संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Sunday, August 9, 2009

अठन्‍नी-सी ये जिंदगी : फिर रविवार-फिर गुलज़ार

 

 

कुछ गाने कैसे अनायास याद दिला दिए जाते हैं । 'फेसबुक' पर पवन झा ने आज लिखकर टांग दिया 'कभी चांद की तरह टपकी, कभी राह में पड़ी पाई, अठन्‍नी-सी ये जिंदगी' । और ये गाना अचानक हमारे ज़ेहन में ताज़ा हो गया । जहां तक याद आता है, मुंबई में हमारे शुरूआती साल ही थे जब ये फिल्‍म आई थी । और वो कैसेट्स का ही ज़माना था । ज़ाहिर है कि ये कैसेट हमने छोड़ा नहीं । अब भी संग्रह में है ।



गुलज़ार अपने 'एक्‍सप्रेशन' में कितने कमाल हैं यहां । ज़रा-सा गाना है तीन मिनिट बारह1223037839 सेकेन्‍ड का । लेकिन दिलो-दिमाग़ पर छा जाता है । ये वही टीम है 'कमीने' वाली । यानी गुलज़ार और विशाल भारद्वाज की टीम । विशाल अपनी इस कंपोज़ीशन में उसी तरह 'एक्‍सपेरीमेन्‍टल' हैं जैसे वो हमेशा होते हैं । हरिहरन पर तो आंख मूंदकर भरोसा किया जा सकता है कि वो जब भी गायेंगे और जो भी गायेंगे अच्‍छा ही गायेंगे । तो आईये अपनी जिंदगी को 'अठन्‍नी-सी जिंदगी' कहें । और इस गाने से होकर गुज़रें ।


song-aththanni si zindagi
singer-hariharan
lyrics:gulzar
music-vishal
film-jahan tum le chalo
duration-3-12




कभी चांद की तरह टपकी कभी राह में पडी पाई
अठन्नी सी ज़िन्दगी, ये ज़िन्दगी
कभी छींक की तरह खनकी कभी जेब से निकल आई
अठन्नी-सी ज़िन्दगी, ये ज़िन्दगी
कभी चेहरे पे जड़ी देखी..
कभी मोड़ पे पडी देखी
शीशे के मर्तबानो मे दुकान पे पड़ी देखी
चौकन्नी-सी ज़िन्दगी, ये ज़िन्दगी
तमगे़ लगाके मिलती है मासूमियत सी खिलती है
कभी फूल हाथ में लेकर शाख़ों पे बैठी मिलती है
अठन्नी-सी ज़िन्दगी, ये ज़िन्दगी


ये इस गाने का वीडियो तो नहीं है पर एक प्रेजेन्‍टेशन ज़रूर है ।

10 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi August 9, 2009 at 3:49 PM  

फिल्म में गीत का अपना मकसद है जिसे वह पूरा करता है। लेकिन मुझे यह गीत अधिक पसंद नहीं आया। उल्लेखनीय नहीं।

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey August 9, 2009 at 6:23 PM  

यूट्यूब वाला खुराफात बढ़िया है। हम भी करने को उद्धत हो सकते हैं। बस हमारे पास स्वर नहीं हैं! :(

Abhishek Mishra August 9, 2009 at 7:46 PM  

Vakai behtar geet hai.Is team ka to javab hi nahin !

जीवन सफ़र August 9, 2009 at 8:51 PM  

गुलजार साहब का जवाब नही छोटी कविता और भाव गहराई लिए हुये हरिहरण ने इसे बहुत सुंदर गाया है और विडियो को कुछ खट्टा कुछ मीठा या मनोरंजक कह सकते है!

सुशील कुमार छौक्कर August 9, 2009 at 11:22 PM  

गाना सुनना तो सम्भव नही है क्योंकि रात हो चुकी है। पर गुलजार जी की तो बात ही कुछ और है उनका लिखा दिल को छूता है। जो पल उनके लिखे को पढने या सुनने में बीतता है तो लगता है यह वक्त बर्बाद नही गया। सच उस पल को दिल से जी लिया।

दिलीप कवठेकर August 9, 2009 at 11:58 PM  

आश्चर्य हुआ, कि हरिहरन थोडा सा कनसुरा हो सकते हैं. (यू ट्युब) मगर जब प्लेयर पर सुना तो ठीक से सुना, और समझ आया कि मूव्ही बनाते समय ऒडियो में गडबड हुई है!!

हारमोनी के उपयोग के अलावा इस गीत में और श्रवणीय नहीं मिला. मगर इसे सुन कर माचिस के गीतों की याद ज़रूर आयी.

दिलीप कवठेकर August 9, 2009 at 11:59 PM  

हां , ये लिखना तो भूल ही गया कि गुलज़ार साहब नें कमाल का लिखा है,(जिस बात पर पोस्ट लिखी गयी है)

वाणी गीत August 10, 2009 at 4:41 AM  

गाने के बोलों के साथ शीशे के मर्तबानों का प्रेजेंटेशन बढ़िया है ..!!

Archana August 10, 2009 at 7:41 AM  

@युनुस जी आप मेरी पोस्ट पर तांडवस्त्रोत्र क्यो नही सुन पाये ये तो नही जानती ,पर इसका अफ़सोस है...

Pratik Pandey September 25, 2009 at 10:37 PM  

गुलज़ार साहब की क़लम में ग़ज़ब का जादू है। यह गाना इस बात को एक बार फिर पुख़्ता करता मालूम होता है। संगीत भी बढ़िया है। अचरज की बात यह है कि यह गाना मैंने आज से पहले कभी सुना नहीं था। आपकी बदौलत सुन सका... शुक्रिया।

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