बारो घी के दीयना : नायाब क़व्वाली, जाफ़र हुसैन ख़ां बदायूंनी की आवाज़
रेडियोवाणी पर कल्ट-क़व्वालियों की श्रृंखला अपने अनियमित तरीक़े से जारी है । इसी सिलसिले में आज हम एक ऐसी क़व्वाली लेकर आए हैं जिसे हज़रत पैग़ंबर मोहम्मद के जन्मदिन के मौक़े पर ख़ासतौर पर गाया जाता है । इसके बारे में सबसे पहले मुझे भाई अनामदास ने बताया था । उसके बाद एक दिन बोधिसत्व ने इसका जिक्र किया । इन दोनों का ही कहना है कि बचपन के दिनों में इसे उन्होंने बहुत सुना है ।
जाफर हुसैन ख़ां बदायूंनी हिंदुस्तान के नामी क़व्वाल हैं । और ख़ालिस-क़व्वालियों के मामले में उनका दरजा बहुत ऊंचा है । वरना क़व्वालियों के नाम पर आजक़ल मुहब्बत भरी ग़ज़लें ठेली जा रही हैं । मुझे इस क़व्वाली की सबसे बड़ी ख़ासियत इसका 'भदेस' होना लगता है । 'बधावा' उत्तरप्रदेश में बच्चे के पैदा होने के वक्त गाया जाता है । शायद ये 'सोहर' का ही एक रूप है । हम 'अज्ञानियों' को कोई 'टॉर्च' दिखाए तो थोड़ा ज्ञान बढ़े । जाफर हुसैन खां बदायूंनी के बारे में कुछ कहने की ज़रूरत नहीं । उनकी अन्य क़व्वालियों के रेडियोवाणी पर आने का इंतज़ार कीजिए ।
