संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Wednesday, July 14, 2010

सेक्‍सॉफोन की दुनिया के सरताज मनोहारी दादा को विनम्र श्रद्धांजली।




कल शाम फेसबुक के ज़रिए ख़बर मिली कि मनोहारी दादा का निधन हो गया।

जी धक से रह गया। पिछले कई दिनों से उनकी याद लगातार आ रही थी। टाइम्‍स ऑफ इंडिया मुंबई के वीक-एंड पन्‍नों पर अकसर उनका नाम विज्ञापनों में नज़र आता था और पता चलता रहता था कि वो कब कहां परफॉर्म कर रहे हैं। गए हफ्ते उन्‍होंने बोरीवली में शंकर-जयकिशन पर केंद्रित संगीत-कार्यक्रम में सेक्‍सोफ़ोन बजाया था।
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मनोहारी दादा से हुई मुलाक़ातें याद आ रही हैं। मुझे याद है कि एक बार छाया गांगुली ने मनोहारी दादा को संगीत-सरिता के लिए बुलवाया था। उन्‍हें पता था कि मैं मनोहारी दादा के हज़ारों दीवानों में से एक हूं। इसलिए जब मनोहारी दादा आए तो उन्‍होंने ख़ास तौर पर बुलवा लिया। जब मैंने उन्‍हें बताया कि किस तरह मैंने खोज-खोजकर उनके कैसेट्स जमा किये हैं, तो उनकी आंखें छलक आई थीं। उस दिन विविध-भारती के स्‍टूडियो में उन्‍हें सुनना एक दिव्‍य अनुभव था।




अभी कुछ साल पहले की बात है। विविध-भारती के कार्यक्रम हमारे मेहमान के लिए saxophone मनोहारी दादा का इंटरव्‍यू लेने की बात तय हुई। कुछ दिन उनकी सेहत ठीक नहीं थी तो मामला टलता रहा। फिर एक दिन वो आए। अपनी मेटल फ्लूट और सेक्‍सोफोन के साथ। उन्‍होंने खुले दिल से अपनी जिंदगी के बारे में सब कुछ बताया। और मैंने संकोच करते हुए उनसे कहा कि आप ज्‍यादा सेक्‍सोफोन ना बजाएं, सेहत ठीक नहीं थी आपकी कुछ दिन पहले। पर यक़ीन मानिए इस कार्यक्रम में मनोहारी दादा ने सेक्‍सोफोन और मेटल फ्लूट दोनों के खूब जलवे बिखेरे। बात बात पर धुनें बजाकर सुनाईं। पुराने किस्‍से दोहराए। सलिल चौधरी के। एस.डी. बर्मन के। और ख़ासतौर पर पंचम के। पंचम---जिनके साथ उनका सबसे लंबा जुड़ाव रहा। बासु-मनोहारी की जोड़ी पंचम के मुख्‍य-सहायकों में से रही। पंचम की आखिरी फिल्‍म तक वो उनके साथ थे।

कानों में अभी भी मनोहारी दादा का सेक्‍सोफोन गूंज रहा है। एक दिलचस्‍प बात आपको बताई जाए। पिछले दिनों एक ख़ास वजह से मैं मनोहारी दादा के दोनों अलबमों की तलाश कर रहा था। missing u और sax appeal. मिसिंग यू--तो किशोर कुमार को दी गयी manohari मनोहारी दादा की श्रद्धांजली है जिसमें उन्‍होंने किशोर दा के चुने हुए गानों को सेक्‍सोफोन पर बजाया है। हालांकि अभी कुछ दिनों से इंटरनेट पर एक और अलबम नज़र आ रहा है 'मेलोडियस मैजिक'। बहरहाल...काफी लोगों से संपर्क किया गया। म्‍यूजिक-शॉप्‍स पर फ़ोन किए गए। पता चला कि ये अलबम फिल्‍हाल उपलब्‍ध नहीं हैं।  फिर अचानक मैं अपने ही संग्रह के कैसेट्स को उलट-पुलट रहा था तो दोनों अलबम एक साथ सुरक्षित पाए गए। इतने दिनों में खुद मुझे ही याद नहीं रहा था कि जाने कहां-कहां से मैंने ये दोनों अलबम ख़रीदे थे--वो भी कैसेट्स पर। उन्‍हें बाक़ायदा डिजिटाइज़ कर लिया गया है। क्‍वालिटी के मामले में थोड़ा समझौता करना पड़ा है। पर मनोहारी दादा के ये अनमोल अलबम हमेशा हमेशा उनकी यादें ताज़ा करते रहेंगे। (इस तस्‍वीर में मोहम्‍मद रफ़ी, बांसुरी वादक सुमन राज, मनोहारी दादा और हरिप्रसाद चौरसिया सबसे दाहिने)

सेक्‍सोफोन बेहद मुश्किल वाद्य है। इसे बजाने वाले को अपने जिगर को फूंक डालना पड़ता है। तब जाकर वो आवाज़ निकलती है जिससे हम मद-मस्‍त हो जाते हैं। मैंने लाइव-ऑर्केस्‍ट्रा में मनोहारी दादा को म्‍यूजिक कंडक्‍ट करते देखा है। खासकर मन्‍ना दा के एक कंसर्ट में। उस समय उनकी तन्‍मयता देखते ही बनती थी। मुझे हमेशा हैरत होती रही कि मनोहारी दादा इतनी उम्र के बावजूद अपनी सांसों में वो बल कहां से लाते थे जिससे सेक्‍सोफोन जिंदा हो उठे। उनकी दीवानगी को सिर्फ वही लोग महसूस कर सकते हैं जो उन्‍हें जानते थे। उनका प्रिय सेक्‍सोफोन....वो वाद्य जिसे वो कई बरसों से बजा रहे थे...अब ख़ामोश रहेगा। उन्‍होंने खुद मुझे बताया था कि ये इंस्‍ट्रमेन्‍ट उन्‍होंने विदेश से मंगवाया था। 

उन कुछ गानों की फेहरिस्‍त जिनमें मनोहारी दादा का सेक्‍सोफोन गूंजता है--



गाता रहे मेरा दिल—गाइड
दिल ढल जाये-गाइड
ये दुनिया उसी की--काश्‍मीर की कली
बेदर्दी बालमा तुझको--आरजू
हुई शाम उनका ख्‍याल आ गया--मेरे हमदम मेरे दोस्‍त
जा रे उड़ जा रे पंछी- माया
शोले का टाइटल म्‍यूजिक।
गा मेरे मन गया-लाजवंती
मैं आया हूं लेकर जाम हाथों में--अमीर गरीब
तुम्‍हें याद होगा जब हम मिले थे-सट्टा बाज़ार
ओ हसीना जुल्‍फों वाली-तीसरी मंजिल
आवाज़ देके हमें तुम-शालीमार
खिलते हैं गुल यहां-शर्मीली
तुम मुझे यूं--पगला कहीं का
आजकल तेरे मेरे प्‍यार के चर्चे-ब्रम्‍हचारी
शोख नज़र की बिजलियां--वो कौन थी
आओ हुजूर तुमको-किस्‍मत etc

मनोहारी दादा के इंटरव्‍यू के कुछ अंश मेरे निजी संग्रहालय में सुरक्षित हैं। लेकिन आज सिर्फ उनके बजाए दो गाने आपको सुनवा रहा हूं। ये उन्‍हीं अलबमों से हैं जिनका मैंने जिक्र किया।
‘missing u’ अलबम से फिल्‍म 'चलते चलते' का शीर्षक गीत।



और ये रहा मनोहारी दादा का एक और कमाल। 'सफ़र' फिल्‍म का गीत। (हो सकता है कि डिवशेयर का ये प्‍लेयर क्रोम पर ना चले)



ये तो तय है कि फिल्‍म-संगीत में ओरीजनल म्‍यूजिक इंस्‍ट्रमेन्‍ट्स बजाने वाले लोगों की एक बड़ी जमात जा चुकी है। और उसकी कोई भरपाई नहीं है। सेक्‍सोफोन के मामले में तो तीन ही नाम याद आते रहे हैं। मनोहारी दादा, श्‍याम राज और सुरेश यादव। पर मनोहारी दादा का जाना एक बहुत बड़ा नुकसान है।

दादा...जब भी शाम सुरमई और उदास होगी...जब भी हल्‍की-सी बारिश होगी...कुहासा छायेगा...जब रात का अकेलापन कुछ और गाढ़ा हो जायेगा...तो आपकी याद और गहरी होती चली जाएगी।

विनम्र श्रद्धांजली।
यू-ट्यूब पर मनोहारी दादा

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विविध भारती पर मनोहारी दादा को श्रद्धांजली आज दिन में एक बजे और रात नौ बजे।


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Thursday, March 20, 2008

सेक्‍सोफोन पर मनोहारी सिंह की बजाई धुन-'हम बेवफ़ा हरगिज़ ना थे'

रेडियोवाणी पर हमने फिल्‍मी गीतों के instrumentals की एक अनियमित श्रृंखला शुरू की है । दरअसल इस श्रृंखला को शुरू करने के पीछे कहीं ना कहीं मन में मनोहारी सिंह के बारे में लिखने की तमन्‍ना छिपी थी । मनोहारी सिंह विख्‍यात म्‍यूजि़क अरेन्‍जर, संगीतकार, सेक्‍सोफोन और मेटल फ्लूट वादक हैं । मुझे उनका सेक्‍सोफोन वादक वाला रूप ज्‍यादा पसंद है । आपको बता दूं कि उनसे कई बार मुलाक़ात हो चुकी है । उनकी प्रतिभा को सलाम करते हुए एक बार उन्‍हें विविध भारती में भी बुलाया गया था और मैंने उनसे लंबी बातचीत की थी । उनकी सफ़र और उनके संघर्ष के बारे में सुना था आमने सामने बैठकर । इस दौरान मनोहारी दादा ने काफी कुछ बजाया भी था । पिछले दिनों सुनने में आया था कि मनोहारी दादा की तबियत ठीक नहीं थी । अब वे स्‍वस्‍थ हैं ।


अगर आप मनोहारी सिंह के बारे में और जानना चाहते हैं तो ज़रा अंग्रेज़ी अख़बार DNA की इस लिंक पर जाएं । और मनोहारी दादा का इंटरव्‍यू पढें photo 1। ये तस्‍वीर मैंने इसी वेबसाईट से साभार ली है । ज़रा तस्‍वीर में मौजूद लोगों को पहचानिए । मोहम्‍मद रफ़ी साहब को तो आप पहचान गये होंगे । फिर हैं फिल्‍मों में बांसुरी बजाकर मशहूर हुए सुमन राज, फिर मनोहारी सिंह और सबसे दाहिनी तरफ विख्‍यात बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया ।


वैसे आपको बता दें कि अगर आप सेक्‍सोफोन की तरंग को पहचानते हैं तो समझ लीजिए कि हिंदी फिल्‍मी गीतों के interludes में जहां कहीं भी सेक्‍सोफोन बजता सुनाई दे, उसे मनोहारी सिंह से जोड़ लीजिए । पचास के दशक से आज तक वो सेक्‍सोफोन बजाते आ रहे हैं । अब काश्‍मीर की कली फिल्‍म का वो गीत लीजिए--'ये दुनिया उसी की ज़माना उसी का' या फिर आरज़ू फिल्‍म का 'बेदर्दी बालमा तुझको मेरा मन याद करता है' या फिर आराधना का 'रूप तेरा मस्‍ताना' सभी गानों में सेक्‍सोफोन बजाने के लिए मनोहारी दादा ने अपना जिगर फूंका है । आगे चलकर मैं अपने पॉडकास्‍ट के ज़रिए आपको मनोहारी दादा के सेक्‍सोफोन से परिचित कराऊंगा । और ज़रूर कराऊंगा । लेकिन फिलहाल कुछ बातें और फिर एक धुन ।


मनोहारी दादा के फिल्‍म संगीत जगत में जो सम्‍मान प्राप्‍त है वो विरलों को मिलता है । वे बेहद विनम्र हैं, बहुत कद्दावर शख्सियत हैं । दिलचस्‍प ये है कि आज तक लगातार वो कई स्‍टेज शो करते हैं । कुछ वर्ष पहले मन्‍नाडे के एक स्‍टेज शो के लिए जब हम पहुंचे तो पाया कि यहां संगीत की बागडोर तो अपने मनोहारी दादा संभाल रहे हैं । अगर आपको मनोहारी दादा को सेक्‍सोफोन बजाते हुए सुनना है तो यू-ट्यूब पर जाईये और ज़रा सर्च कीजिए । कई वीडियोज़ मिल जाएंगे । फिलहाल आपके लिए वो ट्यून जो मेरे लिए बहुत ख़ास है । किशोर दा के गीतों को लेकर मनोहारी दादा ने सेक्‍सोफोन पर बजाई धुनों का एक अलबम निकाला था 'मिसिंग यू' । concord नामक म्‍यूजि़क कंपनी ने इस कैसेट को रिलीज़ किया था । मेरे संग्रह में ये कैसेट सुरक्षित है । पर ये धुन मैंने जुगाड़ कर कहीं और से प्राप्‍त की है । तो आईये शालीमार फिल्‍म के इस शानदार गाने की बेमिसाल धुन से होकर गुज़रा जाए । और मुमकिन हो तो ज़रा तसल्‍ली से बैठिये । आंखें बंद कीजिए और हौले हौले इस धुन को दिल में उतरने दीजिए । आनंद दोगुना हो जाएगा । मनोहारी दादा-- हम आपके फ़न को सलाम करते हैं ।


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