संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Wednesday, September 5, 2007

कव्वाली की दुनिया-- आईये सुनें अलग अलग गायकों की आवाज़ में अमीर खुसरो की रचना ‘मन कुन्तो मौला’

पिछले कुछ दिनों से हम रेडियोवाणी पर और भाई नीरज रोहिल्ला । अपने ब्लॉग पर क़व्वाली की महफिलें सजा रहे हैं । बहुत दिनों से तमन्ना यही थी कि आपको अमीर खुसरो की कुछ सूफी रचनाएं सुनवाई जाएं । लेकिन संयोग नहीं बन रहा था । ये तमन्ना तब से और ज़ोर पकड़ने लगी थी जब से निर्मल-आनंद वाले अभय तिवारी ने नीरज के ब्लॉग पर अपनी टिप्पणी में ‘मन कुन्तो मौला’’ का जिक्र किया था । दरअसल सूफी कव्वाली में ‘मन कुन्तो मौला’ को बिल्कुल मील का पत्थर माना जाता है । हर क़व्वाल इसे ज़रूरी रचना मानता है । लगभग सभी मशहूर क़व्वालों ने ‘मन कुन्तो मौला’ गाकर अपने आप को धन्य धन्य समझा है । ज़ाहिर है कि आज अगर हम किसी एक संस्करण को सुनवा दें तो पूरी तरह से नाइंसाफी होगी । इसलिये ये पोस्ट आकार में ज़रा बड़ी होगी, लेकिन अगर आप सूफ़ी रचनाओं के दीवाने हैं और कहीं ना कहीं आप के दिल में रूहानियत की लौ लगी है तो आप इन तमाम रचनाओं को सुनेंगे । अभी वक्त ना हो तो बाद में आईये और एक एक करके इन सारे संस्करणों को सुनिए,फिर महसूस कीजिए कि ऐसा क्या। है इस रचना में जो इसे हर क़व्वाल ने अपनी ‘मुक्ति’ के लिए एक ज़रूरी रचना समझा है ।

इस बीच हज़रत अमीर खुसरो पर केंद्रित एक ज़रूरी बेबसाईट मुझे मिली है जिसे आप सबके साथ शेयर करना ज़रूरी है । ज़रा एक बार यहां भी जाईयेगा । ये यूसुफ सईद की वेबसाईट है, जिस पर अमीर खुसरो पर केंद्रित बाकी वेबसाईटों का भी विवरण है । और कई अन्य ज़रूरी जानकारियां भी हैं ।
इस वेबसाईट से ही कॉपी-पेस्ट करके मैंने रोमन में इस सूफी रचना का ब्यौरा यहां प्रस्तुत किया है । जो इसे समझने में आपकी मदद करेगा ।

Man kunto maula,
Fa Ali-un maula
Man kunto maula.
Dara dil-e dara dil-e dar-e daani.
Hum tum tanana nana, nana nana ray
Yalali yalali yala, yalayala ray Man tunko maula......

"Whoever accepts me as a master,
Ali is his master too."
(The above is a hadith - a saying of the Prophet Mohammad (PBH).
Rest of the lines are tarana bols that are generally meaningless
and are used for rhythmic chanting by Sufis.)

तो आईये अब एक एक करके ज़रा ‘मन कुन्तो मौला’ के तमाम संस्करण सुन लिये जाएं । सबसे पहले हम सुनेंगे निज़ामी-ब्रदर्स की आवाज़ में । जहां तक मेरी जानकारी है, निज़ामी भाईयों के नाम हैं—गुलाम साबिर और गुलाम वारिस निज़ामी । भारतीय-क़व्वालों की दुनिया में ये जोड़ी एक बड़ा नाम है । निज़ामी भाईयों के गाए इस संस्करण की ख़ासियत ये है कि इसमें एक ख़ास रवानी है । लय है । गति है । और भक्ति रचनाओं का मक़सद तब पूरा होता है जब एक धीमी गति से शुरू करके मामला लौ लगने की तीव्र गति तक पहुंचता है और आपके तन-बदन को झकझोरता हुआ एक असीम शांति से भर देता है । निज़ामी ब्रदर्स का गाया ये संस्करण यही काम करता है । सुनिए और देखिए---



अब इसे साबरी-ब्रदर्स की आवाज़ में सुनिए और देखिए । क़व्वाली के क़द्रदान साबरी ब्रदर्स से वाकिफ़ ना हों ये हो ही नहीं सकता । और वाकिफ़ होने के लिए यहां क्लिक कीजिए । साबरी ब्रदर्स ने इसे समझाते हुए गाया
है ।



ये है उस्ताद नुसरत फतेह अली खां का गाया संस्करण


और ये ज़ि‍ला ख़ान की आवाज़ में ‘मन कुन्तो मौला’ । इसके फैशनेबल वीडियो पर मत जाईयेगा । गायकी सुनिएगा, जो वाक़ई लाजवाब है ।



वडाली ब्रदर्स की आवाज़ वाला संस्करण । वडाली ब्रदर्स पंजाबी लोक गायकी के कालजयी नाम हैं ।



उस्ताद शुजात ख़ां की आवाज़ वाला संस्करण—
हो सकता है कि इसे सुनने में कठिनाई हो । लेकिन मैं इसका विकल्प खोज रहा हूं । क्योंकि ये कमाल का संस्करण है । अगर दिक्कत होती है तो जल्दी ही इसे किसी दूसरे उपाय से सुनवाया जायेगा ।



तो देखा आपने इस एक क़व्वाली को कितने कितने गायकों ने गाया है और अपनी अपनी तरह से गाया है । कई संस्करण हैं जो छूट गये हैं । लेकिन इतने सारे संस्करण एक साथ पेश करने का मतलब है सुनने वालों को दिक्कत में डालना । इसलिए फिलहाल ये छह संस्करण ही सुनिए और बताईये कैसे लगे ।
अगली बार जब कभी मौका मिलेगा तो हम कई कलाकारों की आवाज़ में सुनेंगे अमीर खुसरो की रचना
‘आज रंग है ओ मां’ ।

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11 comments:

neeshoo September 5, 2007 at 10:47 PM  

यूनुसजी बहुत ही अच्छा लगा।

Udan Tashtari September 5, 2007 at 11:49 PM  

अरे वाह!! अभी दो ही वर्जन सुने हैं और वाह वाह करने से दिल नहीं माना-बाकि शाम को सुनकर फिर वाह करेंगे. :)

Gyandutt Pandey September 6, 2007 at 7:17 AM  

कव्वाली के शब्द समझ में नहीं आते सामान्यत:. पर सुन कर दिव्यत्व की अनुभूति अवश्य होती है. मन होता है - बार-बार सुनें!

vimal verma September 6, 2007 at 1:32 PM  

युनूसजी,अच्छा ये है कि एक रचना अलग अलग
अंदाज़ से सुना.. आप तो हर बार दंगित कर देते हैं वाह..... वाह...... वाह..क्या बात है....!!!!

vimal verma September 6, 2007 at 1:35 PM  

माफ़ करियेगा आपके नाम में छोटा उ और बड़ा ऊ इधर उधर हो गये हैं.

Anonymous,  September 6, 2007 at 1:54 PM  

अमीर ख़ुसरो पर वेबसाइट मैं पहले ही देख चुकी थी।

यहां प्रस्तुत सभी रचनाएं अच्छी लगी ।

आशा है आपको मेरी फ़रमाइश याद होगी - मैं तुलसी तेरे आंगन की फ़िल्म की लता और आशा की अवाज़ों में अमीर ख़ुसरो की रचना प्रस्तुत करने की ।

अन्नपूर्णा

पूनम मिश्रा September 6, 2007 at 4:19 PM  

कमाल करते हैं यूनुसजी आप.हर बार कुछ नया.

अजय यादव September 6, 2007 at 4:48 PM  

बहुत बहुत धन्यवाद युनुस भाई!

जोगलिखी संजय पटेल की September 6, 2007 at 7:28 PM  

साबरी बंधुओं क़व्वाली गायकी में नये रूपक गढ़े.वे ऐसे गुलूकार थे जिनसे क़व्वाली का क़द बढ़ा.जिस दौर में उन्होने अपनी प्रस्तुतियाँ दीं हैं उसमें प्रचार प्रसार के लिये कोई ख़ास जगह नहीं थी.लेकिन ये उनके फ़न का जादू था कि पूरे भारतीय उप-महाद्वीप में सर चढ़ कर बोलता था. म.प्र.की स्वर्ण-जयंती समारोह में ग़ुलाम साबरी इन्दौर तशरीफ़ लाए थे.ईद का दिन था और साल २००५.क्या आप यक़ीन करेंगे...शहर के ह्र्दय स्थल पर कम से कम ३०,००० सामईन मौजूद थे.रात दस बजे शुरू हुई महफ़िल रात दो बजे ख़त्म हुई.मैने एंकरिंग करते हुए जब ये कहा कि उस्ताद जी इन्दौर में असली ईद तो बरसों बाद आज मनी है क्योंकि आप यहाँ तशरीफ़ रखते हैं तो पूरा मैदान तालियों से गूँज उठा और साबरी साहब की आँखों से आँसू झर रहे थे.इन्दौर उस रात साबरीमय हो उठा था युनूस भाई.उनकी ह्स्ताक्षर रचना भर दे झोली मेरी या मोहम्मद ...तेरे दर से न जाऊंगा ख़ाली..मुसलमान भाई-बहनों से ज़्यादा मुझ जैसे हिन्दु संगीतप्रेमी को मुँह ज़ुबानी याद होगी.साबरी और क़व्वाली का अर्थ वैसे ही एक होता है जैसे खु़दाई और सच्चाई का.

Neeraj Rohilla September 7, 2007 at 9:26 AM  

युनुसजी,
आपकी महफ़िल में आकर मन भरकर झूम लिये ।
तरीके से गायी हुयी कव्वाली सुनकर लगता है कि मजहब के नाम पर लडाई करने वाले भी इसे सुन लें तो उन्हें भी समझ आ जाये कि ये अहसास किसी भी धर्म की सीमा में बाँधा नहीं जा सकता ।

मैं शीघ्र ही अपने चिट्ठे पर एक कव्वाली सुनवाऊँगा जिसके बोल ("नमीं दानम कुजा रफ़्तम") ईरानी हैं ।

"आज रंग है" के कुछ Version तो सुने हुये हैं आपकी महफ़िल का बेसब्री से इन्तजार रहेगा ।

साभार,

संजय तिवारी December 15, 2007 at 1:27 PM  

आबिदा परवीन ने भी यह रचना बहुत अद्भुद गाया है.

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