संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Saturday, January 22, 2011

फिल्‍म 'सारांश' के दो उदास गाने- कवि वसंत देव की याद

वसंत देव हिंदी (और ये भी कहें कि मराठी) सिनेमा के unsung hero हैं। पिछली पोस्‍ट लगाते वक्‍त ये इरादा नहीं था कि वसंत देव के गानों का कारवां आगे बढ़ाया जाएगा। पर मेरे सामने गानों की जो फ़ेहरिस्‍त है--वो ललचा रही है। इस ललचाने में 'परेशान करने' जैसा भाव भी है।


इस 'परेशानी' का सबब समझाता हूं। अगर कोई अच्‍छी रचना मिले--तो उसे पढ़ने या सुनने के मज़ा तब तक संपूर्ण नहीं होता--जब तक कि किसी के साथ उसे शेयर नहीं कर लिया जाता। और 'रेडियोवाणी' पर हम आपके सुकून से ज्‍यादा अपने सुकून की तलाश में रहते हैं। तो चलिए आज वसंत देव के कुछ और गानों में हम अपना सुकून ढूंढें।


महेश भट्ट ने 1984 में अपनी पांचवीं फिल्‍म बनाई थी 'सारांश'। गिनती इसलिए ताकि हम इसे उनकी पहली फिल्‍म ना मान बैठें। हां इस फिल्‍म के मुख्‍य-कलाकार अनुपम खेर की ज़रूर ये पहली फिल्‍म थी। और अपने संघर्ष की अनुपम बड़ी ही दिलचस्‍प दास्‍तान सुनाते हैं। बहरहाल...यहां बात इस फिल्‍म के दो गीतों की करनी है।

जब 'सारांश' देखी थी तो ये दोनों गीत बहुत अच्‍छे लगे थे। पर कभी कहीं ये गीत मिले नहीं। हां जब से इंटरनेट-क्रांति की धारा में बहे--ऐसे गाने बिछुड़े हुए साथियों की तरह मिलते चले जा रहे हैं। 'सारांश', 'प्रहार', 'सूरज का सातवां घोड़ा', 'कालका', 'मीनू' जैसी कई फिल्‍में इसी फेहरिस्‍त का हिस्‍सा हैं। 'सारांश' के गाने वसंत देव ने ही लिखे थे। ये ऐसे गाने नहीं हैं जो मुख्‍य-धारा की फिल्‍मों में होते हैं। इनमें कोई लटका-झटका नहीं, हाई-बीट्स नहीं। संगीतकार अजीत वर्मन का भी उतना नाम नहीं जितना लक्ष्‍मी-प्‍यारे, कल्‍याणजी-आनंदजी या बप्‍पी लहरी का है। हालांकि अजीत ने अर्धसत्‍य, सारांश, विजेता, आक्रोश और जनम जैसी फिल्‍मों में संगीत दिया था। उनके बारे में ज्यादा जानने के लिए 'यहां' पढिए।

'सारांश' का पहला गाना है--'अंधियारा गहराया, सूनापन घिर आया'। इस गाने को हमारे बेहद प्रिय भूपिंदर सिंह ने गाया है। ये उन गानों में से है--जिन्‍हें सुनकर आप अपने मन की कंदराओं में गुम हो जाते हैं। ये एक अजीब-सा आनंद है। जिसे मैं 'उदासी का आनंद' कहता हूं। कितनी साहित्यिक कृतियां ऐसी हैं, कितने गीत ऐसे हैं--जो हमें 'उदासी का ये आनंद' देते हैं। आईये पहले इस गीत को पढ़ा जाए।

अंधियारा गहराया, सूनापन घिर आया
घबराया मन मेरा, चरणों में आया।
क्‍यों हो तुम,

यूं गुमसुम, किरणों को आने दो
पत्‍थर की फांकों से करूणा को झरने दो।

पत्‍तों तिनकों का बना था घर मेरा
ढह गया, बह गया, अब कहां बसेरा
भीगा है मन-पाखी, अंजुरी में पलने दो।
अंधियारा गहराया।।

ये उदासी अगर छाई है मेरे लिए
पीर की राह भी है बनी मेरे लिए
सह लूं मैं हर जलन, चंदन वो बनने दो।
अंधियारा गहराया।। 


फिल्‍मी-गीतों के तयशुदा व्‍याकरण से अलग है ये गीत। और इसे स्‍वरबद्ध करना अजीत वर्मन के लिए आसान नहीं रहा होगा। ना ही भूपिंदर के लिए इसे गाना इतना आसान रहा होगा। इस गाने में अजीत ने कोरस का बहुत ही उत्‍कृष्‍ट इस्‍तेमाल किया है। इस गाने में कोरस को बाक़ायदा एक इंस्‍ट्रूमेन्‍ट की तरह बरता गया है। इंटरल्‍यूड्स में आपका ध्‍यान सीधे 'कोरस' पर ही जाता है। और इस प्रयोग से गाने की उदासी और गहरी हो जाती है। भूपिंदर को जब रोमांटिक गाने मिलते हैं तो भी वो एक तरंगित उड़ान भरते हैं और उदासी भरे गानों में भी। भूपी जी की आवाज़ का हिंदी-संगीत-संसार उतना इस्तेमाल नहीं कर पाए--जिनती उनमें संभावनाएं थीं।

song: andhiyara ghir aaya
singer:bhipinder singh
lyrics:vasant dev
music: ajit varmen
film:saaransh
duration: 3:34


यहां देखिए--


वसंत देव का फिल्‍म 'सारांश' का दूसरा गीत भी इसी तरह का मद्धम गीत है। और इसे अमित कुमार ने गाया है। दिलचस्‍प बात ये है कि 2009 में एक इंटरव्‍यू के दौरान अमित कुमार ने मुझसे विशेष आग्रह किया था इस गाने को बजाने का। वो इसे अपने श्रेष्‍ठ गानों में गिनते हैं। जबकि ढेर सारे लटक-झटक गाने हैं अमित कुमार के।

हर घड़ी ढल रही शाम है जिंदगी
दर्द का दूसरा नाम है जिंदगी
आसमां है वहीं और वही है ज़मीं
है मकां ग़ैर का...ग़ैर है या हमीं
अजनबी आंख सी आज है जिंदगी
दर्द का दूसरा नाम है जिंदगी।।

क्‍यों खड़े रहा में, राह भी सो गई
अपनी तो छांह भी, अपने से खो गई
भटके हुए पंछी की रात है जिंदगी
दर्द का दूसरा नाम है जिंदगी।।

song: har ghadi dhal rahi shaam hai zindagi
singer: amit kumar
lyrics: vasant dev
music: ajit varmen
film: saaransh
duration: 3:49 

यहां देखिए-
 
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6 comments:

Wang Han Yang January 22, 2011 at 5:53 AM  

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निशांत मिश्र - Nishant Mishra January 22, 2011 at 7:08 AM  

बहुत-बहुत धन्यवाद यूनुस भाई. ये दोनों गीत मुझे बहुत प्रिय हैं लेकिन मेरी श्रीमती जी इनसे सुनने नहीं देती. वे कहती हैं के मैं हमेशा मनहूसियत भरे गीत सुनता हूँ. अपना-अपना नजरिया है. इन गीतों की लिरिक्स देने के लिए आभार. इनकी लिरिक्स में कहीं कुछ छूट रहा था जो अब पता चल गया.
ऊपर वाला कमेन्ट स्पैम है.

Satish Chandra Satyarthi January 22, 2011 at 5:21 PM  

पहली बार सुने दोनों गीत... वाकई मन खो सा जाता है सुनके.. संगीत अनोखा है... आपको धन्यवाद शेयर करने के लिए...

डॉ .अनुराग January 22, 2011 at 7:14 PM  

सारांश मेरी पसंदीदा फिल्म है उदासी के कई हिस्सों से अचानक छट कर आई उम्मीद की तरह ....उस दौर की फिल्म जब महेश भट्ट की प्रतिभा पर बाज़ार हावी नहीं हुआ था ...गाने मैंने यू ट्यूब पर सुने -देखे है ....पर अक्सर कुछ सेकण्ड बाद बंद कर देता हूँ.... बहुत उदास है......बसन्त जी के बारे में आपका कहना ठीक है ...अन -संग हीरो

Rahul Singh January 22, 2011 at 8:07 PM  

वाह, बहुत सुंदर गीतों की याद दिलाई आपने.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन January 22, 2011 at 9:28 PM  

मेरा प्रिय गीत. धन्यवाद!

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