संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Sunday, January 27, 2008

'जब वी मेट' के निर्देशक इम्तियाज़ अली के लिए गुलज़ार का गीत--फिर से आईयो बदरा बिदेसी

विविध भारती के लिए इस शुक्रवार को jab we met के निर्देशक इम्तियाज़ अली से बातचीत करने का मौक़ा मिला । इस इंटरव्‍यू के दौरान मैंने इम्तियाज़ से ऑन-रिकॉर्ड और ऑफ़-रिकॉर्ड बहुत सारी बातें कीं । उनकी जिंदगी और उनकी पसंद के बारे में जाना । आज रेडियोवाणी पर इम्तियाज़ की पसंद का गीत लगाया जा रहा है । और वो भी कुछ दिलचस्‍प बातों के साथ । 

किसी भी कामयाब आदमी की मुंबई आने और स्‍ट्रगल करने की कहानी सुनने में बड़ा मज़ा आता है  । हम रेडियो वाले अपने श्रोताओं को जानी-मानी हस्तियों की जिंदगी में झांकने का मौक़ा देते हैं । ये कई मायनों में प्रेरक भी होता है और मनोरंजक भी । इम्तियाज़ अली की फिल्‍म 'जब वी मेट'  साल 2007 की कामयाब इम्तियाज़ अली विविध भारती में और सराही गयी फिल्‍मों में से एक रही है । दिलचस्‍प बात ये है कि इसे बहुत ज़बर्दस्‍त 'रिस्‍क' लेकर रिलीज़ किया गया था । जहां तक मुझे याद आता है कि इसे अपनी असर कायम करने के लिए तकरीबन दो-तीन हफ्तों का ही वक्‍त मिला था । इसके बाद 'ओम शां‍ति ओम' और 'सांवरिया' रिलीज़ हो गयी थीं । लेकिन तूफानी प्रचार वाली इन 'बड़ी' फिल्‍मों के आने के बहुत दिनों बाद भी jab we met ने सिनेमाघरों में डटी रही और ये एक बड़ी कामयाबी मानी गयी । इसकी वजह थी कहानी कहने का नया और ताज़ा अंदाज़ और कहानी की मज़बूती ।

बहरहाल यहां मैं इस फिल्‍म पर नहीं 'फिल्‍मवाले' पर बात कर रहा हूं । इम्तियाज़ के बारे में लोग ज्‍यादा नहीं जानते । वे मूलरूप से जमशेदपुर झारखंड के रहने वाले हैं । उनके ख़ानदान के कुछ लोगों की तीन टॉकीज़ें है जमशेदपुर शहर में । जहां उन्‍होंने बचपन में खूब फिल्‍में देख रखी हैं । उन्‍होंने स्‍कूल के ज़माने से ही रंगमंच शुरू किया और दिल्‍ली में हिंदू कॉलेज में गए तो वहां अपने ग्रुप 'इब्तिदा' का गठन किया । वैसे वो पियूष मिश्रा वाले थियेटर ग्रुप 'एक्‍ट वन' के भी सदस्‍य रहे । दिल्‍ली के बाद फिल्‍मों में कुछ करने की तमन्‍ना उन्‍हें ले आई मुंबई । यहां पहले तो ज़ी टी वी में प्रोडक्‍शन अस्सिटेन्‍टी की और फिर बड़ी तेज़ी के साथ इम्तियाज़ ने तरक्‍की करनी शुरू की । उनकी पहली फिल्‍म थी 'सोचा ना था' । जिसने तारीफ़ खूब बटोरी थी ।  अब अगर इम्तियाज़ के बारे में सारी बातें यहां बता दूंगा तो  इंटरव्‍यू कौन सुनेगा भाई । इसलिए विविध भारती पर इम्तियाज़ अली से पूरी और लंबी बातचीत आपको ज़रूर सुननी है । इस कार्यक्रम के प्रसारण की ख़बर आपको रेडियोनामा के ज़रिए दे दी जाएगी ।

मुझे इम्तियाज़ की सहजता और सरलता बड़ी अच्‍छी लगी । इम्तियाज़ अपनी फिल्‍में निर्देशित ही नहीं करते बल्कि खुद ही लिखते हैं । उनका कहना था कि वो एक छोटे-शहर के लड़के हैं । मध्‍यवर्गीय जज्‍़बात उनकी पूंजी हैं । उन्‍होंने कहा कि जिस तरह सिग्‍नल रेडियो सेट तक पहुंच जाते हैं उसी तरह कहानी भी अपने लेखक को खोज लेती है । फिर आप बस एक माध्‍यम होते हैं । कहानी अपनी शक्‍ल तय करती चली जाती है । उन्‍होंने जब वी मेट के निर्माण से जुड़े कई दिलचस्‍प किस्‍से भी सुनाए जो आपको इस कार्यक्रम में ही सुनने मिलेंगे । लेकिन ऑफ रिकॉर्ड और ऑन रिकॉर्ड हम फिल्‍मी गीतों पर पहुंच गये और पता चला कि इम्तियाज़ को गुलज़ार के कुछ गीत बड़े पसंद हैं ।

दरअसल इस बातचीत का सिरा तब शुरू हुआ, जब फौजी भाईयों के लिए 'जयमाला' कार्यक्रम प्रस्‍तुत करते हुए इम्तियाज़ ने 'नमकीन' फिल्‍म का वो गीत सुनवाना चाहा--'राह पे चलते हैं'  । और मैंने कहा कि बहुत दिनों बाद मुझे इस गाने की याद आई है । फिर तो कुछ और गानों की बातचीत चल पड़ी । उन्‍होंने 'फिर से आईयो बदरा बिदेसी' को याद किया । ये भी नमकीन फिल्‍म का ही गीत है । इसी तरह देवता के उस गाने के बारे में भी बात हुई--जिसके बोल हैं 'ये साए हैं ये दुनिया है परछाईयों की' । फिर जीवा का वो गीत जो थोड़े दिन पहले मैंने रेडियोवाणी पर सुनवाया था, रोज़ रोज़ आंखों तले । इम्तियाज़ ने कहा कि वो गीत भी उनको पसंद है---सीली हवा छू गयी, गीला बदन जल गया । इस बातचीत के दौरान इम्तियाज़ ने कहा कि हमारी पसंद काफी मिलती जुलती है । ये ऐसे गाने हैं जो बहुत कम सुनाई देते हैं ।

तो चलिए रेडियोवाणी पर आज इम्तियाज़ के बहाने आप सबको सुनवाया जाए गुलज़ार का नमकीन फिल्‍म का गीत । इसे हम गायिक आशा भोसले को भी समर्पित कर रहे हैं । उन्‍हें इस वर्ष का पद्म विभूषण दिया गया है । पच्‍चीस जनवरी की शाम इस घोषणा के फौरन बाद बैंगलोर से भाई शिरीष कोयल का संदेश आया । इस संदेश में आशा जी पर कोई पोस्‍ट लिखने का आग्रह छिपा था । आशा जी के कुछ और गीत आगे चलकर सुनवाए जाएंगे ।

ये बड़ा ही नाज़ुक गीत है । आशा जी ने इसे बड़े लाड़ से गाया है । अदाकारी और इमोशन का मधुर संयोग है ये गीत ।

ये गीत गुलज़ार की कॉमेन्‍ट्री के साथ है । ताकि सुनने में ज्‍यादा मज़ा आए ।

गुलज़ार यहां कहते हैं ।

गीत बूढ़े नहीं होते उनके चेहरे पर झुर्रियां नहीं गिरतीं । वो पलते रहते हैं चलते रहते हैं । सुनने वालों की उम्र बदल जाती है तो कहते हैं । हां वो उस पहाड़ का टीला जब बादलों से ढंक जाता था तो एक आवाज़ सुनाई देती थी.........

 

फिर से आईयो, बदरा बिदेसी । तेरे पंखों में पे मोती जड़ूंगी ।

भरके जाईयो हमारी तलैंया, मैं तलैया के नारे मिलूंगी ।

तुझे मेरे काले कमली वाले की सौं ।

तेरे जाने की रूत मैं जानती हूं, मुड़के आने की रीत है कि नहीं ।

हो काले दरग़ाह से पूछूंगी जाके तेरे मन में प्रीत है कि नहीं ।

कच्‍ची पुलिया से होके बजरिया, कच्‍ची पुलिया के नारे मिलूंगी ।

फिर से आईयो बदरा बिदेसी ।।

तू जो रूक जाए, मेरी अटरिया, मैं अटरिया पे झालर लगा दूं ।

डालूं चार ताबीज़ गले में अपने काजल से बिंदिया लगा दूं ।

छूके जाईयो, हमारी बगीची, मैं पीपल के आंडे मिलूंगी ।

फिर से आईयो बदरा बिदेसी ।।

इस बातचीत ने कुछ और गानों की यादें ताज़ा की हैं । जो समय समय पर आपको सुनवाए जाएंगे । फिलहाल तो ये बताईये कि ये गीत आपको कैसा लगा । और कितने दिनों बाद सुनने मिला आपको ये ।

15 comments:

जगदीश भाटिया,  January 27, 2008 at 11:05 AM  

यूनुस भाई धन्यवाद इस गीत के लिये।
मेरी पसंद का गीत।

Parul January 27, 2008 at 11:45 AM  

YUNUS JI,kal mujhey GULZAAR ki fan honey pe kaafi jhaad padi ,merey hi blog pe..aaj aapki khuubsurat post ne mun bhar diya...ye gaanaa bahutttttt pasand hai ....bahut shukriyaaaa

सजीव सारथी January 27, 2008 at 11:58 AM  

गीत के क्या कहने, गुलज़ार के यह कमेंट्री वाली कोल्लेक्शन है मेरे पास भी तो अक्सर सुनता रहता हूँ, सचमुच ऐसे गीत कभी बूढे नही हो पाएंगे, इम्तियाज़ के बारे आपने जो जानकारी दी कमाल की लगी, जब वी मेट की खासियत इसका किरदारिकरण है, एक एक किरदार स्वाभाविक सा लगता है, संगीत भी बेहद सुंदर है, ऐसे निर्देशक इंडस्ट्री के उम्मीद हैं, हमे उनसे आगे भी बहतरीन फिल्मों की आस रहेगी

Gyandutt Pandey January 27, 2008 at 6:21 PM  

भैया, मुझे तो इन शब्दों ने बांध लिया - गीत बूढ़े नहीं होते उनके चेहरे पर झुर्रियां नहीं गिरतीं। ....
सच में यह कृतित्व शाश्वत होते हैं। अमर।

Gyandutt Pandey January 27, 2008 at 6:23 PM  

गीत शुरू हो रहा है पर पूरा सुनाई नहीं पड़ रहा। पता नहीं, मेरे कम्प्यूटर में गड़बड़ है या लोडिन्ग में।

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल January 27, 2008 at 7:17 PM  

यूनुस भाई, ऐसा खूबसूरत गीत पढवाने और सुनवाने ले लिए आभार. बल्कि आभार तो बहुत छोटा शब्द है. मैं खडा होकर आपको सलाम करना चाहता हूं. बस एक ही गुज़ारिश है कि यह सिलसिला कभी खत्म न हो.

RA January 27, 2008 at 9:02 PM  

वाह!!! नमकीन का मीठा गीत सुनवानें का धन्यवाद।
जब वी..का ’आओगे जब तुम’ भी सुनने लायक है।

चार्वाक January 27, 2008 at 9:39 PM  

आर डी बर्मन का यह गीत और एस डी बर्मन का आशा से ही गवाया बंदिनी का गीत अबके बरस भेज भइया को बाबुल सावन में लीजो बुलाय रे की तुलना करें. दादा बर्मन के गीत में मेलोडी उफन रही है जबकि पंचम गद्य को पद्य का रूप देने का प्रयास करते साफ झलकते हैं.गीत के बोलों का भाव सुननेवालों को लुभाता है. गुलज़ार अपने गीतों में एक प्रकार का रूहानी वातावरण कुशलता से बुनते हैं.

Manish January 27, 2008 at 9:51 PM  

इम्तियाज अली से मिलवाने के लिए धन्यवाद !जानकर खुशी हुई कि हमारे इलाके से आते हैं. ये संयोग ही है कि मेरी गीतमाला का अगला गीत Jab We Met से ही है।

पर मुख्य बात इस गीत की जिसने बहुत सारी यादें एक साथ जगां दीं..हॉस्तल का कमरा ..लंबा कॉरीडोर..रविवार की अलसाई सी धूप और आशा जी का नमकीनियत लि॓ ये प्यारा सा गीत

मुझे याद है कि जब फुर्सत के रात दिन कैसेट खरीदी थी तो ये गाना शायद साइड A के पहले नंबर पर बजता था और पहली बार सुनते ही गीत के पहले की कमेंट्री और ये गीत इस कदर जेहन पर चढ़ गए कि फिर कभी नहीं निकल सके।

इसलिए जब मैंने अपने रोमन ब्लॉग पर गीतों का परिशिष्ट बनाया तो गुलज़ार की यही पंक्तियाँ डाल दीं। इसके साथ कुछ पहले भी पंक्तियाँ थीं। गुलज़ार प्रेमियों के लिए यहीं चस्पा कर रहा हूँ

एक मूड, एक कैफियत गीत का चेहरा होता है..
कुछ सही से लफ्ज जड़ दो, मौजूं से धुन की लकीरें खींच दो..
तो नग्मा सांस लेने लगता है, जिन्दा हो जाता है..
इतनी सी जान होती है गाने की इक लमहे की जितनी..
हाँ कुछ लमहे बरसों जिन्दा रहते हैं..
गीत बूढ़े नहीं होते उनके चेहरे पर झुर्रियाँ नहीं गिरती..
वो पलते रहते हैं चलते रहते हैं..
गुलजार

राज यादव January 27, 2008 at 10:01 PM  

यूनुस भाई .आपका चिटठा पिछले कुछ महीनों से पढ़ रहा हूँ.एक बाट के लिए अभी मैं अजमंजास की स्थिति में हूँ. क्या आप "विविध भारती " वाले यूनुस झी हैं क्या ...कभी किसी समय विविध भारती का दीवाना हुआ करता था में.खास कर के ..उसमे एक किरदार (एंकर ) यूनुस खान. जब में अपनी इंजीनियरिंग की पढाई कर रहा था..सेमेस्टर परीक्षा में भी में यूनुस की जादू भरी आवाज को सुनने के लिए ऍफ़.एम् . ऑन कर देता था.अगर आप वही यूनुस जी हों तो कृपया ..हमारे चिट्ठे पर आ कर ..कमेंट कर के बताएं ..बहुत खुशी महसूस होगी ....

rajy.blogspot.com

anitakumar January 27, 2008 at 10:33 PM  

गीत सच में बहुत खूबसूरत है। इम्तियाज जी के इंटरवियु का इनजार रहेगा। आज इतवार की सुबह सुबह रेडियो ऑन करते ही मोदी जी और निम्मी जी की आवाज सुनते ही ऐसा लगा हम एक बार फ़िर वहां पहुंच गये है। इतने सालों में अमीन स्यानी के सिवा कभी किसी की आवाज नहीं पहचानी थी न ध्यान दिया था, पर आज इन दोनों की आवाज सुनते ही उनके नाम बताने से पहले हम पह्चान गये कि ये मोदी जी बोल रहे है, पत्रों के जवाब दिये जा रहे थे, आज से बाकि के सब चैनल बंद…:)

Lavanyam - Antarman January 28, 2008 at 12:20 AM  

बदरीया परदेस आ गयी जी ..वाह ..आशा जी

वाह गुलज़ार सा'बी ..और यूनुस भाई आपका शुक्रिया इस गीत को सुनवाने का और युवा निर्देशक इम्तियाज अली से मिलवाने के लिए ....

जोशिम January 28, 2008 at 1:08 AM  

....बहुत बहुत दिनों बाद [- और सही वक्त पर-] वैसे ये गुलज़ार साब ही लिख सकते हैं बात चीत भी और धूप-छाँव भी - rgds - मनीष

रजनी भार्गव January 28, 2008 at 11:22 PM  

बहुत दिनों बाद ये गाना सुना,बहुत अच्छा लगा सुन कर.इम्तियाज़ अली से भेंटवार्ता भी अच्छी लगी.उनकी
फ़िल्म सोचा न थी भी देखी थी, फ़िल्म और गाने भी अच्छॆ लगे थे.बहुत-बहुत शुक्रिया.

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