संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Saturday, September 22, 2007

बाग़ों में बहार आई और मैं ढूंढ रहा था सपनों में--आनंद बख्‍शी के 'गाये' दो गीत




लंबे अरसे से मैं आनंद बख्‍शी के गीत रेडियोवाणी पर प्रस्‍तुत करना चाहता था ।
लेकिन मुमकिन नहीं हो पा रहा था । पर दो एक दिन पहले कुछ 'ऐसा' पढ़ लिया कि लगा अब बख्‍शी साहब की बातें रेडियोवाणी पर करनी ही होंगी ।

आनंद बख्‍शी मुंबईया फिल्‍म-जगत में आने से पहले फौज में थे । दो बार उन्‍होंने गीतकारी के लिए जद्दोजेहद की और हारकर वापस लौट गये । लेकिन तीसरी बार आखि़रकार बख्‍शी साहब को मौक़ा मिल ही गया और मुंबईया फिल्‍म-जगत को एक बाक़यादा गीतकार मिला ।

बाक़ायदा गीतकार से मेरा आशय है फुलटाईम गीतकार से ।
मुंबईया फिल्‍म-जगत में ज्‍यादातर शायर और कवियों से गाने लिखवाये जाते रहे हैं ।
मजरूह सुल्‍तानपुरी से लेकर साहिर लुधियानवी और नीरज से लेकर इंदीवर तक ज्‍यादातर गीतकार पहले शायर या कवि थे और बाद में बने गीतकार । लेकिन आनंद बख्शी गीतकारी की दुनिया में फुलफ्लेज आये थे । लिखने का शौक़ था, उससे भी ज्‍यादा था गाने का शौक़ । आनंद बख्‍शी ने ज्‍यादातर गानों की धुनें तक संगीतकारों ने दीं और संगीतकारों ने उन धुनों को स्‍वीकार भी किया ।

आनंद बख्‍शी का सबसे बड़ा योगदान ये रहा है कि उन्‍होंने जनता की भाषा को कविता की शक्‍ल दी । बख्‍शी साहब पर केंद्रित इस अनियमित-श्रृंखला में हम उनके कुछ गानों का विश्‍लेषण करते हुए पता लगायेंगे कि वो क्‍या चीज़ थी जो बख्‍शी को दूसरे गीतकारों से अलग और ख़ास बनाती थी । बख्‍शी ने गीतकारी की दुनिया को क्‍या दिया । उनका गीतकारी में क्‍या योगदान है ।

मुझे लगता है कि बख्‍शी ने युगल-गीतों का बेहतरीन ग्रामर दिया है फिल्‍म-उद्योग को । उनके ज्‍यादातर युगल-गीतों में कमाल का संयोजन है । सवाल-जवाब वाली लोक-परंपरा को उन्‍होंने फिल्‍मों की गीतकारी में शामिल किया । 'अच्‍छा तो हम चलते हैं, 'सावन का महीना,पवन करे शोर,'कोरा काग़ज़ था ये मन मेरा','बाग़ों में बहार है, कल सोमवार है' जैसे अनगिनत युगल-गीत हैं उनके । जो एक नज़र में तो सादा लगते हैं, लेकिन इनका शिल्‍प कमाल का है । बहरहाल इन मुद्दों पर हम फिर कभी चर्चा करेंगे ।

गीतकार आनंद बख्‍शी के गीतों पर केंद्रित इस अनियमित श्रृंखला की पहली कड़ी में आपको उनके लिखे और उन्‍हीं के गाये दो अनमोल गीत सुनवाये जा रहे हैं । फिल्‍म है -मोम की गुडि़या । 1972 में आई इस फिल्‍म निर्माता निर्देशक थे मोहन कुमार ।
इस फिल्‍म की नायिका तनूजा थीं और नायक कोई रतन चोपड़ा थे । फिल्‍म की गुमनामी से समझा जा सकता है कि इसका हश्र क्‍या हुआ होगा । लेकिन इसके गीत काफी चले । इस फिल्‍म में लक्ष्‍मी-प्‍यारे ने संगीत दिया था ।

बख्‍शी साहब ने 'मोम की गुडि़या' में दो गीत गाए थे । एक था-बाग़ों में बहार आई । और दूसरा-मैं ढूंढ रहा था सपनों में ।
मुझे दूसरा गीत ज्‍यादा पसंद है । इसलिए पहले हम इसकी चर्चा करेंगे ।

'मैं ढूंढ रहा था सपनों में'काफी नाटकीय ढंग से बहुत ऊंचे सुर वाले ग्रुप वाय‍लिन से शुरू होता है । वायलिन की ये वैसी तान है जैसी मुगलिया सल्‍तनत की कहानियां दिखाने वाली फिल्‍मों में होती थी । लेकिन इसके बाद संगीत मद्धम होता है । फिर रबाब की तान आती है और फिर बख्‍शी साहब की आवाज़ । इस आवाज़ में मुझे एक अलग सी खनक सुनाई देती है ।

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मैं ढूंढ रहा था सपनों में
तुमको अनजाने अपनों में
रस्‍ते में मुझे फूल मिला तो
मैंने कहा मैंने कहा
ऐ फूल तू कितना सुंदर है
लेकिन तू राख है मौज नहीं
जा मुझको तेरी खोज नहीं ।। मैं ढूंढ रहा था ।।

इस गाने के इंटरल्‍यूड में रबाब का शानदार उपयोग है । वैसे तो कल्‍याण जी आनंद जी ने रबाब का उपयोग अपने संगीत में कई बार किया है । पर इस गाने में लक्ष्‍मी प्‍यारे ने रबाब से बेहतरीन इंटरल्‍यूड सजाया है । साथ में गिटार का बेहद सुंदर इस्‍तेमाल । लक्ष्‍मी-प्‍यारे के ऑरकेस्‍ट्रा में झांककर देखो तो अकसर चौंकाने वाले प्रयोग मिलते हैं । इस सपनीले और फंतासी गाने में रबाब ने जो समां बांधा है वो शायद किसी और प्रयोग से नहीं बंध सकता था । ऊपर से आनंद बख्‍शी की अनयूजुअल आवाज़ । दिल अश अश करने लगता है ।


मैं दीवाना अनजाने में
जा पहुंचा फिर मैखाने में
रस्‍ते में मुझे एक जाम मिला
तो मैंने कहा मैंने कहा
ऐ जाम तू कितना दिलकश है
लेकिन तू हार है जीत नहीं
जा तेरी मेरी प्रीत नहीं ।। मैं ढूंढ रहा था ।।


इसके बाद जो अंतरे आते हैं, वो हम जैसे आनंद बख्‍शी के दीवानों को मोहित करने के लिए काफी है । इस कविता में कोई चमत्‍कार नहीं है । इस गीत में कोई कलाबाज़ी नहीं है । कोई बौद्धिकता नहीं है ।
कोई नारेबाज़ी नहीं है । लेकिन इसमें सच्‍चाई है । सादगी है । एक दर्शन है ।

मैं बढ़कर अपनी हस्‍ती से
गुज़रा तारों की बस्‍ती से
रस्‍ते में मुझे फिर चांद मिला
तो मैंने कहा मैंने कहा
ऐ चांद तू कितना रोशन है
पर दिलबर तेरा नाम नहीं
जा तेरे बस का काम नहीं
दीपक की तरह जलते जलते
जीवन पथ पर चलते चलते
रस्‍ते में मुझे संसार मिला
तो मैंने कहा मैंने कहा
संसार तू कितना अच्‍छा है
लेकिन ज़ंजीर है डोर नहीं
जा तू मेरा चितचोर नहीं ।। मैं ढूंढ रहा था ।।

कुछ और चला मैं बंजारा
तो देखा मंदिर का
मंदिर में मुझे भगवान मिला
तो मैंने कहा मैंने कहा
भगवान तेरा घर सब कुछ है
लेकिन साजन का द्वार नहीं
पूजा पूजा है प्‍यार नहीं
जी था बेचैन अकेले में
पहुंचा सावन के मेले में
मेले में तुम्‍हें जब देख लिया
तो मैंने कहा मैंने कहा
तुम्‍हीं तो हो तुम्‍हीं तो हो
चितचोर मेरे मनमीत मेरे
तुम बिन प्‍यासे थे गीत मेरे ।। मैं ढूंढ रहा था ।।

यहां आकर गीत अपने अंजाम तक पहुंचता है और बख्‍शी साहब अपनी प्‍यारी हमिंग करते हैं । और दिल पर एक खलिश सी तारी हो जाती है । मैंने पहले भी कहा कि इस गाने में कितनी सादगी से बख्‍शी साहब ने प्रेम का दर्शन उतार दिया है । ज़रा इन पंक्तियों पर ग़ौर कीजिए--

रस्‍ते में मुझे संसार मिला
तो मैंने कहा मैंने कहा
संसार तू कितना अच्‍छा है
लेकिन ज़ंजीर है डोर नहीं
जा तू मेरा चितचोर नहीं ।।

मंदिर में मुझे भगवान मिला
तो मैंने कहा मैंने कहा
भगवान तेरा घर सब कुछ है
लेकिन साजन का द्वार नहीं
पूजा पूजा है प्‍यार नहीं

मेले में तुम्‍हें जब देख लिया
तो मैंने कहा मैंने कहा
तुम्‍हीं तो हो तुम्‍हीं तो हो
चितचोर मेरे मनमीत मेरे
तुम बिन प्‍यासे थे गीत मेरे ।।

ये तीनों जुमले या कह लीजिये कि अंतरे के तीनो टुकड़े कमाल के हैं । जिस बात को कबीर ने कहा, मीरा ने कहा, सूफियों ने कहा--कि प्रेम दुनिया की हर चीज़ से बढ़कर है, भगवान से बढ़कर है उसे आनंद बख्‍शी ने भी कहा । लेकिन एक फिल्‍मी गीत में गुंजाईश निकालकर कहा । और इसीलिए वो दूसरों से अलग खड़े नज़र आते हैं ।

दूसरा गीत है 'बाग़ों में बहार आई' । इस गाने को मैं बहुत ही संक्रामक गीत मानता हूं । इंफैक्‍शस सॉन्‍ग । इसे सुनकर बिना गुनगुनाए आप रह ही नहीं सकते । गाने की शुरूआत लताजी और आनंद बख्‍शी के आलाप से होती है । साथ में है बांसुरी और रिदम का कुशल संयोजन । जो इस गाने की पहचान बन गया है । इस गाने में लंबी लंबी पंक्तियां हैं और लक्ष्‍मी-प्‍यारे ने बड़ी अदा के साथ इनकी धुन तैयार की है ।

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बाग़ों में बहार आई, होठों पे पुकार आई
आजा आजा आजा मेरी रानी
रूत बेक़रार आई,डोली में सवार आई
आजा आजा आजा मेरे राजा ।।

फूलों की गली में आईं भंवरों की टोलियां
दिये से पतंगा खेले आंखमिचौलियां
बोले ऐसे बोलियां के प्‍यार जागा जग सो गया ।।
रूत बेक़रार आई डोली में सवार आई
आजा आजा आजा मेरे राजा ।।

सपना तो सपनों की बात है प्‍यार में
नींद नहीं आती सैंयां तेरे इंतज़ार में
होके बेक़रार तुझे ढूंढूं मैं तू कहां खो गया ।।
बाग़ों में बहार आई, होठों पे पुकार आई
आजा आजा आजा मेरी रानी ।।

लंबी लंबी बातें छेड़ें, छोटी सी रात में
सारी बातें कैसे होंगी, इक मुलाकात में
एक ही बात में लो देख लो सबेरा हो गया ।।
बाग़ों में बहार आई, होठों पे पुकार आई
आजा आजा आजा मेरी रानी ।।


आनंद बख्‍शी की आवाज़ नेज़ल है, वो कुछ कुछ नाक से गाते हैं । लेकिन कुछ नया और आकर्षक तो है ही उनकी आवाज़
में । मैं आपको ये भी बताना चाहूंगा कि फिल्‍म-संसार को आनंद बख्‍शी के गाये ज्‍यादा गीत क्‍यों नहीं मिले । मोम की गुडि़या और चरस जैसी फिल्मों में आनंद बख्‍शी के गाने गाने के बाद पता नहीं कैसे फिल्‍म संसार में ये बात फैल गयी कि बख्‍शी साहब जिस फिल्‍म में गीत गाएं वो फ्लॉप हो जाती है । यही वजह थी कि आगे चलकर रमेश सिप्‍पी ने शोले में जो क़व्‍वाली किशोर कुमार, मन्‍नाडे और भूपेन्‍द्र की आवाज़ में रिकॉर्ड की थी उसे फिल्‍म से निकाल दिया गया । ये क़व्‍वाली फिल्‍म के रिकॉर्ड पर तो है लेकिन परदे पर कभी नहीं आ सकी । फिल्‍मी दुनिया में कैसे कैसे अंधविश्‍वास प्रचलित हो जाते हैं । अगर ये बात ना फैली होती तो हमें बख्‍शी साहब के गाये कई और गीत मिल सकते थे । पर अब बख्‍शी साहब नहीं हैं, और हमें इन्‍हीं गानों से तसल्‍ली करनी होगी ।

आनंद बख्‍शी के अनमोल गीतों पर केंद्रित ये अनियमित श्रृंखला जारी रहेगी ।
रेडियोवाणी पर बाईं ओर फरमाईशों और संदेसों का नया विजेट लगाया गया है । इसे आज़माकर देखिएगा ।

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Saturday, July 28, 2007

राजा मेहदी अली खां की याद में आईये आज सुनें उनके गाने


मुझे राजा मेहदी अली ख़ां के गाने बहुत पसंद हैं । ख़ासकर मदन मोहन के साथ उनकी जोड़ी ने जो काम किया है वो कालजयी है । कहते हैं कि मेहदी साहब नवाबों के ख़ानदान के थे । उनके निजी जीवन के बारे में ना तो कुछ ज्‍यादा लिखा गया है और ना ही मुझे पता चल पाया । अफ़सोस कि हमारे यहां इतने नामचीन गीतकारों की गुमनामी को दूर करने का कभी किसी ने सोचा ही नहीं । मुझे बहुत खोजने पर भी ना तो राजा मेहदी अली खां की जीवनी मिली और ना ही उनका कोई चित्र मिला ।


धुंधली सी याद उस पुस्‍तक की जरूर आ रही है जिसे शायद प्रकाश पंडित ने कंपाईल किया था और
जिसमें राजा मेहदी अली ख़ां की उर्दू शायरी से परिचय कराया गया था । मुझे ये भी पता है कि उर्दू में मेहदी साहब एक मज़ाहिया शायर के रूप में ज्‍यादा जाने जाते थे लेकिन फिल्‍म संसार में उन्‍होंने बहुत गंभीर काम किया है । उनके गानों में विविधता है । नाज़ुकी है और सरलता है । ये तीनों चीज़ें फिल्‍मी दुनिया में कामयाबी की बुनियाद होती हैं । फिलहाल ये गीत सुनिए-फिल्‍म है वो कौन थी । संगीत मदनमोहन का है और आवाज़ लता मंगेशकर की ।

मुझे ये क्रांतिकारी गीत लगता है । देखिए कितने अलग तरीक़े से मेहबूबा बेवफ़ाई पर शोले उगल रही है ।



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जो हमने दास्‍तां अपनी सुनाई आप क्‍यूं रोए
तबाही तो हमारे दिल पे आई आप क्‍यूं रोए
हमारा दर्दे ग़म है ये, इसे क्‍यों आप सहते हैं
ये क्‍यों आंसू हमारे आपकी आंखों से बहते हैं
ग़मों की आग हमने खुद लगाई आप क्‍यूं रोए
बहुत रोए मगर अब आपकी ख़ातिर ना रोएंगे
ना अपना चैन खोकर आपका हम चैन खोऐंगे
क़यामत आपके अश्‍कों ने ढायी आप क्‍यूं रोए
ना ये आंसू रूके तो देखिए हम भी रो देंगे
हम अपने आंसूओं में चांद तारों को डुबो देंगे
फ़ना हो जाएगी सारी ख़ुदाई आप क्‍यूं रोए ।।


राजा मेहदी अली ख़ां की पुण्‍‍यतिथि है आज । हम उनको नमन करते हैं ।
उनके गानों पर एक लंबी चर्चा की इच्‍छा है, देखिए कब मोहलत मिलती है इस लंबे काम के लिए ।

आज धीनगाना प्‍लेयर पर मैंने राजा मेहदी अली खां के गीत चढ़ाए हैं । अगर आप इन्‍हें लगातार सुनें तो आपका ये दिन यादगार बन जायेगा, संवर जायेगा, निखर जाएगा ।
धीनगाना प्‍लेयर मेरे चिट्ठे पर बाईं ओर ऊपर है ।

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Wednesday, June 6, 2007

कभी कभी मेरे दिल में ख्‍याल आता है—ख़ुद साहिर लुधियानवी की आवाज़ में एक दुर्लभ ऑडियो

साहिर मेरे प्रिय शायर हैं । और उनके गीतों और शायरी के बारे में विस्‍तार से रेडियोवाणी पर बातें करने की मेरी इच्‍छा भी है । साहिर लुधियानवी ने एक बीहड़ जिंदगी जी थी । उन्‍होंने जिसे चाहा और शिद्दत से चाहा, वो उन्‍हें कभी नहीं मिला । साहिर जीवन भर अविवाहित रहे । मैंने सुना है कि अपनी मां के इंतक़ाल के बाद जल्‍दी ही साहिर ने भी दुनिया को अलविदा कह दिया ।


मजरूह सुलतानपुरी के अलावा साहिर हिंदी सिनेमा के ऐसे अकेले गीतकार थे जिन्‍होंने अपनी शर्तों पर काम किया । सुना है कि उस ज़माने में भी वो गीतकारी की फ़ीस के रूप में संगीतकार से एक रूपया ज्‍यादा लिया करते थे ।

जिसके साथ काम करने की मरज़ी होती, उसी के साथ करते । पर हर किसी के लिए गीत नहीं लिखते । नौजवानों से उन्‍हें बहुत प्‍यार था । वो मुशायरों में भी जाया करते थे, और तूफानी शायर माने जाते थे । कुछ दिन पहले बैंगलोर के हमारे मित्र शिरीष कोयल ने फ़ोन पर ही साहिर की आवाज़ की रिकॉर्डिंग सुनवाकर दिल में तूफ़ान मचा दिया था ।

सच तो ये है कि साहिर साहब की आवाज़ विविध भारती के पास तक नहीं है । फिर आज के दौर में अपने प्रिय गीतकार की आवाज़ कहां सुनने को मिल सकती है । पर मैं हमेशा से कहता रहा हूं कि ये टेक्‍नॉलॉजी का लोकतंत्र है । और इसी लोकतंत्र ने साहिर की आवाज़ को हम तक पहुंचा दिया है । ये रही । आप समझ सकते हैं कि इसे पेश करते हुए मैं कितना ख़ुश हूं ।

इस वीडियो के नीचे यही इस नज्म की इबारत दी गयी है और साथ में हैं यहां आये कुछ कठिन उर्दू अल्‍फ़ाज़ के मायने ।







कभी कभी मेरे दिल में ख्‍याल आता है

कि जिंदगी तेरी जुल्‍फ़ों की नर्म छांव में गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी

ये तीरगी जो मेरे ज़ीस्‍त का मुक़द्दर है, तेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी

अजब ना था कि मैं बेगाना-ए-अलम होकर, तेरे जमाल की रानाईयों में खो रहता

तेरा गुदाज़ बदन, तेरी नीमबाज़ आंखें, इन्‍हीं हसीन फ़ज़ाओं में मैं हो रहता ।

पुकारतीं मुझे जब तल्खियां ज़माने की, तेरे लबों से हलावत के घूंट पी लेता

हयात चीख़ती फिरती बरहना-सर और मैँ, घनेरी ज़ुल्‍फ़ों के साये में छुप के जी लेता

मगर ये हो ना सका, मगर ये हो ना सका और अब ये आलम है

कि तू नहीं, तेरा ग़म, तेरी जुस्‍तजू भी नहीं

गुज़र रही है कुछ इस तरह जिंदगी जैसे, इसे किसी सहारे की आरज़ू भी नहीं ।

ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूं गले

गुज़र रहा हूं कुछ अनजानी रहगुज़रों से

मुहीब साये मेरी सिम्‍त बढ़ते आते हैं

हयात-ओ-मौत के पुरहौल ख़ार-ज़ारों से


ना कोई जादा ना मंजिल ना रोशनी का सुराग़

भटक रही है ख़लाओं में जिंदगी मेरी

इन्‍हीं ख़लाओं में रह जाऊंगा कभी खो कर

मैं जानता हूं मेरी हमनफ़स मगर यूं ही

कभी कभी मेरे दिल में ख्‍याल आता है ।।


इस नज्म में आये कुछ कठिन उर्दू शब्‍दों के मायने


शादाब—ताज़ा,खुशनुमा

तीरगी—अंधेरा

ज़ीस्‍त—जिंदगी

बेगाना-ए-इल्‍म—ज्ञान से बेख़बर

जमाल—खूबसूरती

रानाईयों—चमक दमक

गुदाज़—नर्म, तंदुरूस्‍त

नीमबाज़—अधसोई

तल्खियां—कड़वापन, तीखापन

हलावत—स्‍वादिष्‍ट, अच्‍छा

हयात—जिंदगी

बरहना—खुला हुआ, नंगा

घनेरी—घनी

जुस्‍तजू—उम्‍मीद, तलाश

मुहीब—डरावना

सिम्‍त—तरफ, दिशा में

पुर हौल—डरावना

ख़ार—कांटे

ज़ारों—अफ़सोस,
शोक

ख़ला—ख़ालीपन, निर्वात

हमनफ़स—हमसफर, दोस्‍त

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Thursday, May 24, 2007

हम तो आवाज़ हैं दीवारों से छन जाते हैं: मजरूह सुल्‍तानपुरी की बरसी पर विशेष


आज से सात साल पहले मजरूह सुलतानपुरी ने आज ही के दिन इस दुनिया को अलविदा कह दिया था और मेरी उनसे मिलने की सालों पुरानी तमन्‍ना सिर्फ एक सपना ही बनके रह गयी । मुझे याद है कि आठवीं नौंवीं में पढ़ने वाले दिन थे । और म0प्र0 के सागर शहर में थी पिताजी की पोस्टिंग । रेडियो सुनने का चस्‍का तो पहले से ही था, पर यहां मित्रों की संगति में मन्‍ना डे, तलत महमूद, रफी साहब और लता जी को सुनने की होड़ सी लग गई । नये नये गाने हम खोजने लगे । इसी दौरान मजरूह साहब की शायरी की एक पुस्‍तक स्‍कूल की लाईब्रेरी में हाथ लगी । उसे पढ़ा तो अपन मजरूह के फैन हो गये । यहां से मेरा मजरूह के गानों को ध्‍यान से सुनने का सिलसिला शुरू हुआ । और फिर तो उनसे जुड़ी बातें लगातार सामने आती चली गयीं ।

मजरूह मेरे प्रिय शायर हैं, प्रिय और आदर्श गीतकार हैं । क्‍यों हैं यही मैं आज आपको बताऊंगा ।

मजरूह का जो पहला और सबसे मशहूर शेर मैंने पढ़ा था, वो ये है, कई लोग इस शेर को ‘कोट’ करते हैं, पर शायर का नाम तक नहीं जानते ।

मैं अकेला ही चला था जानिबे मंज़ि‍ल मगर
लोग साथ आते गये कारवां बनता गया ।।

ये कविगुरू रवींद्रनाथ टैगोर के ‘एकला चलो रे’ का सार एक शेर में समा लेने जैसे वाली बात है, हालांकि इस शेर में कारवां बनने की बात कही गयी है, पर अकेले चलने की बात भी है ।

अब मजरूह का एक बुलंद शेर और सुन लीजिये । पहले इसकी संक्षिप्‍त पृष्‍ठभूमि ।
आज़ादी की लड़ाई के दौरान मजरूह ने कुछ ऐसा लिख दिया कि जेल में डाल दिये गये, जवानी का जोश और शायरी का जुनून था । उन्‍होंने वहां ये शेर लिखा, जिसे आपका ये दोस्‍त बेहद बेहद प्‍यार करता है----

रोक सकता हमें ज़िन्‍दाने बला क्‍या मजरूह
हम तो आवाज़ हैं दीवारों से छन जाते हैं ।।


‍ज़िन्‍दान का मतलब होता है जेलर या जेल ।

मजरूह ने अपनी फिल्‍म यात्रा 1946 में आई फिल्‍म शाहजहां से शुरू की थी, इस फिल्‍म में नौशाद का संगीत था और सारे गाने सहगल ने गाये थे, वही इस फिल्‍म के नायक थे, आज भी खालिस उर्दू वाले वो नग्‍मे फिल्‍म संगीत के क़द्रदानों की जान हैं ।

जैसे ग़म दिये मुस्‍तकिल इतना नाजुक है दिल ये ना जाना
यहां सुनिए

या फिर

जब दिल ही टूट गया हम जीके क्‍या करेंगे ।
यहां सुनिए

इसमें से ‘जब दिल ही टूट गया’ की शायरी तो कमाल है । उलफत का दिया हमने इस दिल में जलाया था, उम्‍मीद के फूलों से इस घर को सजाया था, एक भेदी लूट गया, हम जीके क्‍या करेंगे ।

मजरूह का एक शेर और याद आ गया, ये शेर भी उन्‍होंने जेल में रहते हुए ही लिखा
था ।

देख ज़िन्‍दां के परे जोशे जुनूं, जोशे बहार
रक्‍स करना है तो फिर पांव की ज़ंजीर ना देख ।।

एक और शेर

जला के मशाल-ऐ-जाना, हम जुनूने सिफत चले
जो घर को आग लगाए हमारे साथ चले । ।

एक और शेर

शबे इंतज़ार की कश्‍मकश ना पूछ कैसे सहर हुई
कभी एक चराग़ चला लिया, कभी एक चराग़ बुझा दिया ।।

आईये अब मजरूह के फिल्‍मी गीतों की तरफ चलें । मुझे मजरूह और साहिर के बीच हुई एक बहस याद आ रही है । मजरूह ने एक बार साहिर के गीतों पर टिप्‍पणी करते हुए कहा था कि साहिर तो एक माली से भी उर्दू गजल कहलवा लेते हैं । अरे भैया फिल्‍म में कोई मेकेनिक के किरदार में है तो गाना उसी की ज़बान में होना चाहिये । ये कहां की बात हुई कि मेकिनिक मियां ग़ज़ल कहने लगें ।

ये बात बिल्‍कुल सही थी । साहिर साहब के हम सब शैदाई हैं पर ये उनके फिल्‍मी गीतों की कमज़ोरी रही है । मजरूह ने हमेशा किरदार के मुताबिक़ गीत लिखे । मिसाल के लिए फिल्‍म ‘चलती का नाम गाड़ी’ का गीत
‘पांच रूपैया बारह आना’
यहां सुनिए


इसी फिल्‍म के लिए उन्‍होंने लिखा—हम थे वो थी और समां रंगीन समझ गये ना ।
जाना था जापान पहुंच गये चीन समझ गये ना । याने याने याने प्‍यार हो गया ।
ये सारे गाने साबित करते हैं कि मजरूह किरदार के भीतर जाकर उसके मुताबिक़ गाने लिखते थे ।

उनकी शायरी की ऊंचाई से तो हम सब वाकिफ हैं ही । उसकी मिसाल देने के लिये आपको केवल दो गाने सुनवाऊंगा ।

एक तो सन 1970 में आई फिल्‍म दस्‍तक का
ये गीत । संगीत मदन मोहन का ।

हम हैं मताए कूचओ बाज़ार की तरह

उठती है हर निगाह खरीददार की‍ तरह

वो तो कहीं हैं और मगर दिल के आसपास

फिरती है कोई शय निगाहे यार की तरह ।।

मजरूह लिख रहे हैं वो अहले वफा का नाम

हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह

इस कूए तिश्‍नगी में बहुत है एक जाम

हाथ आ गया है दौलते बेदार की तरह

सीधी है राहे शौक़ पर यूं ही कभी कभी

ख़म हो गयी है गेसुए दिलदार की तरह ।।



इस रचना के आखिरी दो शेर गाने में इस्‍तेमाल नहीं किये गये हैं । अब दूसरे गाने की
बारी । फिल्‍म का नाम है ‘दिल की राहें’ ।

>
यहां सुनिए ।


रस्‍मे उल्‍फत को निभाएं तो निभाएं कैसे,


हर तरफ आग है दामन को बचाएं कैसे ।।

दिल की राहों में उठाते हैं जो दुनिया वाले

कोई कह दे के वो दीवार गिराएं कैसे ।।

दर्द में डूबे हुए नग्‍मे हज़ारों हैं मगर

साज़े दिल टूट गया हो तो सुनाएं कैसे ।।

बोझ होता जो गमों का तो उठा ही लेते

जिंदगी बोझ बनी हो तो उठायें कैसे ।।


इन नग्‍मों में दुनिया की जुल्‍मतों से छलनी हुआ दिल अपनी बात कह रहा है । मेरे एक मित्र कहते हैं कि ये दोनों नारीवादी गीत हैं । पुरूष का दिल टूटने के नग्‍मे फिल्‍मों में बहुत हैं और काफी खूबसूरत हैं । पर ये उन गिने चुने नग्‍मों में से हैं जिनमें बहुत शायराना तबियत है और जो एक नारी की वेदना को बहुत शिद्दत के साथ उभारते हैं । दोनों गाने मदन मोहन ने स्‍वरबद्ध किये हैं और लता जी ने गाये हैं ।

आज मजरूह की बरसी है, इसलिये मजरूह सुल्‍तानपुरी पर केंद्रित श्रृंखला मैंने आज से शुरू की है । इस श्रृंखला में हम समय समय पर मजरूह के गीतों का विश्‍लेषण करेंगे ।
फिल्‍हाल आप बताईये आपको मजरूह का कौन सा गाना बहुत पसंद है ।

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Tuesday, April 17, 2007

कल रात जिंदगी से मुलाक़ात हो गयी---शकील बदायूंनी पर केंद्रित श्रृंखला का पहला भाग







‘ तेरे बगैर अजब दिल का आलम है
चराग़ सैकड़ों जलते हैं रोशनी कम है
कफस से आये चमन में तो यही देखा
बहार कहते हैं जिसे खिजां का आलम है ’

एक कहानी जिसका आग़ाज़ तीन अगस्‍त 1916 को हुआ था, बीस अप्रैल 1970 को पहुंची अपने अंजाम पर । उस दास्‍तान का नाम था शकील बदायूंनी । तो आईये आज शकील बदायूंनी की इस दास्‍तान को जानें-सुनें ।
किसी ने क्‍या खूब कहा है कि शायर की दास्‍तान उसकी पैदाईश से शुरू तो ज़रूर होती है लेकिन उसकी मौत पर जाकर खत्‍म नहीं होती । उसके अशआर वक्‍त और ज़माने की हदों के पार जाकर उसकी याद को जिंदा रखते हैं । शायर पैदा तो होते हैं पर कभी मरते नहीं । आज शकील बदायूंनी जैसे अमर शायर की शायरी के समंदर में डुबकी लगायेंगे हम । हम गुनगुनायेंगे उसके तरानों को । हम पता लगायेंगे कि आखिर ऐसा क्‍या है उसके नग्‍मों में—जो बरसों बाद भी हम उन्‍हें गुनगुना रहे हैं ।
शकील दिल का हूं तरजुमा, मुहब्‍बतों का हूं राज़दां
मुझे फख्र है मेरी शायरी मेरी जिंदगी से जुदा नहीं ।


रवायत तो ये है कि पहले हम शायर का ताररूफ करायें उसके बाद आगे
बढ़ें । लेकिन रवायत तोड़ने को दिल चाहता है, क्‍योंकि शकील इतने बड़े और ऊंचे दरजे के शायर और गीतकार थे कि अगर वो बदायूं की जगह अलीगढ़ या इलाहाबाद में भी पैदा होते तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था । हां वो इस दुनिया में नहीं आते तो उनके नग्‍मों के गिना ये संसार कितना खाली खाली और फीका होता, इसका अंदाज़ा आपको ये आलेख पढ़कर लग जायेगा ।

जिंदगानी खुद हरीफे जिंदगानी हो गई ।
मैंने जब रखा कदम दुनिया पुरानी हो गई ।
है वही अफसाना लेकिन कहने वाले और हैं ।
है वही उन्‍वां मगर लंबी कहानी हो गयी ।

शकील शायरी की दुनिया से फिल्‍मों में आये थे । यानी फिल्‍मों में आने से पहले शायरी के आसमान पर वो एक चमकता सितारा बन चुके थे । वो मुशायरों की जान हुआ करते थे । उस दौर में तरक्‍की पसंद शायरी पूरे उफान पर थी । जुल्‍मतों के खिलाफ आवाज बुलंद की जा रही थी, गरीबों और लाचारों को जगाने के लिये शायरी की जा रही थी । शायरी को क्रांति का बायस माना जा रहा था । ऐसे तूफानी दौर में भी शकील उर्दू शायरी की गहरी रवायत का दामन पकड़े रहे । वो मुहब्‍बतों के शायर बने रहे । और मुशायरों को लूटते रहे ।

ये फलक फलक हवाएं, ये झुकी झुकी घटायें
वो नजर भी क्‍या नजर है जो ना समझ ले इशारा ।
मुझे आ गया यकीं सा कि यही है मेरी मंजिल
सरे राह जब किसी ने मुझे दफ्फतन पुकारा ।
कोई आये शकील देखे ये जुनूं नहीं तो क्‍या है
कि उसी के हो गये हम जो ना हो सका हमारा ।


ये है शकील की शायरी की मिसाल । मजे की बात ये है‍ कि शायर शकील बदायूंनी जिस वक्‍त मुशायरों पर हुकूमत कर रहे थे तभी घर-गृहस्‍थी चलाने के लिये राज्‍य सरकार के सप्‍लाई विभाग में काम भी कर रहे थे । कितना अजीब था ना ये तालमेल । एक तरफ सप्‍लाई विभाग की नौकरी की सूखी और उबाऊ लिखापढ़ी । दूसरी तरफ शायरी की नाजुकतरीन दुनिया । सन 1942 से 1946 तक दिल्‍ली में नौकरी में रहते हुए उन्‍होंने खूब शायरी की और खूब नाम कमाया । फिर सन 1946 में एक मुशायरे में शिरकत करने के लिये वो बंबई तशरीफ लाए । वो लिखने पढ़ने का ज़माना था । और फिल्‍म निर्माता भी मुशायरे सुनने जाया करते थे । नामचीन निर्माता निर्देशक ए0 आर0 कारदार ने जब शकील बदायूंनी को सुनाओ तो उस वक्‍त बन रही अपने फिल्‍म दर्द में उन्‍हें लिखने का न्‍यौता दे डाला । बस फिर क्‍या था, मुनव्‍वर सुलताना, श्‍याम और सुरैया की अदायगी से सजी इस फिल्‍म से एक सुरीला अफसाना शुरू हुआ । आपको याद होंगे इस फिल्‍म के नग्‍मे ।

गाना सुनने के लिये इस पंक्ति पर क्लिक करें :

अफसाना लिख रही हूं दिले बेक़रार का, आंखों में रंग भरके तेरे इंतज़ार का
फिल्‍म-दर्द/1947/कारदार प्रो0

टुनटुन यानी उमादेवी के गाये फिल्‍म दर्द के इस गाने से ही शुरू हुआ था गीतकार शकील बदायूंनी और संगीतकार नौशाद का साथ । दिलचस्‍प बात ये है कि शायरी की दुनिया से आने के बावजूद शकील ने फिल्‍मी गीतों के व्‍याकरण को फौरन समझ लिया था । उनकी पहली ही फिल्‍म के गाने एक तरफ सरल और सीधे-सादे हैं तो दूसरी तरफ उनमें शायरी की ऊंचाई भी है । इस गाने में शकील साहब ने लिखा है---
आजा के अब तो आंख में आंसू भी आ गए
साग़र छलक उठा है मेरे सब्र-ओ-क़रार का
अफसाना लिख रही हूं दिले बेक़रार का


किसी के इंतज़ार को जितने शिद्दत भरे अलफ़ाज़ शकील ने दिये, शायद किसी और गीतकार ने नहीं दिये । ऐसा करते हैं कि इंतज़ार को शिद्दत भरे अलफाज देने की इसी बात पर हम सन 1946 से सीधे छलांग लगाते हैं सन 1949 की तरफ । एक बार फिर ए0 आर0 कारदार की फिल्‍म । एक बार फिर नौशाद की धुन और एक बार फिर शकील बदायूंनी का इंतज़ार की कशिश से लबरेज़ नग्‍मा । इस गाने को नौशाद ने राग पहाड़ी में क्‍या खूब बनाया है । इस गाने का दूसरा अंतरा है-----

तड़प रहे हैं हम यहां किसी के इंतज़ार में
खिज़ां का रंग आ चला है मौसमे-बहार में खिज़ां यानी पतझर
हवा भी रूख़ बदल चुकी, ना जाने तुम कब आओगे ।।

फिल्‍म दुलारी का ये गीत गाया है मो0 रफी ने । बहुत ही कम साज़ों के इस्‍तेमाल से बनाए गये गानों में ये गाना चोटी पर आता है । आज के संगीतकारों को इस गाने को सुनकर सीखना चाहिये कि अच्‍छा गाना बनाने के लिये बीट्स या स्ट्रिंग डालकर गाने को ठूंस ठूंस कर भरना ज़रूरी नहीं होता । अच्‍छा गाना दिल से बनता है ।
गाना सुनने के लिये इस पंक्ति पर क्लिक करें :
सुहानी रात ढल चुकी ना जाने तुम कब आओगे---फिल्‍म:दुलारी 1949


इश्‍क़ का कोई ख़ैरख़्वाह तो है
तू नहीं है तेरी निगाह तो है
जिंदगी इस सियाह रात सही
आशिक़ी इक चराग़े-राह तो है ।।

शकील बदायूंनी का ये शेर सियाह और सुनसान रात को आशिकी के चराग़ के सहारे काट लेने की बात करता है । आपके इस दोस्‍त को शकील के नग़मों को सुनते सुनते अचानक ये अहसास हुआ कि इस शायर को रात से बेइंतिहा मुहब्‍बत थी । हालांकि दुनिया में रात पर अगर किसी ने सबसे खूबसूरत ग़ज़लें या नज़्में कहीं हैं तो वो हैं रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी
ऐसा लगता है जैसे फिराक़ साहब ने रात को सही मानी दे दिये हैं । थोड़ी देर के लिये फिराक़ का रात का बयां देखिए ---




ये मौजे-नूर, ये भरपूर ये खिली हुई रात
कि जैसे खिलता चला जाए इक सफेद कंवल
सिपाहे-रूस हैं अब कितनी दूर बर्लिन के
जगा रहा है कोई आधी रात का जादू

क्ररीब चांद के मंडला रही है इक चिड़ीया
भंवर में नूर के करवट से जैसे नाव चले,
कि जैसे सीना-ए-शायर में कोई ख्‍वाब पले,
वो ख्‍वाब सांचे में जिसके नई हयात ढले,
वो ख्‍वाब जिससे पुराना निज़ामे-गम बदले ।।

ये रात, छनती हवाओं की सोंधी सोंधी महक
ये खेल करती हुई चांदनी की नर्म दमक
सुगंध रात की रानी की जब मचलती है
फजां में रूहे-तलब करवटें बदलती है ।।




हां तो बात चल रही थी कि शकील बदायूंनी को रात से बेइंतिहा मुहब्‍बत
थी । और हो भी क्‍यों ना । मुहब्‍बतों का शायर हर उस चीज़ से टूटकर प्‍यार करता है जो नाजुकतरीन होती है । फिर चाहे वो फूल की नाज़ुक पंखुडियां हों या किसी हसीन शख्‍स का पंखुडी जैसा नाजुक दिल । आपने शायद ही कभी ध्‍यान दिया होगा कि एक ही गीतकार ने रात के कितने कितने रंग अपने अलग अलग नग्‍मों में भरे हैं ।

आई है वो बहार के नग्‍मे उबल पड़े
ऐसी खुशी है कि आंसू निकल पड़े
होठों पर हैं दुआएं मगर दिल पे हाथ है
कैसी हसीन आज ये बहारों की रात है

गाना सुनने के लिए इस पंक्ति पर क्लिक करें ।
कैसी हसीन ये बहारों की रात है---फिल्‍म आदमी/मो0रफी और तलत महमूद/सन 1968

नोट:फिल्‍म में ये गीत मो0 रफी और महेंद्र कपूर की आवाज़ में है, दरअसल मनोज कुमार ने अपने लिए तलत की आवाज़ की बजाय महेंद्र कपूर की आवाज़ लेने पर ज़ोर दिया और नौशाद साहब को ये बात माननी पड़ी । पर रिकॉर्ड पर रफी और तलत की ही आवाज़ में हैं । गाने के शीर्षक को क्लिक करके आप यही संस्‍करण सुन सकते हैं । फिल्‍म में आपको महेंद्र कपूर वाला संस्‍करण मिलेगा ।



सन 1967 में आई फिल्‍म पालकी में शकील बदायूंनी ने रात का एक और अनमोल नग्‍मा लिखा । हिंदी फिल्‍मों में कुछ गाने जैसे कालजयी बनने के लिये ही रचे गये हैं । उनमें से एक है ये गाना । फिर वही संयोग । नौशाद, रफी साहब और शकील बदायूंनी ।

ऐ मेरी रूहे-ग़ज़ल, मेरी जाने-शायरी
दिल मानता नहीं कि तू मुझसे बिछड़ गयी
मायूसियां हैं फिर भी मेरे दिल को आस है
समझाऊं किस तरह से मैं दिल बेक़रार को
वापस कहां से लाऊं गुज़री बहार को
मजबूर दिल के साथ बड़ी घात हो गयी




ये गाना सुनने के लिये इस पंक्ति पर क्लिक करें:
कल रात जिंदगी से मुलाक़ात हो गयी ।।
फिल्‍म पालकी/गायक-मो0 रफी/ सन 1967

हम बात कर रहे हैं शकील बदायूंनी के लिखे उन गानों की जिनमें आता है रात का जिक्र । ये रात के अलग अलग रंग हैं । कहीं खुशियां हैं, तो कहीं गम हैं । रात कहीं जुदाई की प्रतीक है तो कहीं ये रात बहुत मानीखेज बदलाव लेकर आने वाली है । हिंदी फिल्‍मों के इतिहास की एक अज़ीमुश्‍शान फिल्‍म थी मुगल-ऐ-आज़म । और इस फिल्‍म के कथानक में जब मोड़ आता है तो होती है एक क़व्‍वाली । इश्‍क़ की बग़ावत की क़व्‍वाली । ज़रा सुनिए शकील बदायूंनी ने इसे किस तरह निभाया है । वो लिखते हैं---



नग्‍मों से बरसती है मस्‍ती, छलके हैं खुशी के पैमाने

आज ऐसी बहारें आई हैं, कल जिनके बनेंगे अफसाने



अब इससे ज्‍यादा और हंसीं ये प्‍यार का मौसम क्‍या

जब रात है ऐसी मतवाली फिर सुबह का आलम क्‍या होगा ।।






ईस गाने को सुनने के लिये यहां क्लिक करें ।फिल्‍म---मुगल-ए-आज़म/लता/नौशाद ।


अगर आपने मुग़ल-ऐ-आज़म फिल्‍म ध्‍यान से देखी है तो आपको समझ में आयेगा कि ऐसी सिचुएशन पर ऐसा क़व्‍वालीनुमा गीत लिखना कितनी बड़ी चुनौती रही होगी । और इसे शकील ने कितनी खूबी के साथ निभाया है । इसी तरह फिल्‍म राम और श्‍याम में जब मौक़ा आया तो शकील बदायूंनी ने रात से जुड़ा हमारी स्‍मृतियों का सबसे शिद्दत भरा गाना दिया । बेवफाई से तड़पता आशिक़ शब्‍दों के ज़हर बुझे तीर चला रहा है और पीछे से पियानो, ग्रुप वायलिन और ढोलक की जुगलबंदी । रफी साहब की वो बेक़रार आवाज़ और शकील के अलफ़ाज़ का अंदाज़ कि मुंह से बेसाख्‍ता वाह वाह निकल आती है ।


ये रात जैसे दुल्‍हन बन गयी चराग़ों से करूंगा और उजाला मैं दिल के दाग़ों से.......

तू मेरा साथ ना दे राहे मुहब्‍बत में सनम,
चलते चलते मैं किसी राह पे मुड़ जाऊंगा
कहकशां चांद सितारे तेरे चूमेंगे क़दम
मेरे रस्‍ते की मैं एक धूल बन जाऊंगा
साथ मेरे मेरा अफसाना चला जायेगा
कल तेरी बज्‍म से दीवाना चला जायेगा
शम्‍मा रह जायेगी परवाना चला जायेगा


इस गाने को सुनने के लिये यहां क्लिक कीजिये:फिल्‍म: राम और श्‍याम/रफी /नौशाद
शकील के लिखे रात के नग्‍मों का सिलसिला यहीं खत्‍म नहीं हो जाता बल्कि फिल्‍म कोहीनूर में एक नई ऊंचाई पर पहुंचता है । ये गाना ख्‍वाबों की ताबीर का गाना है । जिंदगी के खुशनसीब पलों का नग्‍मा है । शकील लिखते हैं---

जिनसे मिलने की तमन्‍ना थी, वो ही आते हैं
चांद तारे मेरी राहों में बिछे जाते हैं
चूमता है तेरे क़दमों को गगन आज की रात,
सारी दुनिया नज़र आती है दुल्‍हन आज की रात

नौशाद ने इस गाने के इंटरल्‍यूड में पश्चिमी ढंग के कोरस का इस्‍तेमाल किया है, ऊपर से रफी साहब की आवाज़ की पवित्रता और लता जी की आवाज़ की मासूमियत, जिससे ये गाना और भी दिव्‍य बन गया है ।
इस गाने को सुनने के लिये इस पंक्ति पर क्लिक कीजिये:
दो सितारों का ज़मीं पर है मिलन आज की रात/लता-रफी/फिल्‍म कोहीनूर

इस विश्‍लेषण के अगले भाग में चर्चा शकील बदायूंनी के कुछ और गानों की आपकी राय का इंतज़ार.....









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