संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Wednesday, May 1, 2019

खेला फुटबॉल खेला-- मन्‍ना डे के जन्‍मदिन पर विशेष




आज मज़दूर दिवस है और आज ही है हमारे प्रिय गायक मन्‍ना डे का जन्‍मदिन भी। जब तक मन्‍ना डे हयात थे, फोन पर उन्‍हें बधाई देते थे और कृतज्ञता ज्ञापन भी कि आपने हमारी जिंदगी को अपनी आवाज़ से सुनहरा बनाया है।

आज मन्‍ना डे के जन्‍मदिन के मौक़े पर उनके एक अनमोल गाने की याद और उसकी कहानी। 16 अगस्‍त 1980 को कोलकाता के ईडन गार्डन्‍स में भारत के दो सबसे पुराने और पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी क्‍लबों मोहन बागान और ईस्‍ट बंगाल के बीच
‘कोलकाता डर्बी’ नामक मुक़ाबला हो रहा था। मोहन बागान के कप्‍तान थे--कॉम्‍प्‍टन दत्‍ता और ईस्‍ट बंगाल के कप्‍तान थे—सत्‍यजीत मित्रा। इस मैच में हुआ ये कि बार-बार फाउल के बावजूद जब एक टीम के खिलाडियों को रेफरी ने कार्ड नहीं दिखाया, उन्‍हें सज़ा नहीं दी तो स्‍टेडियम में दोनों टीमों के समर्थकों के बीच ज़ोरदार झड़प हो गयी। आमतौर पर दोनों टीमों के समर्थकों को अलग अलग गैलेरीज़ में बैठाया जाता था पर जाने क्‍यों उस दिन मिले-जुले समर्थक बैठे थे। स्‍टेडियम में ज़ोरदार हिंसा हुई। ऐसे में दर्शक अपनी जान बचाने के लिए गेट की तरफ भागे। कुछ लोगों ने ऊँचाई से कूदकर भागने की भी कोशिश की। गेट संकरे थे, पुलिस की व्‍यवस्‍था पर्याप्‍त नहीं थी, इस वजह से कुल 16 लोगों की इस अशांति में मौत हो गयी थी और बड़ी तादाद में लोग घायल भी हुए थे।

नतीजा ये हुआ कि
‘कोलकाता डर्बी’ के आगे के सारे मैच रद्द कर दिए गए और दोनों टीमों पर भारी मात्रा में फाइन भी लगाया गया। कोलकाता के फुटबॉल के दीवानों को इस घटना से भारी झटका लगा। आगे चलकर इसका असर ये हुआ कि फुटबॉल के पारंपरिक बांग्‍ला फैन्‍स ने मैदान में मैच देखना आना कम कर दिया। परिवार के लोगों ने सुरक्षा के मद्देनज़र जमकर विरोध किया। लोगों को जाने ही नहीं दिया जाता था। इससे उबरने में तकरीबन दो दशक लग गये।

भारतीय फुटबॉल फेडरेशन ने मारे गये लोगों की याद में इस दिन को
‘फुटबॉल लवर्स डे’ घोषित कर दिया। इस मौक़े पर मन्‍ना दा ने एक गाना गाया- जिसके बोल थे—‘खेला फुटबॉल खेला’। इस गाने को लिखा था-सत्‍या बंदोपाध्‍याय ने और कंपोज़ किया था सुपर्ण कांति घोष ने। इस गाने के बाद लोगों से पैसे जमा किये गये और इस तरह जमा रकम मृतकों के परिजनों को सौंप दी गयी थी। इस गाने का संदेश था खेल को प्रेम से खेला जाये। मिल जुलकर रहा जाये। खेल के नाम पर हिंसा ना की जाए। फुटबॉल से जुड़ा ये सारी दुनिया में अपनी तरह का अनूठा गीत है।

आपको ये भी बता दें कि मन्‍ना दा और सचिन देव बर्मन फुटबॉल के परम दीवानों में से रहे हैं। अपनी टीम के कट्टर समर्थक। आज मन्‍ना डे के सौवें जन्‍मदिन और उनकी जन्‍मशती की शुरूआत के मौक़े पर ये बहुत ही खा़स गीत आप सबकी नज़र। 


Song: khela Football Khela
Singer: Manna Dey
Lyrics: Satya Bandopadhyay
Music: Suparn kanti Ghosh
Duration: 06:08 






ये रहे इस गाने के अधूरे बोल
(पूरे बोल किसी के पास रोमन में हों तो कृपया भेजें)

khela football khela
khela football khela
khoka dekhte gelo
sei sakal bela
khela football khela…..

chhoto baro teami er khela
shato shato loker mela
khoka dekhte gelo
sei sakal bela
khela football khela…..
oi oi oi jarsi pore
namlo duto dal hajar hajar lok hoye othe chanchal
khokar mukhe ghamer alpona
chokher taray utte jona
khokar mukhe ghamer alpona
chokher taray utte jona
ke jete ke hare ke kata gol kare
ke kata gol kare
ke kata gol kare
referir huisel khela holo shuru
kapchhe buk aj duru duru
chhutchhe je bal e gol theke o gole
mete uthechhe math lokeder bhishon kalorole
uttejonay fatchhe mather buk
alo adhari hochchhe khokar mukh
hathath khelte khelte kheloarder laglo thokathuki
sange sange darshok der hate iter lofalufi
nimeshete khelar mather aj bodle gelo rup
ranokhetro ar kake bale khoka bhaye chup
praner bhaye chhutlo manush
sabai dishshara
sara mathe boye gelo
rakto gangar dhara
sabar sathe chhutlo





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Friday, October 25, 2013

सावन की रिमझिम में थिरक-थिरक नाचे रे... मन्‍ना दा के ग़ैर-फिल्‍मी गीत (पहला भाग)

रेडियोवाणी पर हमने मन्‍ना दा के बारे में कई बार लिखा। उनके कई गीत सुनवाए। हमने ये भी बताया है कि किस तरह स्‍कूल के ज़माने में मित्रों के साथ पुराने फिल्‍म-संगीत का शौक़ लगा और हम मन्‍ना दा के शैदाई होते चले गए। इस बीच जिंदगी की राहें हमें विविध-भारती ले आयीं और फिर मन्‍ना दा से संयोग‍वश मुलाक़ात भी हुई। बहुत थोड़ी देर की। यक़ीन ही नहीं हुआ कि हम मन्‍ना दा के समक्ष हैं। उनके घर पर।

अद्भुत था वो अहसास। फिर एक बार मन्‍ना दा का 'लाइव कंसर्ट' देखा। मुंबई में ही। जहां कविता कृष्‍णमूर्ति उनके साथ गा रही थीं। मन्‍ना दा तकरीबन ढाई घंटे तक लोगों की फ़रमाईशों को पूरा करते रहे थे। बहराहल...मन्‍ना दा अब हमारे बीच नहीं हैं। उनके लिए क़सीदे पढ़े जाने का दौर भी ख़त्‍म होने को है। और लोग अपने काम-धंधों में लग रहे हैं। पर शुभ्रा जी (मशहूर समाचार-वाचिका शुभ्रा शर्मा, जिन्‍हें हम जिज्‍जी कहते हैं) ने फ़ेसबुक पर कितनी बढिया बात लिखी है--


'मैं नहीं मानती कि मन्ना युग का अंत हो गया है, हो ही नहीं सकता। उनके गीतों की धारा ऐसे ही अविरल, अजस्र बहती रहेगी ....
संगीत मन को पंख लगाये, गीतों से रिमझिम रस बरसाये ....
इतना रस बहाने वाली सरिता सूख कैसे सकती है, बस सरस्वती की तरह आँखों से ओझल हो गयी है। लेकिन संगम पर सरस्वती आज भी पूजी जाती है कि नहीं?'



इसे ही हमारे मन की बात भी समझा जाए। हम ये कहेंगे कि मन्‍ना दा ने देह-photo_24_01_2013_22_36_345101fdc20220fत्‍याग किया है। पर वे कहीं नहीं गए। वे तो 'रेडियोवाणी' पर भी हैं। मन्‍ना दा को नमन करते हुए आज से एक श्रृंखला रेडियोवाणी पर शुरू की जा रही है। सोचा यही है कि इस श्रृंखला में उनके गाए ग़ैर-फिल्‍मी गाने सुनवायेंगे। पर अभी से बताये दे रहे हैं कि आगे चलकर मुमकिन है हमारा मन बदल जाए और हम उनके कुछ कम सुने गीत भी यहां प्रस्‍तुत करें। तो शुरूआत करते हैं उस गाने से...जिसे सुनकर हम मदहोश ही हो गये थे। आपको बतायें कि इंटरनेट-विहीन उस ज़माने में गानों के लिए कैसेट खोजने पड़ते थे। और जाने कितनी मेहनत के बाद हमें मिला था वो दो कैसेट अलबम--'मन्‍ना डे: हिज़ ग्रेटेस्‍ट नॉन फिल्‍म हिट्स'। ये तस्‍वीर नेट से हासिल की गयी है पर है उसी अलबम की। उन दिनों ये हमारे संग्रह का अनमोल नगीना होता था। आज भी है। इस अलबम में जो अनमोल गाने थे उनकी फेहरिस्‍त आपको दिखला दी जाए।

1- सावन की रिमझिम में थिरक थिरक नाचे रे मयूरपंखी रे सपने
2- नथली से टूटा मोती रे
3- शाम हो जाम हो सुबू भी हो
4- कुछ ऐसे भी पल होते हैं जब रात के गहरे सन्‍नाटे गहरी नींद में सोते हैं
5- चंद्रमा की चांदनी से भी नरम और उषा के भाल से ज्‍यादा गरम, है नहीं कुछ और केवल प्‍यार है
6. याद फिर आयी आंख भर आयी
7. तुम जाने तुमको ग़ैर से जो रस्‍मो-राह हो
8. ये आवारा रातें.. वग़ैरह

और इस फ़ेहरिस्‍त का पहला ही गीत हमने आज के लिए चुना है।
इस वेबसाइट के मुताबिक़ गाना सन 1974 में रिकॉर्ड किया गया था। गीतकार अंजान और संगीतकार भी एक गीतकार ही हैं। प्रेम धवन।

Song: Sawan ki rimjhim mein thirak thirak nache re 
Singer: Manna dey
Lyrics: Anjaan
Music: Prem Dhavan
Year: 1974
Duration: 4 32




ये रहे इस गाने के बोल:
खुले गगन पे झुक गयी, किसी की सुरमई पलक
किसी की लट बिखर गयी, घिरी घटा जहां तलक
धुली हवा में घुल गयी, किसी की सांस की महक
किसी का प्‍यार आज बूंद-बूंद से गया छलक


सावन की रिमझिम में थिरक-थिरक नाचे रे मयूर पंखी रे सपने
कजरारी पलक झुकी रे, घिर गयी घटायें
चूडियां बजाने लगीं रे, सावनी हवाएं
माथे की बिंदिया, जो घुंघटा से झांके
चमके बिजुरिया, कहीं झिलमिलाके
बूंदों के घुंघरू झनका के रे।
सावन की रिमझिम में।।

छलक गयीं नीलगगन से रसभरी फुहारें
महक उठीं तेरे बदन सी भीगती बहारें
रिमझिम फुहारों के रस में नहाके
सिमटी है फिर मेरी बांहों में आके
सपनों की दुलहन शर्मा के हो।
सावन की रिमझिम में।।

रेडियोवाणी पर मन्‍ना दा के ग़ैर-फिल्‍मी गीतों का सिलसिला जारी रहेगा।


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Friday, October 2, 2009

नथली से टूटा मोती रे : मन्‍ना डे का ग़ैर-फि़ल्‍मी गीत ।।

ये शायद 1986 से 1988 के बीच के किसी साल की बात है । दूरदर्शन के दोपहर के प्रसारण में black and white era के कुछ नायाब गाने दिखाए जाते थे । इसमें कुछ ऐसे गाने हुआ करते थे जो ना हमने कभी देखे थे और ना सुने थे । ऐसे गानों में शामिल थे --मन्‍ना डे का गाया 'चलता चल' ( फिल्‍म 'फैशनेबल वाइफ' इसे जल्‍दी ही हम रेडियोवाणी पर सुनवाएंगे ), मन्‍ना दा का ही गाया 'रहने को घर दो' ( फिल्‍म 'बीवी और मकान' ) वग़ैरह ।
यहां पूरी फेहरिस्‍त दे दें तो अपने मन की बात कब कहें, बताईये आप ।

बहरहाल । ये वो उम्र थी जब हम नौंवी दसवीं या ग्‍यारहवीं जैसे कक्षाओं में विज्ञान की पढ़ाई से जूझते थे और सोचते थे कि इस 'मुई' पढ़ाई का कोई विकल्‍प नहीं हो सकता । जैसे कि हम 'गिटार' सीखें पांच साल और फिर जिंदगी भर गिटार बजाकर इज्‍ज़त से रोज़ी-रोटी कमाएं । हमारे इन ख़यालात को ना सिर्फ़ हमारे दोस्‍त और घर वाले बल्कि हम ख़ुद भी संदेह और हिकारत की नज़र से देखते थे । कंफूजियाने की उम्र थी ये । और हम अपनी जिंदगी में मन्‍ना दा (और तलत महमूद ) को 'discover' कर रहे थे ।
'भए भंजना' सुनते थे तो जब मन्‍ना दा 'दरस तेरे मां.....गे ये तेरा पुजारी' की तान छेड़ते....हमारे दिल में एक ख़ला, एक निर्वात, एक वैक्‍यूम बन जाता था । जब मन्‍ना दा गाते 'अभी तो हाथ में जाम है' (फिल्‍म सीता और गीता) और हम बाद में अपनी ही तरंग में इसे गुनगुनाते तो घर वाले हम से रही सही उम्‍मीद भी छोड़ देते थे । धीरे-धीरे मन्‍ना डे की हम शैदाई उनके 'usual' गानों से थोड़े दूर आ गए । 'कुछ अलग-कुछ नए' की 'चिरंतन-तलाश' ने हमें कहां-कहां नहीं भटकाया । स्‍कूल के ज़माने में ही श्रवण हळवे ने 'मधुशाला' की कैसेट दी तब हमें पता चला कि 'बच्‍चन' की जिस पुस्‍तक के हम यूं ही 'शैदाई' बन चुके थे, उसकी चुनिंदा रूबाईयों को हमारे प्रिय गायक ने गाया भी है । फिर तो पंडित नरेंद्र शर्मा, बच्‍चन जी और जयदेव के इस प्रोजेक्‍ट के तमाम किस्‍से खोद-खोदकर निकाल लिए हमने ।

'मधुशाला' के बाद बारी थी मन्‍ना डे के ग़ैर-फिल्‍मी गीतों की दुनिया में घुसने की । जबलपुर जैसे एकदम सुस्‍त शहर की एक कैसेट-शॉप में जब display में मन्‍नादा के ग़ैर-फिल्‍मी गीतों का 'डबल-कैसेट-अलबम' नज़र आ गया तो अपने 'तंग-जेबख़र्च' के बावजूद उसे ख़रीद लिया । एक नई दुनिया खुली ।
'नाच रे मयूरा', 'सावन की रिमझिम में थिरक-थिरक नाचे मयूरपंखी सपने', 'मेरी भी एक मुमताज थी', 'शाम हो जाम हो सुबू भी हो', 'चंद्रमा की चांदनी से भी नरम', 'नथली से टूटा मोती रे', 'ओ रंगरेजवा', 'हैरां हूं ऐ सनम'.......हमारे रिकॉर्डर पर ये कैसेट्स इतनी बार चलीं कि हमारे संस्‍कारों में समाहित हो गए हैं ये तमाम गीत । मन्‍ना दा हमारे लिए एक गायक नहीं रहे, वो हमारी जीवन का हिस्‍सा बन गए । वो इस भयानक, चालबाज़, नकली और बेहद शातिर संसार में हमारे लिए विश्‍वास की किरण बन गए ।

स्‍टेज-शोज़ में उन्‍हें देखना हमारे लिए एक 'दिव्‍य-अनुभव' बन गया । जब मुंबई के सेंन्‍ट एंडूज़ हॉल में मन्‍ना दा कविता कृष्‍णमूर्ति के साथ 'तू छिपी है कहां मैं तड़पता यहां' गा रहे थे तो यूं लग रहा था कि एक जुनूनी बुजुर्ग उम्र और गले की थकन को मात देने की ईमानदार कोशिश कर रहा है । पुराने ज़माने के किस्‍से उनसे सुनना भी एक 'दिव्‍य' अनुभव होता है । मुझे मुंबई में उनके घर पर उनसे मिलने का भी सौभाग्‍य प्राप्‍त है । अदभुत अनुभव था वो ।

मन्‍ना दा की आवाज़ में रेडियोवाणी पर आज आपको वो गीत सुनवाया जा रहा है जो अपनी रचना और अपनी गायकी दोनों में ही अनमोल है । कल जब मैंने 'फेसबुक' पर ये गीत चढ़ाया तो भाई प्रियंकर इसके गीतकार मधुकर राजस्‍थानी के बारे में कितने उत्‍साहित हुए पढिए ।


अरे वाह ! आपने मन्ना दा के साथ मधुकर राजस्थानी को भी याद कर लिया . मैं तो ’नथनी’ की जगह ’नथली’ देख-सुन कर ही समझ गया था कि किसी राजस्थानी का गीत है . मधुकर राजस्थानी के तो क्या कहने . उनके लिखे ’मैं ग्वालो रखवालो मैया’ तथा ’पांव पड़ूं तोरे श्याम’ आदि भजनों को तो रफ़ी साहब ने अमरता प्रदान कर ही दी है, जैसे मन्ना दा ने विप्रलंभ श्रंगार के इस अद्भुत गीत को . गीत-संगीत की दुनिया में हम आपकी बनाई पगडंडियों से जल्दी पहुंचते हैं .


मन्‍ना दा ने इस गाने को अद्भुत रंग दिया है । हैरत है कि मधुकर राजस्‍थानी के बारे में हमें ज्‍यादा जानकारियां नहीं मिलतीं । जबकि उन्‍होंने अपने समय में शानदार गैर-फिल्‍मी गीत दिये, जिनमें से कुछ का जिक्र तो प्रियंकर जी ने कर ही दिया है । आपमें से कोई उनके बारे में विस्‍तार से बता सके तो मज़ा आ जाए ।

तो आईये सुनते हैं 'नथली से टूटा मोती रे' ।





एक और प्‍लेयर ताकि सनद रहे । 


सजनी, सजनी
नथली से टूटा मोती रे 
कजरारी अँखियां रह गईं रोती रे \-२ 
नथली से टूटा मोती रे 
रूप की अगियाऽऽ आऽऽ रूप की अगिया रूप की अगिया अंग में लागी अंग में लागी कैसे छुपाए, लाज अभागी, लाज अभागी मनवाऽऽ कहताऽऽ भोर कभी ना होती रे कजरारी अँखियाँ रह गईं ... बोली दुल्हनिया पलकें झुकाएऽऽ पलकें झुकाए घूँघटवा में सहमे लजाये
सहमे लजाये बलमाऽऽ पढ़ाएऽऽ प्रीत की पहली पोथी रे कजरारी अँखियाँ रह गईं ... lyrics corutesy:
http://lyricsindia.net/songs/show/9287

मन्‍ना दा को दादा साहेब फालके पुरस्‍कार मिलने की घोषणा हम सब के लिए हर्ष का विषय है । असंख्‍य बधाईयां ।


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Thursday, June 26, 2008

मन्‍ना दा का गाया गीत ऊपर गगन विशाल ।। 58 साल पुराना नग़मा

अहमदाबाद की यात्रा की वजह से रेडियोवाणी पर पिछले कई दिनों से कुछ जारी नहीं किया जा सका । अब गीतों का सिलसिला दोबारा शुरू किया जा mannaरहा है । पिछले कुछ दिनों से मैं मन्‍ना दा के गीत सुन रहा हूं । शायद  रेडियोवाणी पर पहले भी बताया है कि मन्‍ना दा को सुनने का शौक़ बचपन से ही लग गया था । वो पहले गायक थे जिनके गाने हम सभी मित्र ढूंढ ढूंढकर सुनते थे । और इसी खोज में मन्‍ना डे की गायी 'मधुशाला' हासिल हुई और बहुत आगे चलकर मिले मन्‍ना दा के गाये ग़ैर-फिल्‍मी गीत और ग़ज़लें । फिर मन्‍ना दा के गाए बांगला गीत भी मिले और एक पूरा ख़ज़ाना हमारे सामने आ गया ।

आज जो गीत रेडियोवाणी के ज़रिए आप तक पहुंचाया जा रहा है ये मन्‍ना दा का पहला हिट गीत था ।

आप जानते होंगे कि मन्‍ना डे का असली नाम था प्रबोधचंद्र डे । वो अपने ज़माने के प्रख्‍यात गायक के.सी.डे के भतीजे थे । सन 1940 में जब के.सी.डे बंबई आए तो मन्‍ना डे भी उनके साथ चले आये । और संगीतकार एच पी दास के सहायक बन गये । फिल्‍म 'रामराज्‍य' में उन्‍होंने अपना पहला गीत गाया और उसके बाद उन्‍हें लंबा स्‍ट्रगल करना पड़ा । उन्‍होंने वापस लौटने पर भी विचार किया । लेकिन इसी बीच उन्‍हें 'मशाल' फिल्‍म का ये गीत मिला ।

इस गाने से जुड़ी एक कथा सचिन देव बर्मन के बारे में भी है । सचिन देव बर्मन ने 'शिकारी' और 'आठ दिन' जैसी फिल्‍मों से अपनी संगीत यात्रा शुरू hfs6 की थी । ये सन 1946 की बात है । इसके बाद उन्‍होंने 'दो भाई' फिल्‍म का बेहतरीन गीत ' मेरा सुंदर सपना बीत गया' भी दिया । जो गीता रॉय का पहला फिल्‍मी गाना था । लेकिन सचिन दा को कामयाबी नहीं मिल रही थी । निराश होकर सचिन देव बर्मन ने कोलकाता वापस लौटने का मन बना लिया था । उन दिनों सचिन देव बर्मन फिल्मिस्‍तान की फिल्‍म 'मशाल' में संगीत दे रहे थे । फिल्मिस्‍तान के पार्टनर अशोक कुमार सचिन देव बर्मन के क़द्रदान थे । उन्‍होंने सचिन दा को समझाया कि इस फिल्‍म का काम पूरा करके ही आगे के बारे में सोचें । सन 1950 की बात है ये । ख़ैर इस फिल्‍म के गाने 'ऊपर गगन विशाल' ने ना सिर्फ मन्‍ना डे की कि़स्‍मत बदल दी बल्कि सचिन देव बर्मन को भी मुंबई में स्‍थापित कर दिया ।

ये गीत कवि प्रदीप ने लिखा है । यू ट्यूब पर छानबीन करने से मुझे इसका वीडियो भी मिल गया है । तो चलिए सुनें 'ऊपर गगन विशाल' ।

ये गाना जैसे जैसे आगे बढ़ता है, इसके सुर ऊपर होते जाते हैं । ख़ासतौर पर इसका कोरस बड़ा ही विकल और उत्‍साहित करने वाला है ।


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ऊपर गगन विशाल नीचे गहरा पाताल
बीच में धरती वाह मेरे मालिक तू ने किया कमाल
को: अरे वाह मेरे मालिक क्या तेरी लीला
तू ने किया कमाल
म: ऊपर गगन विशाल
म: एक फूँक से रच दिया तू ने
सूरज अगन का गोला
एक फूँक से रचा चन्द्रमा
लाखों सितारों का टोला
तू ने रच दिया पवन झखोला
ये पानी और ये शोला
ये बादल का उड़न खटोला
जिसे देख हमारा मन डोला
सोच सोच हम करें अचम्भा
नज़र न आता एक भी खम्बा
फिर भी ये आकाश खड़ा है
हुए करोड़ो साल मालिक
तू ने किया कमाल
ऊपर गगन विशाल
को: आ हा आ हा आ आ आ
म: तू ने रचा एक अद्भुत्‌ प्राणी
जिसका नाम इनसान - २
इसकी नन्ही प्राण है लेकिन
भरा हुआ तूफ़ान
इस जग में इनसान के दिल को
कौन सका पहचान
इस में ही शैतान बसा है
इस में ही भगवान
बड़ा ग़ज़ब का है ये खिलौना - २
इसका नहीं मिसाल
मालिक तू ने किया कमाल ...
ऊपर गगन विशाल
को: आ आ आ आ आ आ।।

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