संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Wednesday, August 5, 2009

संगीत के शौक़ ने फंसा दिया, आप भी फंसिए और इन धुनों को पहचानिए

हमारा बचपन भी वैसा ही गुज़रा है जैसा छोटे शहर के किसी आम मध्‍यवर्गीय परिवार के लड़कों का बीतता है । गाडियों के एक्‍सल से निकले मेटल के पहिये को तार से बने 'ड्राइवर' से चलाते हुए दौडते थे और लगता था कि धरती के उस पार तक चले जायेंगे । धूप में 'पिट्ठू' 'गुल्‍ली-डंडा' या पतंगबाज़ी करते 'काले-ढुस' होकर लौटते थे और मां-पापा की डांट सुनते थे । कॉमिक्‍स की अदला-बदली करते थे और सपनों में खोए रहते थे । माचिस की डिब्बियों के रैपर जमा करते थे, पुराने सिक्‍के और डाकटिकट जमा करते थे और सोचते थे कि दुनिया की सबसे बड़ी दौलत है ये ।

इस दौरान एक चीज़ थी जो यहां-वहां-जहां-तहां 'संतोसी-माता' की तरह 'विराजमान' रहती थी और वो था संगीत और संगीत के नाम पर मुहल्‍लों में होने वाला कानफोड़े शोर ( शोर नहीं बाबा 'सोर'....'सोर' ) कभी 'गनेस जी' के 'गनेसोत्‍सव' के नाम पर तो कभी 'नवरात्र' के नाम पर, कभी किसी मज़ार के 'उर्स' के नाम पर तो कभी किसी के घर का 'चिराग़' पैदा होने के नाम पर, कभी शादी के नाम पर तो कभी 'हैपी-बड्डे' के नाम पर । अब हम क्‍या कहें कल हमारे मित्र 'डाकसाब' की एक मेल आई है : उन्‍होंने जैसे हमारे मन के किसी कोने में घुसकर हमारी भावनाओं पर डाका डालके खुद लिख दिया । समझ लीजिएगा कि शब्‍द उनके हैं और भाव हमारे हैं ( जे हमारे साथ अकसर क्‍यों होता है जी )

बचपन के सुने ज़्यादातर फ़िल्मी गाने,जो हमारे मन में बहुत गहरे अन्दर तक रच-बस गये हैं,वे नहीं हैं

जो हमने रेडियो पर सुने या भोंपूनुमा ग्रामोफ़ोन पर; बल्कि वे हैं, जो हमने लाउडस्पीकर पर सुने।

इलाहाबाद में पैदा हुए और पले-बढ़े लोग इस लाउडस्पीकर संस्कृति से अच्छी तरह परिचित हैं । गली-मोहल्लों,चौराहों की सड़कों पर बिजली के खम्भों या मकानों-दुकानों के छज्जों से बँधे ये बड़े-बड़े चोंगेनुमा प्राणी ( "यन्त्र"कहना अपमान होगा इनका ) आपके आस- पास या कहीं दूर आठों पहर संगीत की स्वर-लहरियाँ छेड़े रहते थे। बहाना-ए-मौका कुछ भी हो सकता था-होली,दीवाली,दशहरा,राखी जैसे त्यौहारों से लेकर  सार्वजनिक समारोहों या शादी-बरात जैसे नितान्त निजी आयोजनों तक कुछ भी । ज़्यादातर तो इनमें से कुछ भी नहीं होता था । बस यूँ ही बजते रहते थे;पता नहीं क्यों । तब घर पर डाँट पड़्ने के बावज़ूद दिन भर छत पर पतंग उड़ाते या गली-मैदानों में कंचे खेलते ये गाने बरबस कानों में पड़ते रहते थे,बल्कि अक्सर कोफ़्त भी पैदा करते थे, ख़ास तौर पर परीक्षाओं के दिनों में।

तब क्या पता था कि आगे चलकर ज़िन्दगी का आधा पड़ाव पार कर लेने के बाद इसी शहर में एक दिन  यही गाने सुनने को तरस जाएँगे हम और पागलों की तरह इनकी याद में तड़पते हुए इन्हें कहीं से भी दोबारा हासिल करने और सुनने के लिये क्या-क्या नहीं करेंगे!

बैकग्राउण्ड में कहीं दूर क्षितिज या किसी वादी से आती आवाज़ जैसे ये गाने तब एक अजीब सा सम्मोहन पैदा करते थे । तीन-चार बरस की उस उम्र में इनमें से कईयों के तो बोल भी ठीक से समझ नहीं आते थे। अपनी बाल-बुद्धि से ही शब्द गढ़ कर उन धुनों को ज़ुमलों का ज़ामा पहनाते और गुनगुनाते थे हम। अगर शब्द समझ आये भी, तो उनमें से कईयों के पीछे छिपे असली भावों या जीवन-दर्शन की समझ कहाँ थी तब ?

ऐसा ही एक गाना तब अक्सर दूर कहीं लाउडस्पीकर पर ख़ूब बजा करता था। कुछ तो दूरी और कुछ लाउड स्पीकरों की फटी हुई साउण्ड क्वालिटी की वज़ह से बोल तो साफ़ समझ नहीं आते थे,पर धुन बड़ी सम्मोहक थी । उन्हीं दिनों  एक दिन (शायद ज़िन्दगी में पहली बार ) पुलिस को एक आदमी को सड़क पर हथकड़ी लगाकर ले जाते हुए देखा (पीछे-पीछे तमाशबीनों की भीड़ के साथ)। तब इस गाने को सुनकर मन में हमेशा यही सीन घूमता था।

उसके बाद फिर पिछले कोई चालीस सालों से नहीं सुना यह गाना । "विविध-भारती" के पास शायद है भी नहीं । होता तो इतने सालों में  कभी न कभी, कहीं न कहीं, बजता ज़रूर। बाकी सब जगह ढूँढ-ढाँढ कर भी थक गये ।

यू-ट्यूब पर भी नहीं है। बस किसी तरह फ़िल्म का नाम जुगाड़ लिया। फिर वही अपनी पुरानी स्पेशल एप्रोच - फ़िल्म की VCD/DVD जुगाड़ो,गाना ख़ुद-ब-ख़ुद मिलेगा ।

पुराने लोग कह ही गये हैं - ढूँढो तो भगवान भी मिलता है ( वैसे कहते तो हम भी हैं; शायद धीरे-धीरे पुराने पड़ने का लक्षण है ),तो आख़िर VCD क्या चीज़ है ? जाकर हमें भी मिली और इस तरह लगे हाथों यह फ़िल्म देखने की हसरत भी पूरी हो गयी।

तो यह रही साथ में अटैच्ड इस गाने के शुरुआती संगीत की धुन । दूसरी फ़ाइल में है एक अन्तरे की धुन( ख़ास बात यह है कि  प्रचलित प्रथा के विपरीत हर अन्तरे के बीच की धुन एकदम वही नहीं है,बल्कि थोड़ी अलग है)

वैसे आप जैसे (संगीत के) नशेड़ियों के लिये इस पहेली में ज़्यादा दम तो नहीं लगता, फिर भी बताइये कि यह गाना कौन-सा है ? 


इसके बाद उन्‍होंने दो एम.पी3 फाइलें जोड़ दी हैं । एक तो बचपन के उन 'हाय हाय' और 'अश अश' वाले दिनों की याद दिला दी । ऊपर से जे पहेली । जुलम करे । दिमाग़ पर ज़ोर डाला पर बात बन नहीं रही है । मदद कीजिए । पहचानिए इन गानों को । अगर जे पहेली आप पर भी 'जुलम' कर रही है तो 'मुंडी झुकाकर' हार मान लीजिए । हम भी मान जाएंगे । गंगा मैया की कसम, नरबदा मैया की कसम हमें इस पहेली का जवाब नहीं मालूम । जिन्‍हें मालूम है बो तो चिढ़ा रहे हैं ।

पहली फाइल मुखड़े की धुन



दूसरी फाइल अंतरे की धुन

13 comments:

Mired Mirage August 5, 2009 at 12:29 PM  

आप नहीं पहचान पाए तो हम क्या पहचानेंगे ?
घुघूती बासूती

अफ़लातून August 5, 2009 at 12:41 PM  

हम से नहीं विनय जैन से पूछो !

Parul August 5, 2009 at 12:54 PM  

hariyali aur rasta type picture ka geet lag raha hai....salil da ka sa sangeet lag raha hai...per samajh se bilkul baahar hai...shayad shaam tak aaye kuch yaad...

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi August 5, 2009 at 1:54 PM  

याद नहीं आ रहा है।

रक्षाबंधन पर शुभकामनाएँ! विश्व-भ्रातृत्व विजयी हो!

कंचन सिंह चौहान August 5, 2009 at 3:16 PM  

pahali baat to aap ki pahali clip mujhe mil nahi rahi.

dusari baat ki Parul se sahamat huN. aaj subaha jab Rakhi ke gano ki talash me FM on kiya to vo to nahi magar Rainbow par ye geet chal raha tha "ye hariyali aur ye Rasta" lag to vahi raha hai.

agar sahi to inaam mera galat to dosh Parul ka..! unhone hi confuse kiya hai mujhe :)

कंचन सिंह चौहान August 5, 2009 at 3:17 PM  

Lekin shayad ye hoga nahi sahi..Hariyali aur Rasta ke geet milna to itna mushkil nahi hai

Chidambar August 5, 2009 at 4:39 PM  

दॊ दिल - प्यासी हिरनी ?

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey August 5, 2009 at 5:30 PM  

आप तो तरह तरह का लिखे जा रहे हैं और हम ढूंढ़ रहे हैं नागपंचमी वाली कविता!

दिलीप कवठेकर August 5, 2009 at 8:39 PM  

प्यासी हिरनी बन बन डोले, कोई शिकारी आये रे,

दो दिल,
हेमंत कुमार (संगीत निर्देशक)

शत प्रतिशत..

दिलीप कवठेकर August 5, 2009 at 8:43 PM  

यूनुस भाई,

अपके लिखे में आनंद आ गया, साथ ही डाकसाब का भी लिखना, यादें ताज़ा कर गया. आज आपका मूड भी बढिया है, और बडा ही भा रहा है. यूंहि आप मस्त रहें और हमारे दिल में उतरते रहें...

"डाकसाब"("डाकबाबू" जैसा लगता है ! ),  August 6, 2009 at 1:59 PM  

जब हमारी भेजी पहेली हमारे नाम पर सबसे पूछ ली आपने (बहुत-बहुत शुक्रिया),तो "हंसिनी" के अलावा किशोर दा के बाकी दोनों गाने ( वीडियो-पहेली समेत ) भी हमीं ने भेजे थे आपको, यह भी बता देते सबको (हें-हें) !

(जब आप नहीं दे रहे हैं, तो ख़ुदै क्रेडिट ले-ले रहे हैं हम। क्या करें; आजकल ज़माना ही ऐसा है - अपना ढिंढोरा आपै पीटने का)

लेकिन अब जबकि रेडियोवाणी के सुधी श्रोताओं (आपसे तो वही भले) ने सही जवाब दे ही दिया है, तो कम से कम सही विजेताओं के नाम का ऐलान करके बतौर ईनाम पूरा गनवा तो सुनवाय दीजिये सबको । "बच्चों की जान लेंगे क्या ? "
:-))
( या न हो आपके पास,तो भेजें हम ? )

’डाकसाब",  August 6, 2009 at 3:40 PM  

वैसे एक बात और थी कहने को ।

पवनपुत्र हनुमान की तरह वायुमार्ग में विचरण करने वाले "उड़न-तश्तरी" जी नहीं आये इस बार आपकी प्राण-रक्षा के लिये ?

यूँ नहीं आये तो अच्छा ही किया । मुसीबत हो जाती, अगर संजीवनी बूटी की जगह पूरा हिमालय ही उठा लाते तो ।

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