संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Friday, August 31, 2007

तकदीर का फ़साना--संगीतकार रामलाल के गाने के दो संस्करण

महफिल वाले भाई सागरचंद नाहर के कहने से मैंने संगीतकार रामलाल जी पर इस श्रृंखला का पहला लेख लिखा था और आप सबकी प्रतिक्रियाओं से ये ज़ाहिर हुआ कि अभी भी हमारे मन में ऐसे कम चर्चित संगीतकारों के लिए प्यार कायम है । इससे कुछ बातें और उभर कर सामने आती हैं । नए विषयों की तलाश में जूझ रहा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया किस क़दर घिसे-पिटे दायरे में काम करता है और कैसे केवल उगते हुए सूरज को ही सलाम करता है । इसी तरह विविध भारती को छोड़ दें तो रेडियो की दुनिया में भी कैसे कुछ सौ गानों को ही तरजीह दी जाती है । बाकी कई गाने अनछुए रह जाते हैं । मुद्दे की बात ये है कि इन गानों के कद्रदान होते हुए भी ये जनता तक नहीं पहुंचाये जा रहे हैं ।

रेडियोवाणी पर ना सिर्फ चर्चित संगीतकारों की बात की जाती है बल्कि उन संगीतकारों का जिक्र भी किया जाता है जिनका काम बहुत ज्यादा नहीं है लेकिन उनके काम का असर बहुत ज्यादा है । संगीतकार रामलाल का शुमार भी इसी तरह के संगीतकारों में होता है । जब विविध भारती में मेरी संगीतकार रामलाल से मुलाकात हुई तो वो मुझे मुहल्ले के किसी बुजुर्ग की तरह लगे । बुढ़ापा उनकी शख्सियत का हिस्सा बन चुका था और जो तल्खी उनके भीतर थी वो शायद दुनिया की जुल्म तों से ही आई होगी । हो सकता है कि कामयाब लोगों ने अपनी आक्रामकता के साथ उनके ऊपर वो जुल्म ढाए हों जिनकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी ।

ऐसा क़तई नहीं लगता कि रामलाल ‘वन फिल्म वंडर’ जैसी प्रतिभा थे । कम से कम उनके संगीत संयोजन और उनकी धुनों की गहराई को देखकर तो कभी हम मान ही नहीं सकते कि प्रतिभा का अकाल था रामलाल जी के भीतर । हां ये जरूर है कि बंबई की फिल्मी दुनिया की तहज़ीब उन्होंने सीखी नहीं होगी, जिसके तहत काम प्राप्त करना भी एक तरह का ‘मैनेजमेन्ट’ होता है । बहरहाल आईये रामलाल के संगीत संसार में फिर से प्रवेश करें ।

‘सेहरा’ और ‘गीत गाया पत्थरों ने’ यही दो फिल्में हैं जो रामलाल की संगीत-यात्रा की अहम फिल्में मानी जा सकती हैं । बाकी कुछ छोटी मोटी फिल्मों में भी उनका संगीत रहा है लेकिन अगर जरूरी लगा तो उनके गानों की चर्चा फिर कभी की जाएगी । आज हम आपको रामलाल जी के दो खामोश मिज़ाज गीत सुनवायेंगे । दोनों में एक नाज़ुकी है । एक प्यार के कोमल अहसास का गीत है और दूसरा बेवफ़ाई का नग्मा । और ये तो हिंदी सिने-संगीत के कद्रदान जानते ही हैं कि एक खास तरह की इन्टेन्सिटी की जरूरत पड़ती है इन गानों को रचने के लिए ।

ज़रा इस गीत को सुनिए—

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तकदीर का फसाना जाकर किसे सुनाएं
इस दिल में जल रही हैं अरमान की चिताएं ।।
सांसों में आज मेरे तूफान उठ रहे हैं
शहनाईयों से कह दो कहीं और जाकर गायें
इस दिल में जल रही हैं अरमान की चिताएं ।।
तकदीर का फसाना ।।
मतवाले चांद सूरज, तेरा उठायें डोला
तुझको खुशी की परियां घर तेरे लेके जाएं
इस दिल में जल रही हैं अरमान की चिताएं ।।
तकदीर का फसाना ।।
तुम तो रहो सलामत, सेहरा तुम्हें मुबारक
मेरा हरेक आंसू देने लगा दुआएं
इस दिल में जल रही हैं अरमान की चिताएं ।।
तकदीर का फसाना ।।

यहां हम आपको बताना चाहेंगे कि इस गाने के दो संस्करण हैं । एक लोकप्रिय संस्करण मो. रफी वाला है और दूसरा है लता मंगेशकर वाला संस्करण । वही बात जो पहले भी कह चुका हूं यहां भी कहूंगा कि इस तरह के अन्य कई गानों की तरह यहां भी पुरूष गायक का संस्करण ज्यादा लोकप्रिय हुआ है और शायद बेहतर भी बन पड़ा है ।

रफी साहब वाले संस्करण में शहनाई की करूण तान तो है ही साथ ही रफी साहब की आवाज़ का उफान भी है । रफी साहब अपनी आवाज़ को इस गाने में कितने ऊपर ले गये हैं सुनिए और महसूस कीजिए । ऐसे गाने हमेशा मुश्किल और डिमान्डिंग हुआ करते हैं । रफ़ी साहब ने रामलाल की इस कठिनतर धुन के साथ बिल्कुल न्याय किया है । बेवफ़ाई वाले गानों में जब इस तरह की इन्टेन्सिटी आ जाती है तो उनका लोकप्रिय होना तय हो जाता है । इस गाने को गली कूचों में एकतरफा मुहब्बत करने वाले नौजवानों ने खूब गाया है । रफी के बेहद चुनिन्दा गानों में इस गाने का शुमार किया जाता है । यहां हसरत जयपुरी की कलम को भी सलाम करना जरूरी है । क्यों कि ‘अरमान की चिताएं’ वाला जुमला हो या फिर ‘मेरा हरेक आंसू देने लगा दुआएं’ जैसे जुमले इस गाने में देकर उन्होंने अपनी सादगी भरी शायरी का कमाल दिखाया है ।

लता मंगेशकर वाला संस्करण एक अद्भुत धुन के साथ शुरू होता है फिर एक शेर आता है ।

उजड़ गया है मुहब्बत में जिंदगी का चांद
सितारे हैं मेरी दुनिया के आंसुओं का कफन ।।

और फिर ग्रुप वायलिन की चीत्कार । जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि इस गाने की खासियत ये है इसकी इंटन्सिटी । बहुत नीचे सुर से शुरू होकर ये गीत बहुत ऊपर तक जाता है । मुखड़ा जानबूझकर रामलाल जी ने नीचे सुर पर रखा है । लेकिन जैसे ही अंतरे पर हम आगे बढ़ते हैं गायिका के सुर ऊपर चढ़ते जाते हैं । ऐसे गाने किसी भी कलाकार के लिए एक कठिन चुनौती की तरह होते हैं । लता जी की रेन्ज की एक जिंदा मिसाल है ये गीत । जब हम दूसरे अंतरे तक पहुंचते हैं तो सुर इतना चढ़ जाता है कि आज के जमाने की गायिकाओं की आवाज़ चीं चीं करने लगे । खासकर ये पंक्ति ‘वो बेवफा ना समझें हमसे बदल ना जाएं’ बहुत ऊंचे सुर में है ।

इस गाने के ताल वाद्य पर ध्यान दें तो आपको फिर हैरत होगी । ये मंदिर के नगाड़े जैसा चलन है । बहुत धीमी और शांत चाल के ताल वाद्य रखे हैं रामलाल ने । ताकि गाने का गहरा असर बरक़रार रहे, क्योंकि यहां कमाल तो धुन और गायकी को करना था । आज के गानों की तरह केवल म्यूजिक अरेन्जमेन्ट को नहीं ।

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तकदीर का फसाना जाकर किसे सुनाएं
इस दिल में जल रही हैं अरमान की चिताएं
देखे थे जो भी सपने, वो बन गये हैं आंसू
जाती हुई हवाओं ले जाओ मेरी आहें
इस दिल में जल रही हैं अरमान की चिताएं ।।
तकदीर का फसाना ।।
अपना तो ग़म नहीं है, ग़म है तो इतना ग़म है
वो बेवफ़ा ना समझें, हमसे बदल ना जाएं
इस दिल में जल रही हैं अरमान की चिताएं ।।
तकदीर का फ़साना ।।
इस बेबसी पे मेरी रोएगा आसमां भी
डूबेगी सारी धरती देखेंगी ये फिज़ाएं
इस दिल में जल रही हैं अरमान की चिताएं ।।
तकदीर का फसाना ।।


संगीतकार रामलाल पर ये अनियमित श्रृंखला जारी रहेगी ।
इस श्रृंखला का पहला लेख—संगीतकार रामलाल की मुफलिसी और सेहरा फिल्म के दो गीत ।

चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: संगीतकार, रामलाल, फिल्‍म, सेहरा, तकदीर, का, फसाना, प्रिय, गीत,


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9 comments:

Manish September 1, 2007 at 12:22 AM  

लता जी का संस्करण भी सुनाने के लिए धन्यवाद

Udan Tashtari September 1, 2007 at 6:34 AM  

वाह वाह, बहुत खूब...क्या संस्करण लाये हैं...आभार कहते कहते थके जा रहे हैं भाई.

Gyandutt Pandey September 1, 2007 at 9:18 AM  

"शहनाईयों से कह दो कहीं और जाकर गायें... "
शहनाई तो हमें झंकृत कर गयी है - यूनुस!
बहुत अच्छा लगा गीत.

Anonymous,  September 1, 2007 at 11:14 AM  

रफ़ी के आगे लता का गीत उन्नीस ही रहा।

अन्नपूर्णा

Vikas Shukla September 1, 2007 at 12:40 PM  

युनूसभाई,
कल रात आपका इंटरनेट कनेक्शन कब सुधरा ? खैर. हम तो इंतजार करते करते थक गये.
तकदीरका फसाना के दोनो संस्करण सुने.रफी साब ने क्या आवाज लगाई है. सुभानल्ला! और एक चीज मैने नोट की. रफी साब वाले संस्करणमें जहां शहनाई का प्रयोग है, वहां लताजी वाले संस्करणमें गिटार का उपयोग हुवा है. (उस गीतके पहले आनेवाला जो शेर आपने लिखा है उसमें चांद की जगह चमन ये शब्द चाहिये. )
चालीसगांवमे हमारी सिनेमा थिएटर हुवा करती थी. शाम हुई के हम बच्चे उधर ही पडे रहते थे. सेहरा ये फिल्म, मै जब छोटा था तब हमारे थिएटर मे लगी थी और बहुत चली थी. इस फिल्मका हिरो प्रशांत करके था (जो इस फिल्म के बाद कही दिखा नही) और संध्या हिरोइन थी.
मुझे याद आता हे रामलाल जी के और एक भाई थे शामलाल करके और दोनो भाई मिलके शहनाई बजाया करते थे. आकाशवाणी के शनिवासरीय संगीत संमेलन में मैने इन दो भाइयोंका शहनाई वादन सुना है.

Anil Pandey September 1, 2007 at 3:45 PM  

sir,
shandar laga taqdeer ka fasana..blog se sambandhit kuch tips mujhe bhi dijiyega to mai apka shukraguzar rahunga.

अजय यादव September 1, 2007 at 6:07 PM  

युनुस जी!
बेहद सुंदर गीत और उतनी ही सुंदर प्रस्तुति कि लिये एक बार फिर धन्यवद!

Raj September 1, 2007 at 6:14 PM  

युनस भाई जी शुक्रिया,
तकदीर का फसाना ... जनाब अब किस किस बात की तारीफ करे, शहनाई ने गीत मे चार चांद लगा दिये, फिर शायरी ओर फिर रफी साहब की आवाज
बहुत बहुत शुक्रिया,
कभी जर्मनी की तरफ आओ तो दीदार जरुर देना

नाहर September 2, 2007 at 3:03 PM  

आपसे चैट करने का बहुत बड़ा फायदा हो गया, स्व. रामलाल जी हीरापन्ना के बारे में कई जानी अन्जानी बातें पता चली, और गानें तो सुनने में मजा आया ही है।
धन्यवाद यूनूस भाई

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