जि़हाले-मिस्कीन मकुन तग़ाफ़ुल...मुकेश और सुधा मल्होत्रा की आवाज़ें..
कैलेन्डर का पन्ना देखें तो तारीख़ें कोरी-सी नज़र आती हैं। वो अपने आप कुछ नहीं कहतीं। ये तो हम हैं कि तारीख़ों से कुछ यादों को जोड़ लेते हैं और वो ख़ास बन जाती हैं। सत्ताईस अगस्त यूं तो एक कोरी तारीख़ है। लेकिन सन 1976 में आज ही के दिन अमेरिका में डेट्रॉइट मिशिगन में मुकेश का निधन हो गया था। इसलिए ये तारीख़ मुकेश की याद की तारीख़ बन गयी।
मुकेश आम-जनों के गायक हैं। आप पायेंगे कि हर तरफ़ मुकेश के दीवाने हैं। हर तरफ़ मुकेश
के 'क्लोन' मौजूद हैं। बहरहाल.....मुकेश की याद में उनका एक अनमोल गीत। ये हज़रत अमीर ख़ुसरो की रचना है। आपको बता दें कि सन 1960 में संगीतकार मुरली मनोहर स्वरूप ने एक अलबम बनाया था, जिसका नाम था 'अमीर ख़ुसरो'। इस अलबम में फिल्म-संसार के बड़े गायक-गायिकाओं ने हज़रत अमीर ख़ुसरो की रचनाओं को गाया था। संगीतकार थे मुरली मनोहर स्वरूप। खुशी की बात ये है कि ये अलबम यू-ट्यूब पर बाक़ायदा उपलब्ध है।
तो चलिए सुनते हैं ये रचना। यहां ये जिक्र करता चलूं कि मैंने 'रेडियोवाणी' पर 'जिहाले मिस्कीं' एक बार और सुनवाया है। वो मुजफ्फर अली के अलबम 'हुस्न-ए-जानां' से था। और छाया गांगुली की आवाज़ थी। इस लिंक पर जाकर आप वो रचना भी सुन सकते हैं।
Song: Zihale miskin makun taghaful
Singer: Mukesh, sudha malhotra
Music: Murli Manohar swaroop
Duratio: about 5 min.
ये रहे इस रचना के बोल
अगर आप चाहते हैं कि 'रेडियोवाणी' की पोस्ट्स आपको नियमित रूप से अपने इनबॉक्स में मिलें, तो दाहिनी तरफ 'रेडियोवाणी की नियमित खुराक' वाले बॉक्स में अपना ईमेल एड्रेस भरें और इनबॉक्स में जाकर वेरीफाई करें।
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मुकेश आम-जनों के गायक हैं। आप पायेंगे कि हर तरफ़ मुकेश के दीवाने हैं। हर तरफ़ मुकेश
तो चलिए सुनते हैं ये रचना। यहां ये जिक्र करता चलूं कि मैंने 'रेडियोवाणी' पर 'जिहाले मिस्कीं' एक बार और सुनवाया है। वो मुजफ्फर अली के अलबम 'हुस्न-ए-जानां' से था। और छाया गांगुली की आवाज़ थी। इस लिंक पर जाकर आप वो रचना भी सुन सकते हैं।
Song: Zihale miskin makun taghaful
Singer: Mukesh, sudha malhotra
Music: Murli Manohar swaroop
Duratio: about 5 min.
ये रहे इस रचना के बोल
"जिहाल-ए-मिस्कीं मकुन तगाफुल, दुराय नैना बनाय बतियाँ।यू-ट्यूब पर ये रचना। ताकि आप इस अलबम की बाक़ी रचनाएं खोज सकें।
किताबे हिज्राँ, न दारम ऐ जाँ, न लेहु काहे लगाय छतियाँ।।
शबाने हिज्राँ दराज चूँ जुल्फ बरोजे वसलत चूँ उम्र कोताह।
सखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ।
यकायक अज़दिल दू चश्मे जादू बसद फरेबम बवुर्द तस्कीं।
किसे पड़ी है जो जा सुनावे पियारे पी को हमारी बतियाँ
चूँ शम्आ सोजाँ, चूँ जर्रा हैराँ, हमेशा गिरियाँ ब इश्के आँ माह।
न नींद नैंना, न अंग चैना, न आप आये न भेजे पतियाँ।।
बहक्के रोजे विसाले दिलबर के दाद मारा फरेब खुसरो।
सपीत मन के दराये राखूँ जो जाय पाऊँ पिया की खतियाँ।।
या (दुराय राखो समेत साजन जो करने पाऊँ दो बोल-बतियाँ।)
अर्थात मुझ गरीब मिस्कीन की हालत से यूँ बेख़बर न बनो। आँखें मिलाते हो, आँखें चुराते हो और बातें बनाते हो। जुदाई की रातें तुम्हारी कारी जुल्फ़ों की तरह लंबी व घनी है। और मिलने के दिन उम्र की तरह छोटे। शमा की मिसाल मैं सुलग रहा हूँ, जल रहा हूँ और ज़र्रे की तरह हैरान हूँ। उस चाँद की लगन में आ मेरी ये हालत हो गई कि न आँखों को नींद है न बदन को चैन, न आप आते हैं न ख़त लिखते हैं ।
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