संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Friday, August 10, 2007

संगीतकार दानसिंह के अनमोल नग्‍मे—‘मेरे हमनशीं मेरे हमनवां,मेरे पास आ मुझे थाम ले’




पिछले चार दिनों से मुंबई की बारिश ने मेरे एम.टी.एन.एल ब्रॉडबैन्‍ड कनेक्‍शन को तबाह कर रखा था और शुरूआत के बाद पहली बार इतने दिन चिट्ठाकारी की दुनिया से दूर रहना पड़ा । बहुत छटपटाहट हुई । लेकिन साईबर कैफे जाकर माथापच्‍ची करने की ना तो मोहलत मिली और ना ही साहस हुआ ।

फिर कल रात जब कनेक्‍शन दुरूस्‍त हुआ तो देखा कि मेरे छोटे भाई का एक संदेश चिट्ठे पर पड़ा है, क्‍या भाई तीन दिन हो गये, कुछ लिखा नहीं क्‍या हुआ । बहुत अच्‍छा लगा इस संदेश को पढ़कर । ये लगा कि कोई है जो इंतज़ार कर रहा है मेरे लिखने का । पुराने ज़माने के एक ब्रॉडकास्‍टर ने मुझसे एक बार कहा था कि रेडियो से बोलना किसी ऊंची इमारत से कंकर फेंकने जैसा है, पता नहीं किस किस को जाकर लगता है । आप जान भी नहीं पाते । ब्‍लॉगिंग में ऐसा नहीं है । प्रतिक्रियाएं और टिप्‍पणी फौरन मिल जाती हैं और हौसला अफ़ज़ाई भी हो जाती है ।

विकास शुक्‍ल ने तलब किया है कि दानसिंह पर आधारित श्रृंखला का क्‍या हुई भाई साहब । दरअसल दान सिंह वाली श्रृंखला पूरी हो ही नहीं सकी थी । ये इस श्रृंखला की तीसरी कड़ी है । विकास भाई ने जो गाना याद दिलाया है, वो है ‘ज़िक्र होता है जब क़यामत का, तेरे जलवों की बात होती है’ । ये मुकेश के यादगार गानों में से एक है और आगे चलकर ज़रूर सुनवाया जायेगा । लेकिन आज मैं जो गाना लेकर आया हूं वो इस गाने से कहीं ज्‍यादा अच्‍छा है ।

ये गीत है ‘मेरे हमनशीं मेरे हमनवां मेरे साथ आ मुझे थाम ले’

फिल्‍म-संसार के बेहद नाज़ुक गीतों में इस गाने का शुमार होता है । ये गीता रॉय के उन गानों में से एक है जो अनसुने से रह गये, ज्‍यादा कामयाब नहीं हो सके । यहां तक कि म्‍यूजिक कंपनी वाले भी इस तरह के कुछ गानों को अनदेखा करते रहे हैं । ये मुझे बेहद अफ़सोस की बात लगती है ।

बहरहाल......शायद आपको ये जानकर हैरत होगी कि इस गाने को हरिराम आचार्य ने लिखा है । आचार्य भी हिंदी फिल्‍म संगीत के बहुत कम चर्चित गीतकार रहे हैं । उनका ज्‍यादातर काम दानसिंह के साथ ही है । ‘भूल ना जाना’ 1960 में आई फिल्‍म है । मेरी जानकारी ये कहती है कि ये फिल्‍म रिलीज़ नहीं हो सकी थी । लेकिन इसके गानों के तो कहने ही क्‍या । इससे पहले मैंने आपको इसी फिल्‍म का मुकेश का गाया गीत सुनवाया था—‘पुकारो मुझे नाम लेकर’ ।
गीता रॉय ने इस गाने को बड़ी विकलता से गाया है । मैं ज़ोर देकर इस गाने की तुलना ‘साहब बीवी और ग़ुलाम’ के गीत ‘ना जाओ सैंया’ से करना चाहूंगा । दोनों को गीता रॉय ने ही गाया और दोनों में एक अजीब सी विकलता है । ये दोनों गाने कुछ इस तरह के हैं जैसे जिंदगी मुट्ठी में बंद रेत की तरह सरकती जा रही हो और कोई इसे थाम लेने, सहेज लेने की जद्दोजेहद कर रहा हो । कोई अपनी जिंदगी के रेज़े-रेज़े को चुनकर उसे नई शक्‍ल देने की नाकाम कोशिश कर रहा हो, किसी चमत्‍कार ही उम्‍मीद में ।

अब ज़रा इस गाने को सुनिए---
यहां क्लिक करके ।

वायलिन की विकल तान से शुरू होता है ये गाना, उसके बाद आती है गीता राय की दर्द में डूबी आवाज़ । ऐसी आवाज़ जिसकी सांद्रता हर पंक्ति के साथ बढ़ती चली जाती है । जैसे दर्द का गाढ़ा घोल कानों में उतारा जा रहा हो । दानसिंह के सूझबूझ भरे संगीत संयोजन की नायाब मिसाल है ये गीत । यहां फिर कहूंगा कि सबसे कमाल की है इस गाने की धुन, धुन जो गाने को कालजयी बनाती है । फिर आती है गायकी और लेखनी, तीनों के स्‍तर पर मुझे ये बेहतरीन नग़मा लगता है ।


मेरे हमनशीं मेरे हमनवां मेरे पास आ मुझे थाम ले
तू चला है मुझसे बिछड़ के यूं जो शिकस्‍ता-साज़ से रागिनी
जो चली हो जिस्‍म से दूर जां, जो चली हो आंख से रोशनी
मुझे दे दे बांहों का आसरा, मेरे पास आ मुझे थाम ले ।।

ये तेरा मिलन, ये तेरा करम है मुझे हयात से कम नहीं
तू है सामने तो मेरे सनम, मुझे मौत का भी अलम नहीं
ऐ बहारे-दिल, ऐ सुकूने-जां मेरे पास आ मुझे थाम ले
मेरे हमनशीं मेरे हमनवां ।।


बताईये आपका क्‍या कहना है ।


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इस श्रृंखला के अन्‍य लेख-- पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो वो तेरे प्‍यार का ग़म ,
वो तेरे प्‍यार का ग़म

12 comments:

Vikas Shukla August 10, 2007 at 11:33 AM  

वाह युनूसभाई,
चार दिनोंबाद आपकी पोस्ट पढकर मजा आ गया. बडा मिस किया आपके ब्लॉग को. गानेकी जो लिंक आपने दी है, मेरे यहा खुल नही पा रही. बादमे फिर ट्राय करूंगा. तबतक अलविदा.

ganand August 10, 2007 at 12:00 PM  

sahi bat aapne likhi hai jabse aap chithakaron ki duniya mein aaye hain uske bad ka sab se bada auntral ye tha. har din subah samacharpatra ki bhati aapka blog aa ke kholta par kuch naya na dekh kar dil mayus ho jata. aaj padh kar kafi auchha laga. aur ye blog aapki kushalata ka bhi sandesh de jata hai agar aap niyamit likhte hain to hame pata rahta hai ki hamare pyare Yunusji sakushal hain.....
Barish ke karan jyada dikkat to nahi hui hai aub kya haal hai?

Vikas Shukla August 10, 2007 at 12:05 PM  

लिंक खुल गयी और मैने गाना सुन लिया.
बस एकही शब्द कहुंगा....बेहतरीन !
अपना वादा आपने पूरा कर दिया. धन्यवाद.

आलोक August 10, 2007 at 5:54 PM  

ब्‍लॉगिंग में ऐसा नहीं है । प्रतिक्रियाएं और टिप्‍पणी फौरन मिल जाती हैं और हौसला अफ़ज़ाई भी हो जाती है ।

हाँ, सो तो है। साथ ही, कई लोग आपकी प्रविष्टियाँ सालों बाद भी पढ़ेगे। आप अपना लिखा भूल चुकेंगे फिर भी लोग पढ़ रहे होंगे। आज भी पढ़ते बहुत हैं और टिप्पणी करते होंगे शायद उसके दशांश।

Udan Tashtari August 10, 2007 at 8:16 PM  

चलो, हमारा इन्तजार सार्थक रहा. बहुत बढ़िया लौटे, मजा आया.

सच है ब्लॉगिंग के बारे में आपकी सोच और आलोक भाई से भी मैं पूर्णतः सहमत हूँ. अब जारी रहें, शुभकामनायें.

rajendra August 10, 2007 at 11:09 PM  

Both Daan Singh and Hariram Aacharya are hail and hearty and are in Jaipur. Daan Singh worked as an artiste at Jaipur station of AIR before leaving for Bombay in 60s to try his luck in Filmi Mayanagari. He composed most beautiful songs for 'Bhool Na Jaana' and Shashi Kapoor Sharmila Tagore starrer 'My Love'. First film could not be released and another bombed at the box office terminating Singh's tryst with tinsel world. He returned back home in Jaipur dejected. It would be interesting to know that avant grade film maker Sukhdev had directed 'My Love'. Sunil Dutt's fine film 'Reshma Aur Shera' in which Amitabh Bacchhan a short role of an aggressive dumb village youth.
-Rajendra Bora, Jaipur (Rajasthan)

जोगलिखी संजय पटेल की August 10, 2007 at 11:12 PM  

दानसिंहजी के गीत से मधुर यह समाचार मिला कि आप सब बेतहाशा पानी मे ख़ैरियत से हैं.मैं खु़द चिंतित था कि युनूस भाई कहाँ गए ? वेलकम होम युनूस भाई..(हिन्दी प्रेमी होने के बावजूद कई बार अंग्रेज़ी का बेहतर तर्जुमा अपनी ज़ुबान में नहीं मिल पाता इसलिये वेलकम होम..रेडियोवाणी घर से क्या कम है...जिसमें सारी खु़शिया और ग़म हैं)
अल्ला हाफ़िज़ !

yunus August 11, 2007 at 8:47 AM  

राजेंद्र जी बहुत बहुत धन्‍यवाद इस जानकारी के लिए । दरअसल मुझे फिल्‍मकार जगमोहन मूंदड़ा ने बताया भी था कि दानसिंह जयपुर में रहते हैं । अभी भी हैं । क्‍या मुझे उनका पता मिल सकता है । एक और निवेदन है क्‍या आप बता सकते हैं कि क्‍या हरिराम आचार्य भी हैं हमारे बीच । अभी आप दानसिंह और हरिराम आचार्य के फोन नंबर या पते दे सकते हैं । मेरा ईमेल पता चिट्ठे पर भी है, yunus.radiojockey@gmail.com. बहुत अच्‍छा लगा आपकी टिप्‍पणी पढ़के । आपसे कैसे संपर्क हो सकता है ।

yunus August 11, 2007 at 8:48 AM  

संजय भाई मैं एकदम सही सलामत हूं । गड़बड़ तो मेरा ब्रॉडबैन्‍ड कनेक्‍शन हुआ था, बहुत शुक्रिया ।

manoj August 11, 2007 at 10:15 AM  

आपका blog अच्छा है
मे भी ऐसा blog शुरू करना चाहता हू
आप कोंसी software उपयोग किया
मुजको www.quillpad.in/hindi अच्छा लगा
आप english type मे करेगा तो hindi मे लिपि आएगी

Lavanyam -Antarman August 11, 2007 at 8:16 PM  

युनूस भाई,
गीता जी कितनी अच्छी गायिका थीँ और दाम सिँह जी की सँगीत रचना का एक नायाब गीत पेश करने का शुक्रिया ! मुझे ऐसे गीत बहुत ज्यादा पसँद आते हैँ जिन मेँ एक के बाद एक पँक्ति गायी जाती हो -
इस गीत मेँ गीता जी ने, मुझे थाम ले" - इस अर्ध वाक्य को २ बार गाया है बाकी कि लाइन, रीपीट नहीँ कीँ
इससे एक समाँ बँधता चला गया है - और बहुत खूब हैँ श्री हरिराम आचार्य जी के शब्द - शुक्रिया --
स -स्नेह, -लावण्या

HEALTH INFO October 12, 2008 at 10:48 PM  

कृपया संगीतकार खय्याम के बारे में लिखे और उनके कुछ अनमोल नगमे सुनाएँ
निरंजन जैन

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http://www.google.com/transliterate/indic/

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