संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Saturday, August 18, 2007

कव्वाली में कन्हैया—सुनिए फरीद अयाज़ की आवाज़ में ये अदभुत कव्वाली-- कन्हैया याद भी है कुछ हमारी

आज तो कमाल हो गया । मैं इंटरनेट पर नज़ीर अकबराबादी की रचना ‘कन्‍हैया का बांकपन’ खोज रहा था । इसे पीनाज़ मसानी ने गाया है और विविध भारती में इसका रिकॉर्ड सही सलामत है । ख़ैर ये रचना तो नहीं मिली मगर कुछ ऐसा मिला है कि ऐन दफ्तर जाने से ठीक पहले सब कुछ छोड़कर मुझे ये पोस्‍ट लिखनी पड़ रही है । जी हां आज मैं रात्रि प्रसारण कर रहा हूं ।
मुझे मिली हैं कुछ क़व्‍वालियां । आमतौर पर क़व्‍वालियों से मेरा ज्‍यादा अनुराग नहीं रहा है । इसकी कई वजहें रही हैं । पर मुझे कुछ चुनिंदा क़व्‍वालियां पसंद है, जिसमें कबीर की एक रचना है जिसे श्‍याम बेनेगल ने अपनी फिल्‍म ‘मंडी’ में इस्‍तेमाल किया था—‘हर में हर को देखा रे बाबा हर में हर को देखा’ इसके अलावा दो चार और होंगी बस । बहरहाल आज मुझे प्राप्‍त हुई हैं फ़रीद अयाज़ क़व्‍वाल की क़व्‍वालियां ।
इंटरनेट पर मुझे फ़रीद अयाज़ के बारे में ज्‍यादा कुछ पता नहीं चल सका । बस इतना पता चला कि ये विशुद्ध क़व्‍वाली को निभाने वाली फ़नकार हैं जिनका ताल्‍लुक भारत से रहा है पर अब रहते हैं पाकिस्‍तान में । दुनिया भर में इनकी कव्‍वालियों की म‍हफिलें काफी चर्चित रही हैं । इनके बारे में ज्‍यादा जानकारी बाद में जुटाई जायेगी, फिल्‍हाल सुनिए ये क़व्‍वालियां ।

इस कव्‍वाली का उन्‍वान है—कन्‍हैया याद भी है कुछ हमारी ।
मुझे अद्भुत लगा कि कव्‍वाली और वो भी कन्‍हैया पर । हालांकि ये अजीब नहीं है । कन्‍हैया सबके प्रिय रहे हैं । क़व्‍वालों और सूफियों के भी ।
ये रहा इस क़व्‍वाली का यू ट्यूब वीडियो । जो वीडियो से ज्‍यादा तस्‍वीरों का मोन्‍टाज है ।

ये रहे इसके बोल--
कन्‍हैया बोलो याद भी है कुछ हमारी,
कहूं क्‍या तेरे भूलने के मैं वारी
बिनती मैं कर कर पमना से पूछी
पल पल की खबर तिहारी
पैंया परीं महादेव के जाके
टोना भी करके मैं हारी
कन्‍हैया याद है कुछ भी हमारी
खाक परो लोगो इस ब्‍याहने पर
अच्‍छी मैं रहती कंवारी
मैका में हिल मिल रहती थी सुख से
फिरती थी क्‍यों मारी मारी ।
कन्‍हैया कन्‍हैया ।।


इनकी कुछ और क़व्‍वालियां भी मिली हैं । हौसला अफ़ज़ाई तो कीजिये, ज़रूर पेश की जायेंगी ।
अगर आप फरीद अयाज़ कव्‍वाल के बारे में ज्‍यादा जानते हैं तो ज़रा मुझे भी टॉर्च दिखाईये ।


इस क़व्वाली की लिंक ये रही । इसे कट पेस्ट कीजिये या फिर यहां क्लिक कीजिए
http://youtube.com/watch?v=GjQBG7A3bLg

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8 comments:

rajendra August 18, 2007 at 7:24 PM  

Following write up is available on podcast.underscorerecords.info on Ayaz:

Hailing from a family of musicians now based in Karachi (Pakistan), Fareed Ayaz belongs to the group of hereditary performers of qawwali at Nizamuddin Auliya’s shrine in Delhi. Qawwali can be categorized as a song genre of Hindustani semi-classical music that is set to mystical Sufi poetry in Farsi, Hindi, Persian, Punjabi, and Urdu. Historically, this type of music was performed in smaller assemblies at the dargahs, or shrines, of the respected Sufi leaders. Since the early eighties, however, the likes of Nusrat Fateh Ali Khan and Sabri Brothers have brought qawwali to the masses by performing outside of the dargah. It is important to note that as a genre, qawwali is marked by its vast internal variation in musical and lyrical understanding, performance, and repertoire. Different musicians performing the same song can and do sound very different. More importantly, a troupe will change their presentation of the same song depending on variable factors such as time, audience, place, and setting.

This video, recorded at a public concert in New Delhi, presents a medley of different sounds that characterize qawwali as taught by the Late Munshi Raziuddin. Munshi Raziuddin was a respected musician and scholar who diligently taught his sons Fareed Ayaz (video right) and Abu-Muhammad (video left) until his death at the age of 93. In the first piece, Fareed Ayaz presents his interpretation of an encounter that he believes took place between two iconic figures in South Asian musical history–-Gopal Nayak and Amir Khusrau. Legend has it that a music competition in a king’s court had come down to the two aforementioned finalists. Gopal Nayak sang a song in Sanskrit hoping to baffle Khusrau. Khusrau replied by singing a similar melody with Persian vocalic syllables as Sanskrit substitutes. These Persian vocalic syllables came to be later known as tarana. Fareed Ayaz sings both versions commenting that Khusrau’s response was prized because it was limited in words and was able to be reproduced by the young musicians, or the qawwal bacche, of the time.

Having trained in Hindustani classical music, Fareed Ayaz’s music also includes features of khayal singing. This is especially true in the interludes between verses. For example, the second piece begins with a short aalaap and tarana in Raag Bihag before moving back into the main medley. The main song is a stanza from Khusrau’s famous poem Chhapa Tilak Sab Cheeni. This particular poem was written in reverence to Khusrau’s spiritual guide (peer) Nizamuddin Auliya. The verse sung here is:

Bal Bal Jaaon Mein Toray Rang Rajwa
Apnisee Rang Leeni Ray Mosay Naina Milaikay

The last item of the video is the popular dhamaal. This ritual is characterized by ecstatic and uncontrolled swirling of the head and body accompanied by strong punctuations in the rhythm. This type of dance and rhythmic trance is characteristic of the music at the shrine of Lal Shahbaz Qalandar. In this segment of the clip, Fareed Ayaz’s younger brother and son are on the tabla and dholak, respectively, and conclude the recital with variations in the qawwali thekha, or the metric pattern of eight beats (4 + 4).

The write up is by Sudev Sheth
who probably lives in Berkeley.

Raviratlami August 18, 2007 at 8:08 PM  

ये वीडियो देखते ये लिंक भी वहीं मिली -

मेरी रंग दे चुनरिया:

http://youtube.com/watch?v=cMB5ACOZlos

शानदार कव्वालियाँ.

Udan Tashtari August 18, 2007 at 8:36 PM  

बढ़िया रही भाई कव्वालियाँ/ रवि भाई का लिंक भी देख आये, बहुत शुक्रिया.

अनामदास August 18, 2007 at 10:54 PM  

कमाल है. बहुत बहुत धन्यवाद.
शंकर शंभू भी सुनवा दीजिए कहीं से.

अनामदास August 18, 2007 at 10:59 PM  

यूनुस भाई
क्या आपने हबीब पेंटर और जाफर हुसैन बंदायूनी को नहीं सुना है, अगर जाफर हुसैन का सिर्फ़ 'बारो घी के दियना, आज पैदा भइले आमना के ललना' सुन लें तो आपको मज़ा आ जाएगा. हबीब पेंटर जायसी और खुसरो को बहुत सुंदर गाया है, कहीं से खोज निकालिए.

Pramod Singh August 19, 2007 at 11:25 AM  

बिना किसी नाटकीयता के देखो, कव्‍वाली सुनने का क्‍या आनन्‍द है.. सही चयन!

yunus August 19, 2007 at 5:18 PM  

राजेंद्र भाई बहुत बहुत शुक्रिया इन जानकारियों के लिए । अनामदास जी हबीब पेन्टआर और जाफर दोनों को सुना है और अब जब आपने याद दिलाया है तो जरूर भविष्यि में इनकी क़व्वानलियां खोजी जाएंगी । पहली कोशिश की पर नाकाम रही । लेकिन कोशश जारी रहेगी । बहुत बहुत शुक्रिया । रवि जी जिस लिंक को आप पहले ही देख आये उसे मैं बाद में पोस्टश करने वाला था ।

Anonymous,  August 20, 2007 at 11:15 AM  

क़्व्वाली अच्छी लगी पर इससे जुड़ा नाम पहली बार सुना।

मुझे अमीर ख़ुसरो की एक रचना याद आ रही है फिल्म है - मैं तुलसी तेरे आंगन की

आवाज़ें लता और आशा की है। बोल है -

छाप तिलक छब छीनी मोसे नैना मिलाएके

हो सकें तो प्रस्तुत कीजिए।

अन्नपूर्णा

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http://www.google.com/transliterate/indic/

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