संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Wednesday, June 6, 2007

कभी कभी मेरे दिल में ख्‍याल आता है—ख़ुद साहिर लुधियानवी की आवाज़ में एक दुर्लभ ऑडियो

साहिर मेरे प्रिय शायर हैं । और उनके गीतों और शायरी के बारे में विस्‍तार से रेडियोवाणी पर बातें करने की मेरी इच्‍छा भी है । साहिर लुधियानवी ने एक बीहड़ जिंदगी जी थी । उन्‍होंने जिसे चाहा और शिद्दत से चाहा, वो उन्‍हें कभी नहीं मिला । साहिर जीवन भर अविवाहित रहे । मैंने सुना है कि अपनी मां के इंतक़ाल के बाद जल्‍दी ही साहिर ने भी दुनिया को अलविदा कह दिया ।


मजरूह सुलतानपुरी के अलावा साहिर हिंदी सिनेमा के ऐसे अकेले गीतकार थे जिन्‍होंने अपनी शर्तों पर काम किया । सुना है कि उस ज़माने में भी वो गीतकारी की फ़ीस के रूप में संगीतकार से एक रूपया ज्‍यादा लिया करते थे ।

जिसके साथ काम करने की मरज़ी होती, उसी के साथ करते । पर हर किसी के लिए गीत नहीं लिखते । नौजवानों से उन्‍हें बहुत प्‍यार था । वो मुशायरों में भी जाया करते थे, और तूफानी शायर माने जाते थे । कुछ दिन पहले बैंगलोर के हमारे मित्र शिरीष कोयल ने फ़ोन पर ही साहिर की आवाज़ की रिकॉर्डिंग सुनवाकर दिल में तूफ़ान मचा दिया था ।

सच तो ये है कि साहिर साहब की आवाज़ विविध भारती के पास तक नहीं है । फिर आज के दौर में अपने प्रिय गीतकार की आवाज़ कहां सुनने को मिल सकती है । पर मैं हमेशा से कहता रहा हूं कि ये टेक्‍नॉलॉजी का लोकतंत्र है । और इसी लोकतंत्र ने साहिर की आवाज़ को हम तक पहुंचा दिया है । ये रही । आप समझ सकते हैं कि इसे पेश करते हुए मैं कितना ख़ुश हूं ।

इस वीडियो के नीचे यही इस नज्म की इबारत दी गयी है और साथ में हैं यहां आये कुछ कठिन उर्दू अल्‍फ़ाज़ के मायने ।







कभी कभी मेरे दिल में ख्‍याल आता है

कि जिंदगी तेरी जुल्‍फ़ों की नर्म छांव में गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी

ये तीरगी जो मेरे ज़ीस्‍त का मुक़द्दर है, तेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी

अजब ना था कि मैं बेगाना-ए-अलम होकर, तेरे जमाल की रानाईयों में खो रहता

तेरा गुदाज़ बदन, तेरी नीमबाज़ आंखें, इन्‍हीं हसीन फ़ज़ाओं में मैं हो रहता ।

पुकारतीं मुझे जब तल्खियां ज़माने की, तेरे लबों से हलावत के घूंट पी लेता

हयात चीख़ती फिरती बरहना-सर और मैँ, घनेरी ज़ुल्‍फ़ों के साये में छुप के जी लेता

मगर ये हो ना सका, मगर ये हो ना सका और अब ये आलम है

कि तू नहीं, तेरा ग़म, तेरी जुस्‍तजू भी नहीं

गुज़र रही है कुछ इस तरह जिंदगी जैसे, इसे किसी सहारे की आरज़ू भी नहीं ।

ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूं गले

गुज़र रहा हूं कुछ अनजानी रहगुज़रों से

मुहीब साये मेरी सिम्‍त बढ़ते आते हैं

हयात-ओ-मौत के पुरहौल ख़ार-ज़ारों से


ना कोई जादा ना मंजिल ना रोशनी का सुराग़

भटक रही है ख़लाओं में जिंदगी मेरी

इन्‍हीं ख़लाओं में रह जाऊंगा कभी खो कर

मैं जानता हूं मेरी हमनफ़स मगर यूं ही

कभी कभी मेरे दिल में ख्‍याल आता है ।।


इस नज्म में आये कुछ कठिन उर्दू शब्‍दों के मायने


शादाब—ताज़ा,खुशनुमा

तीरगी—अंधेरा

ज़ीस्‍त—जिंदगी

बेगाना-ए-इल्‍म—ज्ञान से बेख़बर

जमाल—खूबसूरती

रानाईयों—चमक दमक

गुदाज़—नर्म, तंदुरूस्‍त

नीमबाज़—अधसोई

तल्खियां—कड़वापन, तीखापन

हलावत—स्‍वादिष्‍ट, अच्‍छा

हयात—जिंदगी

बरहना—खुला हुआ, नंगा

घनेरी—घनी

जुस्‍तजू—उम्‍मीद, तलाश

मुहीब—डरावना

सिम्‍त—तरफ, दिशा में

पुर हौल—डरावना

ख़ार—कांटे

ज़ारों—अफ़सोस,
शोक

ख़ला—ख़ालीपन, निर्वात

हमनफ़स—हमसफर, दोस्‍त

11 comments:

Lavanyam -Antarman June 6, 2007 at 11:57 PM  

युनूस भाई,
बहुत अच्छे गीत के बारे मेँ यह लिन्क दिया है आपने ~~
साहिर सा'ब की आवाज़ कितनी साफ और ज़बाँ मेँ कितनी रवानी है !
शुभकामना सहित,
स स्नेह,
लावण्या

अनामदास June 7, 2007 at 12:34 AM  

युनुस भाई
आपने शाम बना दी, दिल आपको बेसाख़्ता दुआएँ दिए जा रहा है. बेहतरीन शायर की एक बेहद नाज़ुक नज़्म. मैंने सोचा नहीं था कि साहिर साहब की आवाज़ में सुनने को मिल जाएगी. अगर कुछ और मिले तो उसे भी चढ़ाइए. आप बेहतरीन काम कर रहे हैं, लगे रहिए.
अनामदास

Pramod Singh June 7, 2007 at 1:40 AM  

बहुत अच्‍छे.. वाह! वाह!

Anonymous,  June 7, 2007 at 11:57 AM  

Bahut khoob

isse zyada mere paas shabd nahi hai

Annapurna

Suresh Chiplunkar June 7, 2007 at 3:36 PM  

यूनुस भाई, आपका काम सदा की तरह उम्दा रहा लेकिन खास बात जो लगी वह यह कि आपने उर्दू शब्दों का तर्जुमा करके बताया उसके कारण मजा दूना हो गया... क्या आप किसी उर्दू-हिन्दी शब्दकोश साईट के बारे में जानते हैं...यदि हाँ तो लिंक दीजियेगा

joglikhisanjaypatelki June 7, 2007 at 8:23 PM  

साहिर के मायने होते हैं जादूगर...साहिर लुधियानपुरी वाक़ई शब्द के जादूगर थे यूनुस भाई.साहिर साहब के एक पारिवारिक मित्र ने मेरे पिता श्री नरहरि पटेल (जिन्हें हम पप्पाजी कहते हैं,आकाशवाणी इन्दौर यानी मालवा हाउस की प्राइम वाइस रहे हैं)को बताया था फ़िल्म चित्रलेखा और साहिर सा. से जुडा़ एक वाक़या.संगीतकार रोशन सा.से निर्माता ने कहा कि चित्रलेखा चूंकि भारतीय पृष्ठभूमि पर बनी तस्वीर है सो लोग सुझा रहे हैं कि इसकी गीत निगारी के लिये पं. प्रदीप,शैलेंद्र या पं.भरत व्यास से बात की जाए.जब रोशन सा.ने इसका कारण पूछा तो बताया गया कि ये सब नाम गीत विधा के प्रतिष्ठित लोग हैं और आपके महबूब शायर साहिर का इलाक़ा तो ग़ज़ल और नज़्म है.ज़ाहिर है दोस्तो उस ज़माने में भी लाबिंग हुआ करती थी और ईर्ष्या तो तबसे अस्तित्व में है जब से इस सृष्टी की रचना हुई है...ख़ैर..रोशन सा. ने कहा मै एक बार साहिर को ही आज़माना चाहूंगा.साहिर साहब तशरीफ़ लाए..रोशन सा. ने कहा साहिर भाई आप तो ठीक हैं पर यहां मेरी इज़्ज़त का सवाल है..साहिर सा.ने इसे एक चैलेंज के रूप में लिया और यूनुस भाई हमारे कानों को मिले चित्रलेखा के मोतियों से दमकते सुरीले नग़मे.चोखे लोगों का दौर था वो . साहिर साहब का लिखा और रफ़ी साहब का ये गीत सुनिये...मन रे तू काहे न धीर धरे..ढूंढ सकता है इसमें कोई एक भी उर्दू का लब्ज़.साहिर के क़लम से खा़लिस हिन्दी में क्या खूब झरा है ये गीत. रफ़ी सा. की आवाज़ में इसे जब भी सुनता हूं तो लगता है कोई सूफ़ी , दरवेश हमे
ज़िन्दगी की सचाइयों का फ़लसफ़ा समझा रहा है...बेसुरे समय में साहिर के ये गीत कविता के अस्तित्व का का पता देते हैं.हिन्दी गीत लेखन विधा की बहुत बड़ी शख़्सियत हैं साहिर साहब और उनका काम.संगीत और गीत को धंधा बनाने वालों से पूछा जाना चाहिये यूनुस भाई...जिन्हे नाज़ है हिन्द (या अपने फ़न पर) पर वो कहां हैं.

Manish June 7, 2007 at 10:54 PM  

ये नज्म तो साहिर की बेहद मशहूर नज्म है । साहिर की आवाज सुनाने का शुक्रिया !
वैसे अभिनव जी ने हाल ही में बताया था की मंच पर अदायगी के मामले में साहिर साहब कुछ कमजोर पड़ते थे । वो इस रिकार्डिंग से भी स्पष्ट है।

Vikas June 8, 2007 at 4:29 PM  

Yunusbhai, why you did not mention Sahir's love for Amrita Pritam? As both are now part of history, you should have mentioned some incidances from Amritaji's autobiography 'Rasidee Tikat' like she used to store the stubs of cigarets which Sahir used to leave behind in the ashtray and smoke them after Sahir gone from her home.

Shirish June 11, 2007 at 11:31 AM  

Yunus, I have something to add to what Joglikhisanjaypatelki and Manish have said.

Despite writing such exquisite poetry in Hindi for Chitralekha, Sahir is reported to have had self-doubt. So he went to Indeevar, a top lyricist who was strong in Hindi, to get the nuances checked. Indeevar did not find even one correction/modification to make. He found Sahir's work perfect. Indeevar recalls that episode here:
http://bollyweird.com/memories-of-a-master-indeevar.html

Manish has said: "अभिनव जी ने हाल ही में बताया था की मंच पर अदायगी के मामले में साहिर साहब कुछ कमजोर पड़ते थे । वो इस रिकार्डिंग से भी स्पष्ट है।"
May I point out that Sahir Sahab's recitation of Kabhi Kabhi (posted by Yunus) was not made on a stage. It seems to be a studio recording in the latter part of his life.
I have a recording of a younger Sahir reciting his epic nazm Parchhaiyaan at a mushaira. The recitation is bold and clear. The audience seems to be held in thrall.

PD August 24, 2013 at 12:35 AM  

इस लिंक से भटकते हुए कई बार गुजरा हूँ.. आज सोचा कमेन्ट भी करता चलूँ.. :)

Post a Comment

if you want to comment in hindi here is the link for google indic transliteration
http://www.google.com/transliterate/indic/

Blog Widget by LinkWithin
.

  © Blogger templates Psi by Ourblogtemplates.com 2008 यूनुस ख़ान द्वारा संशोधित और परिवर्तित

Back to TOP