संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
Showing posts with label सलिल चौधरी. Show all posts
Showing posts with label सलिल चौधरी. Show all posts

Saturday, July 1, 2017

शीतल मंजुल कोमल तेरा आंचल मेरी सुधियों में लहराया... चरित्रहीन सीरियल का शीर्षक गीत

पिछले दिनों फेसबुक पर मैंने अंतरा चौधरी की चर्चा की अपनी सीरीज़ 'वक्‍त की धुंध' में। उन आवाज़ों की बातें इस सीरीज़ में की जा रही हैं जो वक्‍त की धुंध में खो गयीं। जब अंतरा के गाने मैंने वहां लगाये, जिनमें 'काली रे काली रे' और अन्‍य गाने शामिल थे, तो सबने पुराने ज़माने के टीवी सीरियत 'चरित्रहीन' का टाइटल सॉन्‍ग बहुत याद किया। इसलिए आज 'रेडियोवाणी' पर मैं वही गीत लेकर आया हूं।


शरतचंद्र के उपन्‍यास पर आधारित 'चरित्रहीन' पर आधारित येे  धारावाहिक हम सबकी स्‍मृतियों में कायम है। उस दौर के टीवी सीरियलों के बारे में खोज तो ये लिंक मिली। शायद आप सबके काम आ जाये, पुरानी यादों को दोहरा सकें आप। 


बहरहाल.. चरित्रहीनका ये टाइटल-सॉन्‍ग सलिल चौधरी ने बनाया था, इसे कृष्‍ण राघव लिखा था और आवाजें थीं सैकत मित्रा और अंतरा चौधरी की।  

serial: charitraheen
singer: saikat mitra, antara chowdhury
lyrics: krishna raghav
music: salil chowdhury
ये रहे इस गाने के बोल।
शीतल मंजुल कोमल, तेरा आँचल
मेरी सुधियों में लहराया
झल-मल झल-मल
और एक शाम मैंने तेरे नाम लिख दी
हौले, हौले-हौले; पुरवा डोले, पुरवा डोले
ढलते दिन की अरुणाई में सपने घोले; सपने घोले
सपने घोले
और एक शाम मैंने तेरे नाम लिख दी
पंछी एक बिचारा, टूटा हारा, टूटा हारा
सुने नभ में उड़ता फ़िरता, मारा-मारा
मारा-मारा
और एक शाम मैंने तेरे नाम लिख दी
शीतल मंजुल कोमल, तेरा आँचल
मेरी सुधियों में लहराया
झल-मल झल-मल

और एक शाम मैंने तेरे नाम लिख दी
इस गानेे का एक संस्‍करण अंतरा चौधरी ने अपने अलबम 'मधुर स्‍मृति' में गाया था। वो भी सुन लीजिए


इसी सीरियल का एक और गीत हेमंंती शुक्‍‍‍ला की आवाज़़ मेंं

READ MORE...

Thursday, March 11, 2010

सलिल दा की याद, सबिता चौधरी की आवाज़, चांद कभी था राहों में




सबिता जी की याद आ गयी । उन्‍हें सबिता बैनर्जी कहा जाए या सबिता चौधरी । या फिर ये कहा जाए कि वो जाने-माने और हमारे प्रिय संगीतकार सलिल चौधरी की पत्‍नी हैं । लेकिन इस सबसे ऊपर उनकी एक और पहचान है । सबिता बैनर्जी एक बहुत मीठी आवाज़ हैं । लेकिन कई लोगों के लिए कही गई एक बात जो अपना अर्थ खो चुकी लगती है--पर वही बात मैं सबिता बैनर्जी के लिए भी कहना चाहता हूं कि उन्‍हें सचमुच उनका हक़ नहीं मिला । 

सबिता जी के कुछ गाने वाक़ई अनमोल हैं । सबिता जी ने बांग्‍ला में तो ख़ैर बहुत गाया ही लेकिन हिंदी में भी उनके कुछ अच्‍छे गाने हैं । आज रेडियोवाणी पर आपको जो गाना सुनवाया जा रहा है उसके अलावा कुछ गानों का जिक्र करने का मन कर रहा है ।



फिल्‍म 'हनीमून' 1960 । गाना--'तुम जो मिले हो तो खिला है गुलाब मेरे दिल का'
फिल्‍म 'हनीमून' 1960 । गाना-'छुओ ना छुओ ना मेरे अलबेले मेरे सैंयां'
फिल्‍म 'अन्‍नदाता' 1972 । गाना--'चंपावती तू आ जा'
फिल्‍म 'उसने कहा था' सन 1960 । गाना 'जाने वाले सिपाही से पूछो'
सबिता जी और मन्‍ना डे का गाया ग़ैर-फिल्‍मी गीत--'ओ आलोर पोथेजात्री' जिसका हिंदी संस्‍करण दूरदर्शन पर 'चलो भोर के राही ओ हमराही' के नाम से आया करता था ।


इनके अलावा गुलजा़र पर केंद्रित वेबसाइट के इस पन्‍ने पर सबिता जी के दो ग़ैर-फिल्‍मी गानों का जिक्र है । ये गाने मैंने तो कहीं नहीं सुने । अगर आपके पास इनका अता पता हो तो ज़रा टॉर्च दिखाईये

सबिता जी के बांगला गाने यहां सुने जा सकते हैं ।

अहमदाबाद में एक कार्यक्रम के सिलसिले में सबिता चौधरी और उनकी बेटी अंतरा चौधरी ( फिल्‍मsabita (1) मीनू का गीत याद कीजिए--'तेरी गलियों में हम आए' या फिर 'काली रे काली रे' ) के साथ एक पूरा दिन बिताने का मौक़ा मिला था । दिलचस्‍प ये था कि होटेल के कमरे में लगभग सारे दिन हम बस सलिल दा को याद करते रहे । सबिता जी से सलिल दा के किस्‍से सुनते रहे । वो बताती रहीं कि किस तरह सलिल दा किसी धुन की तलाश में परेशान होते तो थैली लेकर बाज़ार जाते, मछली लाते और 'माछेर झोल' बनाते । रसोई के बर्तनों में से संगीत निकलता....रसोई की हालत ख़राब भी होती...वग़ैरह । या फिर वो पियानो बजाने लगते । यूं लग रहा था मानो सलिल दा ख़ुद हमारे बीच मौजूद हैं । उसी शाम सलिल दा की यादों को समर्पित फिल्‍मी-गीतों का कार्यक्रम भी था..और आयोजक इस बात से परेशान थे कि उसकी कोई बात ही नहीं हो रही है...बस गप्‍पें हो रही हैं । उनकी चिंताओं का सम्‍मान करते हुए कार्यक्रम का स्‍वरूप ये तय किया गया कि मैं सबिता जी से वैसे ही बातें करूंगा जैसे अभी यहां कर रहा हूं । और इस दौरान हम हर विषय को एक गाने तक ले आयेंगे....गानों की फेहरिस्‍त तो तैयार थी ही । फिर सबिता, अंतरा और उनकी टोली अपने लाइव ऑर्केस्‍ट्रा के साथ ये गाने पेश करेगी ।

इस आयोजन में कई गानों का आधा हिस्‍सा बांग्‍ला में और आधा हिंदी में पेश किया गया । क्‍योंकि सलिल दा के कई गानों के बांग्‍ला संस्‍करण भी हैं और उतने ही प्रसिद्ध भी हैं । यहां सबिता जी और अंतरा ने मिलकर 'धित्‍तांग धित्‍तांग बोले' भी गाया । आपको याद होगा कि फिल्‍म 'आवाज़' में ये गाना लता मंगेशकर ने गाया है । जबकि बांगला में ये गीत हेमंत दा की आवाज़ में है । आगे चलकर रेडियोवाणी पर दोनों ही संस्‍करण आपको सुनवाए जायेंगे ।

लेकिन आज रेडियोवाणी पर हम आपको सुनवा रहे हैं वो गाना जो बड़ा ही अनमोल है । फिल्‍म है 1961 में आई 'सपन-सुहाने' । जिसमें बलराज साहनी और गीता बाली थे । इस फिल्‍म का एक विवाह-गीत बड़ा ही प्‍यारा है---'घूंघट हटा ना देना गोरिये चंदा शरम से डूबेगा' । बहरहाल...सबिता जी का जो गाना आज रेडियोवाणी पर है उसका इंट्रो ही आपको बांध लेगा । सलिल दा के गानों की संरचना जहां बेहद जटिल होती है वहीं उनमें एक अजीब तरह की सादगी भी है । इस गाने में बांसुरी की हल्‍की-सी तान, ग्रुप वायलिन, सबिता जी की आवाज़ का दुख, गिटार सब कुछ आपको कहीं बहा ले जायेंगे ।  

song: chand kabhi tha raahon me
film: sapan suhane
singer: sabita choudhury
lyrics:shailendra
music:salil choudhury





एक और प्‍लेयर ताकि सनद रहे ।





चांद कभी था बांहों में फूल बिछे थे राहों में
अब तो वो सपने गए बिखर, डूब गए हम आहों में
दूर दूर दूर जहां, उठ रहा है अब धुंआ
मेरा वहीं पर था आशियां
तारों की झिलमिल छांव में


चांद कभी था.....
हाय मेरी बेकसी बेज़ुबां है जिंदगी
मैं उनकी नज़रों से ऐसी गिरी
ना अपने घर हूं ना राहों में
चांद कभी था....


-----

अगर आप चाहते  हैं कि 'रेडियोवाणी' की पोस्ट्स आपको नियमित रूप से अपने इनबॉक्स में मिलें, तो दाहिनी तरफ 'रेडियोवाणी की नियमित खुराक' वाले बॉक्स में अपना ईमेल एड्रेस भरें और इनबॉक्स में जाकर वेरीफाई करें।

READ MORE...

Saturday, November 15, 2008

फिल्‍म 'छोटी-सी बात' के गाने: तीसरा भाग-जानेमन जानेमन तेरे दो नयन

संगीतकार सलिल चौधरी का संगीत-संसार बेहद प्रयोगधर्मी और साहसिक कम्‍पो‍ज़ीशन्‍स से भरा पड़ा है । और हम सलिल चौधरी के 'विकट प्रशंसकों' में से एक हैं । सलिल दा को कोई हमारे रहते 'कुछ' कह दे तो पहले हम शास्‍त्रार्थ करेंगे और फिर 'मल्‍लयुद्ध' पर भी उतर जायेंगे । दीवाने तो भई ऐसे ही होते हैं ना । रेडियोवाणी पर इन दिनों सलिल चौधरी के संगीत से सजी फिल्‍म 'छोटी सी बात' के गानों का उत्‍सव चल रहा है । और इसकी वजह ये है कि ये गाने हमेशा से मेरे दिल के क़रीब रहे हैं । इस फिल्‍म में केवल तीन ही गीत हैं । पहली कड़ी में हमने सुना--'ना जाने क्‍यों होता है ये जिंदगी के सा‍थ' और दूसरी कड़ी में सुना--'ये दिन क्‍या आये' । इंटरनेट पर ये फिल्‍म यहां देखी जा सकती है ।

आज ज़रा येसुदास की बात हो जाए । रेडियोवाणी पर के.जे.येसुदास के गानों की श्रृंखला बहुत दिनों से ऐजेन्‍डे में है । येसुदास हिंदी सिनेमा के विरले गायकों में से एक रहे हैं । येसुदास वैसे तो मलयालम, तमिल और yesudas कन्‍नड़ के प्रख्‍यात गायकों में से रहे हैं और दक्षिण भारत में पूजे भी जाते हैं । पर हिंदी में येसुदास को लाने का श्रेय सलिल दा को ही प्राप्‍त है । हालांकि ये भ्रांति है कि रवीन्‍द्र जैन उन्‍हें हिंदी में लेकर आए । सलिल दा ने सबसे पहले उनसे सन 1975 में फिल्‍म 'छोटी सी बात' का यही गीत गवाया था जिसके बोल थे--'जानेमन जानेमन' । इसमें आशा भोसले उनके साथ थीं । इसके बाद सन 1977 में आया 'आनंद महल' का गीत 'नी सा गा मा पा' । इस दौरान रवीन्‍द्र जैन ने सन 1976 में उन्‍हें 'चितचोर' में मौक़ा दिया । इसके बाद तो येसुदास हिंदी सिने-संगीत में एक सेन्‍सेशन बन गए । खु़द कई लोग मुझे ई-मेल पर कहते हैं कि येसुदास के गानों पर एक श्रृंखला की जाए । HMV की येसुदास के हिट्स की सी.डी. कई बरसों से 'बेस्‍टसेलर' की
लिस्‍ट में है । अब ये तो आप बताएं कि येसुदास इतने 'अच्‍छे' क्‍यों लगते हैं ।


फिलहाल तो आईये इस गीत में डूब जायें । पहले ये जान लीजिये कि सन 1976 की बिनाका गीत माला की वार्षिक हिट परेड में ये गाना इक्‍कीसवें नंबर पर रहा था । उस साल का सरताज गाना क्‍या था, आप यही सोच रहे हैं ना । जवाब है--'कभी कभी मेरे दिल में ख्‍याल आता है' । दूसरे नंबर पर था-'इक दिन बिक जायेगा माटी के मोल ( धरम करम ) और तीसरे नंबर पर--'मैं तो आरती उतारूं रे' ( जय संतोषी मां ) पूरी फेहरिस्‍त यहां
देखिए ।


'छोटी सी बात' के गीत योगेश जी ने लिखे थे । इस गाने की ट्यून बड़ी महत्‍त्‍वपूर्ण है । सलिल दा ने ऐसे तेज़ रफ्तार वाले गीत बहुत कम बनाए हैं salil । मेटल फ्लूट सिगनेचर म्‍यूजिक में ही आप पर ऐसा जादू तारी कर देती है कि अपने आप ही पैर थिरकने लगते हैं । सलिल दा अपने गानों के सिगनेचर म्‍यूजिक और इंटरल्‍यूड्स पर कितनी मेहनत करते थे इसकी मिसाल उनके पूरे म्‍यूजिक में देखी जा सकती है । इस गाने में एक रवानी, एक प्रवाह, एक रफ्तार है जो आपको अपने साथ एक दूसरी ही दुनिया में ले जाती है । ये छेड़छाड़ भरा गाना है । जिसमें नाय‍क-नायिका एक दूसरे पर बातों के 'तीर' चला रहे हैं । हिंदी में इतने बड़े मुखड़े वाले गाने कम ही बने हैं । संगीतकारों के लिए ऐसी लंबी लंबी पंक्तियों को धुन में उतारना बेहद मुश्किल होता है और जब धुन पर गाना रचा जाये तो ये सारी मुसीबत गीतकार के सिर पर आ जाती है ।

आईये गीत सुना जाये ।



जानेमन जानेमन तेरे दो नयन चोरी चोरी लेके गए देखो मेरा मन ।
मेरे दो नयन चोर नहीं सजन, तुमसे ही खोया होगा कहीं तुम्‍हारा मन ।

तोड़ दे दिलों की दूरी, ऐसी क्‍या है मजबूरी दिल से दिल मिलने दे
हां, अभी तो हुई है यारी, अभी से ये बेक़रारी, दिन तो ज़रा ढलने दे ।
यही सुनते, समझते, गुज़र गाए जाने कितने ही सावन ।
जानेमन जानेमन ।।

संग-संग चले मेरे, मारे आगे पीछे फेरे, समझूं मैं तेरे इशारे, जा,
दोष तेरा है ये तो, हर दिन जब देखो, करती हो झूठे वादे
तू ना जाने, दीवाने, दिखाऊं तुझे कैसे मैं ये दिल की लगन
जानेमन जानेमन ।।

छेड़ेंगे कभी ना तुम्‍हें, ज़रा बतला दो हमें, कब तक हम तरसेंगे
ऐसे घबराओ नहीं, कभी तो कहीं ना कहीं, बदल ये बरसेंगे
क्‍या करेंगे, बरस के कि जब ये मुरझायेगा ये सारा चमन ।
जानेमन जानेमन ।।

ये रहा इस गाने का वीडियो--

READ MORE...

Thursday, November 13, 2008

फिल्‍म 'छोटी-सी बात के गीत-दूसरी कड़ी--'देखो बसंती बसंती होने लगे मेरे सपने' ।।

रेडियोवाणी पर इन दिनों हम फिल्‍म 'छोटी-सी बात' के गाने सुन रहे हैं । ये फिल्‍म सन 1975 में आई थी और बी.आर.चोपड़ा ने इसे बनाया था । पिछली कड़ी में मैंने आपको बताया था कि किस तरह चोपड़ा साहब फिल्‍म दास्‍तान के नाकाम होने से दुखी हो गए थे और उन्‍होंने दो तीन छोटी फिल्‍मों पर हाथ आज़माया था । मुझे लगता है कि अगर ये सिलसिला आगे भी जारी रहता तो हिंदी सिनेमा को कुछ शानदार गाने मिलते और मिलती कुछ शानदार कथानकों वाली फिल्‍में । मेरे पास 'छोटी सी बात' की डी.वी.डी. बरसों से है और ममता अकसर शिकायत करती रहती हैं कि क्‍यों तुम इस फिल्‍म के पीछे पड़े रहते हो । दरअसल ये फिल्‍म है ही इतनी 'इन्‍फैक्‍शस' ।

मैंने 'डाउन मेमरी लेन' पर पढ़ा कि अमोल पालेकर की तीन शुरूआती फिल्‍में amol-palekar थीं--रजनीगंधा ( 1974), छोटी सी बात (1975) और चितचोर (1976) । ये तीनों फिल्‍में ही सिल्‍वर जुबली रही थीं । और अचानक ही अमोल एक स्‍टार बन गए थे । सामान्‍य शक्‍लो-सूरत के बावजूद अमोल को लोगों का प्‍यार मिला और अपनी प्रतिभा के सहारे उन्‍होंने आगे चलकर बतौर निर्देशक भी खूब ख्‍याति पाई ।

तो चलिए आज 'छोटी-सी बात' का एक और गीत सुनते हैं जो मुझे बहुत पसंद है । मुकेश की आवाज़ में ये गीत है--ये दिन क्‍या आये लगे फूल
हंसने । सलिल दा ने इस गाने का सिग्‍नेचर म्‍यूजिक कितना कमाल बनाया है । और इसके बाद आती है मुकेश की गाढ़ी आवाज़ । सलिल दा कितने मनोयोग से कोई गीत बुनते थे उसकी मिसाल है ये गाना । सारे इंटरल्‍यूड, सारा म्‍यूजिक अरेन्‍जमेन्‍ट इतना अनूठा है कि बस मन बह जाता है साथ में ।
तो आईये अपने सपनों को बासंती करें ।




ये दिन क्‍या आये लगे फूल हंसने
देखो बसंती बसंती होने लगे मेरे सपने ।।
सोने जैसी हो रही है हर सुबह मेरी
लगे हर सांझ अब गुलाल से भरी
चलने लगी महकी हुई पवन मगन झूमके
आंचल तेरा चूमके ।
ये दिन क्‍या आए ।।
वहां मन बावरा आज उड़ चला
जहां पर है गगन सलोना सांवला
जाके वहीं रख दे कहीं मन रंगों में खोलके
सपने ये अनमोल से ।
ये दिन क्‍या आए ।।
इसके बाद 'छोटी सी बात' का एक ही गीत बचा रहता है 'जानेमन जानेमन' जिसकी चर्चा दो दिन बाद की जायेगी । इस गाने का वीडियो ये रहा ।

READ MORE...

Tuesday, November 11, 2008

फिल्‍म 'छोटी सी बात' के गाने--पहला भाग: 'ना जाने क्‍यों होता है ये जिंदगी के साथ'

पिछले कई दिनों से रेडियोवाणी पर खामोशी रही । पर अब दोबारा हम संगीत के इस सिलसिले को शुरू कर रहे हैं । 

कई दिनों से मेरे मन में फिल्‍म 'छोटी सी बात' के गीत गूंज रहे हैं । पिछले दिनों बी.आर.चोपड़ा नहीं रहे । और जब हम उनकी फिल्‍मोग्राफी पर विचार कर रहे थे तो मेरी नज़र कुछ छोटी फिल्‍मों पर पड़ गई । दरअसल सत्‍तर के दशक के उत्‍तरार्द्ध में बी.आर.चोपड़ा का मन बड़ी फिल्‍मों से खिन्‍न सा हो गया था । हुआ ये था कि दिलीप कुमार और शर्मिला टैगोर के अभिनय से सजी बी.आर.चोपड़ा की 'बड़ी' फिल्‍म 'दास्‍तान' फ्लॉप हो गई थी । यही वो दौर था जब चोपड़ा साहब के छोटे भाई यश चोपड़ा अपनी फिल्‍मी महत्‍वाकांक्षाओं के कारण 'अलग' हो गए थे । कहते हैं कि इन घटनाओं ने बी.आर.चोपड़ा जैसी मज़बूत शख्सियत को भी भीतर से हिला दिया था । चोपड़ा साहब को कई महीनों तक नींद की गोलियां खाकर सोना पड़ा था । ये वो दौर था जब बासु चैटर्जी जैसे फिल्‍मकार छोटे बजट में सिनेमा की सुहावनी बयार चला रहे थे । 


बी.आर.चोपड़ा को लगा कि फिल्‍म-निर्माण की ये भी एक शैली हो सकती है । इसलिए उन्‍होंने 'छोटी सी बात' और 'पति पत्‍नी और वो' जैसी फिल्‍मों का निर्माण किया । ये दोनों ही छोटी फिल्‍में थीं और अपने तईं कामयाब भी रही थीं । फिल्‍म 'छोटी सी बात' के संगीतकार थे सलिल चौधरी । जिन्‍होंने बी.आर.फिल्‍म्‍स में सन 1961 में फिल्‍म 'क़ानून' और सन 1969 में 'इत्‍तेफाक' जैसी फिल्‍मों में संगीत दिया था । दिलचस्‍प बात ये है कि ये दोनों ही फिल्‍में गीतविहीन फिल्‍में थीं । और इसके बावजूद सलिल दा के पार्श्‍वसंगीत को सराहा गया था । मैंने हाल ही में 'क़ानून' की सी.डी.ख़रीदी है ताकि किसी दिन फुरसत से बैठकर इसे देखा जाये । बहरहाल आज तो हम बात कर रहे हैं फिल्‍म 'छोटी सी बात' के एक गाने की । योगेश ने इस गाने को कितनी खूबसूरती से लिखा है । मुझे तो इस गाने का मुखड़ा 'किसी के जाने के बाद करे फिर उसकी याद छोटी छोटी सी बात' एक मुहावरे जैसा ही लगता है । 

सलिल चौधरी ने इस छोटी सी फिल्‍म में भव्‍य संगीत दिया है । ये गाना सिम्‍फनी शैली के शानदार सिगनेचर म्‍यूजिक से शुरू होता है । और उसके बाद आती है लता जी की आवाज़ । गिटार के शानदार तरंगें सुनाई देती हैं नेपथ्‍य में । दिलचस्‍प बात ये है कि गाने के संगीत में एक जबर्दस्‍त रिदम है । एक रफ्तार है, तेज़ी है । जबकि लता जी की आवाज़ में एक ठहराव है, गहराई है मिठास है, तरंग है । कई ऐसे लोग हैं जिन्‍हें इस फिल्‍म के गीत ख़ास पसंद नहीं आए । पर पता नहीं क्‍या है इन गानों में कि बरसों बरस से ये गाने मेरे ज़ेहन में गूंज रहे हैं और कभी भी इनको सुनकर मन नहीं भरता । ना ही इस फिल्‍म को देखकर ही जी भरता है । बस यही कहना है कि इस गीत को खूब सुकून से सुनिए, ना सिर्फ बोलों को बल्कि गाने के संगीत संयोजन पर भी ध्‍यान दीजिये और बताईये कि एक महीने की ख़ामोशी को तोड़ने की 'रेडियोवाणी' की ये 'अदा' आपको कैसी लगी ।   


ना जाने क्‍यों होता है ये जिंदगी के साथ
अचानक ये मन किसी के जाने के बाद
करे फिर उसकी याद, छोटी छोटी सी बात ।। 
वो अनजान पल, ढल गए कल,
आज वो रंग बदल बदल,मन को मचल मचल
रहे हैं छल वो अनजान पल । 
सजे बिना मेरे नयनों में टूटे रे हाय रे सपनों के महल ।। 
ना जाने क्‍यों ।।
वही है डगर, वही है सफर 
है नहीं, साथ मेरे मगर, अब मेरा हमसफर, इधर उधर ढूंढे नज़र 
कहां गईं शामें मद भरी, वो मेरी, वो मेरे वो दिन गए किधर 
ना जाने क्‍यों ।। 

दो अंतरों वाले इस गाने के लिए हम योगेश को भी नमन करते हैं । एक बेहतरीन गीतकार योगेश इन दिनों गोरेगांव में एक गुमनाम जीवन जी रहे हैं । 
इस गाने को 'यहां' यूट्यूब पर देखा जा सकता है ।  

READ MORE...

Sunday, November 11, 2007

आके सीधी लगी दिल पे जैसे कटरिया--जब किशोर कुमार ने महिला और पुरूष दोनों स्‍वरों में गाया



रेडियोवाणी पर आज हम आपको एक बहुत ही अनोखा गीत सुनवायेंगे ।
इस गीत की ख़ासियत ये है‍ कि इसे किशोर कुमार ने दो आवाज़ों में गाया है । महिला और पुरूष स्‍वर दोनों में । किशोर कुमार improvisation के माहिर कलाकार थे । गाना जैसा रचा गया हो, शायद ही किशोर दा ने वैसा का वैसा गा दिया हो, उन्‍होंने हमेशा हमेशा चीज़ों के साथ खेल किया, प्रयोग किये । और इसी प्रयोग का नतीजा है ये
गीत ।

ये गाना 1962 में आई फिल्‍म half ticket का है । इसे कालिदास ने निर्देशित किया था । किशोर कुमार, मधुबाला, हेलेन और प्राण इस फिल्‍म के कलाकार थे । मज़ाहिया यानी हास्‍य फिल्‍मों में इस फिल्‍म को सरताज माना जाता है । गीत शैलेन्‍द्र ने लिखे थे और संगीत सलिल चौधरी का था ।



ई स्निप्‍स से प्राप्‍त इस गाने में पहले आपको खुद सलिल दा की आवाज़ सुनाई देगी । जो बता रहे हैं कि इस गाने को पहले लता जी को गाना था । लेकिन वो उपलब्‍ध नहीं हो पाईं तो किशोर ने कहा कि मैं ही दोनों आवाज़ों में गा देता हूं, सलिल दा हतप्रभ रह गए और थोड़े हिचकते हुए राज़ी भी हो गए । पर जब फाइनल गीत बना तो वो कमाल का था । शायद इन कलाकारों को अहसास भी नहीं हुआ होगा कि वो अपने समझौते और प्रयोग के ज़रिए एक इतिहास रचने वाले हैं । किशोर कुमार ने ऐसे और भी गीत गाए हैं जिनमें वो लड़के और लड़की की आवाज़ों में गाते हैं । जैसे फिल्‍म लड़का लड़की का गीत 'सुणिए सुणिए आजकल की लड़कियों का प्रोग्राम' । बहरहाल आईये इसी गीत पर वापस लौटते हैं । ये एक मज़ाहिया गीत है । और मज़ाहिया गीत की अदायगी तलवार पर चलने जैसा जोखिम होती है । किशोर दा तलवार की धार पर चले भी और पार भी निकले हैं । इस गाने के बोल भी पेश कर रहा हूं ताकि आपको सुनने समझने और इस गाने की चुनौती को समझने में आसानी रहे ।

इस गाने को सुनते हुए ध्‍यान दीजियेगा कि कितनी जल्‍दी जल्‍दी किशोर ने स्‍वर बदला है । पहले महिला फिर पुरूष । ये भी याद रहे कि वो ट्रैक रिकॉर्डिंग वाला दौर नहीं था । यानी गाना वन टेक ओके होता था । सीधे शब्‍दों में कहें तो शुरू से आखिर तक एक ही कट में रिकॉर्ड किया जाता था । इससे आपको इस गाने की चुनौती का अहसास जरूर हो जायेगा । सलिल दा ने इस गाने के इंटरल्‍यूड में में‍डोलिन पर बड़ी प्‍यारी धुन बजवाई है । कमाल धुन है । सलिल दा अपने काम के हर हिस्‍से को पूरी गंभीरता से पूरा करते थे । वे वाक़ई एक संपूर्ण कलाकार थे ।

एक अफ़सोस ये रह गया कि शुद्ध संगीत के चाहने वाले इस गाने को गंभीरता से नहीं लेते । उन्‍हें ये एक खेल या एक खिलवाड़ लगता है । लेकिन मुझे लगता है कि किशोर कुमार की कलाकारी का बेहतरीन नमूना है ये गीत ।

Get this widget Track details eSnips Social DNA


महिला-आके सीधी लगी दिल पे जैसे कटरिया ओ संवरिया
ओ तेरी तिरछी नज़रिया
पुरूष- ले गयी मेरा दिल तेरी जुल्‍मी नज़रिया ओ गुजरिया
ओ जाने सारी नगरिया
महिला- आके सीधी लगी ।।

महिला- मेरी गली आते हो क्‍यूं बार बार
छेड़ छेड़ जाते हो क्‍यूं दिल के तार
ओ सैंया ओ सैंया पड़ूं तेरे पैयां

पुरूष- क्‍या मैं करूं गोरी मुझे तुझसे है प्‍यार
जो ना तुझे देखूं ना आये क़रार
ओ गोरी ओ गोरी बड़के बुद्धन तीर वी टक्‍कर

महिला- हटो जाओ ना बनाओ
हटो जाओ हाय हाय ना बनाओ हाय हाय
नटखट रंगीले सांवरिया
आके सीधी लगी दिल पे जैसे कटरिया ।।

पुरूष- ले गयी मेरा दिल तेरी जुल्‍मी नजरिया ओ गुजरिया

महिला- पीछे पीछे आते हो क्‍यूं दिल के चोर
मान जाओ वरना मचा दूंगी शोर
बचाओ ओ मुई मुर्गे ओ कौवे

पुरूष- पहले तो बांधी निगाहों की डोर
अब हमसे कहती हो चल पीछा छोड़
ओ गोरी ओ नटखट ओ खटपट ओ पनघट ओ झटपट

महिला- तोरे नैना ओ मीठे बैना
मुझको बना दिया बावरिया
आके सीधी ।।

पुरूष- ले गयी मेरा दिल तेरी जुल्‍मी नजरिया ओ गुजरिया
जाने सारी नगरिया ।।।।



इस गाने को आप यहां देख भी सकते हैं ।


Technorati tags:
, फिल्‍म हाफ टिकिट ,,,,,, , ,

आके-सीधी-लगी-दिल-पे-जैसे-कटरिया, फिल्‍म-हाफ-टिकिट, किशोर-कुमार, सलिल-चौधरी, kishore-kumar-in-female-and, -male-voices, salil-choudhary, half-ticket, shailendra, aake-sidhi-lagi-dil-pe-jaise-katariya,

READ MORE...

Wednesday, October 24, 2007

आईये गुनगुनाएं अंतरा चौधरी का गीत--- काली रे काली रे तू तो काली काली है..........



कल मैंने रेडियोवाणी पर आपको अंतरा चौधरी के कुछ गीत सुनवाये थे और जिक्र किया था फिल्‍म मीनू के गीत का जिसके बोल हैं--काली रे काली रे तू तो काली काली है । मैंने सोचा था कि मशक्‍कत करने के बाद कहीं से गीत मिल सकेगा, लेकिन संगीत के क़द्रदान हमारे अज़ीज़ इरफ़ान ने तुरंत मुझे इस गाने का लिंक भेजा, यही नहीं अंतरा चौधरी का जो चित्र आप देख रहे हैं ये भी उन्‍हीं ने उपलब्‍ध करवाया है ।

इन गीतों की खोजबीन के दौरान मैं salilda.com नामक वेबसाईट पर भी काफी घूमा-फिरा । इस वेबसाईट के संचालक हैं गौतम चौधुरी । जो सलिल दा के बेटे नहीं हैं बस उनके दीवाने हैं । हॉलैन्‍ड में रहते हैं । उनसे ताज़ा ताज़ा संपर्क स्‍थापित हुआ है । हम गौतम के सहयोग से रेडियोवाणी पर सलिल दा पर कोई महत्‍त्‍वपूर्ण आयोजन करेंगे ।

फिलहाल तो आईये सुना जाये ये गीत--इतना याद दिला दूं कि ये योगेश की रचना है ।



ओ काली रे काली रे तू तो काली काली है
गोरा सा इक भैया मां अब लाने वाली है ।

भैया होगा प्‍यारा प्‍यारा चांद सरीखा
पर देख उसे चांद भी हो जायेगा फीका
मैं गाल पे काजल का लगा दूंगी रे टीका ।।
ओ काली रे ।।
दिन रात उसे देखा करूंगी मैं सजा के
मैं खेलूंगी भैया को गोदी में उठाके
मैं रोज़ सुलाऊंगी उसे लोरियां गाके ।।
ओ काली रे ।।

सच मानिए, मैं अंतरा की आवाज़ के बचपने....उसकी आवाज़ के भोलेपन, सच्‍चाई पर मुग्‍ध हूं ।
कुछ गीत संक्रामक/इंफैक्‍शस होते हैं । मैंने इस गीत का मीठा वायरस छोड़ दिया ।
अब आप पायेंगे कि आप दिन भर गुनगुना रहे हैं---ओ काली रे काली रे तू तो काली काली है ।
और मैं ये चला ।


चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: काली-रे-काली-रे, फिल्‍म-मीनू, अंतरा-चौधरी, kaali-re-kaali-re, film-meenu, yogesh, salil-choudhary, antara-choudhary,


Technorati tags:
"काली रे काली रे" , "फिल्म मीनू" , "अंतरा चौधरी" , "kaali re kaali re" , "film meenu" , yogesh , "salil choudhary" , " antara choudhary"

READ MORE...

Tuesday, October 23, 2007

आईये आज अंतरा चौधरी को सुनें--और कहें--'तेरी गलियों में हम आए'



अंतरा चौधरी जाने-माने संगीतकार सलिल चौधरी की बेटी हैं ।
अंतरा से फिल्‍म-संगीत के क़द्रदानों का पहला परिचय फिल्‍म 'मीनू' के ज़रिए हुआ था । ये फिल्‍म सन 1972 में आई थी ।
योगेश ने इस फिल्‍म के गीत लिखे थे और संगीत था सलिल चौधरी का । इस फिल्‍म का ई.पी.रिकॉर्ड जारी हुआ था । मैंने फिल्‍म मीनू दूरदर्शन के ज़माने में देखी थी जब रविवार की कोई अच्‍छी सी फिल्‍म एक आयोजन की तरह होती थी । और मुझे याद है कि हम इस फिल्‍म को देखकर काफी भावुक हो गये थे ।

बहरहाल फिल्‍म मीनू की याद मुझे मेरे मित्र राजेश ने दिलाई है । शनिवार को हम बैठ कर गप्‍पें मार रहे थे, तभी उसने इस फिल्‍म का जिक्र किया । तो मुझे लगा कि क्‍यों ना कहीं से खोज-खाजकर आपके लिए मीनू फिल्‍म के गीत लाए जाएं ।
दरअसल मैं खोज रहा था दूसरा गीत । जिसके बोल हैं -'काली रे काली रे तू तो काली काली है' । इसकी व्‍यवस्‍था फिलहाल नहीं हो सकी । लेकिन यक़ीन मानिए, रेडियोवाणी पर हम किसी गीत की खोज में निकलते हैं तो पूरे जी-जान से निकलते हैं तो जब तक ये गीत नहीं मिलेगा, हम चैन से नहीं बैठेंगे । यानी एक दिन जल्‍दी ही रेडियोवाणी पर आप 'काली रे काली रे तू तो काली काली है' ज़रूर सुनेंगे ।

फिलहाल हमें इस गाने से ही संतोष करना है । जिसके बोल हैं 'तेरी गलियों में हम आए' ।
मन्‍ना दा और अंतरा ने इस गाने को गाया है । अंतरा की आवाज़ में इत्‍ती मासूमियत है कि क्‍या कहें । ऐसा लगता है जैसे कच्‍चे नारियल सी दूधिया आवाज़ हो । एकदम सरल, सहज और गबदुल्‍ली सी आवाज़ । अद्भुत है ये गीत । सुनिए और पढि़ये ।

Get this widget | Track details | eSnips Social DNA


तेरी गलियों में हम आये
दिल ये अरमानों भरा लाये ।
हमपे हो जाये करम हाय जो तेरा
अपनी किस्‍मत भी संवर जाए ज़रा ।
जिंदगी तेरी बहारों में मुस्‍काए सदा
तेरे दामन को ना छू पाए ग़म की हवा ।
हम ग़रीबों की लगे तुझको दुआ ।।
तेरी गलियों में हम आए ।।
हमको शिकवा है किसी से ना हमें कोई गिला
जो ना दे उसका भला जो दे उसका भला ।
जिसने जो चाहा कहां उसको मिला ।
तेरी गलियों में हम आए ।।
जैसे मजबूर हैं हम कोई मजबूर ना हो
किसी मन का महल ऐसे चूर ना हो ।
ऐसे खुशियों से कोई दूर ना हो ।।
तेरी गलियों में हम आए ।।

सुना आपने अंतरा चौधरी का ये प्‍यारा सा, मासूम सा गीत ।
आज अंतरा चौधरी के बहाने आपसे कुछ और बातें कहनी हैं अपने मन की । लेकिन पहले जिक्र कर लिया जाए अंतरा के चार पांच साल पहले आये अलबम 'मधुर स्‍मृति' का । ये एलबम अंतरा ने सलिल दा की याद में निकाला था । ख़ासियत ये थी कि इसमें सलिल दा के स्‍वरबद्ध किये गये बांगला गीतों को हिंदी में अनुवाद करवा के बिल्‍कुल उसी धुन और उसी ऑरकेस्‍ट्रा पर गाया गया था । मेरे संग्रह में ये कैसेट है । इसलिए इसे आप तक पहुंचाने में देर लग रही है । कैसेट से कंप्‍यूटर पर ट्रांस्‍फर झंझट का काम है ना । पर ये कई मायनों में एक अनोखा और महत्‍त्‍वपूर्ण अलबम है ।

दूसरी बात जो अंतरा चौधरी के बहाने कहनी है वो ये, कि सलिल दा ने अंतरा की प्रतिभा को बचपन में ही पहचान लिया था । और जो महत्‍त्‍वपूर्ण काम उन्‍होंने किया, वो था अंतरा से बांगला में बच्‍चों के गीत गवाने का काम । मुझे ई स्निप्‍स पर अंतरा के कई नर्सरी-गीत मिले हैं । उनमें से कुछ आपके लिए प्रस्‍तुत कर रहा हूं । ये गाने उतने ही मासूम और प्‍यारे हैं जितना कि फिल्‍म मीनू का ये गीत । आपको बता दूं कि मुझे बांगला भाषा नहीं आती, लेकिन इससे इन गीतों के आनंद में कोई कमी नहीं आती । हां ये ख़लिश ज़रूर रह जाती है कि हमारे यहां हिंदी में कभी किसी ने बच्‍चों के लिए ऐसे गीत बनाने की क्‍यों नहीं सोची । क्‍या इसे हम हिंदी संगीत जगत की दरिद्रता नहीं मानेंगे ?

बहरहाल ये रहे अंतरा के गाये कुछ बांगला गीत--

एका नोरी काने कोरी तेतुल पारे छोरी छोरी--
Get this widget | Track details | eSnips Social DNA



केउ कोकुने ठीक दोपुरे
Get this widget | Track details | eSnips Social DNA


ओ शोना बैंग ओ कोला बैंग
Get this widget | Track details | eSnips Social DNA


सुनो भाई एस्‍काबोनेर
Get this widget | Track details | eSnips Social DNA


बुलबुल पाखी मोयना ती
Get this widget | Track details | eSnips Social DNA


अंतरा चौधरी अब बड़ी हो चुकी हैं और अब उनकी मासूम आवाज़ कुछ ऐसी बन चुकी है ।
Get this widget | Track details | eSnips Social DNA


अंतरा चौधरी के नर्सरी-गीतों का पूरा संग्रह सुनने के लिए यहां क्लिक कीजिए ।

Technorati tags:
“antara choudhary” , “teri galiyon me hum aaye” ,”film meenu” ,”Eka-nori-kane-kori-tetul-pare-chhori-chhori” ,”Keu kokhono thik dupure” ,”O sona bang o kola bang” ,”Sono Bhai Iskaboner” ,”Bulbul pakhi moina tiye” ,””Dadabhai Chal Bhaza” ,”अंतरा चौधरी” , ”सलिल चौधरी” , ”फिल्म मीनू” ,
”तेरी गलियों में हम आए” ,”एका नोरी काने कोरी” ,”केउ कोकुने ठीक दोपुरे” ,”ओ शोना बैंग ओ कोला बैंग” ,”सुनो भाई एस्काकबोनेर” ,”बुलबुल पाखी मोयना ती” ,”दादाभाई चल बाजा”

चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: तेरी-गलियों-में-हम-आये, एक-नोरी-काने-कोरी, केउ-कोकुने-ठीक-दोपुरे, ओ-शोना-बैंग-ओ-कोला-, बैंग, सुनो-भाई-ऐस्काकबोनेर, बुलबुल-पाखी-मोयना-ती, दादाभाई-चल-बाजा, “antara, -choudhary”, “teri-, galiyon-, me-, hum-, aaye”, ”film-, meenu”, ”Eka-nori-kane-kori-tetul-pare-chhori-chhori”, ”Keu-, kokhono-, thik-, dupure”, ”O-, sona-, bang-, o-, kola-, bang”, ”Sono-, Bhai, -Iskaboner”, ”Bulbul-, pakhi-, moina-, tiye”, Dadabhai-, Chal-, Bhaza”, salil-choudhary,

READ MORE...
Blog Widget by LinkWithin
.

  © Blogger templates Psi by Ourblogtemplates.com 2008 यूनुस ख़ान द्वारा संशोधित और परिवर्तित

Back to TOP