संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Wednesday, August 29, 2007

संगीतकार रामलाल की मुफलिसी और सेहरा फिल्म के दो गाने—पंख होते तो उड़ आती रे और तुम तो प्यार हो

दोस्‍तो पिछले कुछ दिनों से ब्‍लॉगिंग का सिलसिला इतर व्‍यस्‍तताओं की वजह से काफी धीमा सा हो गया है । मैं खुद भी रेडियोवाणी पर लगातार लिखने को मिस कर रहा हूं । कल हैदराबाद के मित्र सागर चंद नाहर से चैट हो रही थी कि उन्‍होंने अचानक सवाल दाग़ दिया, आप रामलाल हीरा पन्‍ना पर कब लिख रहे हैं । और मैंने उनसे आज का वादा कर दिया । दरअसल रामलाल जी पर मैं जाने कब से लिखना चाह रहा था । रेडियोवाणी की परंपरा बन गई है, उन संगीतकारों के बारे में भी बातें करने की जिन्‍हें पेशेवर दुनिया में ज्‍यादा काम नहीं मिला, लेकिन जो इक्‍का दुक्‍का मौक़े मिले, उनमें उन्‍होंने अपना सारा हुनर झोंक दिया । संगीतकार रामलाल भी इसी तरह के संगीतकार रहे हैं ।



शायद कुछ छह साल बरस पहले की बात है । विविध भारती पर हमारे एक सहयोगी को फोन आया कि मैं संगीतकार रामलाल बोल रहा हूं । क्‍या आप विविध भारती के सरगम के सितारे कार्यक्रम में मुझसे इंटरव्‍यू नहीं ले सकते । ये रामलाल नहीं उनकी मजबूरी बोल रही थी । शायद उन दिनों मैं छुट्टी पर था जब रामलाल सफेद कुर्ता पाजामा और स्‍लीपर चप्‍पलें पहनकर विविध भारती आये और सबसे मिलकर गये ।



लेकिन ये फोन थोड़े दिन बाद फिर आया । तब तक उनका इंटरव्‍यू हुआ नहीं था । खैर इस बार रामलाल जी की इंटरव्‍यू तय हुआ और वे खुद विविध भारती में आए । वही कुरता पाज़ामा । कपड़े का झोला । और पूरी शख्सियत से झरती मजबूरी । उन दिनों रामलाल एक किसी चाल की एक छोटी सी खोली में रहते थे । ज़रा स्‍क्रीन की इस खबर को एक नज़र देख लीजिए । विविध भारती आने पर उन्‍होंने स्‍वयं बताया कि किस तरह महाराष्‍ट्र सरकार ने उन्‍हें पवई में एक घर देने की घोषण की और फिर वो घर उन्‍हें इसलिए नहीं मिल रहा है क्‍योंकि उसके लिए जो पैसे जमा करने हैं वो उनके पास नहीं हैं । फिर बाद में पता चला कि उन्‍हें वो घर मिल गया है ।



रामलाल के मन में फिल्‍म-संसार के प्रति बहुत सारा रोष था । अपना हक़ मार लिये जाने का रोष । मैं आपको बता दूं कि फिल्‍म्‍ ‘गूंज उठी शहनाई’ में उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खां के साथ रामलाल ने भी शहनाई बजाई थी । लेकिन रामलाल का कहना था कि ज्‍यादा काम मेरा था और सारा नाम उस्‍ताद जी ले गये । रामलाल ने कई फिल्‍मों में शहनाई की तान छेड़ी । वे कमाल के शहनाई वादक थे । दरअसल फिल्‍म संसार में सीधे सादे गऊ आदमी की कोई कद्र नहीं होती । रामलाल जी यहीं मार खा गए । और यही कटु सत्‍य है ।
इस पोस्‍ट के ज़रिए मैं आपको ये अहसास भी दिलाना चाहता हूं कि फिल्‍म संसार में एक एक कायमाब व्‍यक्ति के पीछे हज़ारों या लाखों स्‍ट्रग्‍लर होते हैं । जो एकाध मौक़े के बाद गुमनामी की धुंध में खो जाते हैं । फिल्‍मी दुनिया में सब चलता है, किसी का काम अपने नाम करवा लेना, ज्‍यादा पैसे देने का वादा करके काम करवाना और फिर पेमेन्‍ट ना करना, फिल्‍म रिलीज़ के वक्‍त क्रेडिट ना देना और ना जाने क्‍या क्‍या ।



बहरहाल एक दिन रामलाल जी गुमनाम मौत मर गये । अखबारों में ख़बर इतनी छोटी थी कि किसी को पता भी नहीं चला । विविध भारती पर हमने उन्‍हें श्रद्धांजली दी । उनकी रिकॉर्डिंग आज भी हमारे पास है, जिसमें वो अपनी पूरी कहानी बयान करते हैं । इन पंक्तियों को लिखते वक्‍त मुझे रामलाल जी की वो बेफिक्र ठहाका भी याद आ रहा है और उनकी वो किससागोई भी जो हमारे बीच बैठकर उन्‍होंने पूरी फुरसत से की थी । कितनी कितनी बातें उन्‍होंने बताईं । अफ़सोस कि मुझे रामलाल जी की कोई तस्‍वीर नहीं मिल पा रही है । अगर मिली तो आप तक जरूर पहुंचाऊंगा । एक बात और बता दूं कि रामलाल जी ने एक विदेशी महिला से शादी की थी । ये संगीत के ज़रिए हुई मुहब्‍बत थी, जो जीवन भर चली ।
रामलाल ने दो बड़ी फिल्‍मों में संगीत दिया था—1963 में आई ‘सेहरा’ और ‘गीत गाया पत्‍थरों ने’ । संगीत के नज़रिये से ये दोनों फिल्‍में काफी कामयाब रही थीं । सेहरा फिल्‍म के गीत तो आज भी ज़बर्दस्‍त लोकप्रिय हैं । दिलचस्‍प बात ये है कि ‘गूंज उठी शहनाई’ में जब रामलाल ने शहनाई बजाई तो उनकी ख्‍याति निर्माता निर्देशक वी. शांताराम तक पहुंची और शांताराम ने ही अपनी दो फिल्‍मों में रामलाल को मौक़ा दिया । इसके बाद किसी ने उन्‍हें मौक़ा नहीं दिया ।
सेहरा रामलाल की सबसे बड़ी फिल्‍म थी । इस फिल्‍म के सारे गाने हिट थे । आईये इसी फिल्‍म के दो गीत सुने जाएं । इन्‍हें हसरत जयपुरी ने लिखा है । और यहां मैं अनिवार्य रूप से गाने के बोल भी दे रहा हूं ताकि आप जान पायें कि उत्‍कृष्‍ट लेखनी गाने के रस को कितना बढ़ा देती है । रामलाल जी के संगीत-संयोजन में एक परफेक्‍शन है । सेहरा फिल्‍म के गीत ‘पंख होते तो उड़ जाती रे’ को ही लीजिये । लता जी का जैसा शुरूआती आलाप इस गाने में है, वैसा अन्‍यत्र दुर्लभ है । बिल्‍कुल यूं लगता है कि जैसे किसी पंछी की उड़ान का आलाप है । इस गाने के मुखड़े के बाद पंछी की चहक डाली गयी है । और संगीत संयोजन देखिए, यहां गुप वायलिन भी है, तबला भी और हिंदी फिल्‍म संगीत में बहुत ही कम बजने वाला जलतरंग भी । बेहद पेचीदा लेकिन सादगी भरा संयोजन । तबले का चलन देखिए । उसकी तरंग को महसूस कीजिए । इस गाने में लता जी की आवाज़ में हल्‍की सी गूंज रखी गयी है जो इस गाने के प्रसंग के मुताबिक बिल्‍कुल सटीक लगती है । पहले अंतरे के बाद का इंटरल्‍यूड सुनिए । लता जी के आवाज़ के साथ तबले की रफ्तार । साथ में सितार और वायलिन । और फिर जलतरंग की तेज़ लहर । यूं लगता है जैसे हम आकाश में उड़े जा रहे हैं । ना जाने कितने लोगों को ये गीत ही नहीं इसके संगीत संयोजन का एक एक हिस्‍सा याद है । अद्भुत सही मायनों में अद्भुत गीत । लता जी ने राग भोपाली पर आधारित इस कठिन गाने को कितनी कुशलता से गाया है । उनकी प्रतिभा पेचीदा गाने को भी सरल बना देती है । गाने के अंत में मुखड़े से पहले जो हल्‍की सी बांसुरी है उस पर ध्‍यान जरूर दीजियेगा ।

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पंख होते तो उड़ आती रे रसिया हो ज़ालिमा
तुझे दिल के दाग़ दिखलाती रे ।।
किरनें बनके बांहें फैलाईं
आस के बादल पे जाके लहराई
दूर से देखा मौसम हसीं था
आने वाले तू ही नहीं था रसिया हो ज़ालिमा ।।

यादों में खोई पहुंची गगन में
पंछी बनके सच्‍ची लगन में
झूल चुकी मैं वादे का झूला
तू तो अपना वादा भी भूला रसिया हो ज़ालिमा ।।

दूसरा गाना है ‘तुम तो प्‍यार हो सजना’ । लता मंगेशकर और मुहम्‍मद रफी की आवाज़ । ये कई मायनों में मुझे एक दिव्‍य गाना लगता है । अगर आप इस गाने के रिदम को सुनें तो लगेगा कि किसी रोमांटिक गाने का नहीं बल्कि भजन का रिदम है । मुखड़े के बाद संतूर की स्‍वरलहरी और उसके बाद कोरस और फिर उसमें घुला मिला संतूर और लता जी का आलाप । सब कुछ इस गाने को एकदम दिव्‍य और अलौकिक बना देता है । आज के गानों को ग्रांड बनाने के लिए उनमें रिदम और बीट ठूंस दी जाती हैं । रामलाल ने यहां दिखाया है कि कैसे सादगी भरे संगीत संयोजन से गाने को एक भव्‍य रूप दिया जा सकता है । लेखनी और गायन दोनों में भी बेमिसाल है ये गाना । यूं लगता है जैसे प्‍यार छलक छलक पड़ रहा है ।

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तुम तो प्‍यार हो सजना,
मुझे तुमसे प्‍यारा और ना कोई ।।
कितना है प्‍यार हमसे इतना बता दो
अंबर पे तारे जितने इतना समझ लो
सच मेरी कसम
तेरी कसम तेरी याद मुझे लूटे
कसमें तो खाने वाले होते हैं झूठे
चलो जाओ हटो जाओ दिल का दामन छोड़ो
तुम तो प्‍यार हो ।।
आके ना जाए कभी ऐसी बहार हो
तुम भी हमारे लिए जीवन सिंगार हो
सच मेरी क़सम
तेरी क़सम तू है आंख के तिल में
तुम भी छुपी हो मेरे शीशा-ऐ-दिल में
मेरे हमदम मेरी बात तो मानो
तम तो प्‍यार हो ।।


संगीतकार रामलाल को फिल्‍म संसार वाले रामलाल हीरा पन्‍ना कहते थे । क्‍योंकि वो अपनी उंगलियों में पन्‍ना पहनते थे । रामलाल के जीवन के कुछ और पहलुओं पर बात होगी आगे चलकर । और तब मैं आपको सुनवाऊंगा उनके कुछ और अनमोल गाने ।
अंत में ये कह दूं कि ये मेरी सौंवीं पोस्‍ट थी ।
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16 comments:

Manish August 29, 2007 at 11:18 AM  

रामलाल जी के बारे में बताने का शुक्रिया ! सुंदर रहा गीतों का विवरण

Anonymous,  August 29, 2007 at 11:38 AM  

शतक मुबारक !

दोनों गीत बहुत सुंदर है।

प्रतीक्षा है फ़िल्म गीत गाया पत्थरों ने के गीतों की विशेषकर किशोरी अमोलकर के शीर्षक गीत की…

अन्नपूर्णा

Shirish August 29, 2007 at 12:32 PM  

Ramlal is among the hundreds of singers, composers and lyricists whose talent was not acknowledged enough.
This brings to my mind what you said during our chats: In Bollywood, most people work for themselves. Very few care to honour others' calibre.
It's a sad state of affairs. AS Kaifi Azmi rightly noted:

Matlab ki duniya hai saari
Bichde sabhi baari baari

Sagar Chand Nahar August 29, 2007 at 2:18 PM  

यूनूस भाई
स्व. रामलाल हीरापन्नाजी के बारे आपके लेख को पढ़ना बहुत अच्छा लगा। बहुत बहुत धन्यवाद।

कुछ वर्षों पहले गुजरात समाचार में रामलालजी पर एक लेख आया था उसमें उनका हंसता हुआ फोटो भी था। मैं पहले से सेहरा और गीत गाया के गानों और संगीत का प्रसंषक था पर लेख पढ़ने के बाद रामलालजी से मिलने की इच्छा तीव्र हुई और आपने बताया कि वे हमारे बीच नहीं है। तो बड़ा दुख: हुआ।
इस फिल्म के सारे गाने मुझे पसन्द हैं। खासकर तकदीर का फ़साना और हेमन्त कुमार की आवाज में गाये हुए श्लोक ना घर तेरा ना घर मेरा।
रामलालजी को श्रद्धान्जली

Sagar Chand Nahar August 29, 2007 at 2:25 PM  

इतने कम समय में सौवीं पोस्ट !!!
बहुत बहुत बधाई।

rajendra August 29, 2007 at 2:44 PM  

Congrats for the grand century. It is only begining. You have to score several centuries.

It is great that your 100th post remembers late Ram Lal. His talent was not used is the loss of indian film music.

Film world might have rejected him. But his compositions in two films would always keep him alive in hearts of music lovers.

Can't you post his Vividh Bharti interview?

Gyandutt Pandey August 29, 2007 at 2:54 PM  

नॉट आउट शतक की बधाई. बहुत धुआंधार बल्लेबाजी थी! जारी रहेगी - इसका सुकून है.

Udan Tashtari August 29, 2007 at 6:16 PM  

अक्सर क्रिकेट में भी देखा है कि जब शतक लगाने में एक रन बाकी हो तो प्लेयर नर्वस होकर बहुत संभल कर धीरे से वो रन बनाता है. बाद में अच्छा यह हो जाता है कि फिर खुल कर खेलता है.

वही आपके साथ हुआ..बहुत बधाई-अब परम्परा का निर्वहन करो और खुल कर खेलो-धड़ाधड़!! अनेकों शुभकामनाऐं.

रामलाल जी का परिचय अपने रोचक अंदाज में देने का आभार.

PIYUSH MEHTA-SURAT August 29, 2007 at 10:46 PM  

आदरणीय श्री युनूसजी,
१०० वे पोस्ट्के लिये हार्दिक बधाई । स्व. रामलालजी के बारेमें और उनके गानोके बारेमें बहोत ही बेहतरीन जानकारी । मैनें विविध भारती की उनकी मुलाक़ात सुनी है और शायद मैने उसका ध्वनि-मूद्रण भी रखा है । एक बात जो मेरे रस की है और इनसे संबंधीत है वो ये की फ़िल्म एक ही रास्ता (निर्माता : बी. आर. चोपरा और संगीत निर्देषक स्व. हेमन्त कुमार) के एक गीत चली गोरी पीके मिलन को चली की स्व. रामलालजी की शहनाई पर बजाई धून मैनें करीब ४० साल पहेले रेडियो श्रीलंका से सुनी थी जो बादमें कभी भी कम से कम मेरे सुननेमें नहीं आई ।
पियुष महेता
सुरत-३९५००१.

आदित्य प्रताप वन्देमातरम August 29, 2007 at 10:59 PM  

धन्यवाद यूनुस भाई, रामलालजी के बारे में इतनी सारी जानकारी देने के लिए। और इतने प्यारे गीत सुनाने के लिए।
और शतक के लिए शत - शत बधाइयाँ।

Mired Mirage August 30, 2007 at 2:01 AM  

इतनी सारी जानकारी मनोरंजक ढंग से देने के लिष धन्यवाद । पंख होते .... . हमारे बचपन का गाना है । सुनकर बचपन याद आ गया ।
घुघूती बासूती

Neeraj Rohilla August 30, 2007 at 3:39 PM  

देर लगी आने में हमको, देख लो फ़िर भी आये हैं :-)

सबसे पहले रामलालजी के बारे में जानकारी देने के लिये बधाई ।

इसके साथ ही शानदार स्ट्राईक रेट से शतक लगाकर जनता को मंत्रमुग्ध करने के लिये बधाईयाँ । आगे भी बैटिंग चलती रहे और बताते चलें कि ढीला पडने की जरा भी गुंजाइश नही है ।

Vikas Shukla August 30, 2007 at 5:49 PM  

युनूसभाई,
नॉट आउट सेंचुरी लगानेके लिये बहुत बहुत बधाई हो. आपने जो नियमितता रखी है वो यकिनन काबिले तारीफ है.
रामलाल जी ने आशाजी से गवाया हुवा फिल्म 'गीत गाया पत्थरोंने' का गाना 'तेरे खयालोंमें हम' एक अद्भुत गाना है. शांतारामजी ने उस गीत का चित्रीकरण बडे ही कल्पक तरीकेसे किया है. उसी प्रकार उसी फिल्म का सी. एच. आत्मा का गाना 'मंडवे तले गरीब के दो फूल खिल रहे है' काफि खूबसूरत है. लेकिन बहुत कम सुननेमे आता है.
शांतारामजी की और एक फिल्म थी 'बूंद जो बन गयी मोती'. उसका संगीत शायद सतीश भाटिया ने दिया था. उस फिल्म के गाने भी क्या कमाल के थे. 'हरी हरी वसुंधरा पे नीला नीला ये गगन', 'हां मैने भी प्यार किया'. कभी इन संगीतकारके बारेमे भी लिखियेगा.

Akhil Gokhale August 31, 2007 at 3:45 PM  

Thanks Yunus Bhai for information. It’s very sad those talented people are struggling for basic needs of life.
Complete article is well composed and informative. Please keep doing such great job.

-Akhil

rahul,  August 31, 2007 at 4:47 PM  

article is really good

जोगलिखी संजय पटेल की August 31, 2007 at 8:23 PM  

रामलालजी पर लिख कर तो आपने सवाब ही लूट लिया युनूस भाई.शब्दों के कई शतक बनाते रहें आप.मेरी दुआएं सदा आपके साथ.

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http://www.google.com/transliterate/indic/

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