संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Monday, June 11, 2007

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्‍वाबों में मिलें.......हमारी सुरमई शामों की आवाज़ मेंहदी हसन

उस्‍ताद मेंहदी हसन साहब मेरे पसंदीदा ग़ज़ल-गायकों में से एक हैं । मेंहदी हसन की ख़ासियत ये रही है कि वो केवल उम्‍दा शायरी को ही अपनी आवाज़ बख्‍शते हैं । अब तक का मेरा तजुरबा यही कहता है कि मेंहदी हसन साहब किसी ऐसी-वैसी ग़ज़ल को छूते भी नहीं । मेंहदी हसन साहब अब गा नहीं सकते, सोचिए कि उनके दिल पर क्‍या बीतती होगी, खुद हमारा ही दिल इस बात से भीग भीग जाता है । आईये इस महान गायक को बड़े एहतेराम से सलाम करें और ये क़ुबूल करें कि हमने अपनी जिंदगी के कई ख़ामोश लम्‍हे, कई सुरमई शामें इस आवाज़ के साथ बिताई हैं ।

अपनी पिछली पोस्‍ट में मैंने गुलाम अली की कुछ ग़ज़लों के लिंक दिये थे और ये वादा किया था कि जल्‍दी ही मेंहदी हसन की अपनी पसंदीदा ग़ज़लें भी आपको सुनवाऊंगा । तो आईये आज के इस दिन को रंगीन करें इन नग्‍मों और ग़ज़लों से ।

(इस दौरान मनीष ने बड़ी महत्‍त्‍वपूर्ण बात कही है, उन्‍होंने कहा कि भारत में इंटरनेट की धीमी रफ्तार अकसर परेशान करती है, ऐसे में केवल यू-ट्यूब के लिंक देना नाइंसाफी है, हो सकता है कि बहुत सारे लोगों को परेशानी होती हो । इसलिये इस बार कुछ गानों के ऑडियो लिंक अलग और वीडियो लिंक अलग-अलग कर दिये हैं । जिसकी जैसी सुविधा हो, इनका इस्‍तेमाल कर सकता है । कुछ गीतों के वीडियो लिंक नहीं मिले इसलिये उनका केवल ऑडियो दिया जा रहा है)

मुझे तुम नज़र से गिरा तो रहे हो, मुझे तुम कभी भी भुला ना सकोगे---मेंहदी हसन का गाया ये नग्‍मा पियानो से शुरू होता है । और पियानो भी वैसा नहीं है जैसा धर्मेन्‍द्र, राजेंद्र कुमार या देव आनंद के फिल्‍मी गानों में होता है । अच्‍छा नाज़ुक सा पियानो है । यहां मेंहदी हसन की आवाज़ भी फ़र्क़ है, वैसी नहीं है जैसी उनकी हारमोनियम और तबले की संगत वाली ग़ज़लों में होती है । यहां उन्‍होंने शास्‍त्रीयता का इस्‍तेमाल थोड़ा कम किया है । बहुत शिद्दत भरे प्‍यार का नग्‍मा है ये । पढिये और सुनिए ।


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मुझे तुम नज़र से गिरा तो रहे हो, मुझे तुम कभी भी भुला ना सकोगे ।

ना जाने मुझे क्‍यूं यक़ीं हो चला है, मेरे प्‍यार को तुम मिटा ना सकोगे ।।

मेरी याद होगी जिधर जाओगे तुम, कभी नग्‍मा बनके कभी बनके आंसू
तड़पता मुझे हर तरफ पाओगे तुम, शमा जो जलाई है मेरी वफा ने
बुझाना भी चाहो बुझा ना सकोगे ।।

कभी नाम बातों में आया जो मेरा तो बेचैन होके दिल थाम लोगे निगाहों में छायेगा ग़म का अंधेरा, किसी ने जो पूछा सबब आंसुओं का
बताना भी चाहो बता ना सकोगे ।।


पिछले चिट्ठे पर टिप्‍पणी में मनीष ने लिखा था, ‘हम किशोरावस्‍था की दहलीज़ पर खड़े थे, बिना किसी बात के ही दिल भर जाता था’ । एक अबूझ से अहसास को कितनी आसानी से एक वाक्‍य में उतार दिया मनीष ने । बस यही अहसास आज भी होता है मेंहदी हसन की ग़ज़लें सुनने के बाद । ग़ुलाम अली की ग़ज़लों में कभी ख़ुशी की तरंग होती है तो कभी अफ़सोस का रंग । पर मेंहदी हसन हर सूरत में हमारी सुरमई शामों की आवाज़ हैं । हमारी तन्‍हाईयों, हमारे उदासी, हमारी नाकामी की आवाज़ हैं । और कहते हैं कि हम सबके भीतर उदासी का एक कोना होता है । ख़ामोशी और अकेलेपन का एक हिस्‍सा होता है । बस इसी हिस्‍से को मुतमईन करती हैं मेंहदी हसन की ग़ज़लें । ये ग़ज़ल हफ़ीज़ जालंधरी की है ।

यहां सुनिए—

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यहां देखिए—

यहां पढ़िए—
मुहब्‍बत करने वाले कम ना होंगे, तेरी महफिल में लेकिन हम ना होंगे

ज़माने भर का ग़म या इक तेरा ग़म ये ग़म होगा तो कितने ग़म ना होंगे ।।

अगर तू इत्‍तेफ़ाक़न मिल भी जाये तेरी फ़ुरक़त के सदमे कम ना होंगे

दिलों की उलझनें बढ़ती रहेंगी अगर कुछ मशवरे बाहम ना होंगे ।।

हफ़ीज़ उनसे मैं जितना बदगुमां हूं, वो मुझसे इस क़दर बरहम ना होंगे ।।



फ़ुरक़त—जुदाई । इत्‍तेफ़ाक़न—संयोग से । बाहम—जमा ।
बदगुमां—नाराज़ होना । बरहम—टूट कर अलग होना ।

और सबसे आखिर में अहमद फ़राज़ की ये ग़ज़ल । अब के हम बिछड़े । ज्‍यादा कुछ कहना नहीं चाहता, बस बशीर बद्र का शेर याद आ रहा है---

ये एक पेड़ है, आ इससे गले मिलके रो लें हम
यहां से हमारे तुम्‍हारे रास्‍ते बदलते हैं ।।



यहां सुनें--

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यहां देखें--

यहां पढ़ें--
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्‍वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ।।

तू खुदा है ना मेरा इश्‍क़ फरिश्‍तों जैसा
दोनों इंसां हैं तो इतने हिजाबों में मिलें ।।

ग़मे दुनिया भी ग़मे यार में शामिल कर लो
नशा बढ़ता है चराग़ों में जो शराबों में मिले ।।

अब ना वो मैं हूं ना तू है, ना वो माज़ी है फ़राज़
जैसे दो साये तमन्‍ना के सराबों में मिलें ।।

हिजाब-पर्दा । सराब—मृगतृष्‍णा ।

मेंहदी हसन की अनगिनत ग़ज़लें हैं जो हमारी तन्‍हाईयों की साथी हैं । आज उनमें से दो ग़ज़लें और एक नग्‍मा आपकी नज़र किया । मेंहदी हसन के गाये कुछ और अनमोल मोती फिर कभी ।

12 comments:

Anonymous,  June 11, 2007 at 11:56 AM  

5-6 saal pahale Anoop Jalota Hyderabad aaye the. Maine onse Doordarshan ke liy baat ki thi. jab sangeet ki, mahfilon ki aur clasical touch ki baat chali tab Anoop jee ne bataya ki kaise Mahdi Hasan saheb ek ghazal ko 30-40 min. tak gaate the. saath hi bahit si baate Anoop jee ne apne mitra Mehdi Hasan ke baare main batai thi, tab pahali baar main vaakai Mehdi Hasan saheb se parichit hui thi. Aaj bhi ve pal meri smritiyon main taza hai.

Annapurna

DR PRABHAT TANDON June 11, 2007 at 1:20 PM  

शुक्रिया यूनूस भाई, मेहंदी हसन जी को हम तक पहुँचाने के लिये . सुनते हैं कि पाकिस्तान सरकार ने मेहंदी हसन जी को उनके हाल पर छोड दिया है , अगर यह वाकई मे सच है तो इस महान कलाकार की अपने ही देश मे इससे बडी बेइज्जती नही हो सकती.

Sagar Chand Nahar June 11, 2007 at 4:20 PM  

यूनूस भाई
बहुत अच्छा लगा गजलों को सुनने में। मेहंदी हसन साहब का जिक्र हो तो tतेरी आँखों को जब देखा कँवल कहने को जी चाहा और रंजिश ही सही .. का जिक्र ना हो तो लेख अधूरा सा लगता है।
इस लेख माला की तीसरी कड़ी में ये दो गाने भी सुनवा दीजिये।

Vikas June 11, 2007 at 6:10 PM  

मेंहदी हसन साब के बारेमें जिंदगी में पहली बार मैंने पढा शिरीष कणेकर के एक आर्टिकल में, जो उन्होने लिखा था ओ. पी. नैय्यर साब पर. उन्होंने लिखा था, ओपी साब पाकिस्तानसे मेंहदी हसन साबका एल पी मंगाकर सुनते है और सुनते सुनते मस्त नाग की तरह डोलते रहते है. उन दिनो महाराष्ट्र मे किसी पाकिस्तानी सिंगर का रिकार्ड मिलना अशक्य था. बादमे एक दोस्त लंडन से उनकी दो एल् पीज लेके आया. फिर तो हम मेंहदी साब के दिवाने हो गये. उनके लगबग सारे गजल और गीत संग्रहित कर चुके है. कलही आजतक पर लताजी के गजल के नये अल्बम के बारे में उनसे साक्षात्कार चल रहा था. वो कह रही थी, एक नया अल्बम बनाने की तैयारी चल रही है, जिसमे भारत और पाकिस्तानके ४-४ सिंगर होगे. मेंहदी हसन, गुलाम अली, आबिदा परवीन, फरीदा खानुम. यहा से हरिहरन, सुरेश वाडकर, लताजी. (चौथा नाम मै भूल गया. ). लताजी ने एक बार मेंहदी हसन के बारेमें कहा था, उनके गले में ईश्वर का बसेरा है. What a complement!
विकास.

Udan Tashtari June 11, 2007 at 7:12 PM  

मुहब्‍बत करने वाले कम ना होंगे, तेरी महफिल में लेकिन हम ना होंगे

ज़माने भर का ग़म या इक तेरा ग़म ये ग़म होगा तो कितने ग़म ना होंगे ।।



--ये हुई न बात. बहुत खूब. इतने चुनिंदा नग्में सुना रहे हो, मैं पहले ही समझ गया था कि अपने शहर का बंदा लगता है. अब तो पढ़ भी लिया कि जबलपुर के हो. :)

mahashakti June 11, 2007 at 8:05 PM  

आपके पोस्‍ट मन खुश कर देते है।

Lavanyam -Antarman June 11, 2007 at 11:44 PM  

बेहतरीन गीतोँ की प्रस्तुति से मन प्रसन्न्न हो गया --
युनुस भाई , ऐसे सदाबहार गायकोँ से मुलाकात करवाते रहियेगा --
आपका भला हो जी ! ;-)
सादर स -स्नेह,
-- लावण्या

Manish June 11, 2007 at 11:49 PM  

सुझाव को कार्यन्वित करने के लिए धन्यवाद। गजल गायिकी की इतनी बड़ी हस्तियों की चंद अच्छी गजलों को छांटना बड़ा दुष्कर कार्य है । अच्छी कोशिश की है यूनुस आपने !

Anonymous,  June 12, 2007 at 8:37 PM  

मेरे खयाल से ये मिसरा शायद इस तरह होगा-
नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें

yunus June 12, 2007 at 8:44 PM  

जी आपकी बात सही लग ही है । आपने अपना नाम नहीं दिया जनाब

yunus June 12, 2007 at 8:54 PM  

अन्‍नपूर्णा जी आपकी पुरानी यादें जानकर अच्‍छा लगा ।

प्रभात जी आपने निदा फ़ाज़ली की वो ग़ज़ल सुनी होगी—‘यहां भी और वहां भी’ जो हालात वहां हैं वही तो यहां हैं । क्‍या हम अपने बुजुर्ग कलाकारों की खबर लेते हैं ।

सागर भाई आपकी फरमाईश जल्‍दी ही पूरी हो जायेगी, ये मेरी पसंद की रचनाएं हैं ।


विकास, अच्‍छा लगा आपकी प्रतिक्रिया जानकर और अलग से आपने जो मेल भेजा है उसमें मराठी लेख अच्‍छा है । दोबारा जल्‍दी ही पढ़ने वाला हूं । एक बात समझ नहीं आई मेंहदी हसन अब गा तो सकते नहीं हैं । फिर ये नया अलबम कैसे ।

उड़नतश्‍तरी जी क्‍या आप भी जबलईपुर के हैं ।

लावण्‍या जी शुक्रिया । आपकी एक फ़रमाईश मेरी आवाज़ सुनने की है ना । वो भी जल्‍दी ही पूरी होगी ।

मनीष, आपकी बातें और सुझाव हमेशा सिर आंखों पर ।


और अनाम जी आपसे जो कहना था अर्ज़ कर चुका हूं ।

फिर से सबको शुक्रिया ।

Akhilesh,  October 22, 2010 at 2:28 PM  

बहुत खूब , मेहँदी साहब के बारे में कुछ भी कहना चाँद को दिया दिखने जैसा ही होगा
बस ये ही कहना चाहूँगा की एक दो शेर शायद शामिल करने से रह गए हैं
प्रूरी ग़ज़ल एक बार फिर से पोस्ट कर रहा हूँ जिस से की जो लोग अपने पास लिखना चाहे वो ऐसा कर सके :-)

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें

ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती
ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें

तू ख़ुदा है न मेरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा
दोनों इंसाँ हैं तो क्यों इतने हिजाबों में मिलें

ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो
नशा बढ़ता है शराबे जो शराबों में मिलें

आज हम दार पे खेंचे गये जिन बातों पर
क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें

अब न वो मैं हूँ न तु है न वो माज़ी है "फ़राज़"
जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

--- अहमद फ़राज़

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