संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Monday, September 8, 2008

कैसे उनको पाऊं आली--आशा भोसले का स्‍वर



आज सुर-सखी आशा भोसले की पचहत्‍तरवीं सालगिरह है । इसलिए कुछ ऐसा प्रस्‍तुत करने का मन था, जो आमतौर पर हम आशा जी की आवाज़ में नहीं सुनते ।
आशा जी और जयदेव ने बरसों पहले एक अलबम निकाला था । शायद सन 1971 या 1977 में । इसमें आशा जी ने कमाली, मीरा बाई, जयशंकर प्रसाद और महादेवी की रचनाओं को स्‍वर दिया था । आज के मौक़े के लिए पहले तो मुझे ये अलबम याद आया । फिर याद आया कि आशा भोसले और गुलाम अली के साझा अलबम 'मेराज-ए-ग़ज़ल' से कुछ पेश किया जाए । ख़ैर महादेवी की ये रचना मुझे बहुत प्रिय है ।

Mahadevi verma jaidev asha 2
आईये आशा जी को पचहत्‍तर साल पूरे करने की बधाई देते हुए उनके कांचन-स्‍वर में ये गीत सुना
जाए ।


बस इतना अर्ज़ करना चाहता हूं कि इसमें ठेठ जयदेव शैली का संगीत है । रिदम हो या स्ट्रिंग्‍स, मुरली की शांत तान भी इस गाने में पिरोई गई है । ऐसा संगीत केवल जयदेव ही दे सकते थे । जो जीवन भर अपनी शर्तों पर रहे और अपनी शर्तों पर काम किया ।




कैसे उनको पाऊं आली कैसे उनको पाऊं
वे आंसू बनकर मेरे इस कारण ढुल-ढुल जाते
इन पलकों के बंधन में मैं बांध-बांध पछताऊं
कैसे उनको पाऊं आली ।।
वे तारक बालाओं की अपलक चितवन बन जाते
जिसमें उनकी छाया भी मैं छू न सकूं, अकुलाऊं
कैसे उनको पाऊं आली ।।

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