संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Monday, April 30, 2007

कुछ ऐसे भी पल होते हैं, जब रात के गहरे सन्‍नाटे गहरी नींद में सोते हैं : एक मई मन्‍ना डे के जन्‍मदिन पर विशेष


मित्रो पिछले कुछ दिनों से मैं मन्‍ना दा के कुछ गैर फिल्‍मी गीतों की ओर आपका ध्‍यान आकर्षित करने की कोशिश कर रहा हूं । आज उनका जन्‍मदिन है । मन्‍ना डे का जन्‍म एक मई 1919 को हुआ था । मन्‍ना डे इन दिनों बैंगलोर में रहते हैं, और समय समय पर अपने कंसर्ट करते ही रहते हैं । मुझे भी उनके ऐसे ही एक कंसर्ट को सुनने का अवसर मिला है । बहरहाल मन्‍ना डे के जन्‍मदिन पर पिछले कुछ दिनों से चल रहे रेडियोवाणी के इस आयोजन की इस विशेष कड़ी में हम उनके कुछ अनमोल गीतों को सुनेंगे और उनकी विशेषताओं को समझने की कोशिश करेंगे ।


आज हम जिस गीत की सबसे पहले चर्चा कर रहे हैं उसके बोल हैं--
कुछ ऐसे भी पल होते हैं

यहां सुनिए

ये गीत योगेश ने लिखा है, वही योगेश, जिन्‍होंने फिल्‍म ‘आनंद’ का गीत जिंदगी कैसी तू पहेली हाय’ लिखा था । उस गीत में योगेश की इन पंक्तियों पर गौर फरमाईये—कभी देखो मन नहीं माने, पीछे पीछे सपनों के धागे, चला सपनों का राही सपनों से आगे कहां’
उफ़ क्‍या कशिश है योगेश जी की कलम में । क्‍या आपको यक़ीन होगा कि इतना शानदार गीतकार आज गोरेगांव मुंबई में एक लगभग गुमनाम जिंदगी जी रहा है । मुझे योगेश से कई बार मिलने और उनसे लंबी लंबी बातचीत करने का सौभाग्‍य प्राप्‍त हुआ
है । पहली बार की ही मुलाक़ात में मैंने उनसे पूछा था कि योगेश जी आप कैसे लिख लेते हैं इतने नरमो नाज़ुक बोल । कहने लगे—जब कलम चलती है ना तो होश नहीं रहता । बस जो दिल में होता है कागज पर उतर आता है । लिखने का मेरा कोई साइंस नहीं है, बस जो दिल में आया लिख दिया । आज आप लोग इतना पसंद करते हैं तो मुझे हैरत होती है कि ये सब मैंने ही लिखा है या किसी और ने मुझसे लिखवा लिया
है ।
बहरहाल योगेश के इस गीत की पंक्तियों को पढिये ज़रा ---


कुछ ऐसे भी पल होते हैं, जब रात के गहरे सन्‍नाटे गहरी सी नींद में सोते हैं
तब मुस्‍कानों के दर्द यहां, बच्‍चों की तरह से सोते हैं ।
कुछ ऐसे भी पल होते हैं ।।

जब छा जाती है खामोशी, तब शोर मचाती है धड़कन
इक मेला सा लगता है, बिखरा बिखरा सा ये सूनापन
यादों के साये ऐसे में करने लगते हैं आलिंगन
चुभने लगता है सांसों में बिखरे सपनों का हर दरपन
फिर भी जागे ये दो नैना सपनों का बोझ संजोते हैं
कुछ ऐसे भी पल होते हैं ।।

यूं ही हर रात पिघलती है, यूं ही हर दिन ढल जाता है
हर सांझ यूं ही ये बिरही मन, पतझर में फूल खिलता है
आखिर ये कैसा बंधन है, आखिर ये कैसा नाता है
जो जुड़ तो गया अनजाने में पर टूट नहीं अब पाता है
और हम उलझे इस बंधन में दिन रात ये नैन भिगोते हैं ।।
कुछ ऐसे भी पल होते हैं ।।

सबसे पहली बात तो ये कि इतना ललित गीत क्‍या हिंदी फिल्‍मों में कोई और है । चलिए अलबमों की दुनिया में ही ढूंढ निकालिए । नहीं मिलेगा । यकीन मानिए बिल्‍कुल नहीं मिलेगा । क्‍योंकि पहले कभी और ना ही बाद में कभी ऐसा लिखा गया । इसीलिए तो मन्‍ना डे के जन्‍मदिन पर मैं इस गीत को खोजकर आपके लिए लाया हूं ।
जरा इसके दोनों अंतरों को पढिये । खासकर दूसरा अंतरा, हर सांझ यूं ही ये बिरही मन, पतझर में फूल खिलाता है, आखिर ये कैसा बंधन है, आखिर ये कैसा नाता है ।
कितनी अबूझ और कितनी गहरी बात योगेश ने लिखी और मन्‍ना डे को आज तीस चालीस साल बाद ही सही, क्‍यों ना हम बधाई तो दे दें । बधाई तो योगेश जी को भी दी ही जानी चाहिये । क्‍या आप लोगों में कोई योगेश जी का क़द्रदान है । अगर हां तो कृपया अपनी बात कहिए । ऐसा क्‍यूं है कि एक समय के बाद हमारे समय के सबसे अच्‍छे लेखक यूं गुमनाम बना दिये जाते हैं । क्‍या किसी के पास कोई जवाब है ।


आज का दूसरा गीत है---नथली से टूटा मोती रे ।।

ये गीत भी मधुकर राजस्‍थानी का है । और इसे आप रीयल प्‍लेयर पर
यहां सुन सकते हैं । इस गाने को सुनते हुए ज़रा इसके बोलों को भी पढिये ---
सजनी, सजनी
कजरारी अँखियां रह गईं रोती रे
नथली से टूटा मोती रे
रूप की अगिया अंग में लागी
कैसे छुपाए, लाज अभागी,
मनवाऽऽ कहताऽऽ भोर कभी ना होती रे
कजरारी अँखियाँ रह गईं ...
बोली दुलहनिया पलकें झूकाएऽऽ
घूँघटवा में सहमे लजाये
बलमाऽऽ पढ़ाएऽऽ प्रीत की पहली पोथी रे
कजरारी अँखियाँ रह गईं ...

कुल मिलाकर चार मि0 बाईस सेकेन्‍ड का गीत है ये । बेहद भारतीय गीत है । अगर आप इसे ध्‍यान से सुनें और पढ़ें तो पायेंगे कि एक बेहद निषिद्ध विषय पर मधुकर राजस्‍थानी ने ये गीत लिखा है, जिसमें अश्‍लील हो जाने की पूरी संभावनाएं थीं । मगर ऐसा नहीं हुआ बल्कि जिस अंदाज़ में इसे लिखा गया है उससे गीत का लालित्‍य कुछ और बढ़ ही गया है । पिछले कुछ लेखों में मैंने आपको मधुकर राजस्‍थानी के गीतों से अवगत कराया है । इन सबको क्रम से पढ़ने के बाद आप जान चुके होंगे कि सादगी, सरलता और शिष्‍टता इन गीतों की सबसे बड़ी विशेषता है । गीत सितार की तान से शुरू होता है । फिर मन्‍ना दा की नर्म आवाज़ में ‘सजनी सजनी’ की पुकार । और फिर ‘नथली से टूटा मोती रे’ । इसी गीत में मन्‍ना दा जब गाते हैं ‘रूप की अगिया अंग में लागी, कैसे छिपाए लाज अभागी’ तो लाज शब्‍द पर मन्‍ना डे अपनी आवाज़ में जिस तरह का भाव लाते हैं वो अनमोल है, नये गायक अगर ये भाव व्‍यक्‍त करना सीख जाएं तो हमारा संगीत बहुत कुछ सुधर जाए ।

बहरहाल मित्रो, इन गीतों को सुनिए और मन्‍ना डे के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कीजिए ।

15 comments:

mahashakti May 1, 2007 at 8:04 AM  

मन्‍ना डे के बारे में जान कर अच्‍छा लगा गीत भी बहुत सुन्‍दर थे ।

कभी टुन टुन जी के बारे में कुछ बताइये तो अच्‍छा लगेगा। फिल्मी से ज्‍यादा गानों के बारें में।

Anonymous,  May 1, 2007 at 10:21 AM  

Yeh jaan kar acchha laga ki Mannade aaj bhi concert dete hai aur aaj bhi aap Yogesh jee ke sampark main hai.

Kyon n hum ek aisi team banane ki koshish kare jisme Yogesh ke heet ho Mannade ke swar Jagjeet singh ki dhun aur agar nai peedi se jodana chaho to Alka Yagnik ko le sakte hai.

kya aisa ho sakta hai....

Annapurna

Raviratlami May 1, 2007 at 10:56 AM  

पहला गीत तो मेरे मन में बरसों अटका रहा था और जब तब जुबान पे निकल आता था - गुनगुनाहट के रूप में. अब भी सुनो तो अटक-चिपक सा जाता है...

अतुल शर्मा May 1, 2007 at 12:33 PM  

बहुत उम्दा प्रस्तुति है। आपने ब्लॉग जगत वो सुर लगाया है जो अभी तक नहीं था।

Suresh Chiplunkar May 1, 2007 at 12:50 PM  

यूनुस भाई,
आपकी कलम में दम है यह तो मालूम था ही, अब उसका प्रत्यक्ष उदाहरण देखने को मिलता जा रहा है,,, आप जिस प्रोफ़ेशन में हैं.. वह बडा ही आकर्षक है और आप जैसे लोग उसे और आकर्षक बना देते हैं अपनी प्रस्तुतियों के कारण.. एक और शानदार प्रस्तुति पर मेरी बधाई...

अफ़लातून May 1, 2007 at 12:55 PM  

युनुस भाई,
आज सुबह 'भूले-बिसरे गीत' की जगह मन्ना डे को ही विविध भारती ने भी याद किया,आभार।
गीतकार योगेश के कायल देश भर में हैं,उन तक हमारी शुभकामना पहुँचायें। रजनीगन्धा के गीत उन्हींके हैं, न? 'कई बार यूँ ही देखा है, ये जो मन की सीमा-रेखा है,मन तोड़ने लगता है'।
योगेशजी पर केन्द्रित आपकी चिट्ठा-प्रस्तुति का इंतज़ार है ।

Shirish May 1, 2007 at 1:03 PM  

Dear Yunus,
You had entrusted me with the task of greeting Manna Da personally. I felt honoured on reading it.
This morning I called the maestro's residence. I was informed he is in Kolkata, and will be returning to Bangalore on May 5. Then, on May 11, he is leaving for the Gulf.
I was told there is a programme in Kolkata today to mark his birthday.
Nevertheless, I will call Manna Dey after he returns to Bangalore from Kolkata and convey our birthday greetings.
May this great singer live many more healthy years and continue to regale us.

Manish May 1, 2007 at 2:52 PM  

Behad pyare geet sunvaye aapne Yunus Bhai . Yogesh ji ki lekhani ke shuru se kayal rahe hain. Pehli baar school mein jab Rim Jhim gire Sawan suna tha to use Gulzar ka maan baithe the, amein pata chala ki Yogesh ka likha hai.

Manna De ke filmi geeton mein mujhe Sur Na Saje kya gaaon Main aur gair filmi mein Madhushala sabse priya hai.

Janmadin par unhein hardik badhai !

Aflatoon ji Kai baar yoon bhi dekha hai Mukesh ka gaya hua geet hai.

yunus May 1, 2007 at 3:56 PM  

बैंगलोर की शिरीष जी धन्‍यवाद मुझे मन्‍ना दा का नंबर देने और मेरी ओर से उनसे बात करने की कोशिश करने के लिए । फोन तो मैंने भी किया था मगर कोई ज्ञान जी मिले, उन्‍होंने कलकत्‍ता का नंबर दिया । फिर मैंने कलकत्‍ता में भी फोन किया तो पता चला कि आज मन्‍ना दा का अभिनंदन है, वो उसी कार्यक्रम में गये हैं । अभी अभी तक प्रयास किया मगर उनसे बात नहीं हो सकी ।

अफलातून भाई अच्‍छा लगा ये जानकर कि आज आपने विविध भारती से भूले बिसरे गीत में मन्‍ना डे पर केंद्रित विशेष पेशकश सुनी । दरअसल इस साल मैंने सोचा कि क्‍यों ना हम जोर शोर से मन्‍ना दा का जन्‍मदिन मनाए । किसी भी टी0वी0 चैनल ने अभी तीन साढ़े तीन बजे तक तो कुछ प्रस्‍तुत नहीं किया उन पर । और हां ‘कई बार यूं भी देखा है’ गीत योगेश जी का ही है, और मुकेश ने गाया है । फिल्‍म रजनीगंधा । संगीत सलिल चौधरी ।

रवि रतलामी जी, जो बरसों से अटका चिपका रहे वो अच्‍छा ही गीत होगा । मैंने किसी टिप्‍पणी में पढ़ा था कि आप अस्‍सी के दशक के गीतों के मुरीद रहे हैं । क्‍या मुझे उनकी सूची देंगे । मेरे लिए शोध का विषय होगी ।

मनीष भाई योगेश वाक़ई अद्भुत गीतकार हैं । और मन्‍ना डे के जिन गीतों का जिक्र आपने किया है वो तो हैं ही कमाल के । पर कई अन्‍य ऐसे गीत हैं जो मशहूर ना होते हुए भी अनोखे हैं । फिल्‍म अनुभव का गीत सुनिए—फिर कहीं कोई फूल खिला । अगर कहीं मिले तो । ना मिले तो बताईये । मैं हूं ना ।

महाशक्ति और अतुल शर्मा जी को भी धन्‍यवाद । टुनटुन यानी उमा देवी के गीतों पर जल्‍दी ही काम किया जायेगा । अगर भूल जाऊं तो याद जरूर दिलाईयेगा ।

भाई सुरेश चिपलूणकर क़द्रदान लोगों में से हैं । इतनी प्रशंसा मुझे असहज बना देती है, गीतों का जुनून है, जो ये सब करवा रहा है । बस ।

अन्‍नपूर्णा जी ये सुझाव अच्‍छा है आपका । मगर इसके लिए किसी म्‍यूजिक कंपनी को ही आगे आना होगा । अगर ऐसा हो गया तो कमाल के गीत बनेंगे । आपको याद होगा नाना पाटेकर ने प्रहार फिल्‍म का निर्देशन किया था । और उसमें मन्‍ना डे से एक गीत गवाया था । हमारी ही मुट्ठी में आकाश सारा । फिर अभी फिल्‍म उमर में मन्‍ना डे ने एक कव्‍वालीनुमा गीत गाया है सोनू निगम के साथ । जाहिर है कि मन्‍ना डे इस उम्र में भी गा सकते हैं ।
शैलेश भारतवासी को भी धन्यवाद, हिंद युग्‍म देखा, वहां मन्‍ना डे के लिए बधाई संदेश लगाया है उन्‍होंने । आज वाक़ई अच्‍छी तरह मन्‍ना डे का जन्‍मदिन मनाया गया ।

Sagar Chand Nahar May 1, 2007 at 6:24 PM  

यूनूस भाई
मन्नाडे के जन्मदिन पर आपने बहुत सुनद्र प्रस्तुति दी है उसके लिये आपको साधूवाद। मैं भी पुरानी फिल्मों के गानों का मुरीद हूँ, अब आप विविध भारती में हो तो अब बहुत सी अच्छी जानकारियाँ आपसे मिलेगी, ऐसी आशा है।

मनिष भाई के चिट्ठे पर (मुन्नी बाई की गज़ल वाले) आपके लिये संदेश छोड़ा है जिसे भी देख लेवें।
sagarchand.nahar@gmail.com

पंकज May 2, 2007 at 7:56 PM  

यूनुस जी, आज अपने ब्लाग में आप ने वह प्रश्न उठाया है जो मेरे मन में अक्सर ही उठता रहा है।
आखिर क्या कारण है कि जो कवि या शायर बल्कि मैं कहूँगा कि कलाकार, कभी सबका प्यारा होता है वही एक दिन भुला दिया जाता है। मैं ने इस विषय पर कई बार सोचा है; कुछ निष्कर्ष आप के साथ बाँटता हूँ---
१-पब्लिक का 'टेस्ट' बदलता रहता है (लगभग हर पाँच-दस साल में नये कलाकार स्थापित हो जाते हैं और वही टिक पाते हैं जो अपने को थोड़ा बदलता है)।
२-कभी-कभी कलाकार नयी चुनौतियों के लिये तैयार नहीं रहता है या फिर उनके अनुसार अपने आप को बदल नहीं पाता।
३-कई बार कलाकार अपने पारिवारिक कारणों से भी अपना वह मुकाम नहीं पा पाता, जिसका कि वो हकदार होता है(मैं किसी का उदाहरण देना उचित नहीं समझ रहा हूँ, लेकिन शायद आप समझ पा रहे होंगे)।
४- हर कलाकार की अपनी सीमाएँ होती हैं, कई बार हसकी शिमा से अधिक उदम्मीदें की जाती हैं।
५-हर कलाकार की अपनी प्राथमिकताएँ होती हैं, उसका अपना निजी जीवन भी होता है; जिसे जीने के लिए उसे कुछ समझौते करने पड़ते हैं, मैं समझता हूँ कि मुख्य बात यह है कि वो अपने जीवन सै खुश है क्या? ऐसा नहीं है कि अगर वो एक नामचीन कलाकार नहीं बन पाया तो वह एक असफल व्यक्ति है।

Vikas May 3, 2007 at 9:04 PM  

Yunusbhai,
vismrutapray hote ja rahe ye jo asamanya kalakaar hain, unke taraf aap jo hamara dhyan akarshita kar rahe hain, uske liye main aapka abhinandan karta hun aur aapko dhanyawad deta hun. Yogesh aur Salil Chaudhary is jodi ne bahuthi sumadhur aur arthapurna geet diye hain. Yadi Yogesh ji aaj gumnaam jindagi jee rahe hain to isme hum rasik shrotaon ka hi nuksan hain.
Doosari baat, Anand ka jo geet aapne udhrut kiya hain (Jindagi kaisi hain paheli) uske shabd galat likhe gaye hain. Kabhi Dekho Man Nahi Maane (Jaage chahiye) Peeche Peeche Sapanoke Dhaage (Bhaage chahiye).

yunus May 4, 2007 at 9:23 AM  

विकास जी बहुत शुक्रिया टिप्‍पणी के लिए ।
आनंद फिल्‍म के गीत के बोल स्‍मृति के आधार पर लिखे गये थे, इसलिये गलत हो गये, जैसे ही समय मिलता है मैं अपनी पोस्‍ट पर इन बोलों को सुधार दूंगा ।
कृपया अपने बारे में बताएं, आप कहां हैं और क्‍या करते हैं ।
संपर्क रखिए

Vikas May 4, 2007 at 7:36 PM  

Yunus bhai, main ye sub hindi me likhna chhahta hun. Kaise likhu kripaya margadarshan kare. Bahar hal, main Maharashtra ke Jalgaon Dist.ke Chalisgaon namke chhotese town me rahta hun.Vividh Bharati sunta rahta hun. Jab Poona jata hun tab bhi Radio Mirchi ki jagah FM par Vividh Bharati hi sunana pasand karta hun. Vaise to Vividh Bharati ke sabhi udghoshak acche hain. Lekin aapse kuchh special tuning jamti hain aisa lagata hain. Aapke presentation me jabardast josh jhalakata hain aur script and narration par aap jo mehnat lete hain vo har ek program me prakat hoti dikhai deti hain. Ab mere bareme. SBI ki 22 years ki service ke baad maine 2001 me VRS liya hain aur apna Computer Class aur Internet Cafe ka business karta hun. AIR Jalgaon station ka B plus Drama Artiste hun. English se Marathi Translation kee hobby rakhata hun. French story writer Gue De Maupasaant aur Mario Puzo ki Godfather Marathi me translate karke publish kar chuka hun.Filhal Agathe Christie ki ek upanyas ka translation karne me vyast hun.

adityavpratap August 17, 2007 at 2:02 PM  

यूनुस भाई,
मन्ना दे तो हमारे प्राणों मे बसते हैं। हमारा पूरा परिवार इनका दीवाना है।
मेरी ४ वर्ष की लडकी, जो उन्हें "नन्हा रे" कहती है, उनके गीतों पर थिरकनें लगती है। उसका सबसे पसंदीदा गाना है -
ऐ मेरी ज़ोहराजबीं

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http://www.google.com/transliterate/indic/

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