संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
ध्वनि-तरंगों की ताल पर
विविध-भारती पर मुझे सुनिए:
वंदनवार:रविवार सुबह 6-05 त्रिवेणी: रविवार सुबह 7-45 छायागीत: रविवार रात 10-00 जिज्ञासा- शनिवार शाम 7-45 और रविवार सुबह 9-15
रेडियोवाणी पर कल्ट-क़व्वालियों की श्रृंखला अपने अनियमित तरीक़े से जारी है । इसी सिलसिले में आज हम एक ऐसी क़व्वाली लेकर आए हैं जिसे हज़रत पैग़ंबर मोहम्मद के जन्मदिन के मौक़े पर ख़ासतौर पर गाया जाता है । इसके बारे में सबसे पहले मुझे भाई अनामदास ने बताया था । उसके बाद एक दिन बोधिसत्व ने इसका जिक्र किया । इन दोनों का ही कहना है कि बचपन के दिनों में इसे उन्होंने बहुत सुना है ।
जाफर हुसैन ख़ां बदायूंनी हिंदुस्तान के नामी क़व्वाल हैं । और ख़ालिस-क़व्वालियों के मामले में उनका दरजा बहुत ऊंचा है । वरना क़व्वालियों के नाम पर आजक़ल मुहब्बत भरी ग़ज़लें ठेली जा रही हैं । मुझे इस क़व्वाली की सबसे बड़ी ख़ासियत इसका 'भदेस' होना लगता है । 'बधावा' उत्तरप्रदेश में बच्चे के पैदा होने के वक्त गाया जाता है । शायद ये 'सोहर' का ही एक रूप है । हम 'अज्ञानियों' को कोई 'टॉर्च' दिखाए तो थोड़ा ज्ञान बढ़े । जाफर हुसैन खां बदायूंनी के बारे में कुछ कहने की ज़रूरत नहीं । उनकी अन्य क़व्वालियों के रेडियोवाणी पर आने का इंतज़ार कीजिए ।
क़व्वाली में कबीर---ये बात ज़रा अजीब लगती है । पर एक क़व्वाल घराना ऐसा है जो बरसों-बरस से 'कबीर' की साखियों को क़व्वालियों के रूप में गाता रहा है । आज इसी घराने की बात की जायेगी ।
अपनी श्रृंखला 'कल्ट-क़व्वालियां' के ज़रिए हम 'एक्सप्लोर' कर रहे हैं क़व्वालियों के अनूठे संसार को । यहां मुहब्बतों की क़व्वालियां फिलहाल नहीं सुनवाई जायेंगी । ना ही उनकी बारी जल्दी आयेगी । अभी तो हम रूहानी दुनिया के सुकून भरे रास्तों पर तफरीह़ कर रहे हैं । इस श्रृंखला की दूसरी कड़ी में हमने 'क़व्वाल बच्चों के घराने' की बात की थी । मुंशी रज़ीउद्दीन इस घराने के एक स्तंभ हैं । जो 1919 में दिल्ली में पैदा हुए थे । रज़ीउद्दीन उस्ताद उमराव ख़ान के पोते थे--जो हैदराबाद दकन रियासत के दरबार में संगीतकार थे । रज़ी ने अपने बड़े भाई अब्दुल हमीद ख़ां और चाचा अब्दुल करीम ख़ां से शास्त्रीय-संगीत की तालीम ली थी । अपनी तालीम पूरी करने के बाद मुंशी रज़ीउद्दीन ओस्मानिया रियासत के रेडियो स्टेशन में लग गए । कुछ वक्त तक उनका ताल्लुक आकाशवाणी से भी रहा । विभाजन के बाद मुंशी रज़ीउद्दीन करांची चले गए । हालांकि उन्हें दिल्ली में उनके तमाम साथियों ने रोकने की कोशिश की लेकिन उनका मन कराची में अपने परिवार के पास जाने की था । एक ब्लॉग पर ये पता चला कि 'मुंशी' उन्हें इसलिए कहा जाता रहा क्योंकि काफी कम उम्र में उन्होंने उर्दू की 'मुंशी फ़ाजि़ल' की डिग्री हासिल कर ली थी । इसलिए परिवार और बाहर के लोग उन्हें अदब से मुंशी कहते रहे । मुंशी रज़ीउद्दीन ने शास्त्रीय-गायन भी किया और क़व्वालियां भी गाईं ।
फ़रीद-अयाज़ क़व्वाल मुंशी रज़ीउद्दीन के ही बेटे हैं । कुछ बरस पहले यानी मुंशी रज़ी के निधन से पहले तक तीनों एक साथ क़व्वालियां गाते थे । और वो समां ही कुछ और होता था । जी नहीं...काश...हम देख पाते मत कहिए । यूट्यूब पर सर्च कीजिए 'मुंशी रज़ीउद्दीन' और अभी इसी वक्त देखिए । हिस्सा बन जाईये क़व्वाली की उस तरंग का....जो आज बहुत दुर्लभ है । 'क़व्वाल बच्चों के घराने' में 'कबीर' को गाने की परंपरा रही है । आज इस घराने की गायकी का परिचय कराते हुए हम पेश कर रहे हैं एक बेहद मक़बूल क़व्वाली 'भला हुआ मोरी गगरी फूटी' । इसे कबीर की रचनाओं का कोलाज या मोन्टाज कहा जा सकता है । नीचे दो ऑडियो फाईलें लगाई गई हैं । एक में फ़रीद अयाज़ अकेले गा रहे हैं । दूसरी फाईल में मुंशी रज़ीउद्दीन प्रमुख गायक हैं और फ़रीद अयाज सहायक गायक ।
भला हुआ मोरी गगरी फूटी--मुंशी रज़ीउद्दीन एवं साथी । चूंकि ये एक लाईव-कंसर्ट की रिकॉर्डिंग है, इसलिए साउंड-क्वालिटी के मामले में थोड़ा समझौता करना पड़ा है ।
अवधि--9:29 मि.
'भला हुआ मोरी गगरी फूटी' --फ़रीद अयाज़ क़व्वाल एवं साथी । अवधि--6:44 मि.
क़व्वाली में शामिल कुछ साखियां । कबीरा कुआं एक है और पानी भरें अनेक भांडे ही में भेद है, पानी सबमें एक ।।
भला हुआ मोरी गगरी फूटी, मैं पनियां भरन से छूटी
मोरे सिर से टली बला ।।
चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोए
दो पाटन के बीच यार साबुत बचा ना कोए ।।
चाकी चाकी सब कहें और कीली कहे ना कोए
जो कीली से लाग रहे, बाका बाल ना बीका होए ।।
हर मरैं तो हम मरैं, और हमरी मरी बलाए
साचैं उनका बालका कबीरा, मरै ना मारा जाए ।
माटी कहे कुम्हार से तू का गोंधत मोए
एक दिन ऐसा आयेगा कि मैं गूंधूंगी तोय ।।
कविता कोश में कबीर को यहां पढ़ें । दिलचस्प बात ये है कि उक्त दोनों क़व्वालियों के कई संस्करण उपलब्ध हैं । जिनमें हर बार साखियां बदल जाती हैं । यूट्यूब पर आप ये रचनाएं यहां देख-सुन सकते हैं । रेडियोवाणी पर 'कल्ट-क़व्वालियों' का ये अनियमित-सिलसिला जारी रहेगा, अगर पाठकों के पास इस दर्जे की कोई 'कल्ट-क़व्वाली' है तो मेरे ईमेल पते पर संपर्क करें ।
आज 'वसंत-पंचमी' है । वाग्देवी-सरस्वती की पूजा का ये पर्व कलाकारों के लिए विशेष महत्त्व रखता है । रेडियोवाणी पर 'कल्ट-क़व्वालियों' की श्रृंखला में ( तीसरी कड़ी के रूप में ) वसंत-पंचमी की विशेष पेशकश में हम आपको सुनवाने जा रहे हैं वारसी बंधुओं की आवाज़ में हज़रत अमीर ख़ुसरो की रचना । क़व्वाली में किस तरह से सरसों फूल रही है...ये सुनकर आपका मन-मयूर नाच उठेगा । इसलिए बस यही इल्तिजा है कि ख़ूब फुरसत से इस रचना को सुनिएगा ।
लेकिन इससे पहले आपको बताया जाए कि किस तरह से भारत की दरगाहों में वासंती-परंपरा रही है । किसी तरह मुझे किसी ज़माने में 'अमर उजाला' में प्रकाशित एक लेख प्राप्त हुआ है । जिसमें लेखक का नाम नहीं दिया गया है । अमर उजाला से साभार है ये दरगाहों में वासंती परंपरा पर ये लेख ।
वसंतोत्सव केवल हिंदुओं की विचारधारा से जुड़ा उत्सव नहीं है। बहुत कम लोग जानते होंगे कि वसंतोत्सव मनाने की परंपरा मुस्लिमों से भी उतनी ही गहराई से जुड़ी हुई है जितनी हिंदुओं से। स्त्रोत बताते हैं कि 12वी शताब्दी से ही भारत का मुसलिम समाज वसंतोत्सव मनाता आ रहा है। इसकी शुरूआत करने का श्रेय चिश्ती सूफियों को जाता है। दिल्ली के चिश्ती सूफी संत निजामुद्दीन औलिया के समय में वसंतोत्सव मुसलिम समुदाय से जुड़ गया। बहुत पुरानी बात है, जब अपने युवा भतीजे तैकुद्दीन नूह की मौत से गमजदां निजामुद्दीन औलिया ने अपने आपको सांसारिक गतिविधियों से बिलकुल अलग कर लिया। निजामुद्दीन नूह की मौत से इस कदम दुखी थे कि वे या तो नूह की कब्र के पास बैठे रहते या कमरे में बंद रहते । उनके परम मित्र, शिष्य और अपने जमाने के मशहूर शायर अमीर खुसरो से उनकी ये हालत देखी नहीं गई। वे अपने गुरु के मन में फिर से उत्साह जगाने की जुगत करने लगे ।
एक दिन खुसरो ने देखा कि कुछ औरतें, बनाव श्रंगार किए, पीले वस्त्र पहने, फूल लेकर गाती हुई जा रही हैं। खुसरो ने उनसे पूछा कि वे इस प्रकार बन संवर कर पीले वस्त्र पहन कहां जा रही हैं तो महिलाओं ने कहा कि आज वसंत पंचमी है और वो अपने देवता को वसंत यानी पुष्प अर्पित करने जा रही हैं। खुसरो को ये बड़ा दिलचस्प लगा। उन्होंने तय कर लिया कि उनके गुरु को भी एक वसंत की जरूरत है।
खुसरो ने औरतों की तरह बनाव श्रंगार किया, पीले वस्त्र पहले और पीले-भूरे फूल लेकर नूह की कब्र की तरफ गाते हुए चल दिए, जहां निजामुद्दीन अकेले बैठे हुए थे। संत ने देखा कि कुछ औरतें गाती हुई उनकी तरफ आ रही हैं। लेकिन वे पहचान नहीं पाए कि उनमें खुसरो भी हैं। खैर कुछ देर तो वो चकित से देखते रहे लेकिन जल्द ही उन्हें माजरा समझ में आया और वो हंस पड़े। उनको हंसते देख खुसरो और उनके साथ आए अन्य संतों और सूफियों ने वसंत के गीत गाने आरंभ कर दिए। इनमें एक गीत था
सकल बन फूलरहीसरसों,
अमवा बौराए, टेसू फूले,
कोयल बोले डार डार,
और गोरी करत सिंगार,
मालनिया गढ़वा लाइन करसों,
सकल बन फूल रहीं सरसों
। ’’
ये वाकया इतना प्रभावी रहा कि निजामुद्दीन औलिया की खानेकाह में हर साल वसंतोत्सव मनाया जाने लगा। धीरे धीरे यह उत्सव अन्य सूफी दरगाहों में भी मनाया जाने लगा और स्थानीय मुसलमान हर साल वसंतोत्सव में अपने सूफी संत की मजारों और दरगाहों पर जाने लगे। मुगल काल में वसंतोत्सव एक बड़े त्योहार की तरह मनाया जाता था जिसमें शासक वर्ग भी जनता के साथ घुलमिलकर वसंत का आनन्द उठाता था।
महेश्वर दयाल ने अपनी पुस्तक आलम में इंतिखाब: दिल्ली (1987) में बहादुरशाह जफर के शासनकाल के एक ऐसे ही वसंत का जिक्र किया है-‘‘सरदी अपनी कड़क छोड़ सुस्ता रही है, वसंत आ रही है और दिल्ली वाले वसंत का आगमन करने के लिए तैयार हैं। कोई कदम शरीफ में इत्र चढ़ा रहा है तो कहीं गीत संगीत की महफिलें सजी हैं। ऐसे में जनता के बीच बादशाह के जन्मदिन का पैगाम सुनाया गया तो दिल्ली वाले खुशी से नाच उठे। लो, आज तो वृहस्पतिवार भी है। दिल्ली में यमुना किनारे लाल किले के मैदान में भारी भीड़ उमड़ी है, बादशाह को जन्मदिन की बधाई देने को। यहां तिल रखने की भी जगह नहीं। खूब धूम का मेला लगा है। घरों के परदे, औरतों की चादरें, मर्दो की पगडि़यां, बच्चों के कपड़े सब बसंती रंग में रंगे हुए हैं। शाम होते ही आसमान में भूरे और पीले रंग के गुब्बारे दिखने लगे। इन गुब्बारों से बंधी मोमबत्तियां तो आसमान को जगमगा रही हैं। पूरा आसमान पीला और भूरा हो गया है, मानों आसमान की आंखों से फूलों की बरसात हो रही हो। ’
भारत में सूफियों की परंपरा को हिंदु समाज से ज्यादा अलग करके देखा नहीं जा सकता। सूफियों ने न केवल भारतीय गीत संगीत और संस्कृति को अपनाया बल्कि समय समय पर इसमें उत्साहजनक बदलाव भी करते रहे।
और ये रही अमीर ख़ुसरो की वो रचना जिसका जिक्र हमने ऊपर किया है । सकल बन (सघन बन) फूल रही सरसों,
सकल बन (सघन बन) फूल रही....
अम्बवा फूटे, टेसू फूले, कोयल बोले डार डार,
और गोरी करत शृंगार,
मलनियां गढवा ले आइं करसों,
सकल बन फूल रही...
तरह तरह के फूल लगाए,
ले गढवा हातन में आए ।
निजामुदीन के दरवाजे पर,
आवन कह गए आशिक रंग,
और बीत गए बरसों ।
सकल बन फूल रही सरसों । इसके आगे गाते समय इस रचना में थोड़ी तब्दीली कर दी गयी है ।
वारसी बंधुओं की आवाज़ में यही रचना ।
अवधि-9:21
अमीर खुसरो की कुछ रचनाएं यहां पढिये ।
कल रेडियोवाणी पर 'क़व्वाली में कबीर' सुनने के लिए तैयार रहिए । वसंत पंचमी की शुभकामनाएं । फूल रही सरसों.....सकल बन......फूल रही सरसों !
रेडियोवाणी पर 'कल्ट-क़व्वालियां' श्रृंखला शुरू करने के साथ ही क़व्वालियों की दुनिया के नए-दरीचे खुलने लगे हैं । कहना ना होगा कि हम पहले इस दुनिया से थोड़े-बाख़बर और ज़्यादा बेख़बर रहते थे । पर इस श्रृंखला की तैयारियों और अब और ज़्यादा खोजबीन के सिलसिले ने हमारे दिमाग़ में टॉर्च जला दी है ।
'कल्ट-क़व्वालियों' का ये सिलसिला हमें भारत के अलावा पाकिस्तान और दुनिया के इतर देशों में भी ले जायेगा । फिलहाल पाकिस्तान चलते हैं और आपकी मुलाक़ात करवाते हैं फ़रीद अयाज़ क़व्वाल से । फ़रीद अयाज़ क़व्वाल पाकिस्तान के मशहूर क़व्वाल हैं । पर उनका ताल्लुक़ दिल्ली के मशहूर घराने 'क़व्वाल बच्चों के घराने' से है । इनके वालिद मरहूम मुंशी रज़ीउद्दीन अहमद ख़ां दुनिया के बेमिसाल क़व्वालों में गिने जाते हैं । 'कल्ट क़व्वालियों' के सिलसिले में अगली पेशक़श मुंशी रज़ीउद्दीन की ही एक क़व्वाली की होगी । लेकिन आज तो फ़रीद अयाज़ की बात । फ़रीद अयाज़ और इनके पिता मुंशी रज़ीउद्दीन सूफ़ी रचनाएं गाने के लिए मशहूर रहे हैं । कबीर, नानक, बुल्लेशाह, अमीर ख़ुसरो वग़ैरह की रचनाएं वो बड़ी शिद्दत से गाते हैं । इस क़व्वाली को रेडियोवाणी पर पहले भी पेश किया जा चुका है । लेकिन इस बात को बहुत वक्त बीत गया ।
तो चलिए कल्ट क़व्वालियों की इस पेशक़श में आज फ़रीद अयाज़ की दुनिया से होकर गुज़रें । इनका कहना है कि ये रचना तीन सौ सालों से इनकी ख़ानदान में गाई जा रही है । मैंने तो पहली बार क़व्वाली में कन्हैया की बात सुनी है । क्या आपको कोई और क़व्वाली याद आती है जिसमें कन्हैया का जिक्र हो ।
ये रहे इसके बोल--
कन्हैया बोलो याद भी है कुछ हमारी,
कहूं क्या तेरे भूलने के मैं वारी
बिनती मैं कर कर पमना से पूछी
पल पल की खबर तिहारी
पैंया परीं महादेव के जाके
टोना भी करके मैं हारी
कन्हैया याद है कुछ भी हमारी
खाक परो लोगो इस ब्याहने पर
अच्छी मैं रहती कंवारी
मैका में हिल मिल रहती थी सुख से
फिरती थी क्यों मारी मारी ।
कन्हैया कन्हैया ।।
पिछले दिनों तरंग पर मैंने अपनी अजमेर यात्रा का ब्यौरा लिखा था । और आपको बताया था कि किस तरह से दरग़ाह के ठीक बाहर मौजूद 'म्यूजिक स्टोर्स' से अपन ने कुछ क़व्वालियां जुगाड़ी हैं । भाई अनामदास ने काफी पहले कुछ क़व्वालियों की फ़रमाईश की थी तभी से कुछ 'कल्ट' क़व्वालियों पर श्रृंखला करने का विचार लगातार बना हुआ था । आखिरकार सारी चीज़ों को एक तरफ़ रखकर आज हमने 'क़सम' खा ही ली है कि क़व्वालियों पर अनियमित श्रृंखला का 'आग़ाज़' कर देंगे ।
दरअसल क़व्वालियों से हमारी कई निजी यादें जुड़ी हुई हैं । कुछ तकलीफ़देह तो कुछ मीठी । क़व्वालियों का इंसानी सहनशीलता के बाहर के डेसिबल पर बजाया जाना सदा-सर्वदा से हमारे लिए तकलीफ़देह रहा है और मीठी यादें वो हैं जब हमने अपने जन्म के शहर 'दमोह' में पाकिस्तान के सीनियर साबरी ब्रदर्स को एक उर्स में गाते हुए सुना था । अज़ीज़ नाज़ां को सागर में एक उर्स में सुना । उर्स में हम केवल 'जिज्ञासावश' और 'अनुभव संसार को बढ़ाने' के तयशुदा मक़सद से ही जाते थे । क़व्वालियों से उस दौरान हमें ज़रा भी प्यार नहीं था । कई कारणों से क़व्वाली हमें सुहाती नहीं थी । उसकी वजह शायद धार्मिक-कट्टरता के तंग दायरों में सबेरे-सबेरे पागलपन की हद तक ज़ोरदार आवाज़ में क़व्वालियां बजाकर सिर दुखवाना रही थी ( ऐसा ननिहाल के शहर दमोह में जाकर हमेशा महसूस होता था ) पर जब समझदारी बढ़ी और अध्ययन बढ़ा तो क़व्वाली के महत्त्व का अंदाज़ा लगा और फिर जब हमने इन क़व्वालियों की खोजबीन शुरू की तो 'गंगा-जमना' में बहुत पानी बह चुका था । यही हाल 'बुंदेली लोकगीतों' की खोज का भी हुआ है । वो 'क्लासिक' लोकगीत जिनसे हमारी गर्मियों की छुट्टियां गुलज़ार होती थीं अब मिल ही नहीं रहे । जैसे 'मेरी बऊ हिरानी हैं' या 'बैरन हो गई जुनहईया मैं कैसी करूं' । देसराज पटैरिया, हरगोविंद विश्वकर्मा वग़ैरह की आवाज़ें । अगर कोई 'बुंदेला हरबोला' सुन रहा हो तो इस सिलसिले में हमारी मदद करे ।
ख़ैर जिन्हें हम 'क्लासिक' या 'कल्ट' क़व्वाली मानते हैं उनमें से कुछ तो मिल ही गयी हैं । ये पूरी श्रृंखला हम अनामदास जी को समर्पित कर रहे हैं । जिन्होंने एक बार इसरार किया और उनके 'नॉस्टेलजिया', उनकी बेक़रारी ने हमें मजबूर कर दिया कि हम उनकी ये 'तमन्ना' पूरी करें और इसी बहाने बचपन के गलियारों में भी सैर कर आएं ।
हबीब पेन्टर की इस क़व्वाली से श्रृंखला का आग़ाज़ हो रहा है । हबीब पेन्टर के बारे में ज्यादा जानकारी कहीं नहीं मिली । सिवाय इसके कि उनका ताल्लुक़ अलीगढ़ से था । इस श्रृंखला में आगे चलकर मजीद शोला, इस्माइल आज़ाद, मोईन नियाज़ी, शंकर शंभू, जानी बाबू, यूसुफ़ आज़ाद वग़ैरह की क़व्वालियां आपको सुनने मिलेंगी । नीचे इस क़व्वाली के बोलों के कुछ अंश पेश हैं ।
क़व्वाली-बहुत कठिन है डगर पनघट की
गायक हबीब पेन्टर
अवधि- 6:25
बहुत कठिन है डगर पनघट की
कैसे मैं भर लाऊं मदवा से मटकी
कोई गुल को तरसता है कोई गुल को मसलता है
कोई महले-नज़ारा है, कोई फुरकत में जलता है
कहीं पर भीत के टुकड़े, कहीं पर घर बिखरता है
कहीं पर फर्शे-मख़मल है, कोई कांटों पे चलता है
किसी को तख़्त मिलता है, कोई सूली पे चढ़ता है
किसी की खाल खिंचती है कोई दुनिया में फलता है
हबीब अब कहता हूं बस मुख़्तसर ये है
जो उस पर जान देता है वही बरबाद रहता है
बहुत कठिन है डगर पनघट की ।।
मोहरूप संसार के लंबे लंबे पात,
धूप पड़े तो काम ना आवै छाया करते रात
दुर्बल डोले पर्वत-पर्वत, बाट तकै बलवान
पाके सागर ज्ञानी डूबे, मूरख बुद्धिमान
गूंगे दीपक-राग अलापें, बहरे ढोल बजायें
नैनसुख तो डगर में भटकें, अंधे गैल दिखाएं
मछली गोता खात पवन में, कागा जल में फिरते हैं
बगला तो सिंहासन बैठै, हंसा मारे फिरते हैं
ताल-तलैया छोड़ के धुबिया रेत में लत्ता धोए
धरती बरसे, बदरा सुलगैं अंधिया निश्चित होए
मस्जिद ऊपर बांग दे मुल्ला रखकर उंगली कान
घंटा बाजै मंदिर में कछु बहरो है भगवान
योगी-ज्ञानी शोर मचाएं देखो उल्टी रीत
गुरनन हैं ये कहें हबीब, झूठी जग की प्रीत
बहुत कठिन है डगर पनघट की ।।