संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Friday, June 22, 2012

तेरा मिलना बहुत अच्‍छा लगे है: मेहदी और लता


मेहदी हसन चले गये और रेडियोवाणी पर लिखने लायक़ तसल्‍ली अब हासिल हुई है।




अफ़सोस की कोई हद और सरहद नहीं होती। एक कलाकार जाता है कुछ यूं कि जैसे एक डाली से कोई सुरीला पंछी उड़ जाये और वो शाख़ कांपती रहे देर तक। उस शाख़ का कांपना अपने अफ़सोस को बयां करना है। मेहदी हसन की वफ़ात की ख़बर मिली....उस दिन मसरूफियत ने गिरफ्तार कर रखा था, पर हाथ जैसे माउस तक नहीं उठ रहे थे। जिस नामचीन प्रोग्राम के संपादन में हमने ख़ुद को झोंक रखा था....वो पूरी तरह बेमानी हो उठा था।

मेहदी के जाने से मन का एक दरीचा फिर खुल गया। हम छप्‍प से पहुंच गये मध्‍यप्रदेश के छोटे से शहर सागर। जहां अस्‍सी का दशक अपना आधे से थोड़ा ज्‍यादा सफ़र तय कर चुका था। हमारे हाइ-स्‍कूल के उचाट दिन थे। पढ़ाई के अलावा बाक़ी सब पढ़ने के दिन। लिखने के बेहद शुरूआती दिन। सुनने की तमीज़ के भी शुरूआती दिन। श्रवण को पता नहीं याद होगा कि नहीं, पर तब वो कैसेट उधार देता था। मन्‍ना डे की गायी 'मधुशाला', मेहदी हसन का “ghazals by mehndi hasan” और ग़ुलाम अली का कोई अलबम। हम इन्‍हें कॉपी कर लेते। और सुरों की एक ऐसी दुनिया में पहुंच जाते...जो हमारे लिए बेहद नई थी। फिलिप्‍स का वो मोनो-प्‍लेयर उन दिनों हमारी सबसे बड़ी दौलत और नियामत था।



फिर तो लंबा एरियल लगाकर हम पाकिस्‍तान के अलग अलग शहरों के रेडियो स्‍टेशन तलाशते। ताकि मेहदी को सुन सकें। इस तरह उनके फिल्‍मी-गीतों से परिचय हुआ। बहुत बाद में पता चला कि वो पाकिस्‍तानी फिल्‍मों की भी एक कामयाब आवाज़ हैं। उनके कितने कितने फिल्‍मी गीत हमारे दिलों की धड़कन बने रहे।

प्‍यार भरे दो शर्मीले नैन’...जिसके बारे में बाद में पता चला कि ये पाकिस्‍तानी फिल्‍म ‘चाहत’ (1974) में शामिल थी। फिल्‍म ‘अज़्मत’ का राग भीमपलासी पर आधारित गीत—‘जिंदगी में तो सभी प्‍यार किया करते हैं, मैं तो मरके भी मेरी जान तुझे चाहूंगा’। पाकिस्‍तानी फिल्‍म ‘एक रात’ का गाना—‘एक बार चले आओ’.... रफ़्ता रफ्ता वो मेरी हस्‍ती का सामां हो गये (फिल्‍म-ज़ीनत) हम चले इस जहां से—(पाकिस्‍तानी फिल्‍म दिल्‍लगी), क्यों पूछते हो क्‍या तुमसे कहूं मैं किसलिए जीता हूं (बहिश्‍त), खामोश हैं नज़ारे एक बार मुस्‍कुरा दो (फिल्‍म बंदगी बंदगी) जैसे गानों ने उन्‍हें सारी दुनिया का चहेता बना दिया। दरअसल ये सारे गीत आज इंटरनेट के ज़माने में तो बड़ी आसानी से उपलब्‍ध हैं। पर उस दौर में शहरों-शहरों भटकते हुए हमें जबलपुर में हासिल हुए। किसी कैसेट में।

ग़ज़लों की बहुत पाक़, बहुत ही पवित्र दुनिया का बहुत ही नायाब सुर थे मेहदी। मेहदी की दुनिया में ये पक्‍का था कि वो सिर्फ़ और सिर्फ उम्‍दा अशआर को ही उठायेंगे। उन्‍होंने चाहे नामचीन शायरों को गाया हो या नये-नवेले....पर हमेशा अपने दर्जे को कायम रखा। मेहदी की गायी ग़ज़लें उर्दू शायरी की कुछ अनमोल ग़ज़लें हैं। कमाल की बात ये है कि अपनी अदायगी को उन्‍होंने एकदम ठोस बनाए रखा। हर ग़ज़ल के हर शेर और उसके हर लफ्ज़ की गूंज को ध्‍यान में रखकर वो धुन बनाते। बाज़-वक्‍त वो अपने कंसर्ट्स में समझाते भी कि इसे ऐसे भी गाया जा सकता है। और ऐसे भी। पर ऐसा इसलिए गाया क्‍योंकि इसका असर ज़्यादा होता है। तभी तो वो अहमद फ़राज़ की ग़ज़ल 'शोला था जब बुझा हूं/हवाएं मुझे ना दो' को पूरे साढ़े चौदह मिनिट गाते हैं। ऐसे मानो.....हौले हौले कोई तिलस्‍म अपना असर कर रहा हो। जैसे एक मीठा बुख़ार तन-मन को अपनी गिरफ्त में ले रहा हो। इन चौदह मिनिटों के बाद हम शायद आने वाले चौदह दिन इस अहसास से बाहर नहीं आ पाते।

कुछ बरस पहले जयपुर के भाई ईश मधु तलवार ने एक बेमिसाल लेख लिखा था उन पर। जो आउटलुक में छपा था। उसमें मेहदी के राजस्‍थान की सरज़मीं से बेइन्तिहा प्‍यार की बात थी। रेडियोवाणी के दूसरे पन्‍ने पर हम उसे बाक़ायदा साभार पेश कर रहे हैं। यहां पढिए।

राजस्‍थान से उनका प्‍यार तो उनकी गाई मांड में झलकता है। 'केसरिया बालमा हो जी पधारो म्‍हारे देस'। लगता है कि मारू की सरज़मीं का अपना बेटा अपनी धरती पर निहाल हुआ जा रहा है। अफ़सोस ही है कि बंटवारे ने उन जैसे कई कलाकारों को सरहद के उस पर ला खड़ा किया। पर आवाज़ें सरहदों की मोहताज नहीं होतीं। इसलिए शायद उस पार से ज्‍यादा उनके चाहने वाले इस पार रहे।

मेहदी का जाना हमारी दुनिया से एक और ख़ालिस अहसास का चले जाना है। मिलावट भरी और लगातार तरल होती चली जा रही इस दुनिया में हम बार बार लौटेंगे मेहदी के पास। ठोकरें लगने पर....अपनी इंसानियत को टटोलने की ज़रूरत महसूस होने पर....किसी अपने के बिछुड़ जाने पर एक सहारा खोजने के लिए.....अपनी शामों को ख़ूबसूरत बनाने के लिए.......कभी-कभी बिना किसी बहाने के बस यूं ही। मैक़दे और मेहबूब वाली झटकेदार ग़ज़लों के बीच मेहदी एक रोशन सितारा बने रहेंगे......अंधेरे के बीच बतलायेंगे कि रास्‍ता इधर है।

लता मंगेशकर ने कहा था कि उनकी आवाज़ में भगवान बसता है। मेहदी और लता ने साथ-साथ नहीं गाया। बरसों बरस कोशिशें हुईं। और आखिरकार मेहदी साहब ने पांच ग़ज़लें कंपोज़ करके भेजीं। जिनमें से लता जी ने संगीतकार मयूरेश पई के साथ मिलकर एक ग़ज़ल चुनी। और 2011 में रिलीज़ अलबम 'सरहदें' में इसे शामिल किया गया। आपको बता दें कि इस अलबम में सोनू निगम, सुरेश वाडकर और हरिहरन कई और कलाकार भी शामिल थे। 'तेरा मिलना' नामक इस ग़ज़ल को फ़रहद शहज़ाद ने लिखा। मेहदी हसन ने अपनी आवाज़ को सन 2009 में पाकिस्‍तान में रिकॉर्ड किया। और लता जी ने सन 2010 में बंबई में अपना हिस्‍सा गाया। दो महान कलाकार एक साथ कभी नहीं गा सके। पर तकनीक को शुक्रिया अदा करें कि हमें इनकी एक साथ गाई ये रचना हासिल हो सकी है। मेहदी की याद में क्‍या सुनाएं। क्‍या छोड़े। आईये यही सुनें।

ghazal: tera milna
shayar: farhat shehzad


singers: mehndi hasan and lata mangeshkar
duration : 5 57





तेरा मिलना बहुत अच्‍छा लगे है 
मुझे तू मेरे दुख जैसा लगे है
चमन सारा कहे है फूल जिसको
मेरी आंख को तेरा चेहरा लगे है

ये तेरा लम्‍स है कि जिंदगी है   (लम्‍स--छूअन)
तुझे छू लूं तो दिल जिंदा लगे है
रगों में तेरी ख्‍वाहिश बह रही है
ज़माने को लहू दिल का लगे है
मुझे तू मेरे दुख जैसा लगे है
तेरा मिलना बहुत अच्‍छा लगे है।


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