संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Saturday, June 23, 2007

इन बूढ़े पहाड़ों पर कुछ भी तो नहीं बदला---सुनिए गुलज़ार का रचा मेरा पसंदीदा ग़ैरफ़िल्‍मी गीत ।‍






प्रिय मित्रो
कुछ दिन पहले मैंने गुलज़ार की वो कॉमेन्‍ट्री आपको सुनवाई थी जो उनके सीरियल मिर्ज़ा ग़ालिब की शुरूआत में आती है । और मैंने आपसे अर्ज़ किया था कि मेरी नज़र में गुलज़ार का ये सबसे अच्‍छा एलबम है ।

आज मैं उस एलबम के शीर्षक गीत को लेकर आया हूं ।
आने वाले दिनों में इस अलबम के सारे गीतों की एक एक करके चर्चा की जायेगी ।

जहां तक मुझे लगता है कि गुलज़ार ने कश्‍मीर के आतंकवाद को अपनी नज़र से देखा है और इस ललित रचना के ज़रिए वहां को हालात का रूपक गढ़ा है ।

वो कहते हैं कि ‘इन बूढ़े पहाड़ों पर कुछ भी तो नहीं बदला’ या आखिरी पंक्ति है---‘नानी की अगर मानें तो भेड़िया जिंदा है, जायेंगी अभी जानें, इन बूढ़े पहाड़ों पर ।‘

यानी गुलज़ार कहते हैं कि ये आतंकवाद का भेड़िया है जिसने चिनारों पर आग लगा रखी है और जो सब कुछ तबाह कर रहा है ।

इस गाने को सुनवाने से पहले आपको ये भी बताना चाहता हूं कि इस गीत को सुरेश वाडकर ने गाया और स्‍वरबद्ध किया विशाल भारद्वाज ने । हैरत की बात ये है कि सन 1997 में यानी आज से दस साल पहले निकले इस कैसेट की कोई पब्लिसिटी नहीं हुई । ना ही कंपनी ने आगे चलकर इसे दोबारा लॉन्‍च करने की ज़हमत उठाई । मैंने कहीं किसी को भी इसका जिक्र करते नहीं सुना है ।

अब इसके संगीत की बात ।
विशाल ने इस गाने को बिल्‍कुल एक बैले की तरह बनाया है ।
दिलचस्‍प बात आपको बता दूं कि मेरे छोटे भाई ने इस गाने को लेकर अपने कॉलेज के दिनों में वाक़ई एक बैले किया था और उसका वो बैले अच्‍छा जमा था ।


इस गीत में तीन आवाज़ें आती हैं । कोरस की आवाज़, गायक सुरेश वाडकर की आवाज़ और गुलज़ार की कॉमेंट्री एक सूत्रधार की तरह ।

आप पायेंगे कि हर अंतरे की पहली पंक्ति कोरस गाता है और उसे अधूरा छोड़ देता है, फिर उसे सुरेश वाडकर उठाते हैं ।

इस गीत के संगीत में एक ख़ास तरह की रवानी है । बेहद नाज़ुक रिदम का इस्‍तेमाल किया गया है । और कोरस इतना गाढ़ा और नरम है कि सीधे दिल में उतर जाता है । मेरा दिल ख़ामोश ख़ामोश और ख़ाली ख़ाली सा हो जाता है इस गाने को सुनकर ।
योग के गुरू कहते हैं कि ऐसा बहुत देर योग करने के बाद होता है ।

इस गीत में विशाल ने रबाब का भी बेहतरीन इस्‍तेमाल किया है । कहानी की तरह बुने इस गीत का संगीत वो धीरे धीरे चरम पर ले जाते हैं । और सुरेश वाडकर की आवाज़ यू लगती है मानो एक सफेद बर्फ़ जैसी दाढ़ी वाला सूफ़ी फ़क़ीर अपने चिमटे को बजाता हुआ बस्‍ती से गुज़र रहा हो । मानो सदियों से ये सूफ़ी बूढ़े पहाड़ों पर फिर रहा है । और उसने देखा है कि पहाड़ों पर सदियां बर्फ़ हुई पड़ी हैं ।

आप भी सुनिए और लुत्फ उठाईये ।
बस इतना निवेदन है कि जल्‍दीबाज़ी में इस गीत को मत सुनिएगा जब वक्‍त हो तो तसल्‍ली से सुनिए और इसमें डूब कर देखिए ।

इस गाने को सुनने के लिए
यहां क्लिक कीजिए



बांसुरी की एक गहन तान और फिर गुलज़ार की आवाज़

इन बूढ़े पहाड़ों पर कुछ भी तो नहीं बदला ।।


इन बूढ़े पहाड़ों पर
इन बूढ़े पहाड़ों पर कुछ भी तो नहीं बदला ।
सदियों से गिरी बर्फ़ें
और उनपे बरसती हैं हर साल नई बर्फ़ें

घर लगते हैं क़ब्रों से, घर लगते हैं क़ब्रों से,
ख़ामोश सफेदी में
कुतबे से दरख्‍तों के,

ना आब था, ना दाने
अलग़ोज़ा की वादी में
भेड़ों की गई जानें ।

शानदार पहाड़ी बांसुरी की तान और फिर गुलज़ार की आवाज़

कुछ वक्‍त नहीं गुज़रा नानी ने बताया था
सरसब्‍ज़ ढलानों पे बस्‍ती थी गड़रियों की
और भेड़ों के रेवड़ थे ।

ऊंचे कोहसारों के
ऊंचे कोहसारों के गिरते हुए दामन में
जंगल हैं चनारों के
जंगल हैं चनारों के
जंगल हैं चनारों के

सब लाल से रहते हैं
सब लाल से रहते हैं,
जब धूप चमकती है
कुछ और दहकते हैं ।

हर साल चनारों में
हर साल चनारों में
एक आग के लगने से
मरते हैं हज़ारों में
इन बूढ़े पहाड़ों पर


इन बूढ़े पहाड़ों पर कुछ भी तो नहीं बदला
इन बूढ़े पहाड़ों पर

इसके बाद ग्रुप वायलिन की हल्‍की तान और फिर गुलज़ार की आवाज़

चुपचाप अंधेरे में अकसर उस जंगल से
एक भेडिया आता था एक भेड़ उठाकर वो ले जाता था रेवड़ से
और सुबह को जंगल में बस खाल पड़ी मिलती

( यहां आने वाली रबाब और रिदम का अनोखा संयोजन ज़रूर सुनिए)


हर साल उमड़ता है
हर साल उमड़ता है,

दरियाओं पे बारिश में
एक दौरा सा पड़ता है


सबको तोड़ गिराता है जाता है
संदलाख चट्टानों से
वो सर टकराता है
तारीख़ का कहना है
रहना है चट्टानों को
दरियाओं को बहना है

अब के तुग़यानी में कुछ डूब गये गांव
कुछ गल गये पानी में
चढ़ती रही कुर्बानी
अलग़ोज़ा की वादी में
भेड़ों की गयी जानें

हल्‍के रबाब के पीछे गुलज़ार की आवाज़


फिर सारे गड़रियों ने उस भेड़िये को ढूंढा और मार के लौट आए
उस रात एक जश्‍न हुआ और सुबह को जंगल में
दो और मिली खालें


बांसुरी और बेहतरीन रिदम के बीच कोरस उठाता है अगला अंतरा ।

नानी की अगर मानें
नानी की अगर मानें
तो भेड़ि‍या जिंदा है
जायेंगी अभी जानें
जायेंगी अभी जानें
इन बूढ़े पहाड़ों पर
कुछ भी तो नहीं बदला ।।

इन बूढ़े पहाड़ों पर ।।







11 comments:

Hindi Blogger June 23, 2007 at 1:54 PM  

यूनुस साहब, क्या ही बेहतरीन चीज़ लेकर आए हैं. मज़ा आ गया. प्यारे-प्यारे बोल, दर्द भरी आवाज़, सुकूनदायी संगीत...और बीच-बीच में गुलज़ार की गंभीर आवाज़! शुक्रिया जनाब!

Anonymous,  June 23, 2007 at 1:57 PM  

Aap vaakai manjhe huve kalakaar hai.

Jitna acchha geet hai utni hi acchhi tarah aapne yeh geet hame samjhaya.

Mujhe tho Gulzaar ka pahala geet hi bahut pasand hai -

Mora gora rang lai le
Mohe shyam rang dei de

ek request hai - aapne ek photograph upload kiya tha jisme aap, Udit Narayan aur Mamta singh the.

isi tarah kisi-n-kisi sandarbh main apne doosare sahkarmiyon ke photos bhi upload keejeeye taaki jinki awaaze hum roz sunte hai onhe dekh tho le.

Annapurna

ravish June 23, 2007 at 3:59 PM  

बहुत अच्छा है भई। हिंदी फिल्मों के गानों से ही हमारी संवेदना संवरती हैं। अच्छा प्रयास

v9y June 23, 2007 at 6:54 PM  

"मैंने कहीं किसी को भी इसका जिक्र करते नहीं सुना है।"

यूनुस भाई, आप ग़लत संगत में हैं :). मेरे कुछ टूटे फूटे विचार, जो मैंने 1997 में ही लिखे थे, ये देखिये.

Yusuf June 23, 2007 at 9:47 PM  

“Boodhe Pahado par…” – Though it would be bragging to say so but I really look at this song and our ballet as a Rang De Basanti we did in the year 1998.

I have never written a comment on this blog…. not even when I really wanted to write one when there was an extremely nostalgic write up (Jeevan ki kai smritiyo ke saajhee chhote bhai ko janmdin ki badhayee)- posted on my own birthday. Today I am driven to write this in spite of all business pressures and deadlines of the profession, may be to pass by those days when this song meant a lot to us and moreover, to show the kind of up-bringing impact I had on my thought-processes of this radiovani blog writer - Bhai

True, that we share a deep bond that has actually shaped my individuality, inclinations and even my thought-processes. I do not know how and from where Bhai (This is how I address this now quite well-known blog writer and announcer) came to know and even arranged this album but there was one thing that I always used to visualize this song as a Theatrical Ballet (not to forget our obsession for Annual national theater festival and the kind of theatrical exposures we have got through this and more important, the kind of creative aspirations we have nurtured through all this).

Paralally, there was my brother who was working with local radio station and doing all (I literally mean ALL) kind of experimentation in radio features and as I have mentioned that even my thought process carries a shadow of personality of this elder brother, the cumulative impact of passing through all these exposures was – We (I along with a group of friends) used to visualize this song as a Ballet and amazingly no one among us has never even danced in any marriage so we were as blank about dance as President Kalam would be. But then those were the days when we used to look as our self as “Visionaries in the making”. When we were doing BBA and Annual Festival was announced in our Institute and so many people around us as started practicing on the beats of “Dr. Johns, Dr. Johns, Calling Doctor Johns…wake up now….” And more and more of such stuff were prepared by everyone everywhere. It was the time when the visionary inside us got awaken with our creative instincts literally blasting to rock the hip hop copy-caters and we had a deadly receipe for something that is going to be a future fiasco. So we planned a Ballet – “Boodhe Pahado par” and the receipe consisted of 3 cassettes 1. This Boodhe Pahado par, 2. Anand Shankar’s theame music Shubh 3. Background music of the movie Bandit Queen.

As I have just now mentioned a shadow of bhai’s personality on my thought processes and his days of making radio features with lots of experimentations, So we “visionaries” has have added suitbale patched of Anand Shankar’s theme music – Shubh and Background music of Bandit Queen in this song to make scope for Ballet movements and story narration (the struggle of Bhed and Bhediya in blue dim lights on stage and all such stuffs). It should have been a shabby kind of audio given the kind of tape-recorders we have used to music-mixing and then, to add even more troubles to our life, We have casted all such guys and girls who were not taking part in any other dance or drama thing as they were freely available all the time but unfortunately they were the people who have never danced like us and were not at all inclined to performing arts. Then there were sessions were all the visionaries used to get together on the roofs of my home in the night and we used to discuss the dance movements for entire nights. So this is how, it all shaped up. The guys, who did not come on stage, brought lots of card borads from sabzi bazaar to develop a nearly true looking pahad (mountain) that can be placed on the background in the ballet.

Then came the Rang De Basanti Day – We used to have a Dictator kind of a director of the institute and being mischievous and the one who dropped from the first floor of the institute while making some mischievous experiment, I was not at all into her good books. Moreover, I was quite close to a professor of ours whom she hated unconditionally but that professor was very popular among students. It was overheard that she was about to sack that professor after the annual functions is over and I have somewhere said to someone that if Prof. Joel (that genuine professor) would be removed, we will not attend the classes (looks like revolutionary young guns in the making)

So on the very final day, She (our director) declared that she would finance the cost of costumes for all programs (dance drama and Dr. Johns Dr. Johns sort of stuff) but not for this Ballet (because it is not directed by the choreographers hired by her rather by some novice uninitiated guys) and I backed out then and there, saying that if our venture would not be financed, we would neither perform, nor attend the function but she remain unperturbed by this. Somehow Prof Joel got to know about the same and he called me and asked us that he would finance the cost of renting costumes and set-preparation and I dis-agreed. But somehow pursued me to do the ballet.

We did it on the stage.

What if one portion of set of mountain dropped on the stage before the ballet could be completed…
What if the “Mashal” we were using for the ballet got so vigorously ignited that it even touched the electricity wires placed on the upped side of stage…
What if some of our dancers did their steps in an extremely opposite manner of what they were supposed to…

“Nani ki agar mane to bhediya (I meant this bhediya to be our dictator director when I recited this) Zinda hai….Jayenge abi jaane, in boodhe pahado par...

Cut 2. Five years later. At an Alumnus meet organized by our batch mates. People still recognize my forgotten face as the guy who did that “Boodhe Pahado par”

People remembered “Boodhe Pahado par” even after 5 years and they forgot “Dr. Johns Dr. Johns, Calling Dr. Johns, Wake up now….”

Who cares if the one portion of set of mountain dropped on the stage that day even before the ballet could be completed…or our venture was not financed or even it was as miserably performed as brilliantly it was planned.

Now these visionaries sell branded furnitures, pen, credit cards, insurance and all possible stuffs to the world, but living inside a 3x3 cubicle irrespective of the kind of town we are into, that creative blast is over for all of us and creative writing has been restricted to official mails but we feel moved and touched by even by a mentioned of those days and the songs that are associated with those days. Touched enough to write a memoir of 2 pages.

Abhishek June 23, 2007 at 11:27 PM  

यूनुस भाई,
बहुत अच्छा लगा आपकी ये पोस्ट पढ़ कर । मै गुलज़ार साहब का बहुत बड़ा फ़ैन हूँ लेकिन ये रचना कभी नही सुनी थी । संगीत भी एकदम अलग था । कृपया अपना ये प्रयास जारी रखेँ और ऐसी ही नायाब चीज़ें हमे सुनवाते रहें ।

ऐसे अभी अभी छायागीत और आप की फ़रमाइश सुन के उठा हूँ जो कि आज (२३ जून) बहुत दिनो बाद आपने प्रस्तुत किया था । छायागीत मे आपने आज क्या अनसुने और अनमोल गीत सुनवाये । मजा आ गया । आपसे अनुरोध है कि छायागीत और आप की फ़रमाइश, और ज़्यादा बार प्रस्तुत किया करें ।

धन्यवाद
अभिषेक पाण्डेय

Lavanyam -Antarman June 24, 2007 at 12:57 AM  

It was wonderful to read your 2 page Memoir Yusuf bhai --
The obstacles in life does impat , tremendous impetus to forge ahead & break all that it stands to stagnate the flow of ENERGY .
That is the human instinct & behaviour.
I was smiling, understanding how inspired your TEAM of Friends must be to put up such an inspired HOME Production in front of your collegeaues & fellow students.
The memory of those days spent in creative endeavour still fresh in your minds has brought you here on your illustrious Elder brother's BLOG --
May I wish you a belated Happy Birth day & bid you, all the best in life ?
with warm regards to you & Yunus bhai & your Families,
sincerely,
Lavanya Shah

Lavanyam -Antarman June 24, 2007 at 1:03 AM  

युनूस भाई,
आदाब!
सुँदर शब्द रचना के धनी गुलज़ार भाई उर ये गीत - कथा जो अपने भीतर बाल कहानी के साथ नानी की अनुभव जन्य सीख देती जाती है कि," चेत के रहना बच्चोँ ! "
भेडीया कभी मरता नहीँ --
सद्`गुण दुर्जन पर, मसीहा बनकर अपनी रोशनी बिखर ही देते हैँ--
ऐसे ही गीतोँ को सुनवाते रहियेगा -- हमेँ बडी प्रसन्नता होती है -
- ये "चिठ्ठा जगत" का कितना बढिया उपयोग कर रहे हैँ आप!
बधाई !
स्नेह सहित
-- लावण्या

yunus June 24, 2007 at 9:18 AM  

विनय जी टिप्‍पणी के लिए शुक्रिया । आपकी दी लिंक पढ़ी । अच्‍छा लगा । आशय यही है कि बहुत लोग इस अलबम से परिचित नहीं हैं । हां आपने अपनी समीक्षा में लिखा है कि ‘दिल पड़ोसी है’ आपको ज्‍यादा अच्‍छा लगता है । और ‘बूढ़े पहाड़ों पर’ कम । सबकी अपनी अपनी पसंद होती है । मेरे मुताबिक़ ‘बूढ़े पहाडों पर’ पहले और ‘दिल पड़ोसी’ दूसरे नंबर पर है । जल्‍दी ही दिल पड़ोसी के बारे में भी लिखूंगा ।

yunus June 24, 2007 at 9:20 AM  

बाक़ी मित्रों को धन्‍यवाद

बबलू(यूसुफ़) ब्‍लॉग पर पहली बार तुमने टिप्‍पणी दी । पुराने दिन याद आ गये । सोचो भाई, गानों के ज़रिए हम जिंदगी की कितनी कितनी बातें याद कर लेते हैं ।

तुमको पता है ‘बूढ़े पहाड़ों पर’ मैं काफी दिन से खोज रहा था । अब जाकर मिला । तो लगा कि तुमको सबसे अच्‍छा लगेगा इसे सुनकर । अभी इसे बुकमार्क कर लो ।

Vikas June 24, 2007 at 10:34 AM  

Yunusbhai and Yusufbhai,
Aap do bhaiyon ne milkar mera Din Bana Diya ( you made my day ). Yusufbhai, aapka hardik swagat hain. Aap ka kissa-e-ballet sunkar mujhe mere college ke din yaad aa gaye. Jaha college gathering me humne jo drama kiya tha, mike fail hone ki vajah wo hume adhe me chhod ke andar aana pada tha. Magar phir bhi bada maja aaya tha. Oh ! Kaha gaye wo din ?
Yunus bhai, aap jis tarah se kisi geet aur sangeet ka Ras Grahan karke hamare samne uski barikiyan aur najakate pesh karte hain, wo bemisal hain. Aap isi tarah ek se badhkar ek nayab tohphe dundh dundh ke pesh karte rahiyega. Isi shubh kamana aur tamanna ke sath,
Vikas

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