संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Saturday, May 26, 2007

गुलमोहर गर तुम्‍हारा नाम होता: कुछ तस्‍वीरें कुछ बातें





















































मुंबई की गर्मी के बारे में एक मित्र ने बड़ी अच्‍छी बात कही थी । उनका कहना था कि मुंबई में नौ महीने गर्मी पड़ती है और बचे हुए तीन महीने खूब गर्मी पड़ती है । तटीय इलाक़ों में गर्मी का मतलब होता है बहुत सारी नमी, जिसकी वजह से नहाकर निकलते ही पसीने से तर ब तर हो जाते हैं । ऐसी गर्मी से राहत पाना उन लोगों के लिए मुश्किल है, जिन्‍हें बाहर निकलना पड़ता है अपने काम धाम के सिलसिले में । मेरे दफ्तर विविध भारती के लोगों की हालत भी यही है । पसीने से तर ब तर वो दूर दूर से लोकल ट्रेनों और बसों में धक्‍के खाते हुए आते हैं । और दफ्तर कोई पिकनिक मनाने की जगह तो है नहीं । आने के बाद काम भी करना पड़ता है । पर आजकल विविध भारती के अहाते में घुसते ही सब बड़ा सुकून महसूस कर रहे हैं । और इसकी वजह ये है कि विविध भारती के अहाते में आजकल एक गुलमोहर दहक रहा है ।

गुलमोहर मेरी स्‍मृतियों में शामिल रहा है । अभी भी याद है गुलमोहर के लाल होने का मतलब था परीक्षाओं का क़रीब आ जाना । स्‍कूल और कॉलेज की पढ़ाई के दिनों में कभी तसल्‍ली से गुलमोहर के नीचे बैठने का सौभाग्‍य नहीं मिला । मुझे याद है म0प्र0 के शहर छिंदवाड़ा में हमारे कॉलेज के मैदान के एक छोर पर गुलमोहर का पेड़ था । उसमें लाल फूलों की बहार आई होती थी और हम साइंस की पढ़ाई में बौराये से फिरते
थे । फुरसत तक नहीं होती थी उसे देखने की । एक दिन एक मित्र ने कहा—‘ऐसा लगता है जैसे किसी ने हमारे पीछे कुत्‍ता छोड़ रखा है, क्‍या दिन हैं यार, गुलमोहर के नीचे बैठने तक का वक्‍त नहीं है ।‘ और उसके बाद वो भविष्‍य की चिंताओं में डूब गया । हम वो लोग थे जो प्री इंजीनियरिंग टेस्‍ट में नाकाम रहे थे यानी मां-बाप के हमें इंजीनियर बनाने के सपने पर पानी फेर चुके थे । इसलिये ज़िंदगी में कोई अच्‍छा कैरियर बनाने का दबाव रहता था । मेरे साथ तो मामला और भी दिलचस्‍प था । सामाजिक और पारिवारिक दबाव के तहत मैं बी0एस0सी कर रहा था, वरना मन तो लेखन, पत्रकारिता और रंगमंच में लगता था । उन दिनों में आकाशवाणी छिंदवाड़ा में कैजुअल कंपियर बन चुका था । और युववाणी पेश किया करता था, यानी जो बचा खुचा समय था वो भी खत्‍म । घर वालों ने उम्‍मीद छोड़ दी थी कि इस लड़के को कोई ठीक ठिकाने का कैरियर मिलेगा ।

बहरहाल ना तब गुलमोहर के नीचे बैठकर धर्मवीर भारती की कविताएं पढ़ने का वक्‍त था और ना अब है । नौकरी, परिवार, ब्‍लॉगिंग और बाकी सारे धंधे । और मन में गूंज रही है धर्मवीर भारती की मेरी प्रिय कविता, जिसे मैं गुलमोहर के नीचे बैठकर ज़ोर ज़ोर से पढ़ना चाहता हूं—‘इन फीरोज़ी होठों पर बरबाद मेरी ज़िंदगी ।’

बहरहाल रोज़ लग रहा था कि बारिश के पहले छींटे इस गुलमोहर को ख़त्‍म कर देंगे, इसलिये बड़ी विकलता से मैंने इसकी कुछ तस्‍वीरें खींच ली हैं । कुछ अपने कैमेरा मोबाईल से और कुछ अपने डिजिटल कैमेरे से । इन्‍हें देखिए और साथ में सुनिए फिल्‍म ‘देवता’ का गुलज़ार का लिखा ये गीत, जिसमें गुलमोहर का जिक्र आता है । इस गाने को सुनने के लिये
यहां क्लिक कीजिये ।
गुलमोहर गर तुम्‍हारा नाम होता
मौसमे-गुल को हंसाना भी हमारा काम होता ।।
आयेंगी बहारें तो अबके उन्‍हें कहना ज़रा इतना सुनें
मेरे गुल बिना उनका कहां बहार नाम होता ।
मौसमे गुल को हंसाना भी हमारा काम होता ।।
शाम के गुलाबी से आंचल में ये दिया जला है चांद सा
मेरे ‘उन’ के बिना उसका भला चांद नाम होता ।।
गुलमोहर गर तुम्‍हारा नाम होता ।।

थोड़ा सा इस गाने के बारे में भी । गुलज़ार के गीत अपने शिल्‍प में सबसे अलग होते हैं । दो अंतरों का गीत है ये । पहला अंतरा किशोर कुमार ने गाया है । और दूसरा लता जी ने । अंतरे क्‍या हैं दो दो पंक्तियां हैं । ये गुलज़ार के उत्‍कृष्‍ट गीतों में से तो नहीं है । पर इसका अहसास अनमोल है । मुखड़ा ही देखिये ना ‘गुलमोहर गर तुम्‍हारा नाम होता’ । ये बात ना इससे पहले किसी ने सोची और ना ही इसके बाद में । कहिए कैसा लगा आपको ये सब पढ़कर और ये तस्‍वीरें देखकर ।



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10 comments:

Divine India May 26, 2007 at 8:52 PM  

नमस्कार युनूस भाई,
भाई मुम्बई की उमस भरी गर्मी का पूर्णत: तुफ्त उठा रहा हूँ…दिल्ली से निकला था कि थोड़ा शकुन मिलेगा तट के किनारों पर मगर यहाँ का ज़ल्वा ही निराला है… हाँ आप के पास तो गुलमोहर है यही तो सुंदरता है जो मन को शीतल रखता है…मन की तपीस से आराम मिला है आपको।बधाई।

Sagar Chand Nahar May 26, 2007 at 9:21 PM  

युनूस भाई
फोटॊ बहुत अच्छी लगी, मुझे भी गुलमोहर बहुत लुभाता है बचपन से। हम जब छोटे थे गुलमोहर की एक पत्ती जिसमें सफेद होते हैं खाते थे क्यों कि वह खट्टे लगते थे। ( अभी भी मौका मिल जाये तो खा लेता हूँ, चुपके से ... ही ही ही)

वैसे गाने में खास मजा नहीं आया क्यों कि संगीत में इतना दम नहीं लगा।

धुरविरोधी May 26, 2007 at 9:24 PM  

बहुत अच्छे यूनुस भाई.
हमारे घर के आगे भी गुलमोहर लगी है और आजकल शर्मा कर लाल हो रही है.

हमारे फुरसतिया जी ने भी गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता नाम से एक व्यंग्य लिखा था पर न जाने कहां पढ़ा था. अगर आपको कहीं मिले तो जरूर पढियेगा.

और अच्छा हुआ कि आप अंजीनीयर नहीं बने. (कम से कम हमारे लिये तो)

Raviratlami May 27, 2007 at 6:35 AM  

"...और दफ्तर कोई पिकनिक मनाने की जगह तो है नहीं । आने के बाद काम भी करना पड़ता है ।..."

ऐसा क्या? अच्छा हुआ आपने बता दिया :)

RC Mishra May 28, 2007 at 1:37 AM  

पुरानी बातें याद आ गयीं, ये मेरे पसन्दीदा गीतों मे से है।
धन्यवाद।

Anonymous,  May 28, 2007 at 1:55 PM  

last photograph is close-up photograph of the flower is not in focus it is giving blure effect. if it would have been in sharp focus the details and clarity of the petals would have enhance the beauty of the phptograph.

B.V. Noble

Hyderabad

Anonymous,  May 28, 2007 at 2:13 PM  

Aaj Bhule-bisare geet main Mamta jee ne bataya ki Vividh Bharati ki Aangan main Gulmohar hai. Abhi aapka blog dekha tho aapne bhi yehi likha. lagata hai aajkal Vividh Bharati main charcha ka vishay Gulmohar hai. khair...

Antim photo ko chod kar sabhi photos acchhe hai. Antim phograph par mere Office ke photographer ne ek proffessional ki haisiyat se apna comment de diya hai (B.V.Noble).

Hamare office main aage boundry par 6 Gulmohar line se lage hai aisa lagata hai jaise kisi ne Red Boundry line kheech dee ho. peechhe Research farm main bhi aur aage door tak Agriculture university ke research farm aur students farm main Aag ke gole ki tarah khade Gulmohar lagata hai kheton ki phasalon ki raksha kar rahe hai.

Meri dilchaspi in pankhudiyon ko khane main hai. visheshkar adhkhule phool main bahar ke hare petal hata kar bheetar se lal komal petal nikaal kar khane par khatte-khattee siiiiiiiiiii bahut mazaa aata hai.

Aap bhi apne office ke aangan main khade Gulmohar ke petals toodiye aur taste keejeeye. kuch petals tode kar meri ore se Mamta jee ko deejeeye.

Annapurna

Vikas May 28, 2007 at 4:42 PM  

युनूसभाई,
दस साल पहले मैने मेरे घरके बाहर गुलमोहर के चार पेड लगाये.
उनमेसे तीन जिवीत रहे और बढे. हर साल की तरह इस सालभी वो
लाल फूलोंसे लदे भरे है और बच्चे आते जाते उनकी पंकुडियां तोडकर
चखनेकी फिराक में लगे रहते हैं. इस बारिशमें अमलताश और पलाश
लगानेकी सोच रहां हूं.
विकास शुक्ल

yunus May 29, 2007 at 5:15 PM  

आप सभी को बहुत बहुत धन्‍यवाद । गुलमोहर चखने की बात लगभग सभी ने लिखी है । मज़ा आया जानकर । और हां नोबल साहब आखिरी तस्‍वीर वाक़ई आउट आफ फोकस है, वो मेरे मोबाईल कैमेरे से है । आप तो जानते ही हैं कि मोबाईल कैमेरे की अपनी सीमाएं हैं । मैंने डिजिटल कैमेरे से जो क्‍लोज़ अप लिया है वो अच्‍छा आया है । अपने मन की बस इतनी बात कहनी है कि बारिश आते ही गुलमोहर बुझ जायेगा और बस इन तस्‍वीरों में उसकी यादें रह जायेंगी । वैसे हर साल इस तरह दहकता नहीं है हमारा विविध भारती का गुलमोहर । और आप सभी ने तस्‍वीरों में देखा ही होगा कितना छतनार है ये ।

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