संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Wednesday, September 3, 2008

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार: शिवमंगल सिंह सुमन की कविता की संगीतमय प्रस्‍तुति

शिवमंगल सिंह 'सुमन' स्‍कूल के ज़माने में हमारे प्रिय कवि रहे हैं । आज भी उनकी कई रचनाएं जिंदगी के इन रास्‍तों पर एक लाईट-हाउस की तरह लगती हैं । हमारा सौभाग्‍य रहा है कि हमने 'सुमन' जी को साक्षात देखा है और कवि-सम्‍मेलनों में उन्‍हें कविता-पाठ करते हुए देखा-सुना है । शिवमंगल सिंह सुमन की उपस्थिति मात्र ही बड़ी 'असरदार' हुआ करती थी ।
                           Shiv mangal singh suman चित्र-साभार कविता-कोश

दरअसल 'रेडियोवाणी' के लिए गानों की तलाश में कई बार यायावरी करनी पड़ती है और ये यायावरी ही है जो ऐसी चीज़ें हमारे हवाले करवा देती है जिनके बारे में हमने पहले कभी सोचा भी ना हो । अब देखिए ना भला कभी हमने सोचा ही ना था कि सुमन जी की वो कविता, जो 'बाल-भारती' में पढ़ी थी, और फौरन याद हो गयी थी और जिसे इससे अलग धुन पर हम स्‍कूल में समवेत स्‍वरों में गाया करते थे, वही हमें मिल जाएगी और वो भी इतने 'इन्‍फेक्‍शस' अंदाज़ में गाई हुई । पिछले कुछ दिनों से ये गीत और इसका संगीत हमारे घर और हमारे ज़ेहन में गूंज रहा है । और बार बार सुमन जी याद आ जाते हैं । उनका कविता-पाठ याद आ जाता है । 'निर्बल कुम्‍हार के हाथों से, कितने रूपों में गढ़ी -गढ़ी'......'मिट्टी की बारात' शीर्षक ये कविता मैंने उस ज़माने में टी.वी. से कैसेट पर रिकॉर्ड कर ली थी । या फिर 'जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी' । उन दिनों हमें ऐसी कविताएं ही पसंद आती थीं ।


सन 1987 में नेहरू जन्‍मशती के अवसर पर काव्‍य-भारती म्‍यूजिकल्‍स कलकत्‍ता ने एक रिकॉर्ड जारी किया था जिसका शीर्षक दिया गया था --'अमर बेला' । इसमें कई महत्‍त्‍वपूर्ण कवियों की रचनाओं को गाया गया था । इस रिकॉर्ड को मनीष दत्‍त ने तैयार किया था । इसमें मुझे सबसे ज्‍यादा प्रभावित किया इस गीत ने । 'तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार' । इसे चंदन राय चौधरी ने गाया है । तो सुनिए और इस गीत का आनंद लीजिए । मुझे पूरा यक़ीन है कि कुछ-कुछ भटियाली शैली में स्‍वरबद्ध किया गया ये गाना आपके मन में लंबे समय तक गूंजता रहेगा और आपको विकल करता रहेगा ।




इस कविता की इबारत ये रही । गाते समय इसके एक अंतरे को छोड़ दिया गया है

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार
आज सिन्धु ने विष उगला है
लहरों का यौवन मचला है
आज ह्रदय में और सिन्धु में
साथ उठा है ज्वार
तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार
लहरों के स्वर में कुछ बोलो
इस अंधड में साहस तोलो
कभी-कभी मिलता जीवन में
तूफानों का प्यार
तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार
यह असीम, निज सीमा जाने
सागर भी तो यह पहचाने
मिट्टी के पुतले मानव ने
कभी ना मानी हार
तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार
सागर की अपनी क्षमता है
पर माँझी भी कब थकता है
जब तक साँसों में स्पन्दन है
उसका हाथ नहीं रुकता है
इसके ही बल पर कर डाले
सातों सागर पार ।।


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