संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Sunday, August 24, 2008

नज़ीर की रचना--कन्‍हैया का बालपन

आज ही भाई नासिरूद्दीन ने यहां कन्‍हैया का बालपन चढ़ाई है । बेहद रोचक पोस्‍ट है । अभी हाल ही में कबाड़खाना पर भाई अशोक पांडे ने अपनी इस पोस्‍ट पर यही रचना चढ़ाई थी । आज मुंबई पर जन्‍माष्‍टमी की तरंग इस क़दर तारी है कि मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूं और तीस दिसंबर 2007 को जारी की गयी इस पोस्‍ट को दोबारा ठेल रहा हूं । आशा है कि रेडियोवाणी के पाठक आज इस रचना को दोबारा पढ़ और सुनकर मुदित ही होंगे । हाथी घोड़ा पालकी....बोलो...जय कन्‍हैया लाल की ।।

रेडियोवाणी पर इस रचना को मैं लंबे अरसे से चढ़ाना चाह रहा था । नज़ीर अकबराबादी की रचनाएं कम ही गायकों ने गाई हैं । मुझे पीनाज़ मसानी के अलावा अहमद हुसैन मुहम्‍मद हुसैन ही याद आते हैं जिन्‍होंने उनकी कुछ रचनाएं गायी हैं जबकि इन रचनाओं में गायकी की अपार गुंजाईश रही है । मुझे कृष्‍णलीला वाली ये कविता हमेशा से प्रिय रही है । इसे सुनने से पहले ज़रा नज़ीर अकबराबादी के बारे में आपको थोड़ी सी जानकारी दे दी जाए ।



नज़ीर अकबराबादी का असली नाम था वली मुहम्‍मद ।
अठारहवीं सदी में हुए इस नामचीन उर्दू शायर ने तकरीबन दो लाख रचनाएं लिखी थीं लेकिन बदकिस्‍मती से ज्‍यादातर अतीत की गर्द में खो चुकी हैं । तकरीबन छह सौ कविताएं ही प्रकाशित रूप में उपलब्‍ध हैं ।



नज़ीर ने भारतीय जन-जीवन के कई बारीक पहलुओं पर कविताएं कहीं । उनकी 'होली' पर केंद्रित कविता 'जब फागुन रंग महकते हों तो देख बहारें होली की' भारतीय साहित्‍य की एक अनमोल कृति है । होली का इतना बारीक और ललित चित्रण शायद ही कहीं मिलेगा । नज़ीर ने मेलों-ठेलों से लेकर रोटियों चूडि़यों, रीछ, होली, दीवाली, आगरे तक ना जाने किन किन विषयों पर अपनी कलम चलाई । वे जनता के शायर थे । बौद्धिक जुगाली की बजाय उन्‍होंने सादा शब्‍दों में अपनी बात कहकर जनता के दिल पर राज किया ।
बचपन पर नज़ीर की एक कविता है, जिसका अंश पढि़ये--

क्या दिन थे यारो वह भी थे जबकि भोले भाले । 
निकले थी दाई लेकर फिरते कभी ददा ले ।। 
चोटी कोई रखा ले बद्धी कोई पिन्हा ले । 
हँसली गले में डाले मिन्नत कोई बढ़ा ले ।। 
मोटें हों या कि दुबले, गोरे हों या कि काले । 
क्या ऐश लूटते हैं मासूम भोले भाले ।।
इसे आप कविता-कोश में यहां पूरा पढ़ सकते हैं ।



अब ज़रा दीवाली पर उनकी कविता की बानगी देखिए--
जहां में यारो अजब तरह का है ये त्‍यौहार 
किसी ने नक़द लिया और कोई करे उधार
खिलौने, खलियों, बताशों का गर्म है बाज़ार
हर एक दुकान में चराग़ों की हो रही है बहार ।।
मिठाईयों की दुकानें लगा के हलवाई पुकारते हैं 

कह--लाला दीवाली है आई बतासे ले को,

बरफी किसी ने तुलवाई 
खिलौने वालों की उन से ज्‍यादा है बन आई


ऐसे थे नज़ीर । जिनकी कुछ कविताएं आगे चलकर रेडियोवाणी या तरंग पर ही आपको पढ़वाई जायेंगी । पर फिलहाल सुनिए ये रचना । जिसमें श्री कृष्‍ण की लीला का कमाल का वर्णन किया गया है । आपको बता दें कि ये पीनाज़ मसानी की आवाज़ है और संगीत जयदेव का है । जिस दिन मैं इस गीत को सुन लेता हूं दो तीन दिन तक बस ज़बां पर छाया रहता है । आप भी सुनिए और इस अनमोल अदभुत रचना का आनंद लीजिए ।





यारो सुनो ये ब्रज के लुटैया का बालपन
औ'मधुपुरी नगर के बसैया का बालपन ।।

मोहन-स्‍वरूप नृत्‍य, कन्‍हैया का बालपन 
बन बन के ग्‍वाल घूमे, चरैया का बालपन
ऐसा था, बांसुरी के बजैया का बालपन 
क्‍या क्‍या कहूं मैं कृष्‍ण कन्‍हैया का बालपन
औ'मधुपुरी नगर के बसैया का बालपन ।। 
ज़ाहिर में सुत वो नंद जसोदा के आप थे 
वरना वो आप ही माई थे और आप ही बाप थे 
परदे में बालपन के ये उनके मिलाप थे 
ज्‍योतिस्‍वरूप कहिए जिन्‍हें, सो वो आप थे 
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन 
az-janmashtami-6
औ'मधुपुरी नगर के बसैया का बालपन

क्‍या क्‍या कहूं ।। 
उनको तो बालपन से ना था काम कुछ ज़रा 
संसार की जो रीत थी उसको रखा बचा 
मालिक थे वो तो आप ही, उन्‍हें बालपन से क्‍या 
वां बालपन जवानी बुढ़ापा सब एक सा
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन 
औ'मधुपुरी नगर के बसैया का बालपन ।। 
क्‍या क्‍या कहूं ।।
बाले थे ब्रजराज जो दुनिया में आ गये 
लीला के लाख रंग तमाशे दिखा गये
इस बालपन के रूप में कितना भा गये 
एक ये भी लहर थी जो जहां को जता गये 
यारो सुनो ये ब्रज के लुटैया का बालपन
औ'मधुपुरी नगर के बसैया का बालपन 
क्‍या क्‍या कहूं ।।
परदा ना बालपन का अगर वो करते जरा
क्‍या ताब थी जो कोई नज़र भर के देखता 
झाड़ और पहाड़ ने भी सभी अपना सर झुका
पर कौन जानता था जो कुछ उनका भेद था 
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन 
औ'मधुपुरी नगर के बसैया का बालपन 
क्‍या क्‍या कहूं ।।

13 comments:

मीत August 24, 2008 at 7:34 PM  

अद्भुत युनुस भाई. सच में अद्भुत ही है ये ...... नज़ीर अकबराबादी किसी और plane के इंसान थे. पता नहीं कैसे लोग थे.... अभी पिछले दिनों ही सुना था : ".......... तब देख बहारें होली की" - वो गीत भी कुछ ऎसी ही तासीर रखता है ... शुक्रिया कह नहीं सकता

Gyandutt Pandey August 24, 2008 at 8:44 PM  

ओह! मैं तो बिक गया इस गीत पर यूनुस!

सजीव सारथी August 24, 2008 at 9:28 PM  

वाह क्या बात है युनुस भाई, वाकई कमाल....जन्माष्टमी की खुशियाँ दुगनी हो गई

अभिषेक ओझा August 24, 2008 at 11:04 PM  

अनमोल गीत सुनाया आपने... ये बालपन सच में मन को मोह ले गया !

Manish Kumar August 24, 2008 at 11:11 PM  

waah kya baat hai..man khush ho gaya

Farid Khan August 25, 2008 at 12:33 AM  

बहुत ख़ूब यूनुस साहब ..... मज़ा आ गया।

नज़ीर की नज़्म "महादेव जी का ब्याह" और भी दिलचस्प है.... अगर उसे किसी ने गाया हो तो उसे भी सुनवाईये कभी।


क्या रसख़ान के गीतों को भी किसी ने गाया है कभी? मुझे जानकारी नहीं है.... अगर पता चले तो बताईयेगा।

मीडियागुरु August 25, 2008 at 11:19 AM  

भाई जी बहुत बहुत धन्यवाद पीनाज़ की आवाज में नज़ीर साहब की रचना फ़िर से सुनवाने के लिए. पिछली बार किसी ने टिपण्णी भी की थी कि इस गीत में अवधपुरी नहीं होकर औ' मधुपुरी है. मधुपुरी कृष्ण के जनम स्थान को भी कहते हैं. अवधपुरी राम का जनम स्थान मन जाता है.

Toonfactory August 25, 2008 at 12:41 PM  

Humesha Ki Tarah Ek Aur Adbhut Post Yunus Bhai..Aapke saath ek adbhut Rishta sa Mehsoos Hota Hai..Schooli Dino Mein Aapko Vividh Bharti Par sunte huye kabhi Radio Par Aane Ka Sapna Sanjoye Orissa Ke Ek Chhote Se Gaanv Se Ek Safar Shuru Kiya Tha..Woh Maalik Ki Daya Se Kaafi Safal Raha Hai..Aur Kareeb Do Varsho Tak Main Radio Professional Raha Hoon (RadioCity, Bangalore Aur Baad Mein RadioOne, Mumbai)...Magar Mera Fav. Station Aaj Bhi Aakashvaani Ki Panchrangi Seva Hai Aur Priya Udghoshak Aap...Kabhi Milne Ki Ichha Hai..

Dr Prabhat Tandon August 25, 2008 at 4:16 PM  

बहुत ही खूबसूरत !!!शुक्रिया यूनूस भाई !!

yunus August 25, 2008 at 4:41 PM  

मीडिया गुरूजी आपके कहे से सहमत था और हूं । पोस्‍ट में सुधार कर दिया गया है ।
टून फैक्‍ट्री आलोक, अपने बारे में मेल पर बताएं, बंबई में हो तो संपर्क करें ।
फरीद भाई महादेव का ब्‍याह तो शायद किसी ने नहीं गाया । पर रसखान की रचनाएं खोजता हूं । कुछ लोगों ने गाई हैं ।

Nasiruddin August 25, 2008 at 6:12 PM  

yunus bhai, der se suna par bahoot khoob! Patna IPTA ke kalakaar Nazeer aur dusare shayron ko kaafi gaate hain.

Vinod Kumar Purohit August 26, 2008 at 9:11 PM  

वाह युनूस भाई मजा आ गया। क्या प्रस्तुति प्रस्तत की है। आनंद आ गया। अति व्यस्तता के कारण जन्माष्टमि पर तो सुन नहीं पाया लेकिन आज सुन कर जन्माष्टमि भूमिका बन गई। आपने कहा था बीच बीच में याद दिलाते रहना इस लिए याद दिला रहा हूं वो भजन "रात भर का है डेरा रे सवेरे जाना है है ये जोगी वाला फेरा सवेरे जाना है"

ved vilas uniyal August 28, 2008 at 6:46 PM  

yonush bhai, i read your article aoout mukesh, i have also a good collection of mukesh songs, a god gifted voice we feel relex and pleasent to hear it, you are doing great service for music. with your efforts youth generation come to know our rich tradition of music - ved vilas

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