संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Monday, November 26, 2007

जिंदगी को संवारना होगा, दिल में सूरज उतारना होगा--फिर आलाप, फिर येसुदास

कल मैंने रेडियोवाणी पर येसुदास का गाया और डॉ0 हरवंशराय बच्‍चन का लिखा गीत प्रस्‍तुत किया था । अफलातून जी की टिप्‍पणी आई कि फिल्‍म आलाप के और गीत सुनवाए जाये । मेरी खुद की इच्‍छा यही थी कि इस फिल्‍म के कुछ और गीतों का सिलसिला चलाया  जाए ।

आपको ये जानकर हैरत होगी कि आलाप के ज्‍यादातर गीत डॉ0 राही मासूम रज़ा ने लिखे थे । इतनी शुद्ध हिंदी और इतना लालित्‍य कि क्‍या कहें । राही साहब की कलम से निकले कुछ अनमोल गीतों में से हैं ये गीत । राही की कुछ ग़ज़लें आप रेडियो

वाणी पर पहले भी सुन चुके हैं ।

तो आईये आज सुना जाये ये गीत । जो सुबह सुबह प्रेरणा देने का काम भी करेगा । और शायद आप दिन भर यही गुनगुनाएं--जिंदगी को संवारना होगा, दिल में सूरज उतारना होगा ।

ये जो 'दिल में सूरज उतारने' वाली बात है इस पर हमारा दिल आ गया है । येसुदास की गाढ़ी और शहद जैसी आवाज़ अंतरतम की गहराईयों में छा जाती है । एक खुश्‍बू सी बिखेर देती है ।

मैं सोच रहा हूं कि रेडियोवाणी पर अगले कुछ दिन येसुदास के गीतों के नाम कर दिये जायें । आपकी क्‍या राय है । इस गीत के ज़रिए हम संगीतकार जयदेव की प्रतिभा को भी सलाम कर रहे हैं । कमाल का संगीत दिया है उन्‍होंने इस फिल्‍म में । तो आईये इस गीत के ज़रिए जिंदगी को संवारें ।

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जिंदगी को संवारना होगा 

दिल में सूरज उतारना होगा ।।

 

जिंदगी रात नहीं, रात की तस्‍वीर नहीं

जिंदगी सिर्फ़ किसी ज़ुल्‍फ़ की ज़ंजीर नहीं

जिंदगी बस कोई बिगड़ी कोई तस्‍वीर नहीं

जिंदगी को संवारना होगा ।।

जिंदगी धूप नहीं, साया-ऐ-दीवार भी है

जिंदगी धार नहीं, जिंदगी दिलदार भी है

जिंदगी प्‍यार भी है प्‍यार का इक्ररार भी है

जिंदगी को उभारना होगा ।।

जिंदगी को संवारना होगा ।।

इंतज़ार कीजिए कल का । कल आपको सुनवाया जायेगा 'फिर भी' फिल्‍म का एक शानदार और दुर्लभ गीत ।

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Sunday, November 18, 2007

क्‍या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराए--आईये सुनें डॉ राही मासूम रज़ा की दो दुर्लभ ग़ज़लें

रेडियोवाणी पर कुछ दिनों पहले हमने आपको सुनवाई थी डॉ. राही मासूम रज़ा की एक ग़ज़ल, उन दिनों हिंदी चिट्ठों पर कई जगह राही मासूम रज़ा का जिक्र हुआ था । मनीष ने भी आपको राही की ही एक ग़ज़ल सुनवाई थी । और कुर्बान अली का एकशानदार लेख भी आया था राही मासूम रज़ा पर । दरअसल इसी लेख से ये सारा सिलसिला शुरू हुआ था ।
बहरहाल उस वक्‍त रेडियोवाणी पर आपसे एक वादा किया गया था । डॉ. राही मासूम रज़ा की कुछ दुर्लभ ग़ज़लें सुनवाने का वादा । आज उस वादे को पूरा करने का दिन आ गया है ।

आधा गांव, ओस की बूंद और टोपी शुक्‍ला जैसी बेसिमाल कृतियों के रचनाकार राही मासूम रज़ा वाक़ई बड़ी बहुरंगी शख्सियत थे । एक तरफ़ वो शाइरी करते रहे । जिसकी उन्‍होंने ज्‍यादा चर्चा भी नहीं की । दूसरी तरफ उनकी साहित्यिक रचनाएं, उनकी कहानियां और उपन्‍यास आते रहे । इस सबसे अलग फिल्‍म संसार में वो एक ज़हीन लेखक के तौर पर स्‍थापित हो चुके थे । महाभारत जैसे सीरियल में उनकी रचनात्‍मकता देखकर लोगों को थोड़ी हैरत तो हुई ही कि भला एक......।

राही मासूम रज़ा के बेटे नदीम ख़ान जाने माने कैमेरामैन रहे हैं । उन्‍होंने विख्‍यात पॉप गायिका पार्वती ख़ान से विवाह रचाया है । पार्वती ख़ान को आप फिल्‍म 'डिस्‍को डान्‍सर' के गीत 'जिमि जिमि आजा' की गायिक के तौर पर जानते हैं । लेकिन बहुत कम लोगों को जानकारी होगी कि पार्वती ने डॉ. राही मासूम रज़ा और अन्‍य शायरों की रचनाओं को अपने सबसे पहले ग़ैर फिल्‍मी एलबम 'missing you' में गाया था और बहुत ख़ूब गाया था । आईये आज इसी अलबम की राही मासूम रज़ा की दो ग़ज़लें सुनी जाएं । ये पार्वती ख़ान की आवाज़ का एकदम अलग रंग है । अफ़सोस है कि आजकल वो ज्‍यादा नहीं गातीं ।

राही साहब के भीतर एक नाज़ुकतरीन शायर मौजूद था । जिंदगी के इतने छोटे-छोटे अहसास उन्‍होंने पकड़े हैं कि उन पर कुरबान होने को जी चाहता है । ज़रा इस ग़ज़ल को पढि़ये और इस बात को महसूस कीजिए । फिर ज़रा पार्वती की आवाज़ में इसे सुनिए । कितनी प्‍यारी धुन, कितना प्‍यारा संगीत ।








क्‍या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराए
क्‍या वो रातें भी रातें हैं जिनमें नींद ना आए ।
हम भी कैसे दीवाने हैं किन लोगों में बैठे हैं
जान पे खेलके जब सच बोलें तब झूठे कहलाए ।
इतने शोर में दिल से बातें करना है नामुमकिन
जाने क्‍या बातें करते हैं आपस में हमसाए ।।
हम भी हैं बनवास में लेकिन राम नहीं हैं राही
आए अब समझाकर हमको कोई घर ले जाए ।।
क्‍या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराए ।।


और आईये अब सुनी जाये दूसरी ग़जल । इस ग़ज़ल में भी वहीं बात है । बहुत छोटे छोटे महीन अहसास हैं जिन्‍हें ग़ज़ल में पिरोया गया है । काश कि राही साहब और लिखते और पार्वती उन्‍हें और गातीं ।








जिनसे हम छूट गये अब वो जहां कैसे हैं
शाखे गुल कैसे हैं खुश्‍बू के मकां कैसे हैं ।।
ऐ सबा तू तो उधर से ही गुज़रती होगी
उस गली में मेरे पैरों के निशां कैसे हैं ।।
कहीं शबनम के शगूफ़े कहीं अंगारों के फूल
आके देखो मेरी यादों के जहां कैसे हैं ।।
मैं तो पत्‍थर था मुझे फेंक दिया ठीक किया
आज उस शहर में शीशे के मकां कैसे हैं ।।
जिनसे हम छूट गये अब वो जहां कैसे हैं ।।


उम्‍मीद है कि राही साहब की ये ग़ज़लें आपके भीतर कुछ नरमो-नाज़ुक अहसास पैदा करेंगी ।

चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: डॉ.-राही-मासूम-रज़ा, पार्वती-ख़ान, जिनसे-हम-छूट-गए, क्‍या-वो-दिन-भी-दिन-हैं-जिनमें-दिन-भर-जी-घबराए, parvati-khan, jinse-hum-choot-gaye, kya-wo-din-bhi-din-hain-jinme-din-bhar-ji-ghabraye, Dr.-rahi-masoom-raza,


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Saturday, September 1, 2007

बहुत उम्‍दा शायर थे डॉ. राही मासूम रज़ा । आईये सुनें अजनबी शहर के अजनबी रास्‍ते मेरी तन्‍हाईयों पे मुस्‍कुराते रहे ।

हाशिया की इस पोस्ट पर पर आज डॉ. राही मासूम रजा़ के जन्मदिन पर कुरबान अली का एक संस्मरणात्मक लेख छापा गया है । बस ये समझ लीजिए कि इस लेख ने दिल के किसी छिपे हुए तार को झिंझोड़ कर रख दिया है । राही साहब का मैं जाने कब से शैदाई हूं । क्या तब से जब मैंने ‘टोपी शुक्ला ‘ पढ़ा था । या फिर तब से जब ‘आधा गांव’ पढ़ा । या फिर तब से जब पता चला कि टी.वी.सीरियल महाभारत की पटकथा वही लिख रहे हैं । पता नहीं ।

लेकिन राही मासूम रज़ा की शख्सियत का जो पहलू मैं ‘रेडियोवाणी’ पर उजागर करने जा रहा हूं वो इस सबसे जुदा है ।

मुझे याद है कि जब मैं जबलपुर से मुंबई आया विविध भारती में काम करने के लिए तो एक शेर मेरे साथ आया था । मेरा साथ देने के लिए । ये राही साहब का ही शेर था----

सोचता था कैसे कटेंगी रातें परदेस की
ये सितारे तो वही हैं मेरे आंगन वाले ।।

यक़ीन मानिए, इस शेर ने आसमान पे चमकते सितारों पर नज़र डालने को कहा, और अपने आंगन वाले उन सितारों के सहारे ही मुंबई के अजनबी भरे शुरूआती दिन कट गए । बहरहाल, आज मैं राही साहब की शायराना शख्सियत का ही जिक्र कर रहा हूं ।

बहुत कम लोग जानते होंगे कि राही साहब बहुत उम्दा शायर थे । और इसकी सबसे अच्छी मिसाल ये ग़ज़ल है । जिसके कई संस्करण हैं । पर अशोक खोसला और अहमद हुसैन मुहम्मद हुसैन वाले दो संस्करण मेरी पसंद रहे हैं । इनमें भी अहमद हुसैन-मुहम्मद हुसैन वाला संस्क़रण तो वाक़ई दिल को सुकून से भर देता है । अफ़सोस की ये संस्करण इंटरनेट पर नहीं मिल सका ।

ये ग़ज़ल बाद में सुनिएगा । पहले मुझे अपने दिल की बात तो कह लेने दीजिये ।

राही साहब की ग़ज़लें उनकी बहू और जानी मानी गायिका पार्वती ख़ान ने अपने एक अलबम में गाई हैं । और ये अलबम विविध भारती में तो है । पता नहीं और कहीं है या नहीं । पहले विषयांतर करते हुए बता दूं कि राही मासूम रज़ा के बेटे नदीम ख़ान फिल्म-संसार के जाने माने सिनेमेटोग्राफर हैं । सुभाष घई जैसे निर्देशकों की फिल्में शूट कर चुके हैं नदीम । नदीम और पार्वती की मुलाक़ात हुई थी विनोद पांडे की फिल्म ‘ये नज़दीकियां’ के दौरान । जिसमें पार्वती ने एक छोटी सी भूमिका निभाई थी । पता नहीं नदीम और पार्वती की शादी पर शुरूआत में क्या प्रतिक्रिया रही होगी राही साहब की । लेकिन बाद में तो पार्वती को राही साहब नदीम से भी ज्यादा चाहने लगे । आपको ये भी बता दूं कि पार्वती ख़ान फिल्म संसार में भले डिस्को डान्सर के ‘जिमी जिमी’ जैसे गानों के ज़रिए एक डिस्को गायिका के रूप में चर्चित रही हों । लेकिन जब आप राही साहब की लिखी ग़ज़लों का उनका अलबम सुन लेंगे तो आपको उनकी शख्सियत का दूसरा ही पहलू देखने को मिलेगा ।

विविध भारती में मेरी मुलाक़ात ना सिर्फ़ पार्वती से हुई बल्कि नदीम साहब से भी हुई ।

मैंने रेडियो के लिए पार्वती ख़ान का लंबा इंटरव्यू़ लिया और रेडियो-सखी ममता सिंह ने नदीम साहब से लंबी बातचीत की । लेकिन ऑफ रिकॉर्ड मैंने भी नदीम से लंबी गप्पें मारीं । और ख़ासकर राही साहब की शख्सियत के कई पहलुओं के बारे में पूछा । उन्हों ने भी बड़ी प्यारी बातें बताईं । कभी मौक़ा मिला तो नदीम से फिर बात की जायेगी और वो भी ख़ासतौर पर रेडियोवाणी के लिए । एक्सक्लूसिव ।

बहरहाल—आज मैं पार्वती ख़ान की गाई और राही साहब की ग़ज़लें पेश नहीं कर पा रहा हूं । पर बाद में पेश करने का वादा ज़रूर किये दे रहा हूं । लेकिन याददाश्त की बिना पर आपको उन अशआर से वाकिफ़ ज़रूर करवा रहा हूं ।

एक ग़ज़ल है—क्याक वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर दिन घबराए/ क्या वो रातें भी रातें हैं जिनमें नींद ना आए । उफ़ क्या ख्याल है ये । कमाल है ।

दूसरी मेरी पसंदीदा ग़ज़ल है—जिनसे हम छूट गये अब वो जहां कैसे हैं ।

यक़ीन मानिए ये मेरे दिल के बहुत क़रीब रही है । इसलिये कि अपने शहर को छोड़ते वक्त कभी कोई नहीं सोचता कि एक दिन वो अपना, आत्मीय शहर भी आपके लिए अजनबी हो जाएगा, दोस्त शहर को छोड़कर कहीं और बस जायेंगे । वो शाम के अड्डे सूने हो जायेंगे । वो यारबाशियां पुरानी बातें हो जायेंगी । वो स्कूल, वो कॉलेज, वो मुफलिसी, वो लाइब्ररी, वो सायकिलों और स्कूदरों पर गलियों चौराहें के चक्कर काटना । वो घर की छत पर खड़े होकर अपने भविष्य के बारे में खूब खूब चिंता करना । वो बिना बात की उदासी । वो दिल के किसी कोने में सिर उठाती अपनी रिबेल शख्सियत । वो सब कुछ, सब कुछ पुरानी बातें हो गयीं । अपना वो शहर जिसके हर कोने से आत्मीयता छलकती थी, एकदम से अजनबी सा बन
गया । हां उस शहर में आत्मीयता का, रिश्तों का जो कोना बचा है वो अपना घर है, जिसमें मां हैं, जिसमें पिता हैं, उसी शहर में रहती अपनी बहन है । पर उस घर के बाहर......उस घर के बाहर शहर अजनबीयत का लबादा ओढ़ चुका है । और शायद ये मेरा ही नहीं, उन तमाम लोगों का अनुभव होगा, जो अपने शहर को छोड़कर रोज़गार के लिए कहीं और जाते हैं । और थोड़े दिनों की छुट्टियों में लौटकर बार बार अपने शहर को बदलते हुए देखते हैं । शायद शहर के बदलने की रफ्तार, हमारे बदलने की रफ्तार से ज्यादा होती है ।

ख़ैर ये ग़ज़ल आगे चलकर ज़रूर आप तक पहुंचेगी । पर फिलहाल तो अशोक खोसला की आवाज़ में सुनिए राही साहब की वो ग़ज़ल, जिसमें अपने शहर को छोड़कर किसी अजनबी शहर में गये एक नौजवान के अहसासात को बयां किया गया है ।
इसे सुनने के लिए
यहां क्लिक कीजिए ।

या नीचे लिखी लिंक को कट पेस्ट करें ।
http://dishant.com/jukebox.php?songid=12173



अजनबी शहर के/में अजनबी रास्ते , मेरी तन्हाईयों पे मुस्कुराते रहे ।
मैं बहुत देर तक यूं ही चलता रहा, तुम बहुत देर तक याद आते रहे ।।

ज़ख्म मिलता रहा, ज़हर पीते रहे, रोज़ मरते रहे रोज़ जीते रहे,
जिंदगी भी हमें आज़माती रही, और हम भी उसे आज़माते रहे ।।

ज़ख्म जब भी कोई ज़हनो दिल पे लगा, तो जिंदगी की तरफ़ एक दरीचा खुला
हम भी किसी साज़ की तरह हैं, चोट खाते रहे और गुनगुनाते रहे ।।

कल कुछ ऐसा हुआ मैं बहुत थक गया, इसलिये सुन के भी अनसुनी कर गया,
इतनी यादों के भटके हुए कारवां, दिल के जख्मों के दर खटखटाते रहे ।।

सख्त हालात के तेज़ तूफानों, गिर गया था हमारा जुनूने वफ़ा
हम चिराग़े-तमन्ना़ जलाते रहे, वो चिराग़े-तमन्ना बुझाते रहे ।।

ई स्निप्स पर मुझे राही साहब की ये रचना भी मिली है ।

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इसे सलमान अलवी की आवाज़ में इस वीडियो में सुनिए



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