संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Saturday, December 8, 2007

सजना तेरे बिना जिया मोरा नाहीं लागे- bandit queen फिल्‍म का गीत ।


रेडियोवाणी पर मैंने बैंडिट क्‍वीन के गानों का सिलसिला शुरू किया था । इस बीच तीन दिन के लिए मैं एक मीडिया सेमीनार में हिस्‍सा लेने के लिए इंदौर गया तो ये सिलसिला ज़रा-सा थम गया । उस छूटे हुए सिरे को पकड़ते हुए आज से फिर bandit queen के गीत सुनवाए जायेंगे, पर बीच बीच में रेडियोवाणी पर कुछ दूसरे जिक्र भी होते रहेंगे । बहुत जल्‍दी रेडियोवाणी पर आपके लिए प्रस्‍तुत किया जाएगा इंदौर के 'ब्‍लॉगर मिलन' का ब्‍यौरा मय तस्‍वीरों के । लेकिन उसके लिए मुझे मुंबई की दूसरी व्‍यस्‍तताओं से फुरसत तो हो जाने दीजिए ।

बहरहाल शेखर कपूर की फिल्‍म बैंडिट क्‍वीन के गाने सचमुच अनमोल हैं । शुक्र है कि आप लोगों ने याद दिलाए । ये गीत कई मायनों में अजीब-सा है । जब आप इसे पढ़ेंगे तो पाएंगे कि अंतरों की कोई तयशुदा लंबाई या मीटर जैसा नहीं है । पहला अंतरा अंतरे जैसा नहीं है । दो ही पंक्तियों में खत्‍म हो जाता है । हां बाकी के दो अंतरे जरूर बाकायदा जायज़ अंतरे हैं । गीत किसने रचा है, मुझे नहीं मालूम और मैंने फिलहाल इसकी तफ्तीश भी नहीं की । पर गीत में लालित्‍य है । सुंदर सा लिखा है ये गीत जिसने भी लिखा है । मुझे इस गीत के कुछ जुमले वाक़ई बहुत पसंद आए । जैसे कि 'पलकों में बिरहा का गहना पहना' या फिर 'बूंदों की पायल' वाला पूरा अंतरा......इतनी बारीक भावनाओं को शब्‍दों में बांधा गया है कि क्‍या कहें ।

हां इस गाने के संगीत-संयोजन की चर्चा जरूर करना चाहूंगा । बहुत ही प्रयोगधर्मी किस्‍म का संगीत संयोजन है ये । जब इस तरह के देसी बोल हों तो गाने को लोकगीत का जामा पहनाने में देर नहीं लगती । लेकिन नुसरत फतेह अली ( nusrat fateh ali khan)  ने इसमें वैसे साज़ रखे हैं जैसे ग़ज़लों में हुआ करते हैं । तेज़ हवाओं के इफेक्‍ट से गाना शुरू होता है । इसके बाद गिटार और फिर सितार । रिदम बहुत ही हल्‍का-सा है । अगरबत्‍ती की हल्‍की महक जैसा । और फिर आती है नुसरत की विकल पुकार.....सजना..... जिसके बाद गिटार की हल्‍की स्‍वरलहरी भली भली सी लगती है ।

अगर आप पहले interlude से गाने को सुनें तो आप समझेंगे कि ये जगजीत सिंह या भूपेंद्र की कोई गजल है । बिल्‍कुल गजल जैसा संयोजन है । और जैसा गिटार इस गाने में है, वैसा जहां भी हो मुझे बहुत मीठा और मनमोहक लगता है ।  तो पढि़ये और सुनिए इस गीत को ।

 

सजना, सजना तेरे, तेरे बिना जिया मोरा नाहीं लागे ।

काटूं कैसे तेरे बिना बड़ी रैना, तेरे बिना जिया नाहीं लागे ।

 

पलकों में बिरहा का गहना पहना

निंदिया काहे ऐसी अंखियों में आए

तेरे बिना जिया मोरा नाहीं लागे ।।

 

बूंदों की पायल बजी, सुनी किसी ने भी नहीं

खुद से कही जो कही, कही किसी से भी नहीं

भीगने को मन तरसेगा कब तक

चांदनी में आंसू चमकेगा कब तक

सावन आया ना ही बरसे और ना ही जाए

हो निंदिया काहे ऐसी अंखियों में आए

तेरे बिना जिया मोरा नाहीं लागे ।।

 

सरगम खिली प्‍यार की, खिलने लगी धुन कई

खुश्‍बू से 'पर' मांगकर उड़ चली हूं पी की गली

आंच घोले मेरी सांसों में पुरवा

डोल डोल जाए पल पल मनवा

रब जाने के ये सपने हैं या हैं साए

हो निंदिया काहे ऐसी अंखियों में आए

तेरे बिना जिया मोरा नाहीं लागे ।।

इस गाने को सारेगामापा के मुसर्रत की आवाज में आप देख भी सकते हैं ।

 

रेडियोवाणी पर bandit queen के गीतों का सिलसिला जारी रहेगा ।

जल्‍दी ही इंदौर वाली ब्‍लॉगर मीट का ब्‍यौरा भी ।

बैन्डिट क्‍वीन श्रृंखला का पहला गीत सुनने के लिए नीचे शीर्षक पर क्लिक करें ।

1. मोरे सैंयां तो हैं परदेस ।

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Tuesday, December 4, 2007

फिल्‍म Bandit Queen का गीत-मोरे सैंया तो हैं परदेस. नुसरत फतेह अली खां की आवाज़ ।


कल दिन में निर्मल-आनंद वाले अभय जी से बात हो रही थी । उन्‍होंने कहा कि क्‍या मेरे पास bandit queen के गीत होंगे । मुझे फौरन उस कैसेट की याद आ गयी जो मैंने जबलपुर में छोड़ रखा है, इस बार भी उसे निकालने की याद नहीं आई । वो दौर तो याद आ ही गया जब हम अपने जेबखर्च को कैसेट खरीदने में लगाते थे । इस गाने के लिए मुझे ज्‍यादा खोजबीन नहीं करनी पड़ी । और जब सुना तो दिल गदगद हो गया ।

जब शेखर कपूर की फिल्‍म bandit queen आई थी तो इस फिल्‍म के संगीत की काफी चर्चा हुई थी । इसमें कुछ गीत नुसरत फतेह अली खां की आवाज़ में थे और इसी कैसेट में बैकग्राउंड म्‍यूजिक के कुछ कट भी दिये गये थे । खोजबीन करके उन सबको जुटा लिया जायेगा पर आज वो गीत सुनते हैं जिसका मुखड़ा है--मोरे सैंया तो हैं परदेस ।

ये बाक़ायदा एक लोकगीत है और इसे आप शानदार संगीत संयोजन और बेजोड़ गायकी के लिए जरूर सुन सकते हैं । गाना नुसरत के आलाप से शुरू होता है और फौरन दिल में अजीब सी कैफियत आ जाती है । फिर जो रिदम है उसकी रवानी कमाल की है । इसके बाद कोरस ऐसा अहसास देता है जैसे गांव में किसी घने पेड़ के नीचे औरतें सावन का गीत गा रही हैं । फिर नुसरत की गझिन सी आवाज आती है । इस  गाने में एक दर्द है, पीड़ा है, सैंया परदेस हैं और गोरी को विरह परेशान कर रहा है । मुझे आज याद नहीं आ रहा है‍ कि इस गाने की फिल्‍म में क्‍या जगह बनती है । पक्‍का नुसरत शैली का गीत है । जो खत्‍म हो जाए तो खालीपन का अहसास होता है और हम बरबस ही इसे दोबारा सुनने को मजबूर हो जाते हैं । 

सावन आया रिमझिम सांवरे
आये बादल कारे कारे मतवारे
प्‍यारे प्‍यारे मोरे अंगना झूम के
घिर घिर आई ऊदी ऊदी देखो मस्‍त घटाएं
फुरफर आज उड़ाएं आंचल मोरा सर्द हवाएं
डारी डारी पे भंवरा घूम के आये कलियों के मुखड़े चूम के
जिया मोरा जलाए हाय प्‍यारी प्‍यारी रूत सांवली ।।

मेरे सैंयां तो हैं परदेस मैं क्‍या करूं सावन को
सूना लगे सजन बिन देस ।
मैं ढूंढूं साजन को ।।

देखूं राहें, चढ़के अटरिया
जाने कब जाएं सांवरिया
जब से गए मोरी ली ना खबरिया
छूटा पनघट फूटी डगरिया
सूना लागे सजन बिन देस, मैं ढूंढूं साजन को ।।

क्‍यूं पहनूं  मैं पग में पायल
मन तो है मुझ बिरहन का घायल
नींद से खाली मोरी अंखियां बोझल
रोते रोते बह गया काजल ।
सूना लागे सजन बिन देस मैं ढूंढूं साजन को ।।

बैंडिट क्‍वीन के गानों और संगीत का ये सिलसिला जारी रहेगा ।

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