नहीं है बेशकीमती दौलत हैं । यक़ीन मानिए ।




चलिए आज इस एलबम का वो गीत—जिसमें ‘आवारा रातों’ का जिक्र है । गाना है ‘ ये आवारा रातें’
यहां सुनिए ।
अब ज़रा इसके बोल पढिये ।

ये आवारा रातें, ये खोई सी बातें, ये उलझा सा मौसम, ये नजरों की घातें
कहां आ गये हम कहां जा रहे थे
ये नागन से बलखाये ख्‍वाबों के साये, ये चिटके से तारे जो पलकों पे छाये
कहां आ गये हम कहां जा रहे थे
ये सोई सी गलियां, ये कुंभलाई कलियां, ये आंखों के भंवरे करें रंगरलियां
कहां आ गये हम कहां जा रहे थे
ये बिखरी हवाएं, ज्‍यों टूटी सी आहें, बुलाएं सभी को नजारों की बाहें
कहां आ गये हम कहां जा रहे थे ।
मधुकर राजस्‍थानी ने इस गीत को लिखा है और संगीत है खुद मन्‍ना दा का ।

नाज़ुक नर्म रात, मेहबूब से मुलाक़ात, मुहब्‍बत के शिद्दत भरे जज्‍बात ।
और इस गाने का साथ । उफ़ जिंदगी में इससे ज्‍यादा और क्‍या चाहिये ।
प्रिय मित्रो । ध्‍यान से देखिए तो इस गाने में कुल चार पंक्तियां हैं----इतनी नाज़ुक जैसे गुलाब की पंखडियां ।

ये आवारा रातें, ये खोई सी बातें, ये उलझा सा मौसम, ये नजरों की घातें
ये नागन से बलखाये ख्‍वाबों के साये, ये चिटके से तारे जो पलकों पे छाये
ये सोई सी गलियां, ये कुंभलाई कलियां, ये आंखों के भंवरे करें रंगरलियां
ये बिखरी हवाएं, ज्‍यों टूटी सी आहें, बुलाएं सभी को नजारों की बाहें


हर पंक्ति के बाद ये जुमला आता है—कहां आ गये हम कहां जा रहे थे ।
गीत का शिल्‍प अजीब-सा है । मगर इसका असर कमाल का है ।
सच कहूं तो मुझे शब्‍द नहीं मिल रहे हैं, क्‍या लिखूं इस गाने के बारे में ।
अंग्रेजी में कहूं तो really i am out of words
सलाम मधुकर राजस्‍थानी की प्रतिभा को ।
सलाम मन्‍ना दा को ।
अफसोस बस यही है कि फिल्‍मी दुनिया ने मन्‍ना दा को केवल मज़ाहिया गीतों, भजनों और कव्‍वालियों का गायक बना कर रख दिया था ।
एक अच्‍छे गायक का सही इस्‍तेमाल नहीं कर पाये उस दौर के लोग ।
शुक्र है कि ये अलबम आया ।

इन गीतों की फेहरिस्‍त आपको दे रहा हूं – जिन पर आगे चर्चा करेंगे

1- सावन की रिमझिम में थिरक थिरक नाचे रे मयूरपंखी रे सपने
2- नथली से टूटा मोती रे
3- शाम हो जाम हो सुबू भी हो
4- कुछ ऐसे भी पल होते हैं जब रात के गहरे सन्‍नाटे गहरी नींद में सोते हैं
5- चंद्रमा की चांदनी से भी नरम और उषा के भाल से ज्‍यादा गरम, है नहीं कुछ और केवल प्‍यार है
वगैरह ।।
बताईये क्‍या याद आया आपको इस गाने को सुनकर ।
और हां । क्‍या आपके पास ये अलबम है ।
अगर नहीं तो बताईये मैं कुछ व्‍यवस्‍था करूं ।

12 comments:

Anonymous,  April 27, 2007 at 11:49 AM  

Hyderabad se Annapurna

Bahut pahale Vividh Bharati se Sham main 6:30 baje bajane vaale geeton main Ek din maine do geet sune jinme pahalaa geet tha Mayurpankhi re sapne aur shaayad isi geet ke liye kaha gaya tha ki yeh geet Vividh Bharati ke Arambh hone ke Utsav main Mannade ne gaya tha aur bol agar main galat naa hun tho Madhukar Rajasthani ke hai. Doosara geet jo oos din pahali baar suna tha voh tha kamal baarud ka geet film Ramu dada se - suna hai jab se Mausam hai pyar ke khabil. Yeh dono geet os din pahali baar vividh Bharathoi per sune aur aaj tak kaanon main goonjate hai. Dhanyavaad aapka jo is parampara ko aap alag andaaz main internet per aage bada rahe hai.

Raviratlami April 27, 2007 at 12:40 PM  

धन्यवाद. इस लेख को लिखकर गीत सुनने का मेरा अंदाज बदल दिया आपने तो!

mahashakti April 27, 2007 at 1:54 PM  

बधाई हर दिन एक अच्‍छी पोस्‍ट मजा आ जाता है प्‍ढ़ कर

अभय तिवारी April 27, 2007 at 2:14 PM  

लो फिर याद आ गई..

शैलेश भारतवासी April 27, 2007 at 3:21 PM  

मैं तो मन्ना डे द्वारा गाए गये हिन्दी फिल्मी गीत ही सुना हूँ, मगर आपने उनके गैर फ़िल्मों की मीमांसा करके मेरी प्यास को बढ़ा दिया है। सच में गीत का शिल्प अजीब है मगर है बहुत बढ़िया।

रंजु April 27, 2007 at 5:56 PM  

wonderful ...ab padh ke lag raha hai ..inko suna kaise ja sakata hai....koi rasata hai kya..in khubsurat bolo ko sunane ka:)

Manish April 27, 2007 at 10:39 PM  

वाह यूनुस भाई ! क्या बात है ..मैंने अभी सिर्फ बोल पढ़े है मधुकर राजस्थानी के इस गीत के मजा आ गया ..गीत अगर आपके पास हो तो forward करिएगा ।

antarman-- April 28, 2007 at 1:59 AM  

http://antarman-antarman.blogspot.com/2007/03/blog-post_16.html

युनुस जी,
अपके लिये ये लिन्क भेज रही हूँ
आशा है, आप देख पायेँगेँ -
आपका सुझाव सही है --विविधभारती / आकाशवाणी जब एक बच्चे की तरह, मेरे पापाजी
अन्य साथियोँ के साथ तैयार कर रहे थे, उनके यादगार बयाँ जल्द ही पेश करुँगी -
-- लावण्या

yunus April 28, 2007 at 10:25 AM  

अन्‍नपूर्णा जी धन्‍यवाद, सिर्फ एक करेक्‍शन करना चाहूंगा, सावन की रिमझिम में थिरक थिरक नाचे रे मयूरपंखी सपने, ये गीत अनजान ने लिखा है । अगले शनिवार से विविध भारती पर गीतकार समीर से उनके पिता गीतकार अनजान के बारे में की गई मेरी लंबी प्रसारित होने जा रही है, शाम चार बजे, सरगम के सितारे में । शीर्षक है ‘गीतकार अनजान की कहानी उनके बेटे गीतकार समीर की ज़बानी’ । मई के पूरे महीने यानी चारों शनिवार को ये एक एक घंटे की ये चर्चा सुनवाई जायेगी । उसमें भी इस गाने का बड़ा जज्‍बाती जिक्र आया है, सुनिएगा । आपने रामू दाद फिल्‍म के गाने का जिक्र करके अच्‍छा गीत याद दिलाया है ।

भाई रवि रतलामी, महाशक्ति, अभय तिवारी और शैलेष भारतवासी सभी को धन्‍यवाद, रंजु जी इस एलबम के कैसेट से सी0डी0 बनवा रहा हूं । फिर आपको भेज दूंगा । तब तक इंटरनेट पर आप इसे यहां इसे सुन सकती हैं । यही बात मैं मनीष जी से भी कहना चाहता हूं ।

लावण्‍या जी, आपके भेजी लिंक पढ़ी । मुझे आपके उन संस्‍मरणों का इंतज़ार रहेगा, जब सन 57 से लेकर 77, 78 के दौरान आपके पिताश्री पं0 नरेंद्र शर्मा विविध भारती को पैंया पैंया चलना सिखा रहे थे । मैंने तो केवल उनकी आवाज़ सुनी है और तस्‍वीरें ही देखी हैं ।

yunus April 28, 2007 at 10:59 AM  

sorry the hyperlink did not worked.
here u can listen these songs

http://www.musicindiaonline.com/music/compilations/s/album.6082/

Vikas April 29, 2007 at 4:10 PM  

Yunusbhai, Mannade ji ka ek geet hain jo Radio Shrilanka ke kisi program ki signature tune banake bajata hain. 'Khayalon me ho tum, Hawaon me ho tum..Nazar me tum Jigar me tum jahanme tum hi tum' Aaasha hain aap is ke bareme bhi likhenge.

....MaThUr..... November 23, 2009 at 6:39 PM  

yunus bhai.. main manna de ka gair filmi geet "mayurpankhi re sapney mere" khoj raha hoon...par..mujhe mil nahi raha hai...agar aapkey paas hai . . to please mujhe bhejen...I will be very thankful to you...

mera mail id hai:

abhishekmathur.10d@gmail.com

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