संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Monday, July 9, 2007

दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्‍लाह


मेरी शिकायत लगातार बढ़ती जा रही है, आजकल अच्‍छे कवि-सम्‍मेलन और मुशायरों का आयोजन नहीं होता । बचपन की बात है, घर पर ब्‍लैक एंड व्‍हाईट टी.वी. होता था और अकसर मुशायरे और कवि सम्‍मेलन आते थे । ऐसे मुशायरों में क़तील शिफाई, निदा फ़ाज़ली, नक्‍श लायलपुरी, इफ्तेख़ार इमाम सिद्दीक़ी, वसीम बरेलवी, बेकल उत्‍साही, शेरी भोपाली, राहत इंदौरी, अली सरदार जाफरी वगैरह को सुना और इनकी रचनाएं अपनी डायरियों में उतारीं । यही हाल कवि-सम्‍मेलनों का था । बहरहाल आज इस बात का जिक्र इसलिये कि शायद किसी को याद भी ना हो, आज से छह साल पहले आज ही के दिन जाने माने शायर क़तील शिफाई हमसे जुदा हो गये थे । अब ये अफ़सोस की बात ही है कि ये बात पढ़कर आप चौंक रहे हैं । ज़ाहिर है कि इन अहम तारीख़ों को याद दिलाने का कोई पुख्‍ता इंतज़ाम भी तो नहीं है हमारे यहां, आपको याद आये तो आखिर कैसे । इसलिये आपका ये नाचीज़ दोस्‍त जब जब जितना याद आता है, ऐसी हस्तियों की तारीख़ें आपको याद दिलाने की कोशिश करता है ताकि अगर आप इनके प्रशंसक हैं तो कम से कम इस दिन तो शिद्दत से याद करें इन्‍हें । कल हमने गुरूदत्‍त को याद किया था और आज हम क़तील शिफ़ाई की बरसी पर उन्‍हें खिराजे-अकीदत पेश कर रहे हैं ।

क़तील शिफाई 24 दिसंबर 1919 को हरीपुर हज़ारा में पैदा हुए थे । उनका असली नाम था औरंगज़ेब ख़ान था । क़तील उनका तख़ल्‍लुस था, क़तील यानी वो जिसका क़त्‍ल हो चुका है । अपने उस्‍ताद हकीम मुहम्‍मद शिफ़ा के सम्‍मान में क़तील ने अपने नाम के साथ शिफ़ाई शब्‍द जोड़ लिया था । पिता के असमय निधन की वजह से पढ़ाई बीच में ही छोड़कर क़तील को खेल के सामान की अपनी दुकान शुरू करनी पड़ी, इस धंधे में बुरी तरह नाकाम रहने के बाद क़तील पहुंच गये रावलपिंडी और एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में उन्‍होंने साठ रूपये महीने की तनख्‍वाह पर काम करना शुरू किया । सन 1946 में नज़ीर अहमद ने उन्‍हें मशहूर पत्रिका ‘आदाब-ऐ-लतीफ़’ में उप संपादक बनाकर बुला लिया । ये पत्रिका सन 1936 से छप रही थी । क़तील की पहली ग़ज़ल लाहौर से निकलने वाले साप्‍ताहिक अख़बार ‘स्‍टार’ में छपी, जिसके संपादक थे क़मर जलालाबादी ।

जनवरी 1947 में क़तील को लाहौर के एक फिल्‍म प्रोड्यूसर ने गाने लिखने की दावत दी, उन्‍होंने जिस पहली फिल्‍म में गाने लिखे उसका नाम है ‘तेरी याद’ । क़तील ने कई पाकिस्‍तानी और कुछ हिंदुस्‍तानी फिल्‍मों में गीत लिखे । जगजीत सिंह-चित्रा सिंह और गुलाम अली ने उनकी कई ग़ज़लें और नज़्में गाई हैं । उनकी बीस से भी ज्‍यादा किताबें शाया हो चुकी हैं ।

ग्‍यारह जुलाई 2001 को लाहौर में उनका इंतकाल हो गया ।
क़तील की रचनाएं आप कविता-कोश में
यहां पढ़ सकते हैं ।



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ज़िन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं
मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा

तू मिला है तो ये एहसास हुआ है मुझको
ये मेरी उम्र मोहब्बत के लिये थोड़ी है
इक ज़रा सा ग़म-ए-दौराँ का भी हक़ है जिस पर
मैनें वो साँस भी तेरे लिये रख छोड़ी है
तुझपे हो जाऊँगा क़ुरबान तुझे चाहूँगा

अपने जज़्बात में नग़्मात रचाने के लिये
मैनें धड़कन की तरह दिल में बसाया है तुझे
मैं तसव्वुर भी जुदाई का भला कैसे करूँ
मैं ने क़िस्मत की लकीरों से चुराया है तुझे
प्यार का बन के निगेहबान तुझे चाहूँगा

तेरी हर चाप से जलते हैं ख़यालों में चिराग़
जब भी तू आये जगाता हुआ जादू आये
तुझको छू लूँ तो फिर ऐ जान-ए-तमन्ना मुझको
देर तक अपने बदन से तेरी ख़ुश्बू आये
तू बहारों का है उनवान तुझे चाहूँगा

दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्‍लाह


दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह
फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह

मैनें तुझसे चाँद सितारे कब माँगे
रौशन दिल बेदार नज़र दे या अल्लाह

सूरज सी इक चीज़ तो हम सब देख चुके
सचमुच की अब कोई सहर दे या अल्लाह

या धरती के ज़ख़्मों पर मरहम रख दे
या मेरा दिल पत्थर कर दे या अल्लाह


ये मोजज़ा भी मोहब्‍बत कभी दिखाए मुझे




ये मोजज़ा भी मुहब्बत कभी दिखाये मुझे
कि संग तुझपे गिरे और ज़ख़्म आये मुझे

वो महरबाँ है तोप इक़रार क्यूँ नहीं करता
वो बदगुमाँ है तो सौ बार आज़माये मुझे

मैं अपने पाँव तले रौंदता हूँ साये को
बदन मेरा ही सही दोपहर न भाये मुझे

मैं घर से तेरी तमन्ना पहन के जब निकलूँ
बरहना शहर में कोई नज़र न आये मुझे

वो मेरा दोस्त है सारे जहाँ को है मालूम
दग़ा करे वो किसी से तो शर्म आये मुझे

मैं अपनी ज़ात में नीलाम हो रहा हूँ "क़तील"
ग़म-ए-हयात से कह दो ख़रीद लाये मुझे


हाथ दिया उसने मेरे हाथ में


हाथ दिया उसने मेरे हाथ में
मैं तो वली बन गया एक रात में

इश्‍क़ करोगे तो कमाओगे नाम
तोहमतें बंटती नहीं ख़ैरात में

इश्‍क़ बुरी शय नहीं पर दोस्‍तो
दख्‍ल ना दो तुम मेरी हर बात में

मुझपे तवज्‍जो है सब आस पास की
कोई कशिश तो है मेरी ज़ात में

रब्‍त बढ़ाया ना क़तील इसलिये रब्‍त:संपर्क
फ़र्क़ था दोनों के ख़यालात में


किया है प्‍यार जिसे हमने जिंदगी की तरह



किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह
वो आशना भी मिला हमसे अजनबी की तरह

बढ़ा के प्यास मेरी उस ने हाथ छोड़ दिया
वो कर रहा था मुरव्वत भी दिल्लगी की तरह

किसे ख़बर थी बढ़ेगी कुछ और तारीकी
छुपेगा वो किसी बदली में चांदनी की तरह

कभी न सोचा था हमने ‘क़तील’ उस के लिए
करेगा हम पे सितम वो भी हर किसी की तरह



क़तील के कुछ चुनिंदा शेर---

सब कहते हैं इक जन्नत उतरी है मेरी धरती पर
मैं दिल में सोचूँ शायद कमज़ोर मेरी बीनाई है


रची है रतजगो की चाँदनी जिन की जबीनों में
"क़तील" एक उम्र गुज़री है हमारी उन हसीनों में


जिस बरहमन ने कहा है के ये साल अच्छा है
उस को दफ़्नाओ मेरे हाथ की रेखाओं में



वो ख़ुदा है किसी टूटे हुए दिल में होगा
मस्जिदों में उसे ढूँढो न कलीसाओं में



हम को आपस में मुहब्बत नहीं करने देते
इक यही ऐब है इस शहर के दानाओं में

किस को ख़बर थी साँवले बादल बिन बरसे उड़ जाते हैं
सावन आया लेकिन अपनी क़िस्मत में बरसात नहीं

मेरे अन्दर चली थी आँधी ठीक उसी दिन पतझड़ की
जिस दिन अपने जूड़े में उसने कुछ फूल सजाये थे

"क़तील" जिसकी अदावत में एक प्यार भी था
उस आदमी को गले से लगा लिया मैनें

सच बात पे मिलता है सदा ज़हर का प्याला
जीना है तो फिर जीने के इज़हार न माँगो

बताईये क्‍या जिंदगी के किसी मोड़ पर आपको भी याद आये हैं क़तील

2 comments:

Vikas Shukla July 10, 2007 at 9:54 AM  

युनूसभाई,
जगजीत सिंगजी ने कतील साब की रचनाएं गायी उस अल्बम का नाम शायद माइलस्टोन है या द अनफर्गेटेबल्स, ठीक याद नही आ रहा. मगर ये अल्बम मैने आपके शहर भोपालसे ही रेकॉर्ड कराके लाया था. तब केसेट पर रेकार्डिंग करवा लेने का दौर था. मै और मेरी महबूबा (जो आज हमारी बिवी है) उसे बार बार सुनते थे. उसका वो शेर "वो मेहरबां है तो इकरार क्यूं नही करता, वो बदगुमां है तो सौ बार आजमाये मुझे" मुझे आजतक याद है.
कतील अब इस दुनियामें नही है ये बात तो मुझे आज ही आपके द्वारा पता चली. क्या उन्होंने महेश भट की किसी फिल्म के लिये भी गाने लिखे थे (राहुल रॉय और पूजा भट थे शायद उस फिल्ममे और संगीत अनु मलिक का था)?
कवी सम्मेलन और मुशायरे तो हमने बस दूरदर्शनपरही देखे है. हमारे छोटेसे गावमे ये सब चीजे कहां? आप तो बडे ही भाग्यशाली हो की भोपाल जैसे कल्चरली रिच शहरमें पले बडे हुए हो.
कतील साब को भाव भिनी आदरांजली.

Anonymous,  July 10, 2007 at 11:17 AM  

Mahesh Bhatt ki is film ka naam hai - Phir teri kahani yaad aai jisme pooja bedi bhi hai.

isme katil shifai ne bahut acchhi ghazale di. khaaskar party ke mahole main filmai gai ghazal jiske bol main bhool rahi hun.

Annapurna

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