संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Friday, September 26, 2008

देव आनंद के नाम--वहां कौन है तेरा मुसाफिर जायेगा कहां । जन्‍मदिन पर विशेष ।

एक अभिनेता के तौर पर मुझे देव आनंद अच्‍छे लगते हैं । एक निर्माता निर्देशक के तौर पर मुझे देव आनंद 'हरे रामा हरे कृष्‍णा तक अच्‍छे लगते रहे थे । उसके बाद वो डिफ्यूज़ हो गए । लेकिन देव आनंद की कर्मठता और जिद कमाल की है । आज उनका 85 वां जन्‍मदिन है । आजकल वो अपनी नई फिल्‍म 'चार्जशीट' पर काम कर रहे हैं ।
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देव आनंद शायद हमारे समाज को सिखा रहे हैं कि लगातार असफलता के बावजूद कैसे शिद्दत के साथ अपना काम किया जा सकता है । देव आनंद सिखा रहे हैं कि रिटायरमेन्‍ट की उम्र तक पहुंचते पहुंचते शिथिल हो जाने वाले मन को कसकर चुस्‍त दुरूस्‍त कैसे रखा जा सकता है । और जिस उम्र में दुनिया 'आराम' करती है उस उम्र में कैसे कर्मठता के रास्‍ते पर चला जा सकता है ।


देव आनंद की जिंदगी नाटकीयता भरी रही है ।


सुरैया से अथाह प्रेम था उन्‍हें । चर्चगेट स्‍टेशन के नज़दीक सुरैया के घर के सामने एक पेड़ के नीचे बारिश में भीगते हुए उन्‍होंने सुरैया के गैलेरी में आने का इंतज़ार किया था । एक मित्र के ज़रिए हीरे की अंगूठी भेजी थी जिसे सुरैया ने स्‍वीकार कर लिया था । पर सुरैया की नानी और सदियों से चली आ रही धर्म की दीवार ने देव और सुरैया को जीवन भर के लिए अलग अलग कर दिया था ।


आज देव आनंद सुरैया का जिक्र थोड़ी तल्‍खी से करते हैं, उनका कहना है कि सुरैया में साहस नहीं था । कभी कभी मैं सोचता हूं कि किस तरह का खालीपन महसूस होता होगा उन्‍हें भीतर से । जब सुरैया नहीं रहीं तो कैसा लगा होगा देव को ।


सुरैया--करीब तीस साल की उम्र में suraiyaसिनेमा को अलविदा कहने वाली एक  नायाब नायिका । उसके बाद धीरे धीरे अपनों से दूर होने वाली एक ज़हीन लड़की । जिसे अंग्रेजी लिट्रेचर से प्‍यार था । जिसे जिंदगी की छोटी छोटी खुशियों से प्‍यार था । सुरैया को हॉलीवुड के अभिनेता ग्रेगरी पैक अच्‍छे लगते थे । जब देव आनंद को ये बात पता चली तो उम्र भर के लिए उन्‍होंने ग्रेगरी पैक की अदाओं को अपनी अदाएं बना लिया । जो सुरैया को अच्‍छा लगा देव आनंद ने उसे अपना लिया ।

कल्‍पना कीजिए कि तीस बरस से आगे की बाकी उम्र सुरैया ने अपने घर में कैद रहकर बिताई । बाहर की दुनिया से खुद को काटकर किताबों में डूबी रहीं । खूब सज धज कर तैयार होतीं और घर में बनी रहतीं । कल्‍पना कीजिए कि उम्रदराज़ होने के बाद भी वो अपने सौंदर्य के ढलने को स्‍वीकार नहीं कर पाईं । वो उसी तरह से मेकअप करके गहने पहनकर घर पर रहतीं, पूरी नफ़ासत के साथ ।
देव आनंद को जब दादा साहेब फालके अवॉर्ड मिला था तो मेरी उनसे बात हुई थी फोन पर । उन्‍होंने जिस तटस्‍थता के साथ इस अवॉर्ड को स्‍वीकार किया था, वो मुझे हैरतअंगेज़ लगती है । उन्‍होंने क़तई स्‍वीकार नहीं किया कि ये अवॉर्ड उन्‍हें देर से मिला है । उन्‍हें इस बात से कोई फर्क ही नहीं पड़ता था ।

देव आनंद की शख्सियत वाक़ई अद्भुत है ।

हम उन्‍हें जन्‍मदिन की शुभकामनाएं दे रहे हैं ।

गाईड फिल्‍म का ये गीत उनके जन्‍मदिन पर-- जो एक साथ कई स्‍तरों पर अपनी बात कहता है ।




वहां कौन है तेरा मुसाफिर जायेगा कहां
दम ले ले घड़ी भर ये छैंया पाएगा कहां
बीत गये दिन, प्‍यार के पल छिन
सपना बनी वो रातें, भूल गये वो, तू भी भुला दे
प्‍यार की वो मुलाक़ातें
सब दूर अंधेरा, मुसाफिर जाएगा कहां ।।
कोई भी तेरी राह ना देखे, नैन बिछाए ना कोई
दर्द से तेरे कोई ना तड़पा, आंख किसी की ना रोई
कहे किसको तू मेरा, मुसाफिर जाएगा कहां ।।
कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है फ़ानी
पानी में लिखी कहानी,
है सबकी देखी, है सबकी जानी
हाथ किसी के ना आई,
कुछ तेरा ना मेरा, मुसाफिर जायेगा कहां ।।
दम ले ले घड़ी भर ये छैंया पायेगा कहां ।।


आज पार्श्‍वगायक हेमंत कुमार की भी बरसी है । रेडियोवाणी कल उन्‍हें नमन करेगा ।

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Wednesday, April 23, 2008

'वहां कौन है तेरा मुसाफिर जायेगा कहां' : फिल्‍म गाईड के निर्माण से जुड़ी दिलचस्‍प बातें

85 बरस के देव आनंद इस साल पहली बार cannes film festival में जा रहे हैं । उनकी सदाबहार फिल्‍म 'गाईड'  को इस साल कान्‍स फिल्‍म समारोह के 'क्‍लासिक्‍स-सेक्‍शन' के लिए चुना गया है । मुंबई के अंग्रेज़ी अख़बार The Hindustan Times की रोशमिला भट्टाचार्य ने बाईस अप्रैल के अख़बार में फिल्‍म 'गाईड' के निर्माण से जुड़ी दिलचस्‍प बातें लिखी हैं । ये उन्‍हीं के लेख का हिंदी अनुवाद है ।

देव आनंद कहते हैं कि जब मैंने नोबेल पुरस्‍कार विजेता पर्ल एक बक के साथ भारत और अमरीकी सहयोग से बनने वाली फिल्‍म 'गाईड' को घोषणा की तो लोगों ने कहा कि मेरा दिमाग़ ख़राब हो गया है । पर्ल एस बक ने फिल्‍म 175px-Pearl_Buck के अंग्रेज़ी संस्‍करण का प्रोडक्‍शन भी किया था और स्‍क्रिप्‍ट पर भी काम किया था । देव आनंद ने साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार प्राप्‍त आर. के. नारायण की पुस्‍तक 'गाईड' को चुना था और ये फिल्‍म संसार में बेहद चर्चा का विषय बन गया था । सभी का कहना था कि देव आनंद जैसे स्‍टार को एक ऐसे टूरिस्‍ट गाईड की भूमिका निभाने की क्‍या ज़रूरत है, जिसने अनैतिक संबंधों से लेकर धोखाधड़ी तक दुनिया भर के पाप किए हैं । और फिल्‍म के अंत में जाकर वो एक ठिकाने का काम करता है । इस पर देव आनंद का जवाब थ कि लीक से हटकर जीवन जीने के लिए व्‍यक्ति के भीतर एक पागलपन का तत्‍त्‍व होना ज़रूरी है । गाईड राजू में वही पागलपन मौजूद है । ( पर्ल एस बक की ये तस्‍वीर विकीपीडिया से साभार )

जब ये तय हो गया कि देव आनंद ही राजू का किरदार निभाएंगे तो तलाश शुरू हुई रोज़ी की । 'गाईड' के अंग्रेज़ी संस्‍करण के निर्देशन की जिम्‍मेदारी Tad danielwski को सौंपी गयी थी और उनका कहना था कि गाईड राजू ln की रोज़ी तो लीला नायडू ही हो सकती हैं । उन्‍होंने vogue पत्रिका में लीला नायडू को दुनिया की दस सबसे खूबसूरत महिलाओं के तौर पर देखा था । इस्‍माइल मर्चेन्‍ट की फिल्‍म The Householder भी टैड ने देख रखी थी और उनका मानना था कि लीला नायडू इस भूमिका के लिए परफेक्‍ट रहेंगी । लेकिन देवआनंद को लीला नायडू जम नहीं रही थीं । उनका कहना था कि रोज़ी एक लज्‍जावान भारतीय स्‍त्री नहीं थी । वो स्‍वतंत्र विचारों वाली, जुनूनी स्‍त्री थी और सबसे बड़ी बात वो एक नर्तकी थी । जबकि लीला नायडू नर्तकी नहीं थीं । फिर पद्मिनी के नाम पर विचार किया गया । फिर बारी आई वैजयंतीमाला की । लेकिन टैड इन नामों में से किसी पर भी सहमत नहीं हुए । फिर देव आनंद ने वहीदा रहमान के नाम का सुझाव दिया और Tad danielwski इससे सहमत हो गए । (लीला नायडू की तस्‍वीर इस वेबसाईट से साभार )

सवाल ये था कि क्‍या वहीदा रहमान एक शादीशुदा महिला का किरदार निभाने को राज़ी होंगी, जो अपने सपनों को पूरा करने के लिए बड़े साहस के साथ अपने वृद्ध और नपुंसक पति को छोड़कर एक युवा गाईड के साथ भाग guide निकलती है । पर वहीदा राज़ी हो गईं । जब फिल्‍म 'नीलकमल' के निर्देशक राम माहेश्‍वरी को वहीदा के इस 'खलनायिकानुमा' रोल की ख़बर मिली तो वो भड़क गए । उन्‍होंने वहीदा से कहा कि मेरी फिल्‍म और अपने कैरियर को तबाह मत करो । मेरी फिल्‍म में तुम सीता की भूमिका कर रही हो । लेकिन वहीदा रहमान ने तय कर लिया था । वो अपने आप को सती-सावित्री वाली भूमिका में बांधकर नहीं रखना चाहती थीं । वहीदा का कहना था कि जिंदगी में कई बार ऐसे मौक़े आते हैं जब कोई भी महिला रोज़ी की तरह फैसले करती है और बाद में रोज़ी की ही तरह अपने फैसले पर पछताती भी है । वहीदा रहमान को पूरा यक़ीन था कि वो दर्शकों से रोज़ी प्रति सहानुभूति जुटा लेंगी ।

लेकिन वहीदा रहमान के सामने एक और दिक्‍कत थी । जब उन्‍हें पता चला कि राज खोसला गाईड का निर्देशन करेंगे तो उन्‍होंने अपने हाथ पीछे खींच लिये । दरअसल फिल्‍म 'सोलहवां सावन' के निर्माण के दौरान वहीदा और राज खोसला की अनबन हो गयी थी । और वहीदा ने तय किया था कि अब वो कभी राज खोसला के साथ काम नहीं करेंगी । देव आनंद को समझ में आ गया कि वहीदा रहमान की ख़ातिर उन्‍हें राज खोसला को हटाना होगा । बड़ी दिक्‍कत थी । जब राज खोसला को हटा दिया गया तो फिर सवाल उठा कि गाईड का निर्देशन कौन करे । और इस बार देव आनंद ने दरवाज़ा खटखटाया अपने बड़े भाई साहब चेतन आनंद का । जिन्‍होंने नवकेतन के पहली फिल्‍म 'अफसर' का निर्देशन किया था ।

फिल्‍म गाईड के निर्माण्‍ा से जुड़ी कुछ और दिलचस्‍प बातें कल ।

आर के नारायण की पुस्‍तक 'द गाईड' गूगलबुक्‍स पर यहां पढ़ें ।

जाने से पहले आपको फिल्‍म गाईड का सबसे कम चर्चित और मेरा पसंदीदा गीत सुनवाता जाऊं । इसे संगीतकार कुमार सचिन देव बर्मन ने स्‍वयं गाया है । रचना शैलेन्‍द्र की है । अपने संगीत और गायकी में ये गाना मुझे सर्वोत्‍कृष्ट लगता है । इस गाने में मुखड़े के बाद सितार, तबले और बांसुरी की तान सुनिए । और अपने मन के बयाबान में खो जाईये ।

इस गाने से पहले अपने मन की कुछ बातें कहना चाहता हूं । पिछली कुछ पोस्‍टों से बिना किसी योजना के ये हो गया है कि बंजारे मन के गाने रेडियोवाणी पर बजाए जा रहे हैं । संयोग देखिए कि गाइड पर इस पोस्‍ट को लिखते हुए मैंने सोचा नहीं था कि ये गाना लगाऊंगा  । पर सच मानिए कि मेरे जैसे बंजारे मन वाले व्‍यक्ति के दिल के क़रीब ये गाना नहीं होगा तो भला और कौन सा होगा । इस गाने का एक एक शब्‍द दिल पर उतरता है । आप चाहे जिस भी परिस्‍थ‍िति में हों, ये आपको अपने जीवन की कहानी लगेगी । इस गाने के ज़रिए मैं गीतकार शैलेन्‍द्र को सलाम भी कर रहा हूं ।

 

वहां कौन है तेरा मुसाफिर जायेगा कहां

दम ले ले घड़ी भर ये छैंया पाएगा कहां

बीत गये दिन, प्‍यार के पल छिन

सपना बनी वो रातें

भूल गये वो, तू भी भुला दे

प्‍यार की वो मुलाक़ातें

सब दूर अंधेरा, मुसाफिर जाएगा कहां ।।

कोई भी तेरी राह ना देखे, नैन बिछाए ना कोई

दर्द से तेरे कोई ना तड़पा, आंख किसी की ना रोई

कहे किसको तू मेरा, मुसाफिर जाएगा कहां ।।

कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है फ़ानी

पानी में लिखी कहानी

है सबकी देखी, है सबकी जानी

हाथ किसी के ना आई,

कुछ तेरा ना मेरा, मुसाफिर जायेगा कहां ।।

दम ले ले घड़ी भर ये छैंया पायेगा कहां ।।

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