संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Thursday, January 19, 2012

क्‍यों ज़रूरी है सहगल का स्‍वर--रेडियोवाणी परिचर्चा: एक

कल कुंदनलाल सहगल की याद का दिन था। वो दिन जब वो इस फ़ानी दुनिया images से गए। सवाल ये है कि ये दिन क्‍यों याद रहे लोगों को। सहगल की आवाज़ में ऐसा है ही क्‍या कि हम उन्‍हें सुनें, गुनें-बुनें और सराहें। पिछली कई नई पीढियां सहगल को 'बोरिंग' और 'ओल्‍ड' बताती रही हैं। संगीत के इस झमाझम दौर में सहगल कितने ज़रूरी स्‍वर हैं। वो क्‍या बात है कि सहगल मेरे दादाजी से लेकर मेरे लगभग तीन वर्षीय बेटे 'जादू' को भी भाते हैं।

ये सारे सवाल कल मैंने अपनी फ़ेसबुक-वॉल पर उठाये और अपने कुछ संगीत-रसिक मित्रों से जवाब चाहे। मैं ये जानना चाहता था कि असल में सहगल की हम सबकी जिंदगी में क्‍या कोई जगह है। और अगर है तो उसकी क्‍या वजह है।

सबसे पहले अपनी बात कर ली जाए। ये सच है कि हाई-स्‍कूल तक का एक दौर था जब हम सहगल को एक पुराना और बेहद 'नेज़ल स्‍वर 'मानकर रद्द कर देते थे। पर पता नहीं कैसे कब और क्‍या जादू हुआ कि हम सहगल के शैदाई हो गए। शायद संगीत के प्रति लगातार बढ़ते रूझान ने ये 'समझदारी' पैदा की होगी। मुझे याद है कि शायद स्‍कूल में सहपाठी रहे श्रवण हळवे ने मुझे सहगल का एक कैसेट उधार दिया था। और उसे सुनकर शायद ग्यारहवीं की साइंस की पढ़ाई के उस दौर में सिर्फ बतौर जिज्ञासा सुने गए सहगल मन पर छा गए थे। यहां ये जिक्र करना ज़रूरी है कि उन दिनों हम एक तरफ तो मेहदी हसन, गुलाम अली और पंकज उधास को सुन रहे थे तो दूसरी तरफ़ सहगल, मन्‍ना डे, मुकेश और रफ़ी तेज़ झोंके की तरह जिंदगी में दाखिल हो रहे थे। इन सबके बीच उस दौर की फिल्‍मों का बेहद घटिया संगीत भी हमारे होठों पर सज जाता था। संगीत की ये कैसी खिचड़ी थी। शायद हम अलग-अलग 'स्‍वाद' आज़मा रहे थे।

मुझे याद है कि जब सागर मध्‍यप्रदेश के पुरानी हवेली जैसे उस सरकारी-मकान में अपने कमरे में जब फिलिप्‍स के एक स्‍पीकर वाले मोनो कैसेट प्‍लेयर पर सहगल पहली बार बजे तो संगीत की तीखी-तीखी आवाज़ और सहगल का खरजदार स्‍वर अजीब-सा लगा। पर वो गाना फ़ौरन ही याद हो गया। 'ग़म दिये मुस्‍तकिल, कितना नाज़ुक है दिल ये ना जाना...हाय हाय ये जा़लिम ज़माना'। (फिल्‍म शाहजहां 1946 मजरूह/ नौशाद)....या फिर वो गाना 'जब दिल ही टूट गया हम जीके क्‍या करेंगे'। पर इन सबके बीच जो कुछ ऐसे गाने थे जो अचानक मन पर बस छप ही गए थे। 1938 में आई फिल्‍म 'प्रेसीडेन्‍ट' का गाना--'एक राजे का बेटा'.....1940 में आई फिल्‍म 'जिंदगी' का 'सो जा राजकुमारी' और इसी फिल्‍म का गाना--'मैं क्‍या जानूं क्‍या जादू है'।

पता नहीं था कि बरसों बाद हमारा बेटा भी यही गाने गुनगुनायेगा। और वो भी बस एक एक बार सुनवाने के बाद ही ये गाने उसे भा जायेंगे। आज 'जादू' जहां 'कोलावेरी' और 'धुनकी लागे' या 'साडा हक' जैसे ताजा हिट गाने पसंद करता है वहीं उसे ऊपर लिखे तीनों गाने बेहद पसंद हैं। क्‍यों। पता नहीं।
मुझे लगता है कि इस नकली और शोर भरे ज़माने में बहुत ईमानदार और असली सुरों और जज्‍बात की जरूरत पड़ती है। शायद इसीलिए सहगल हमारी ज़रूरत और पसंद हैं। आईये जानें कि बाक़ी लोगों ने क्‍या कहा।

जान-मानी समाचार-वाचिका शुभ्रा शर्मा ने कहा--
यह बात मैंने आज के परिक्रमा कार्यक्रम में भी कही थी...वही दोहराना चाहूंगी. याद है जब रेडियो सीलोन पर सुबह आठ बजे से नयी फिल्मों के गीत आते थे और उससे ठीक पहले पुरानी फिल्मों के संगीत में अंतिम गाना हमेशा सहगल साहब का बजाया जाता था.... हमारे घर में वह समय चैनल बदलकर समाचार लगाने का होता था. जैसे ही सहगल साहब का गाना शुरू होता मैं आज्ञाकारी बालक की तरह चैनल बदलने पहुँच जाती. पापा कहते - ठहरो, सहगल का गाना सुनने दो. मैं कहती - ओफ्फोह... पता नहीं आप क्यों इसे सुनते हैं. हमें तो ज़रा भी अच्छा नहीं लगता. और पापा बड़ी रहस्यमयी-सी मुस्कान के साथ कहते - लगेगा बेटा, एक दिन ये गाना बहुत बहुत अच्छा लगेगा. सो....वह दिन आ ही गया, पापा !!
सहगल के बारे में हमारे अभिन्‍न मित्र,  'रेडियोनामा' और 'श्रोता बिरादरी' की टीम के साथी और 'गीतों की महफिल' जैसे अनमोल ब्‍लॉग के संचालक और विन्‍टेज म्‍यूजिक के बेहद शौक़ीन सागर नाहर ने कहा--
कई चीजों को बस अनुभव की जा सकती है। उनकी खासियतों का वर्णन कर पाना बहुत मुश्किल है। बिल्कुल गूंगे के गुड़ की तरह।
शायद ही कोई सहगल प्रेमी बता सकेगा कि सहगल साहब उसे क्यों पसन्द है।
हमारे मित्र,‍ संगीत की महफिलों के संचालक, विज्ञापनों की दुनिया से जुड़े और बहुत ही मीठी शख्सियत संजय पटेल ने कहा-- इसलिये यूनुस भाई कि सहगल साहब हिन्दी चित्रपट गायन के दादा-गुरू हैं.दूसरी बात बिना किसी विरासत के एक विधा को सजाना-सँवारना और फिर उसे प्रतिष्ठित कर ऐसा रास्ता बना देना जिस पर चल कर पूरा एक दौर आगे बढे...किसी करिश्मे से कम नहीं.आवाज़ का ये कुन्दन अतुलनीय, आदरणीय, अविस्मरणीय है.
मुंबई में संगीत महफिलों का अभिन्‍न हिस्‍सा रहने वाले और संगीत के गहन शौकीन प्राण कटारिया ने कहा-- In terms of pure Gaayaki, there has been no one to touch him. He could sing a nursery rhyme without any musical acoompaniment and make it sound like a masterpiece. It was almost like he was speaking the words and not singing them. A musicians musician who inspired almost all the great singers who came after them and who initially tried to copy him-C.H Atma, Rafi, Mukesh, Kishore Kumar...and even Lata.
मोटे तौर पर प्राण कटारिया कहते हैं कि शुद्ध गायकी के मामले में सहगल का कोई जोड़ नहीं। वो बिना किसी संगीत के नर्सरी-गीत भी गा सकते थे। और उसे मास्‍टरपीस बना सकते थे। सी.एच.आत्‍मा, रफी, मुकेश, किशोर और यहां तक कि लता भी शुरूआती दौर में सहगल की कॉपी करती नज़र आई थीं।


प्रसिद्ध कवि और लेखक बोधिसत्‍व ने एक पंक्ति ने बहुत कुछ कह दिया--
सब सुर की मिठास और सरलता के कारण है।
बीके शर्मा ने सवाल उठाया कि जादू सहगल को सुनता है बात कुछ हज़म नहीं हुई। सहज सवाल है। पर इसके उत्‍तर में आपको खुद जादू को सहगल के गाने गुनगुनाते सुनवाया जायेगा। मूडी कलाकार हैं। रिकॉर्ड करने में मशक्‍कत करनी होगी।

पटना के आशुतोष पार्थेश्‍वर ने कहा--
कि सहगल उस आवाज़ के साथ मिलते हैं जिसमें सच्चाई बसती है, जो देर तक और दूर तक असर करती है और जो हमारे भीतर इस तरह उतरती है कि हमें अपने जज़्बातों के साथ ईमानदार होना ही पड़ता है...
रांची के मनीष कुमार प्रसिद्ध संगीत और ट्रैवल ब्‍लॉगर हैं। उन्‍होंने कहा-- यूनुस हर गायक का अपना एक समय होता है। सहगल एरा में हालत ये थे कि सभी गायक उनकी ही स्टाइल में गीत गाने लगे थे। धीरे धीरे किशोर मुकेश व रफ़ी ने अपना एक अलग अंदाज़ विकसित किया और ये सभी भारतीय संगीत प्रेमी जनमानस के दिल में बैठ गए। सच पूछिए जब सत्तर और अस्सी के दशक में हम बड़े हो रहे थे तो हमने इन कलाकारों के रहते सहगल की कभी कमी महसूस नहीं की। आज गायन की दृष्टि से तरह तरह की आवाज़ों को प्रश्रय मिल रहा है। आज का दौर हरफ़नमौला गायिकी का ना होकर विशिष्ट गायिकी का हो गया है। आप देखेंगे कि हर फिल्म में अलग अलग गीतों के लिए संगीतकार परिस्थिति के हिसाब से गायकों को चुन रहे हैं। अगर आज सहगल होते तो उनकी आवाज़ और स्टाइल के अनुरूप उन्हे जरूर गीत मिला करते।....

.पर उन्हें भी इसी धूम धड़ाके वाले संगीत के बीच ही गाना होता। वक़्त का पहिया सिर्फ आगे की ओर घूमता है पीछे की ओर नहीं। अगर आप ये कल्पना करना चाहें कि अगर आज सहगल होते तो क्या होता तो ये गीत सुनिए जिसे सहगल की याद में फिल्म डेहली बेली में Saigal Blues के नाम से Chetan Shashital ने गाया है। www.youtube.com/watch?v=nER3GFyGRUc

इस गाने की सिर्फ लिंक दी जा रही है। आप यूट्यूब पर जाकर सुन सकते हैं। इलाहाबाद के पत्रकार और विश्‍लेषण अरविंद के. पांडे ने कहा--

प्रकृति के कई ऐसे रहस्य होते है जिन्हें समझना आसान नहीं ..सहगल साहब का जादू भी जो उनके गले से प्रकट हुआ उसको समझना इतना आसान नहीं ..सिर्फ महसूस करिए और यदि आप उच्च चेतनाअवस्था में है या चेतना के जिस भी स्तर पर है इस आवाज के जरिए अपनी चेतना को उन दिव्य भावनाओ से जोड़िये जो हमारे में सुषुप्त पड़ी हुई है. मेरी नज़रो में सहगल की आवाज़ का असर शाश्वत है और ये सबको अपील करता है क्योकि हम सब मूलत दिव्य है पर जानते नहीं और सहगल की आवाज़ सीधे उस दबी हुई दिव्यता को उभारती है और ये भला सा अनोखा परिवर्तन हमको बहुत भाता है. इसलिए आप सहगल को सुने और प्रभावित ना हो ऐसा संभव नहीं . मै तो यह भी कहता हूँ जिनके कान कमजोर हो और नज़र दुरुस्त हो तो कम से कम उनको चलचित्र में काम करते देख ले तो तब भी कुण्डलिनी जागृत हो जायेगी. इनको देखने से ही लगता है कि साहब कोई गन्धर्व पृथ्वी पे भूल से आ गया है :-)
इंदौर के दिलीप कवठेकर वैसे तो इंजीनियर हैं पर वे गायक और संगीत-ब्‍लॉगर भी हैं। अच्‍छे संगीत के कद्रदान हैं। उन्‍होंने कहा--

पिछले दिनों उन्हे सुनने का जतन किया था,तक अंदर से जाना कि वे किस पाये के गायक थे. उनकी लफ़्ज़ों की अदायगी, फ़िर उन्हे सुरों में स्मूथली गूंथना, और उनकी आवाज़ की रेंज? ऊफ़्फ़. तार सप्तक से मंद्र सप्तक तक बिना किसी तीखे मोड के वे उडन खटोले सी चाल में गाना रेंडर कर जाते थे. (जब देखत हो उस पार.... पर एकदम नीचे का सुर याद है?)
और तो और , उनकी आवाज़ का जो टिंबर की वजह से,उनके गाने में एक मुख्तसर सी खलिश , चुभन ज़रूर होती थी , जो कलेजे को चीर कर कहीं अंदर हमेशा चुभती रहती थी.
सहगल को सुनने का और कोई कारंण होगा या ना भी होगा, मगर न्हे कोई भी रिप्लेस नही कर पायेगा.

जबलपुर के संजय वर्मा ने कहा—.
एक वजह तो सीधी सीधी यही है ...दूसरी कि ४२ साल की छोटी सी आयु में , लगभग एक दशक के कार्य में सैकडा भर गीत गाकर में वो ऍसा क्या कर गये ....जो आज हम उन्हें संगीत की धरोहर के रूप में मानते है....आज की पीढी ना सिर्फ उन्हें सुने.. बल्कि उन पर शोध करे...ताकि '' जादू " के बाद की भी पीढ़ी नाज कर सके के .एल.सहगल साहब पर..

दिल्‍ली की रिसर्च स्‍कॉलर और ब्‍लॉगर आराधना चतुर्वेदी ने कहा-- 


मैं क्या जानूं क्या जादू है' और 'सो जा राजकुमारी'- मुझे ये दोनों गीत बचपन से ही बहुत प्रिय हैं. सहगल दिल को सुकून देते हैं. जिस तरह सीधे तीर गहरे घाव करते हैं, उसी तरह सहगल की सहजता दिल में गहरे उतरती जाती है. इतनी सहजता दुर्लभ है और यही उनकी विशेषता है.

और चलते चलते जादू के पसंदीदा सहगल-गीत। बज़रिये यू-टयूब।

मैं क्‍या जानूं क्‍या जादू है



सो जा राजकुमारी


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5 comments:

Ek ziddi dhun January 19, 2012 at 11:21 AM  

सहगल के बहुत से गीतों के बोल मुझे समझ में नहीं आते लेकिन फिर भी न जाने उनकी आवाज में क्या है कि छुटते नहीं। नशे से बढ़कर कुछ ज्यादा।

राजेश उत्‍साही January 19, 2012 at 5:24 PM  

रेडियो सीलोन पर सुबह सुबह पुराने गीतों के कार्यक्रम में अंत में सहगल का गीत हमारे लिए एक जमाने में समय का परिचायक होता था। बहुत दिनों तक विविधभारती ने भी भूले-बिसरे गीत में इस परम्‍परा को बनाए रखा।
सहगल को सुनना हमेशा अच्‍छा लगता रहा है।

प्रवीण पाण्डेय January 19, 2012 at 7:41 PM  

औरों तो नहीं जानता पर मुझे तो भाते हैं सहगल साहेब के गाने।

love sms January 21, 2012 at 12:29 AM  

You have some really good ideas in this article. I am glad I read this. I agree with much of what you state in this article. Your information is thought-provoking, interesting and well-written. Thank you.

Prabhu Chaitanya February 3, 2012 at 12:10 PM  

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आवाज की दुनिया के दोस्तों
आवाज़ हो तो सहगल , C. H. आत्मा,
मन्ना डे , मुकेश, किशोर, रफ़ी साहब ..... जैसी
या फिर
ओशो (रजनीश) , अमीन सयानी , हरीश भिमानी,
अमिताभ बच्चन , विष्णु शर्मा (महाभारत में वसुदेव) ... और
युनूस खान जैसी

कुछ लोगों को आवाज़ Gift के रूप मिलती है

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