संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Sunday, February 1, 2009

क़व्‍वाली में कबीर-'भला हुआ मोरी गगरी टूटी': मुंशी रज़ीउद्दीन और फ़रीद अयाज़

क़व्‍वाली में कबीर---ये बात ज़रा अजीब लगती है । पर एक क़व्‍वाल घराना ऐसा है जो बरसों-बरस से 'कबीर' की साखियों को क़व्‍वालियों के रूप में गाता रहा है । आज इसी घराने की बात की जायेगी ।

अपनी श्रृंखला 'कल्‍ट-क़व्‍वालियां' के ज़रिए हम 'एक्‍सप्‍लोर' कर रहे हैं क़व्‍वालियों के अनूठे संसार को । यहां मुहब्‍बतों की क़व्‍वालियां फिलहाल नहीं सुनवाई जायेंगी । ना ही उनकी बारी जल्‍दी आयेगी । अभी तो हम 14 रूहानी दुनिया के सुकून भरे रास्‍तों पर तफरीह़ कर रहे हैं । इस श्रृंखला की दूसरी कड़ी में हमने 'क़व्‍वाल बच्‍चों के घराने' की बात की थी । मुंशी रज़ीउद्दीन इस घराने के एक स्‍तंभ हैं । जो 1919 में दिल्‍ली में पैदा हुए थे । रज़ीउद्दीन उस्‍ताद उमराव ख़ान के पोते थे--जो हैदराबाद दकन रियासत के दरबार में संगीतकार थे । रज़ी ने अपने बड़े भाई अब्‍दुल हमीद ख़ां और चाचा अब्‍दुल करीम ख़ां से शास्‍त्रीय-संगीत की तालीम ली थी । अपनी तालीम पूरी करने के बाद मुंशी रज़ीउद्दीन ओस्‍मानिया रियासत के रेडियो स्‍टेशन में लग गए । कुछ वक्‍त तक उनका ताल्‍लुक आकाशवाणी से भी रहा । विभाजन के बाद मुंशी रज़ीउद्दीन करांची चले गए । हालांकि उन्‍हें दिल्‍ली में उनके तमाम साथियों ने रोकने की कोशिश की लेकिन उनका मन कराची में अपने परिवार के पास जाने की था । एक ब्‍लॉग पर ये पता चला कि 'मुंशी' उन्‍हें इसलिए कहा जाता रहा क्‍योंकि काफी कम उम्र में उन्‍होंने उर्दू की 'मुंशी फ़ाजि़ल' की डिग्री हासिल कर ली थी । इसलिए परिवार और बाहर के लोग उन्‍हें अदब से मुंशी कहते रहे । मुंशी रज़ीउद्दीन ने शास्‍त्रीय-गायन भी किया और क़व्‍वालियां भी गाईं ।

फ़रीद-अयाज़ क़व्‍वाल मुंशी रज़ीउद्दीन के ही बेटे हैं । कुछ बरस पहले यानी मुंशी रज़ी के निधन से पहले तक तीनों एक साथ क़व्‍वालियां गाते थे । और वो समां ही कुछ और होता था । जी नहीं...काश...हम देख पाते मत कहिए । यूट्यूब पर सर्च कीजिए 'मुंशी रज़ीउद्दीन' और अभी इसी वक्‍त देखिए । हिस्‍सा बन जाईये क़व्‍वाली की उस तरंग का....जो आज बहुत दुर्लभ है । 'क़व्‍वाल बच्‍चों के घराने' में 'कबीर' को गाने की परंपरा रही है । आज इस घराने की गायकी का परिचय कराते हुए हम पेश कर रहे हैं एक बेहद मक़बूल क़व्‍वाली 'भला हुआ मोरी गगरी फूटी' । इसे कबीर की रचनाओं का कोलाज या मोन्‍टाज कहा जा सकता है । नीचे दो ऑडियो फाईलें लगाई गई हैं । एक में फ़रीद अयाज़ अकेले गा रहे हैं । दूसरी फाईल में मुंशी रज़ीउद्दीन प्रमुख गायक हैं और फ़रीद अयाज सहायक गायक ।

भला हुआ मोरी गगरी फूटी--मुंशी रज़ीउद्दीन एवं साथी । चूंकि ये एक लाईव-कंसर्ट की रिकॉर्डिंग है, इसलिए साउंड-क्‍वालिटी के मामले में थोड़ा समझौता करना पड़ा है । 

अवधि--9:29 मि.



'भला हुआ मोरी गगरी फूटी' --फ़रीद अयाज़ क़व्‍वाल एवं साथी । 
अवधि--6:44 मि.


क़व्‍वाली में शामिल कुछ साखियां ।
कबीरा कुआं एक है और पानी भरें अनेक 
भांडे ही में भेद है, पानी सबमें एक ।।
भला हुआ मोरी गगरी फूटी, मैं पनियां भरन से छूटी
मोरे सिर से टली बला ।।
चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोए
दो पाटन के बीच यार साबुत बचा ना कोए ।।
चाकी चाकी सब कहें और कीली कहे ना कोए
जो कीली से लाग रहे, बाका बाल ना बीका होए ।।
हर मरैं तो हम मरैं, और हमरी मरी बलाए
साचैं उनका बालका कबीरा, मरै ना मारा जाए ।
माटी कहे कुम्‍हार से तू का गोंधत मोए
एक दिन ऐसा आयेगा कि मैं गूंधूंगी तोय ।।

कविता कोश में कबीर को
यहां पढ़ें ।

दिलचस्‍प बात ये है कि उक्‍त दोनों क़व्‍वालियों के कई संस्‍करण उपलब्‍ध हैं । जिनमें हर बार साखियां बदल जाती हैं । यूट्यूब पर आप ये रचनाएं यहां देख-सुन सकते हैं । रेडियोवाणी पर 'कल्‍ट-क़व्‍वालियों' का ये अनियमित-सिलसिला जारी रहेगा, अगर पाठकों के पास इस दर्जे की कोई 'कल्‍ट-क़व्‍वाली' है तो मेरे ईमेल पते पर संपर्क करें ।

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