संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Friday, August 3, 2007

आज सुनिए पाब्‍लो नेरूदा की एक कविता-- I can write the saddest poem of all tonight.


आज अचानक इंटरनेट पर छानबीन कर रहा था तो पाब्‍लो नेरूदा की ये कविता हाथ लग गयी ।

नेरूदा के बारे में आप यहां पढ़ सकते हैं ।

नेरूदा की कविताओं के कई रंग हैं । एक ओर उन्‍होंने उन्‍मत्‍त प्रेम की कविताएं लिखी हैं दूसरी तरफ कड़ियल यथार्थ नज़र आता है उनकी कविताओं में । कुछ कविताएं उनकी राजनीतिक विचारधारा की संवाहक नज़र आती हैं । TONIGHT I CAN WRITE THE SADDEST LINES नेरूदा की बेहद लोकप्रिय कविता है । और इसे पढ़ा है एंडी गारसिया
ने । हो सकता है कि ये मेरा अज्ञान रहा हो पर मुझे पता नहीं था कि इस तरह नेरूदा की कविताओं का वाचन भी किया गया है ।

ये एंडी गारसिया की आवाज़ है । क्‍यूबा में जन्‍मे एंडी गारसिया अमरीकी अभिनेता हैं और The godfather, When a Man loves a Woman, Ocean’s Eleven और Ocean’s Thirteen जैसी फिल्‍मों के लिए जाने जाते हैं । उन्‍होंने अपनी क्‍यूबाई पहचान को भी कायम रखा और अमरीकी संस्‍कृति को भी अपनाया । हॉलीवुड का एक बेहद समर्थ अभिनेता माना जाता है उन्‍हें ।


मुझे लगा कि हम भारतीय इस मामले में कितने पिछड़े हैं ।

क्‍यों हमारे यहां कोई अभिनेता अपने प्रभाव और पहुंच का उपयोग करते हुए देश के महत्‍त्‍वपूर्ण कवियों की कविताएं अपने आवाज़ में प्रस्‍तुत नहीं करता । अमिताभ बच्‍चन ने ज़रूर अपने पिताजी डॉ. हरिवंश राय बच्‍चन की कुछ कविताएं पढ़ी हैं । और एच एम वी उन्‍हें बेचकर आज भी पैसा कमा रही है । पर महादेवी वर्मा से लेकर मंगलेश डबराल तक हिंदी या उर्दू की कितनी बड़ी फेहरिस्‍त है कवियों-शायरों की । जनता इस तरह की प्रस्‍तुतियों को कितना सराहेगी । और शायद कुछ प्रयासों के बाद ये बिक भी सकेंगी ।

मुझे याद है कि कुमार सानू ने दूरदर्शन वाले ज़माने में महादेवी वर्मा की कुछ कविताएं गाईं थीं । उनमें से एक थी ‘चिर सजग आंखें उनींदी आज कैसा व्‍यस्‍त बाना, जाग तुझको दूर जाना’ । मुझे नहीं मालूम कि दूरदर्शन या किसी और के पास वो रिकॉर्डिंग है या नहीं । अपनी तमाम ख़ामियों के बावजूद कुमार सानू ने जिस सिन्‍सियेरिटी के साथ उस गीत को गाया था, वो मुझे पसंद आयी थी । हो सकता है कि ये उनके संघर्ष के दिनों की देन रही हो । पर आगे क्‍यों नहीं ।
इस विचार को आपकी ओर उछालते हुए आईये नेरूदा को पढ़ें और सुनें एंडी गारसिया की आवाज़ में उनकी कविता ।

सुखद आश्‍चर्य के रूप में मैं आपको इसका अनुवाद भी दे रहा हूं । दरअसल ये अनुवाद मेरी एक डायरी में ना जाने कब से लिखा हुआ है । कॉलेज के शुरूआती दिनों से । उषा चंदेल और आशुतोष दुबे ने ये अनुवाद किया है । मुझे नहीं मालूम कि ये अनुवाद कहां छपा था और मैंने इसे अपनी डायरी में कहां से उतारा । उम्‍मीद है कि उषा जी और आशुतोष इसे मेरा अज्ञान समझकर यहां छापने पर आपत्ति नहीं करेंगे ।

पहले कविता का अंग्रेज़ी अनुवाद, फिर हिंदी । फिर है इसका ऑडियो ।


I can write the saddest poem of all tonight.

Write, for instance: "The night is full of stars,
and the stars, blue, shiver in the distance."

The night wind whirls in the sky and sings.

I can write the saddest poem of all tonight.
I loved her, and sometimes she loved me too.

On nights like this, I held her in my arms.
I kissed her so many times under the infinite sky.

She loved me, sometimes I loved her.
How could I not have loved her large, still eyes?

I can write the saddest poem of all tonight.
To think I don't have her. To feel that I've lost her.

To hear the immense night, more immense without her.
And the poem falls to the soul as dew to grass.

What does it matter that my love couldn't keep her.
The night is full of stars and she is not with me.

That's all. Far away, someone sings. Far away.
My soul is lost without her.

As if to bring her near, my eyes search for her.
My heart searches for her and she is not with me.

The same night that whitens the same trees.
We, we who were, we are the same no longer.

I no longer love her, true, but how much I loved her.
My voice searched the wind to touch her ear.

Someone else's. She will be someone else's.
As she once belonged to my kisses.
Her voice, her light body. Her infinite eyes.

I no longer love her, true, but perhaps I love her.
Love is so short and oblivion so long.

Because on nights like this I held her in my arms,
my soul is lost without her.

Although this may be the last pain she causes me,
and this may be the last poem I write for her.

लिख सकता हूं मैं आज बेहद उदास सतरें
जैसे कि रात चूर-चूर है
कि सिहरते हैं नीले सितारे दूर कहीं
और रात हवा की बंजारन गाती है आसमानों में

लिख सकता हूं मैं आज रात बेहद उदास सतरें
चाहा था मैंने उसे और कभी उसने मुझको
ऐसी ही और रातों में थामा था उसे बांहों में
चूमा था बार बार उसे बेक़रां आसमां तले
आज की रात लिख सकता हूं बेहद उदास सतरें

ये ख्‍याल कि नहीं है वो मेरी
ये अहसास कि खो दिया है उसे मैंने
ये सूनी लंबी रात
........और सूनी और लंबी उसके बगैर
और शबनम की तरह नज़्म गिरे
रूह पे क़तरा-क़तरा
फ़र्क़ क्‍या पड़ता है जो उसे बांध ना सकी चाहत मेरी
ज़र्रा-ज़र्रा बिखर गई है रात
और नहीं है वो मेरे आसपास
फिर वही रात, वही बर्फ़ से नहाए दरख़्त
बदला है गर कोई तो बस ‘उस वक्‍त के हम’
यक़ीनन अब नहीं, पर किसी वक्‍त चाहा था उसे शिद्दत से
मेरी आवाज़ ने तलाशी ली थी, हवा जो ले जाए उस तक मेरी सदा
और किसी और की होगी वह
उसकी आवाज़ उसका नूरानी बदन, उसकी वो झील सी गहरी आंखें,
तय है कि अब चाहत नहीं, फिर भी शुबहा है कहीं
कितनी मुख़्तसर है मुहब्‍बत
भुलाना कितना तवील
आखिरी दर्द है ये जो उसने मुझको दिया
और उसकी ख़ातिर लिखी
ये आखिरी सतरें हैं मेरी ।


Get this widget Share Track details






Technorati tags:
पाब्‍लो नेरूदा,

12 comments:

Udan Tashtari August 3, 2007 at 10:37 PM  

हमारे तो स्टार फीगर आप ही हो, युनूस भाई. भेजूँ क्या एकाध कविता, आप पढ़ दो न, प्लीज. :) सच में.

बढ़िया लगा यह कविता सुनना.

Pramod Singh August 3, 2007 at 10:56 PM  

नब्‍बे के शुरुआत में एक फ़ि‍ल्‍म आई थी- 'इल पोस्तिनो'- याद है? फ़ि‍ल्‍म नेरुदा के जीवन के उस समय की पृष्‍ठभूमि को डील करती थी जब उन्‍हें दक्षिण इटली के एक गुमनाम द्वीप पर (बंदी?) की शक्‍ल में रहना पड़ा था. ख़ैर, वह कहानी यहां इसलिए बता रहा हूं, कि मुझे ध्‍यान आता है, उस फ़ि‍ल्‍म के प्रदर्शन के ही दौरान, एक टेप हाथ चढ़ा था, जिसमें (एंडी गार्सिया समेत) ढेरों अभिनेता-अभिनेत्रियों ने अपनी-अपनी आवाज़ों में नेरुदा की कविताओं का पाठ किया था. शायद धूल खाते पुराने टेप्स के बीच अब भी वह मेरे घर में कहीं पड़ा हो!

Hindi Blogger August 4, 2007 at 6:21 AM  

प्रमोद जी ने सही कहा है. 'इल पोस्तिनो'(द पोस्टमैन) फ़िल्म की रिलीज़ के साथ ही फ़िल्म का साउंडट्रैक भी रिलीज़ हुआ था. उस सीडी में नेरुदा की कई कविताएँ हैं जिन्हें एंडी गार्सिया के अलावा सैमुअल एल जैक्सन, मैडोना, जूलिया रॉबर्ट्स, वेज़ली स्नाइप्स, स्टिंग आदि ने भी स्वर दिया है. निश्चय ही ऑस्कर विजेता फ़िल्म 'इल पोस्तिनो' की डीवीडी के साथ ये ऑडियो सीडी भी संग्रहणीय है. महान कवि नेरुदा की प्रेमपूर्ण कविताओं के साथ संगीत निर्देशक लुई बाकालोव ने पूरा न्याय किया है.

Anonymous,  August 4, 2007 at 9:44 AM  

''Udan Tashtari ने कहा...
हमारे तो स्टार फीगर आप ही हो, युनूस भाई. भेजूँ क्या एकाध कविता, आप पढ़ दो न, प्लीज. :) सच में.''

यूनुस भाई, मैं भी उदन जी की बात का समर्थन करता हूँ, धन्‍यवाद उदन जी आपने एक बहुत बढि़या आइडिया सुझाया। यूनुस जी, हम आपकी आवाज़ सुन चुके हैं, आपके अहसास से भी वाकिफ हैं। तो फिर क्‍यों किसी कुमार सानू या अमिताभ बच्‍चन का इंतज़ार करें। हमारी फरमाइश है कि आप अपनी पसंद की कविताओं पर पॉडकास्‍ट की एक पूरी सिरीज निकालें। - आनंद

Anonymous,  August 4, 2007 at 11:26 AM  

आपकी शिकायत जायज़ है कि कवियों और शायरों की रचनाओं को प्रस्तुत नही किया ग्या।

यह काम आप क्यों नही शुरु करते विविध भारती पर अपने सहयोगियो के साथ या

उदित नारायण और साधना सरगम जैसे कलाकारों के साथ क्या ऐसे कार्यक्रम नही किये जा सकते ?

अन्न्पूर्णा

Shirish August 4, 2007 at 7:30 PM  

That is a poignant, moving poem, Yunus. Excellent translation by you. Let more such posts follow.

Jan Sevak August 4, 2007 at 8:19 PM  

यूनुस भाई... अब और कुछ नहीं कहूँगा. बस ये बता दीजिए कि सात समंदर पार... विविध भारती में आपके कार्यक्रम कैसे सुन सकता हूँ. इंटरनेटन में उपलब्ध है क्या... या कोई और ज़रिया.

yunus August 5, 2007 at 9:59 PM  

जनसेवक जी आप किस देश में हैं ब्‍यौरा दीजियेगा । तब कोई उपाय सुझाऊंगा ।

Manish August 5, 2007 at 11:03 PM  

लाज़वाब प्रस्तुति !

बहुत बहुत शुक्रिया इस बेहतरीन कविता को उसके अनुवाद के साथ हम सब के सामने लाने का। आप से इस तरह की पोस्ट की आगे भी उम्मीदें हैं।

Vikas Shukla August 6, 2007 at 8:06 PM  

युनूसभाई,
हमारे दोनोकी पसंदे बहुत मिलती जुलती है इसका एहसास मुझे बार बार होता जा रहा है. पाब्लो नेरुदा की यह कविता २०/२५ साल पहले मैने भी मेरी डायरी मे लिख रख्खी है. हमारी बैंकमे एक प्रोबेशनरी अफसर आये थे विजय नाडकर्णी करके. पता नही अब कहा है. उनके पास पाब्लो नेरुदा की किताब थी. उसमेसे ये कविता उन्होने हमे सुनाई थी और हम पागल हो गये थे. आज आपने वही पुरानी यादे ताजा कर दी.

प्रियंकर August 13, 2007 at 6:28 PM  

अंग्रेज़ी और हिंदी अनुवाद के टेक्स्ट धरे रह गए . नेरुदा की यह उत्कट प्रेम,विरह और उदासी की भावनाओं की अनूठी 'ऐल्केमी' रचती इस कविता का एण्डी गार्सिया का सहज प्रभावशाली और मंथर पाठ थरथराहट पैदा कर गया . यार यूनुस क्या कहूं तुमसे!

Post a Comment

if you want to comment in hindi here is the link for google indic transliteration
http://www.google.com/transliterate/indic/

Blog Widget by LinkWithin
.

  © Blogger templates Psi by Ourblogtemplates.com 2008 यूनुस ख़ान द्वारा संशोधित और परिवर्तित

Back to TOP