संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Saturday, April 9, 2011

अम्‍मा पुछदीं- मोहित चौहान

इन दिनों रेडियोवाणी पर लिखना कम होता गया है। ऐसा नहीं है कि हमारे भीतर लिखने की या संगीत सुनने-सुनाने की 'आग' नहीं रही। दरअसल इन दिनों जेब में ख़ाली लम्‍हों के सिक्‍के बहुत कम होते जा रहे हैं। अफ़सोस कि पहली गाज़ ब्‍लॉग पर ही गिरती है।




पर आज के लिए तो हमने काफ़ी पहले से तैयारियां कर रखी थीं। Mohit-Chauhan-Fitoor-The-Special-Edition आज रेडियोवाणी के सफ़र के चार बरस पूरे हुए।

दरअसल सब कुछ ठीक रहता तो शायद ये गीत दो महीने पहले ही आप तक पहुंचता। इन दो महीनों से इस गाने को कुछ ज्‍यादा सुना जाता रहा।

मोहित चौहान अनेक कारणों से हमारे पसंदीदा गायक हैं। उनकी आवाज़ में अफ़सोस की गहराई इतनी ज़्यादा है कि उन्‍हें इन दिनों भारत का blue mood वाला सबसे असरदार गायक कहा जा सकता है। सभी जानते हैं कि मोहित नब्‍बे के दशक में चर्चित हुए पॉप बैन्‍ड
'सिल्क रूट' से पहचाने गए थे। बाद में मुंबई आकर फिल्‍मों में उन्‍होंने ख़ासा नाम कमाया है। 'मसक्‍कली', 'अभी कुछ दिनों से', 'पी लूं', 'ये दूरियां' जैसे कई गानों ने उन्‍हें लोकप्रिय बनाया है।





उनके अलबम 'फितूर' में एक पहाड़ी गीत है, जिसे सुनकर यूं लगता है कि बस घटाएं घिर गयी हैं और बादल अब बरस ही जायेंगे। ज़रूरी नहीं है कि आपको इस गाने के हर शब्‍द के मायने समझ आएं, पर इस गाने का मर्म आपको भभ्‍भड़ भरी इस दुनिया से काट देता है। आपको सुकून की एक तरल दुनिया में पहुंचा देता है। जहां गिटार और बांसुरी की कोमल ध्‍वनियां और मोहित की सौम्‍य-तान आपकी साथी होती हैं। रेडियोवाणी की चौथी सालगिरह पर मुझे यही तोहफ़ा आप सभी के लिए ओर अपने लिए उचित लगा।



खोजते खोजते मुझे इस गाने पर अनूप सेठी का लिखा एक लेख मिला। इसे आप 'यहां' पढ़ सकते हैं। 

भाई अशोक पांडे ने कभी इस गाने को
कबाड़ख़ाना पर चढ़ाया था।


वहीं से हम इस गाने का पाठ और इसका अनुवाद आप तक पहुंचा रहे हैं।  

song: amma puchdi
album:fitoor
singer: mohit chauhan
duration:4 19



अम्मा पुछदी सुन धिये मेरे ए दुबड़ी इतणी तू किया करि होई हो
पारली बणिया मोर जो बोले हो
आमाजी इना मोरे निंदर गंवाई हो
सद लै बन्दूकी जो सद लै शिकारी जो
धिये भला ऐता मोर मार गिराणा हो
मोर नी मारणा मोर नी गवांणा हो
आमाजी ऐता मोर पिंजरे पुवाणा हो
कुथी जांदा चन्द्रमा कुथी जांदे तारे हो
ओ आमाजी कुथी जांदे दिलांदे पियारे हो
छुपी जांदा चन्द्रमा छुपी जांदे तारे हो
ओ धिये भला नईंयो छुपदे दिलांदे पियारे हो


भावानुवाद: मां बेटी से पूछती है कि मेरी प्यारी तू इतनी उदास क्यूं है. बेटी कहती है कि अगले जंगल में मोर पुकारें लगा रहा है वह मेरी नींदें उड़ा ले जा रहा है. मां कहती है : शिकारियों को उनकी बन्दूकों समेत बुलवा लेंगे जो इस मोर को मार डालेंगे. बेटी कहती है : नहीं हम मोर को मारेंगे नहीं. मैं उसे पिंजरे में रख लूंगी.
"मां चांद कहां चला जाता है और कहां चले जाते हैं तारे? ओ मां हमारे दिलों में बसे लोग कहां चले जाते हैं?"
"चांद छिपने चला जाता है और छिपते चले जाते हैं तारे. ओ मेरी प्यारी बेटू, हमारे दिलों में बसे लोग कहीं नहीं जाते. वे रहते हैं हमारे दिलों में"

कुछ और बातें अगर आप मोहित चौहान को लाइव-शो में इस गाने को गाते देखना चाहते हैं तो यहां जाएं। 

मुझे इस गाने का एक और बहुत सोंधा संस्‍करण मिला है। जिसे हम सही मायनों में लोकगीत कह सकते हैं। इसे मशहूर गायक करनैल राणा ने गाया है। 




मोहित के कुछ और गाने इन दिनों हमारे दिल की धड़कन बने हुए हैं। मुमकिन है कि अगली पोस्‍ट जब भी हो तो मोहित चौहान की आवाज़ ही लेकर आए।

रेडियोवाणी पर एक बड़ी 'सीरीज़' की तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी हैं। उसे भी हम जल्‍दी ही शुरू करेंगे। बहरहाल--पूरा हुआ चौथा साल।

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