संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Sunday, July 10, 2011

मेरे हमनशीं मेरे हमनवां: दानसिंह जी की याद में।


दानसिंह जी पर ये विशेष आलेख पिछले दिनों 'दैनिक-भास्कर' में प्रकाशित हुआ था। कई मित्रों को 'भास्‍कर' का अंक उपलब्‍ध नहीं हुआ इसलिए उनके आग्रह पर इसे यहां गानों और उनकी लिंक्‍स के साथ दिया जा रहा है।



पिछले दिनों संगीत-संसार से एक बहुत बुरी ख़बर आई। संगीतकार दानसिंह के निधन की ख़बर। मुझे पिछले बरस अप्रैल के वो दिन याद आ गये जब जयपुर में सुर-यात्रा के आयोजन में दानसिंह जी से मिलने का सौभाग्‍य मिला था। हिंदी फिल्‍म-संगीत जगत में कम चर्चित संगीतकारों की एक पूरी फेहरिस्‍त है। लच्‍छीराम, दत्‍ताराम, एन. दत्‍ता, लाला असर सत्‍तार, इक़बाल क़ुरैशी, गणेश, रामलाल, जे. पी. कौशिक वग़ैरह संगीतकारों की एक पूरी फेहरिस्‍त है, जिन्‍हें अपनी प्रतिभा का पूरा हक़ नहीं मिला। जिनके हिस्‍से में गिनी-चुनी फिल्‍में आईं। पर उनमें भी उन्‍होंने अपना पूरा असर दिखाया।

दानसिंह जी की याद विविध-भारती में अकसर आती। उनके रहते हुए भी और अब उनके ना रहने पर भी। और ये याद मुकेश के कुछ अनमोल गानों के लिए तो आती ही जिनका जिक्र मैं आगे चलकर करूंगा। पर मुझे दानसिंह का स्‍वरबद्ध किया सबसे अनमोल गाना लगता है गीता रॉय का—
‘मेरे हमनशीं मेरे हमनवां, मेरे पास आ मुझे थाम ले।’ ये गाना सन 1965 में आई फिल्‍म ‘भूल ना जाना’ का है। और इसे हरिराम आचार्य ने लिखा है। (उनसे भी पिछले ही बरस जयपुर में मिलने का सौभाग्‍य मिला)। गीता रॉय के लोकप्रिय गीतों से बिल्‍कुल अलग, ये गाना अपनी वेदना के लिए सबसे अलग खड़ा नज़र आता है। और इसकी ख़ूबसूरती है साज़ों के किफ़ायत भरे इस्‍तेमाल में। मुझे ये गाना रूह को सिहरा देने वाले मर्सियों की क़तार में रखने लायक़ लगता है। अंतरों पर शहनाई और बांसुरी की गाढ़ी तान....दिल को गाढ़े सुरमई अंधेरे में ले जाती है। और यही इस गाने की गायकी, लेखनी और धुन की कामयाबी है।


1965 में आई ‘भूल ना जाना’ को अपने बेमिसाल गीतों के लिए याद किया जाता है। यहां मैं रवायत के मुताबिक़ इस फिल्‍म को ‘आई’ ज़रूर कह रहा हूं। पर दानसिंह की किस्‍मत की सबसे बड़ी विडंबना यही थी कि उनके सबसे सुंदर संगीत वाली ये फिल्‍म रिलीज़ ही नहीं हो सकी। केवल इसके गाने रिलीज़ हुए।


इस फिल्‍म के गानों में मुकेश का गाया पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो, मुझे तुमसे अपनी ख़बर मिल रही है’..बड़ा नाज़ुक गाना है ये गुलज़ार का लिखा हुआ। दानसिंह जी के संगीत की सबसे बड़ी ख़ासियत ये थी कि वो अपने समय के सभी दिग्गजों के बीच अपनी अलग धारा पर चले। पक्‍की और मधुर धुनों के साथ-साथ दानसिंह ने कविता की ऊंचाई को भी कायम रखा। उनके स्‍वरबद्ध सभी गाने अपनी कविताई में भी उत्कृष्‍ट हैं।


मुकेश के कुछ बहुत सुंदर गीत दिये उन्‍होंने। इसी‍ फिल्‍म में हरिराम आचार्य का लिखा गाना है—‘ग़म-ए-दिल किससे कहूं कोई भी गमख़ार नहीं’। अफ़सोस है कि बड़ी संगीत कंपनियों ने मुकेश के सबसे उम्‍दा गानों में अकसर इस गाने की अनदेखी की है। जबकि मुकेश की सांद्र तान, उसका ‘नेज़ल टच’, उसमें बसा दर्द का राग..सब कुछ सुनने वाले को एक अलग ऊंचाई पर ले जाते हैं। यहां हरिराम आचार्य की लेखनी को सलाम ना करें तो बहुत बड़ी नाइंसाफ़ी होगी।



फिल्‍म ‘माई लव’ सन 1970 में आई थी। और इसमें दानसिंह जी का स्‍वरबद्ध किया सबसे मशहूर गाना था। गिटार की तरंगों से शुरू होकर, सितार से होते हुए हम इस गाने में मुकेश की आवाज़ तक पहुंचते हैं—‘जिक्र होता है जब क़यामत का तेरे जलवों की बात होती है’। इसे आनंद बख़्शी ने लिखा। इसी फिल्‍म में मुकेश का ‘वो तेरे प्‍यार का ग़म’ भी था। सेक्‍सोफोन की सुंदर पुकार वाला गाना है ये। मैंने महसूस किया है कि दानसिंह के गाने हल्‍के रिदम के गाने हैं। कभी भी वो रिदम को झमाझम नहीं बनाते थे। इस गाने में तो सेक्‍सोफोन की हल्‍की तरंग मुकेश की आवाज़ के पीछे लगभग लगातार है। अंतरे पर पियानो और सेक्‍सोफोन की मिली-जुली हरकतें हैं। ज़रा सोचिए कि मुकेश के अनगिनत मशहूर गानों पर भारी है ये एक गाना।



इसी फिल्‍म का अनूठी धुन वाला शीर्षक गीत मोहम्‍मद रफ़ी की आवाज़ में था।

फिल्‍म ‘भूल ना जाना’ में मुकेश का एक और गाना था—‘गोरा गोरा मुखड़ा ये तूने कहां पाया है’।

दानसिंह मशहूर संगीतकार खेमचंद प्रकाश के शिष्‍य थे। मुंबई में उन्‍हें ज़्यादा मौक़े नहीं मिले। फिल्‍में रिलीज़ नहीं हुईं और उन्‍हें जयपुर वापस लौटना पड़ा। दानसिंह की स्‍वरबद्ध कुछ फिल्‍मों की चर्चा ज़्यादा नहीं हुई। जैसे कि 1969 में आई फिल्‍म ‘तूफ़ान’। जिसके कलाकार थे, दारासिंह, अनीता, जॉनी व्हिसकी और हेलेन वगै़रह। मोहम्‍मद रफ़ी का गाया इस फिल्‍म का टाइटल-गीत काफी इन्‍टेन्‍स है। बोल हैं—‘जिंदगी में आया तूफ़ान’।


फिल्‍म ‘भूल ना जाना’ भारत-चीन युद्ध पर केंद्रित थी। भारत सरकार ने पड़ोसी देश से संबंध सुधारने का वास्‍ता देकर फिल्‍म रिलीज़ ना कराने का फैसला सुनाया। इस तरह एक अच्‍छी फिल्‍म डिब्‍बे में बंद होकर रह गयी। ‘भूल ना जाना’ में मन्‍ना डे ने गाया था—‘बहती है जवां ख़ून की आज धारा/उठो हिंद की सरज़मीं ने पुकारा’


 







दानसिंह जी ने जिन फिल्‍मों में संगीत दिया उनके नाम हैं। ‘रेत की गंगा’, ‘भूल ना जाना’, ‘बहादुर शाह ज़फ़र’, ‘मतलबी’, ‘तूफ़ान’ और ‘बवंडर’। जगमोहन मूंदड़ा की फिल्‍म ‘बवंडर’ 1999 में आई थी। दानसिंह जी ने इस फिल्‍म में कुछ ख़ूबसूरत गाने बनाए थे। हाल ही में दानसिंह जी ने गजेंद्र श्रोत्रिय की राजस्‍थानी फिल्‍म ‘भोभर’ का एक गाना बनाया  था। इसे रामकुमार सिंह ने लिखा है। ये गीत है —‘उग म्‍हारो सूरज उग रे'। जो बड़ा ही शानदार बन पड़ा है।

दानसिंह का जाना फिल्‍म-संसार की एक बड़ा नुकसान है। चलते-चलते अपने मन की एक बात कहता चलूं। हमारे देश में कला के क्षेत्र की नामी हस्तियों से जुड़े ‘डॉक्‍यूमेन्‍टेशन’ का कितना अभाव है। वो तो शुक्र है कि दानसिंह जी से पत्रकार ईशमधु तलवार ने वीडियो बातचीत रिकॉर्ड की थी दूरदर्शन के लिए। वरना दानसिंह जी को बोलते-बतियाते अब हम कहां सुनते। विनम्र श्रद्धांजली।

दानसिंह जी से ईश-मधु तलवार की वीडियो-बातचीत और कुछ अन्‍य वीडियो देखिए रेडियोवाणी के दूसरे पन्‍ने पर--
यहां क्लिक कीजिए।

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11 comments:

यादें July 10, 2011 at 1:14 PM  

आभार! दानसिंह जी से रूबरू करवाने का !
वो तेरे प्यारका गम ,इक बहाना था सनम ...
मेरे बचपन से मेरा पसंदीदा है .....
में उनके निधन पर दुखी हूँ !
भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे !

Vinoy Sinha July 10, 2011 at 2:45 PM  

Yes I read in the newspapers about his death.Dan Singh was a brilliant composer who couldn't make it big in the bollywood but who was really big in the eyes of those who had the opportunity to listen to his compositions.I have in my collection the songs which you have mentioned and I never lose a opportunity to listen and re-listen the songs composed by him.Dan Sigh could only compete against himself.Where to get such another!

रज़िया "राज़" July 10, 2011 at 6:02 PM  

दानसिंह से रुबरु करवाने के लिये आपका शुक्रिया।

daanish July 10, 2011 at 8:29 PM  

अखबार में
दान सिंह जी की मृत्यु की खबर पढ़ ली थी
तभी, यकायक याद आया
"वो तेरे प्यार का ग़म...."
और अब आपके इस अहम लेख के ज़रिये
श्रद्धांजली देने का मौक़ा भी हासिल हो गया
गीता रॉय का गया हुआ गीत , संगीत की उच्च कोटि के
स्वरबद्द गीतों की जमात में ही रक्खे जाने के लायक़ है
और,,, "ग़म ए दिल किस से कहूं...." तो मुकेश के गाये किसी और गीत
"माँगा था प्यार मगर मुझको न ..."
तक ले जाता है
हालांकि संगीत दान सिंह जी का नहीं है ,,, जाने क्यूँ !?!

इस भरपूर मालूमाती पोस्ट के लिए
शुक्रिया कुबूल फरमाएं ...

daanish July 10, 2011 at 8:33 PM  

कम चर्चित संगीतकारों की फेहरिस्‍त में
लाला असर सत्तार जी को कभी नहीं सुना
उम्मीद है , आप ही के यहाँ कुछ मिल पाएगा
कभी

madhu saraf July 11, 2011 at 6:13 PM  

स्व.दानसिंह जी से परिचय करवाने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद ]
इन सुमधुर गीतों को सुनकर ख़ुशी भी हुई और गम भी ! की इतने
गुनी कलाकार को कैसे गुमनामी की मार झेलनी पड़ी ?
स्व:दानसिंह जी को हमारी श्रद्धांजलि .
आपको फिर से धन्यवाद्.

प्रवीण पाण्डेय July 12, 2011 at 7:05 PM  

पहली बार जाना एक कर्मशील व्यक्तित्व के बारे में।

अभिषेक मिश्र July 12, 2011 at 8:33 PM  

एक उम्दा मगर अल्पचर्चित शख्सियत के बारे में आपके माध्यम से ही जानने का मौका मिला. आभार और इस महान व्यक्तित्व को श्रद्धांजलि.

Vaneet Nagpal July 30, 2011 at 9:09 AM  

युनुस जी ,
नमस्कार,
आपके ब्लॉग को "सिटी जलालाबाद डाट ब्लॉगपोस्ट डाट काम"के "हिंदी ब्लॉग लिस्ट पेज" पर लिंक किया जा रहा है|

indu puri September 15, 2011 at 3:07 PM  

बचपन से कुछ गाने बहुत पसंद थे और वे आज भी अपनी खूबसूरत जगह मेरे ज़हन में बनाए बैठे हैं और ....शायद अंत तक ....साथ रहेंगे.बहुत ....बहुत प्यारे और मर्मस्पर्शी गाने है यह दोनों 'ज़िक्र होता है जब कयामत का' और...'गमेदिल किससे कहें कोई भी गमखार नही,चुप ही रहना है यहाँ हाले दिल की ये जलन काबिले इज़हार नही'
नही मालूम था की यह दानसिंह जी ने कम्पोज किये थे.
अफ़सोस कितनी प्रतिभाये प्रचार के आभाव में या फ़िल्मी दुनिया की राजनीती में या...हम लोगों की संवेदनहीनता के कारन गुमनाम सी जीती रही.उन्हें वो सब नही मिला जिनके वे सचमुच हकदार थे.

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