संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Sunday, August 26, 2007

आईये सावन के गीतों की श्रृंखला में आज सुनें ‘बाग़ों में पड़े झूले’—ग़ुलाम अली का गाया गीत-ऑडियो सुधार दिया है




अन्‍नपूर्णा जी ने सावन की याद दिलाई तो हमने अपनी पिछली पोस्‍ट में आपको सावन के तीन गीत सुनवा डाले ।

लेकिन तीन गीतों से भला मन कहां मानता है । आज ठानकर आए हैं कि आपको गुलाम अली का एक शानदार गीत सुनवाएंगे और आपको ये भी बताएंगे कि ये गीत उनके उपशास्‍त्रीय गीतों के एलबम ‘शीशमहल’ में मौजूद है । मैं आपको बता दूं कि इसे ‘माहिया’ कहा जाता है । जो शायद पंजाब की लोकसंगीत की एक विधा है । इतना सीधा-सादा गीत है कि क्‍या कहें । आप पढ़कर ही समझ जायेंगे । लेकिन एक तो वाद्यों के ज़रिए ग़ुलाम अली साहब ने इसका चलन काफी तेज़ रखा है दूसरे उनकी लहरदार आवाज़ ने इस गाने को यादगार बना दिया है । मैं इस तरह के कई गीतों को ‘इन्‍फेक्‍शस’ श्रेणी में रखता हूं । संक्रामक गीत हैं ये । बस एक बार सुन लिया कि आपके होठों पर सज गए । आप हो होश हो या नहीं । फिर अचानक आपको लगेगा अरे ये गीत मैं कैसे गुनगुना रहा हूं ।
ज्‍यादा कुछ नहीं कहना इस गाने के बारे में । बस इतना कहना है कि आपने गुलाम अली की ग़ज़लें तो सुनीं । सबने सुनीं । पर शीशमहल सुनना अब तक छूटा हो तो फटाफट जाईये और ख़रीद डालिए । इस एलबम के अधिकार एच एम वी के पास हैं और इतना दुर्लभ भी नहीं है । पहले से बता दूं कि इस एलबम में कुल चार रचनाएं हैं । जी हां कुल चार केवल चार ।

बालम मोहे छोड़ के ना जा—मिश्र पीलू में ठुमरी
काहे बनाओ झूठी बतियां हमसे—दादरा
तुम बिन ना आवे चैन—ठुमरी मिश्र खमाज
और बागों में पड़े झूल—मा‍हिया ।

अगर हमें पिनक चढ़ गयी तो ये सारे गीत आपको इसी चिट्ठे पर सुनवा दिये जायेंगे । बस हौसला अफ़ज़ाई तो जारी रखिए सरकार ।
तो सुनिए और पढि़ये---

Baagon Main pade j...


बाग़ों में पड़े झूले
तुम भूल गये हमको
हम तुमको नहीं भूले ।।
सावन का महीना है,
साजन से जुदा रहकर
जीना कोई जीना है ।। बाग़ों में ।।
रावी का किनारा है
हर मौज के होठों पर
अफ़साना हमारा है ।। बाग़ों में ।।
ये रक्‍स सितारों का
सुन लो कभी अफ़साना
तक़दीर के मारों का ।। बाग़ों में ।।
दिल में हैं तमन्‍नाएं
डर है कि कहीं हम-तुम
बदनाम ना हो जाएं ।। बाग़ों में ।।
अब और ना तड़पाओ
या हम को बुला भेजो
या आप चले आओ ।। बाग़ों में ।।



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इस श्रृंखला के अन्य भाग--
1.पड़ गये झूले सावन रूत आई और गरजत बरसत सावन आयो रे

2.फिर सावन रूत की पवन चली तुम याद आए ।

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Saturday, August 25, 2007

पड़ गए झूले सावन रूत आई रे और गरजत बरसत सावन आयो रे

कल अन्‍नपूर्णा जी का एक संदेश आया, क्याआआआआ यूनुस ख़ान जी, आप भी !!!!!!!सावन बीत रहा है और अब तक न आपके चिट्ठे में सावन के झूले पड़े, न बोले रे पपीहरा गूंजा और न ही उमड़-घुमड़ कर छाई घटा सावन को ऐसा सूखा तो जाने मत दीजिए………।

जिंदगी की आपाधापी में उलझे हुए अचानक लगा कि बात तो सही है । रेडियोवाणी पर सावन की ज्‍यादा बात नहीं हो पाई । हां मैंने बारिश के कुछ गीत आपको सुनवाए थे । जिनकी लिंक बांयी ओर लेबल वाले ख़ाने में है । क्‍या आपको याद है गुलाम अली का वो गीत—जिसकी मैंने रेडियोवाणी पर ही चर्चा की थी । फिर पत्‍तो की पाजेब बजी तुम याद आये, फिर सावन रूत की पवन चली तुम याद आये । भई याद नहीं आया तो कोई बात नहीं । ज़रा
यहां क्लिक कर लीजिये और पहुंच जाईये उस पोस्‍ट पर ।

बहरहाल आईये आज सुनें दो सावन के दो अनमोल गाने । दिलचस्‍प बात ये है कि दोनों ही साहिर लुधियानवी ने लिखे हैं और दोनों का संगीत भी रोशन ने ही दिया है । एक और समानता है इन दोनों गानों की । ये गाने सावन के महीने में उत्‍तर भारत में पड़ने वाले झूले के गीत हैं । बाग़ों में झूले पड़ गये हैं, सखियां झूलों की पेंग भरते हुए किसिम किसम की शरारतें कर रही हैं । और गीत गा रही हैं । और यूं लग रहा है कि जैसे बारिश का, सावन का ये मौसम नहीं होता और ये समां नहीं बंधता तो क्‍या होता हमारा । पर अपने दिल में झांककर देखें तो पाते हैं कि अब कहां वो झूले, और अब कहां वो सावन । सावन की फुहार पड़ती है तो लगता है कि थोड़ी बारिश रूक जाए तो बाहर निकले । कमबख्‍त बारिश । किसी ज़माने में लोग इसे ‘हाय बारिश’ कहते थे । अब ये कमबख्‍त बारिश है । आधुनिकता और शहरीकरण ने जिन चीज़ों को, जिस मज़े को हमसे छीन लिया है उसमें ये भी शामिल है । ऐसा ना हो कि आगे चलकर हमें एक फेहरिस्‍त बनानी पड़ जाए कि शहरों की और विदेशों की तरफ भागते हुए हमने किन चीज़ों को बिसरा दिया, भुला दिया, खो दिया ।
इस मुद्दे पर भले सोचते रहिये पर ये दोनों गीत सुनकर कल्‍पना की दुनिया में सावन के झूलों का आनंद लीजिए--

गरजत बरसत सावन आयो रे—बारिश का ये गीत । बरसात की रात फिल्‍म का ये गीत लता मंगेशकर और कमल बारोट ने गाया है । सावन पर लिखे गये एकदम ललित गीतों में इसका शुमार होता है । रोशन ने इसकी धुन को एकदम शास्‍त्रीय रखा है । लता जी और कमल बारोट की आवाज़ें जैसे एक दूसरे में घुलमिल गयी हैं । कुल मिलाकर इस गाने को सुनकर मन मोर जैसे नाच उठता है ।

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गरजत बरसत सावन आयो रे
लायो ना संग में हमरे बिछड़े बलमवा ।।
रिमझिम रिमझिम मेहा बरसे
तरसे जियरवा नील समान
पड़ गई फीकी लाल चुनरिया
पिया नहीं आए । गरजत बरसत ।।
पल पल छिन छिन पवन झकोरे
लागे तन पर तीर समान,
नैनन जल सों गीली चदरिया अगन लगाए
गरजत बरसत ।।

आपको बता दूं कि इसी तरह का एक गीत फिल्‍म मल्‍हार में भी था—बोल थे, गरजत बरसत भीजत आईलो, ममता इस गीत को बड़े उत्‍साह से गाती हैं । आप भी सुनिए और साथ में गाईये--



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सन 1967 में आई फिल्‍म ‘बहू बेगम’ का गीत है ‘पड़ गये झूले’ । साहिर लुधियानवी ने इसे लिखा और संगीत है रोशन का । ये उन गिने चुने गीतों में से एक है जिसे लता मंगेशकर और आशा भोसले ने एक साथ गाया है । इन गानों पर तो एक पूरी श्रृंखला की जा सकती है । सही मायनों में ये लोकगीत है । बिल्‍कुल भारतीय संगीत-संयोजन । ढोलक का बेहतरीन इस्‍तेमाल है इस गाने में । और कोरस बिल्‍कुल ऐसा चित्र बना देता है मानों आम के बाग़ में सखियां झूला डाल कर मस्‍ती में पेंग भर रही हों । इस गाने की एक पंक्ति है हमको ना भाए सखी ऐसी ढिठाई रे । कितनी कुशलता से साहिर ने सावन में झूला झूलती किसी सखी की मनोदशा को इस एक पंक्ति में पिरो दिया है । आपको बता दूं कि दूसरे अंतरे के बाद सितार की खूबसूरत धुन रखी गयी है । बारिश में मन वाकई सितार की तरह लहराने लगता है । रोशन इस तरह के गानों के बेहद माहिर संगीतकार रहे हैं । जहां तक मुझे याद आता है फिल्‍म बहू बेगम इसी गाने से शुरू होती है । ये गाना शानदार समां बांध देता है । आईये हम भी सुनें सखियों की बारिशी शरारत का ये गीत--



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पड़ गए झूले सावन रूत आई रे ।
सीने में हूक उठी अल्‍ला दुहाई रे ।।
चंचल झोंके मुंह को चूमें, बूंदे तन से खेलें ।
पेंग बढ़े तो झुकते बादल पांव का चुंबन ले लें ।
हमको ना भाई सखी रे ऐसी ढिठाई रे ।।
बरखा की मुं‍हज़ोर जवानी क्‍या क्‍या आफत ढाए ।
दिल की धड़कन जिस्‍म की रंगत, आंचल से छन जाए ।
हाय आंखों के आगे लुटे अपनी कमाई रे ।।
गीतों का ये अल्‍हड़ मौसम, झूलों का ये मेला ।
ऐसी रूत में हमें झुलाने आए कोई अलबेला ।
थामे तो छोड़े नहीं नाज़ुक कलाई रे ।।


कल रेडियोवाणी पर आप सुनेंगे गुलाम अली की आवाज़ में सावन का एक शानदार गीत ।


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Sunday, July 1, 2007

मेघा छाये आधी रात, झींगुर बोले चीकी मीकी—दो अनमोल बारिश गीत


मित्रो बारिश ने मुंबई शहर का हुलिया फिर बिगाड़ दिया है । उन्‍तीस जून की रात से लेकर तीस जून तक दिन भर ज़बर्दस्‍त बारिश हुई । आंकड़े आपको टी.वी.वाले बता
देंगे । आपको पता होगा कि तीस जून को ‘ब्‍लू मून’ वाला दिन था, एक महीने में दूसरी पूर्णिमा वाला दिन ।

बहरहाल, बारिश के इस महा-मौसम में हाल-बेहाल हुए लोगों में ये नाचीज़ भी शामिल था, जो घुटनों भर पानी में लौटकर घर आया । छींकों के मारे बुरा हाल हो गया । टी.वी. की ख़बरें इतनी डरावनी थीं कि मित्रों और रिश्‍तेदारों के फ़ोन चले आये । पर दिन ठीक-ठाक बीत ही गया ।

चलिये बारिश की इस डरावनी याद को भुलाने के लिए सुनें बारिश के कुछ सुहावने गीत !
मेघा छाये आधी रात, यहां सुनिए ।


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यहां देखिए






मेघा छाए आधी रात बैरन हो गयी निंदिया ।
बता दे मैं क्‍या करूं, क्‍या करूं ।
सबके आंगन दिया जले रे, मेरे आंगन जिया
हवा लागे शूल जैसी, ताना मारे चुनरिया
कैसे कहूं मैं मन की बात, बैरन बन गयी निंदिया
बता दे रे मैं क्‍या करूं, मेघा छाये आधी रात ।।
टूट गये रे सपने मेरे, टूट गयी रे आशा
नैन बहे रे गंगा मोरे, फिर भी मन है प्‍यासा
आई है आंसू की बारात, बैरन बन गयी निंदिया
बता दे मैं क्‍या करूं, मेघा छाये ।।

इस गाने को मैं वेस्‍टर्न म्‍यूज़ि‍क और भारतीय पारंपरिक संगीत का बेहतरीन मिश्रण किया गया है । गाना एस.डी. बर्मन की ठेठ स्‍टाईल से शुरू होता है । ग्रुप वायलिन और रिदम का शानदार संयोजन, जिससे गाने की रवानी या गति का सहज अंदाज़ा लग जाता है, साथ में ऑर्गन की तान ने इस गाने के ‘इंट्रो’ को और भी नशीला बना दिया है । क़रीब बत्‍तीस सेकेन्‍ड के बाद इस वाद्य संयोजन में सितार के सुर सुनाई देते हैं । और उसके बाद वायलिन पर गाने का मुखड़ा छेड़ा गया है । और फिर हल्‍की सी बांसुरी । उसके बाद आती हैं लता जी । मैं इसे एस.डी.बर्मन के रचे सबसे अच्‍छे ‘इंट्रो’ में गिनता हूं । नये-नवेले रसिकों को बता दें कि गाने के पहले बजने वाले वाद्य-संयोजन को संगीत की भाषा में ‘इंट्रो’ कहा जाता है । ये तो थी इंट्रो की बात ।

पर इस गाने की इतनी ही ख़ूबियां नहीं हैं । जैसा कि मैंने कहा कि इस गाने में भारतीय पारंपरिक संगीत और वेस्‍टर्न म्‍यूज़ि‍क की स्‍वरलहरियों का शानदार मिश्रण है । आप ध्‍यान से सुनें तो पायेंगे कि जब लता जी गाती हैं तो ढोलक और तबले की थाप सुनाई देती है, वेस्‍टर्न ऑरकेस्‍ट्रा ख़ामोश रहता है, लेकिन जैसे ही लता जी की गायकी ख़त्‍म होती है, और ‘बैरन बन गयी निंदिया’ का ‘या’ ख़त्‍म होता है, फ़ौरन गिटार संगीत के कारवां को आगे बढ़ाता है । वो भी इतना प्रोमि‍नेन्‍ट गिटार है कि किसी क़द्रदान श्रोता को सिर्फ़ यही सुनवा दिया जाये, तो वो गाने को पहचान लेगा ।

यहां से गाने को और ध्‍यान से सुनने की ज़रूरत है । लगभग एक मि. चालीस सेकेन्‍ड के आसपास आपको अचानक पता चलेगा कि वेस्‍टर्न ऑर्केस्‍ट्रा ने ‘क्‍यू’ दिया और उसकी जगह ले ली भारतीय-धुन ने । और उसके बाद लता जी अंतरा गाती हैं ।

जिस तरह एस.डी.बर्मन ने इस गाने का संगीत-संयोजन किया है, वो वाक़ई अद्भुत है । ये गीत मैंने अपने मोबाइल फ़ोन पर उतार रखा है और जितनी बार सुनता हूं इस गाने का एक नया ही रूप सामने आता है । हैरत होती है कि उस ज़माने में संगीतकार जितनी मेहनत मुखड़े और अंतरे पर करते थे, उतनी ही गाने के इंटरल्‍यूड म्‍यूजिक पर भी करते थे । ऐसा नहीं होता था कि इंटरल्‍यूड के नाम पर कुछ भी ठूंस दिया जाये । यही वजह है कि आज जब हम ये गाने सुनते हैं तो हमारा अवचेतन मन इन तरंगों को गुनगुनाता है । इंटरल्‍यूड को गुनगुनाता है । है ना हैरत की बात । कितने ही ऐसे गाने हैं जिनके इंट्रो या इंटरल्‍यूड को हम शिद्दत के साथ याद करते हैं ।

इस गाने में सितार और वायलिन का इतना प्‍यारा इस्‍तेमाल किया गया है कि क्‍या
कहूं । वाह । कमाल है । सचिन दा को नमन है, बार बार नमन है । ये गाना हमारी बारिश को रंगीन बना देता है ।

लेकिन नमन तो गीतकार नीरज को भी करना होगा । इस गाने का एक-एक शब्‍द कमाल का है । ये फिल्‍मी गीत नहीं है, साहित्यिक-गीत है । ज़रा इन जुमलों पर ग़ौर कीजिए—

सबके आंगन दिया जले रे, मेरे आंगन जिया

हवा लागे शूल जैसी, ताना मारे चुनरिया

नैन बहे रे गंगा मोरे, फिर भी मन है प्‍यासा

अब मैं जिस गाने का ज़ि‍क्र करने जा रहा हूं वो फिल्‍म ‘उसने कहा था’ से है । इस गाने में ‘झींगुर बोले चीकी-मीकी’ जैसा मीठा जुमला इस्‍तेमाल किया गया है । आपको बता दें कि शैलेन्‍द्र ने इसे लिखा और स्‍वरबद्ध किया सलिल दा ने । सलिल दा को पश्चिमी शास्‍त्रीय संगीत का जुनून की हद तक शौक़ था । और उन धुनों को वो अपने संगीत में ढाल लिया करते थे । यहां मैं रेखांकित करना चाहूंगा कि वो उन धुनों को वैसा का वैसा नहीं रखते थे, वो नकल नहीं करते थे बल्कि रचनात्‍मकता दिखाते हुए उन धुनों को ढाला करते थे ।
रिमझिम के ये प्‍यारे प्‍यारे गीत लिए –यहां सुनिए

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यहां पढिये

आहा रिमझिम के ये प्‍यारे प्‍यारे गीत लिए
आई रात सुहानी देखो प्रीत लिए
मीत मेरे सुनो ज़रा हवा कहे क्‍या
सुनो तो ज़रा
झींगुर बोले चीकी-मीकी, चीकी-मीकी ।
रिमझिम के ये ।।
खोई सी भीगी-भीगी सी रात झूमे
आंखों में सपनों की बारात झूमे
दिल की ये दुनिया आज बादलों के साथ झूमे
आहा रिमझिम के ये ।।
आ जाओ दिल में बसा लूं तुम्‍हें
नैंनों का कजरा बना लूं तुम्‍हें
ज़ालिम ज़माने की निगाहों से छुपा लूं तुम्‍हें
आहा रिमझिम के ये ।।
दिल से जो निकली है वो बात रहे
मेरा तुम्‍हारा सारी जिंदगी का साथ रहे
आहा रिमझिम के ये ।।

इस गाने को ध्‍यान से सुना आपने । ज़रा इसके इंट्रो पर ध्‍यान दीजिये, जिसमें बांसुरी की महीन तान है । जो वायलिन के उछाल से होते हुए शायद में‍डोलिन तक जा पहुंचती है । मेरे ख्‍याल से ये में‍डोलिन ही है ।

इसके बाद तलत मेहमूद और लता मंगेशकर की आवाज़ों में गाने का मुखड़ा आता है । तलत साहब की आवाज़ में तो जो नर्मी और नाज़ुकी है उसके कहने ही क्‍या । ये बारिश पर बने सबसे नाज़ुक गीतों में से एक है । दोनों ने बड़ी ही तन्‍मयता से इसे गाया है । लता दीदी की आवाज़ में एक मासूम-सी प्रेमिका का समर्पण है । और तलत की आवाज़ में है एक प्रेमी की मस्‍ती ।
इस गाने के अंतरे के बाद जो म्‍यूज़ि‍क है वो कमाल का है । हमारे परमोद भैया यानी अज़दक बता सकते हैं कि ये जैज़ है या क्‍या । वेस्‍टर्न म्‍यूज़ि‍क के बारे में अपने को ज्‍यादा कुछ नहीं पता । पर सलिल दा की ये कंपोज़ीशन हमेशा से अच्‍छी लगती रही है । ख़ासतौर पर इस गाने में बांसुरी और वायलिन की तान । और झींगुर बोले चीकी-मीकी । आप भी बताईयेगा इस गाने को सुन, देख और पढ़कर कैसा लगा आपको । रेडियोवाणी पर बारिश के गीतों का सिलसिला समय समय पर जारी रहेगा ।



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Thursday, May 31, 2007

बरसो रे मेघा मेघा, बरसो रे—मुंबई की पहली बारिश का गीत



प्रिय मित्रो ।
इकतीस मई की रात है ।
मुंबई झिलमिला रही है रोशनियों में ।
सागर की लहरें किनारे से टकरा कर लौट रही हैं ।
लोकल ट्रेनें ठसाठस भरी हैं और रोज़ के मुसाफिर घर लौट रहे हैं ।
सड़क पर बिकने वाली खाने पीने की चीज़ों वाले धंधे के आखिरी छोर पर हैं ।
सरकार ने स्‍ट्रीट फूड पर पाबंदी लगा दी है, जो जल्‍दी ही लागू हो रही है ।

गृहिणियां टी0वी0 पर एकता कपूर के सीरियल देख रही हैं ।
ब्‍लॉगिए नेट पर टिपिया रहे हैं ।
कॉलसेन्‍टर में काम करने वाले छोरा छोरी लगे पड़े हैं ग्राहकों को पटाने में ।
रेडियो स्‍टेशन अपना राग अलाप रहे हैं ।
हॉकर शाम के अखबार मिड डे की बची प्रतियां खपाने के लिए मशक्‍कत कर रहे हैं ।
नो टोबेको डे को धता बताते हुए पान बिड़ी की दुकानें मस्‍त हैं ।

और अचानक इंद्र देव ने मुंबई शहर को हैलो कहा है ।

जी हां इस मौसम की पहली बारिश है ये ।
और मुझे वो गीत याद आ रहा है जो इस साल पहली बार हम सब बारिश में गुनगुनायेंगे ।

याद रखना मुश्किल है इसलिये पेश कर रहा हूं आपके लिए । चलिये गुनगुनाईये, बारशि हुई हो या ना हुई हो आपके शहर में पर गुनगुनाईये ज़रूर । इतनी मेहनत जो की है मैंने इस गीत को उतारने में ।

बरसो रे मेघा मेघा, बरसो रे मेघा मेघा, बरसो रे मेघा बरसो

मीठा है कोसा है, बारिश का बोसा है ।

कोसा है कोसा है बारिश का बोसा है ।

जल जल जल जल जल जल थल, जल थल, जल थल, जल थल ।

नन्‍ना रे नन्‍ना रे नाना रे नाना रे ।

गीली गीली गीली हां । हां हां हां । हां हां हां ।

गीली गीली माटी । गीली माटी की चल घरौंदे बनायेंगे रे ।

हरी हरी अंबी । अंबी की डाली लेके, झूले झुलायेंगे रे ।

धन, बैजू, गजनी, हल जोते सबने ।

बैलों की घंटी बजी और ताल लगे भरने ।

मैं तैर के चली मैं तो पार चली ।

पार वाले परले किनार चले । रे मेघा । नन्‍ना रे नन्‍ना रे । नाना रे नाना रे ।

काली काली घाटी, काली रातों में ये बदरवा बरस जायेगा ।

गली गली मुझको ढूंढेगा और गरज के पलट जायेगा ।

घर आंगन अंगना और पानी का झरना ।

भूल ना जाना मुझे, सब पूछेंगे वरना ।।

रे बह के चली मैं तो बहके चली, कहके चली मैं तो कह के चली ।

रे मेघा । नन्‍ना रे नन्‍ना रे नन्‍ना रे । नाना रे ।

तो दोस्‍तो गुलज़ार का गुलज़ारी व्‍याकरण वाला ये गीत तो हो गया । अब आप भी बारिश भर नन्‍ना रे नाना रे नन्‍ना रे नाना रे करिए । अगर किसी किसी को ये गीत पसंद नहीं तो कोई बात नहीं । रेडियोवाणी पर आपका ये दोस्‍त बारिश भर बारिश के गानों की पूरी सीरीज़ पेश करेगा, बंबईया भाषा में बोलूं तो भीडू फिकर नहीं करने का । बोले तो, अपुन के पास बारिश के डेढ़ सौ गानों का स्‍टॉक है ।

अच्‍छा मैं तो चला मुंबई की पहली बारिश में भीगने ।
आप क्‍या कर रहे हैं ।
बाय बाय ।
नन्‍ना रे नन्‍ना रे नाना रे नाना रे । बरसो से मेघा मेघा । बरसो रे मेघा मेघा । बरसो रे मेघा बरसो ।




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