संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Friday, April 9, 2010

'रेडियोवाणी' के तीन साल पूरे हुए.

तीन साल......ब्‍लॉगिंग के तीन साल पूरे हुए आज। 'ब्लॉगिंग' किसी 'ऐजेन्‍डे' या किसी 'नारे' के तहत शुरू नहीं की थी। ये समझ लीजिए कि अपना निजी स्‍वार्थ था..संगीत की दुनिया में कुछ और गहरा ग़ोता लगाने का। और इन तीन सालों में ये ग़ोता सचमुच गहरा होता चला गया है। मैं हमेशा कहता हूं कि संगीत से जुड़ाव और उस पर लिखने का जो पहलू रेडियो के दायरे में रहकर पूरा नहीं हो सकता था, उसे पूरा करने के लिए मैंने 'रेडियोवाणी' को शुरू किया है।

'वर्चुअल-स्‍पेस' में तमाम तरह के शग़ल पूरे किए जा सकते हैं। तमाम तरह के संदर्भ मौजूद हैं। और तमाम विषयों में डूबे खरे-तपे लोग भी। आप जिसे चुनें..उसी की अतल गहराईयों तक पहुंच सकते हैं। 'रेडियोवाणी' को शुरू करने का पूरा श्रेय भाई रवि रतलामी
को जाता है। 'मरफी के नियमों' के दिलचस्‍प किस्‍से खोजते हुए हम उनके ब्लॉग पर पहुंचे थे। सईद क़ादरी के बारे में खोजते हुए मनीष के ब्‍लॉग पर पहुंचे। और पहले उनसे फिर मनीष से 'ई-मेल-व्‍यवहार' शुरू हुआ था।


ब्‍लॉगिंग ने कई मित्र बनाए। कई संपर्क कायम किए। श्रोता और पाठक दिए। रेडियो के ज़रिए आवाज़ को जानने वालों ने 'ब्‍लॉग' पर आकर 'अलफ़ाज़' को भी जाना। संगीत के क़द्रदानों ने ना सिर्फ रेडियोवाणी के लिए समय-समय पर content उपलब्‍ध करवाया, विषय सुझाए बल्कि शोध में मदद भी की। कुल मिलाकर 'रेडियोवाणी' के ज़रिए संगीत की हमारी 'समझ' का अप्रत्‍याशित विस्‍तार ही हुआ है।

कुछ दिनों पहले मनीष ने अपने ब्‍लॉग के चार साल पूरे होने के उपलक्ष्‍य में
बड़ी पते-की बात कही--'जैसे जैसे आप अपनी विषय-वस्‍तु का विस्‍तार करते चले जाते हैं, कुल पाठकों की संख्‍या में वृद्धि होती है, पर उसमें एग्रीगेटर से आने वाले पाठकों का हिस्‍सा कम होता चला जाता है। इसलिए सनसनी या बिना मतलब के पचड़ों में पड़ने के बजाए अपने मन की बात कहें और पूरी मेहनत से कहें।  

रेडियोवाणी के ज़रिए कोशिश यही रही है कि 'पॉपुलर' संगीत की बजाए 'क्‍लासिक'
Classical_Guitar और 'अद्वितीय' चीज़ों को आपके सामने रखा जाए। शोध और संदर्भ पक्‍के और प्रचुर रखे जाएं। और जो प्रस्‍तुत किया जा रहा है, उसके और उससे जुड़ी चीज़ों के कई आयाम खोलने की कोशिश की जाए। पता नहीं कितनी कामयाबी मिली। पर यहां तक आकर अच्‍छा तो लग ही रहा है। पिछले दिनों एक सुझाव ये भी था कि ज़रूरी नहीं कि हर 'पोस्‍ट' पर कोई 'गीत' हो..एक प्‍लेयर टंगा हो...कई बार बिना गाना सुनाए भी संगीत की बातें हो सकती हैं। हालांकि मैं ऐसा करने से पहले बचता रहा हूं। पर आगे हम कुछ ऐसी पोस्‍टें भी सामने लायेंगे, जिनमें संगीत के बारे में पढ़ने मिलेगा...बिना प्‍लेयर के। 

हां...कुछ पुरानी पोस्‍टों के प्‍लेयर बंद पड़े हैं..और ये काम जारी है...अगर कोई पोस्‍ट बिना प्‍लेयर के आपको बहुत परेशान कर रही हो तो कृपया सूचित करें..उसे प्राथमिकता के आधार पर सुधार दिया जाएगा। कई लोगों से संगीत के कई वादे कर रखे हैं..जिनमें से कुछ विस्‍मृत हो गए हों तो बताएं...... 

रेडियोवाणी के तमाम पाठकों और श्रोताओं का धन्‍यवाद और बधाई।

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