संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Wednesday, July 4, 2007

फिल्‍म जगत की अनमोल तस्‍वीरें लेकर आई है ज़फ़र आबिद की पुस्‍तक ‘सदाबहार सिनेमा’



प्रिय मित्रो
दुनिया जुनूनी लोगों से भरी पड़ी है । कई ऐसे लोग हैं जिन्‍होंने अपने शौक़ के पीछे अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया है । परिवार की नाराज़गी झेली, नौकरी की परेशानियां झेलीं और ना जाने क्‍या-क्‍या सहा । लेकिन अपने जुनून को नहीं छोड़ा ।
( ये बात हम ब्‍लॉगियों पर भी तो लागू होती है ) आपको बताऊं कि ऐसे ही एक जुनून शख्‍स हैं ज़फ़र आबिद । आप सोच रहे होंगे ये कौन जनाब हैं । इन्‍हें ना तो कहीं देखा और ना ही कहीं इनका नाम सुना । ऐसा है तो फिर धीरज से आगे पढ़ते जाईये ।
ज़फ़र आबिद को फिल्‍म-संसार की पुरानी तस्‍वीरें जमा करने का शौक़ है और पिछले चालीस सालों से वो इस काम में जुटे हुए हैं ।

पिछले साल फरवरी में उन्‍होंने अपने इस काम को एक साकार रूप दिया और अपनी पुस्‍तक प्रकाशित की, जिसका नाम है ‘सदाबहार सिनेमा’ ।

ये कोई फिल्‍मों के इतिहास की पुस्‍तक नहीं है । बल्कि इसमें वो तस्‍वीरें हैं जो ज़फ़र ने ना जाने कहां कहां से जमा की हैं और जिनके लिए वो पिछले चार दशकों से लगातार भटकते रहे हैं । अपनी इस पोस्‍ट के साथ मैं आपको इस पुस्‍तक से लिए गये कुछ अनमोल चित्र भी दिखा रहा हूं ।

दो सौ इकहत्‍तर पेज की इस पुस्‍तक में ज़फ़र ने क्‍या क्‍या नहीं दिया है । समझ लीजिये कि भारतीय फिल्‍म संसार के प्राचीन युग की कुछ अनमोल झांकियां जब आपके सामने आती हैं तो दिल पर एक अजीब सी कैफियत तारी हो जाती है ।

इस पुस्‍तक के कुल इक्‍कीस अध्‍याय हैं । पहला अध्‍याय है इम्‍पीरियल फिल्‍म कंपनी के नाम । मैं आपको बता दूं कि इंपीरियल फिल्‍म कंपनी के मालिक थे आर्देशिर ईरानी जिन्‍होंने सन 1931 में भारत की पहली बोलती फिल्‍म ‘आलमआरा’ बनाई थी । इसी फिल्‍म में नायिका मिस ज़ुबैदा कुछ इस मुद्रा में दिखाई दी थीं ।
इस तरह की कुछ और अनमोल तस्‍वीरें इस अध्‍याय में संग्रहीत की गयी हैं और साथ में है इंपीरियल कंपनी का संक्षिप्‍त इतिहास ।

दूसरा अध्‍याय मूक फिल्‍मों के जन्‍मदाता दादा साहेब फाल्‍के के नाम है । इस अध्‍याय में एक अनमोल तस्‍वीर है, जिसमें दादा साहेब फालके की आखिरी बोलती फिल्‍म ‘गंगावतरण’ का एक दृश्‍य है, इसमें ‘मौसी’ लीला मिश्रा पार्वती के रूप में नज़र आ रही हैं । ये तस्‍वीर यहां नहीं दिखाई गयी है ।

इसी तरह मूक फिल्‍मों के ज़माने से लेखन और निर्देशन में सक्रिय रहे नाना साहेब सरपोतदार पर एक अध्‍याय है । उनकी कुछ अनमोल तस्‍वीरें और दिलचस्‍प विवरण इस अध्‍याय में आपको मिलेगा । इसी तरह अभिनेत्री रतन बाई, अभिनेता पृथ्‍वीराज कपूर, अभिनेत्री जद्दन बाई ( अभिनेत्री नरगिस की मां) और अख्‍तरी फैज़ाबादी यानी बेगम अख्‍तर के नाम भी एक एक अध्‍याय किया गया है । और इनकी बेहतरीन तस्‍वीरें संक्षिप्‍त परिचय के साथ दी गयी हैं । शायद आपको पता हो कि बेगम अख्‍तर ने कई फिल्‍मों में अभिनय भी किया था । यहां उनका ब्‍यौरा भी दिया गया है । ये हैं पृथ्वीराज कपूर । फिर आता है सैयद इम्तियाज अली ताज का जिक्र । ये साहब कौन हैं । अरे भई अनारकली का जन्‍मदाता कहा जाता है इनको । बीसवीं सदी की शुरूआत में ताज सा‍हब ने लाहौर में एक मज़ार देखा जिस पर अनारकली का नाम खुदा था । और फिर उन्‍होंने एक किरदार गढ़ा अनारकली । मैं यहां स्‍पष्‍ट कर दूं कि इतिहास में अनारकली जैसा कोई किरदार है ही नहीं । लेकिन ताज साहब का लिखा नाटक अनारकली एक इतिहास बन गया । और सिनेमा वालों ने बार बार अनारकली की दास्‍तान पेश की । सबसे पहले अनारकली सन 1935 में बनी, नायिका थीं सुलोचना । इसके बाद कब कब और किसने अनारकली को बनाने की कोशिश की, कौन बना सका और कौन नहीं, इसका सारा ब्‍यौरा इस अध्‍याय में है । अनारकली का सबसे लोकप्रिय साकार रूप बनीं अभिनेत्री मधुबाला, जिनकी बेहद खूबसूरत तस्‍वीरें इस पुस्‍तक में संग्रहीत हैं ।


इसके बाद अभिनेत्री नादिरा और टुनटुन पर भी एक एक अध्‍याय है । फिर एक पूरा अध्‍याय है जिसका शीर्षक है ‘सेट पर’ । इसमें कुछ मशहूर फिल्‍मों के सेट पर ली गयी ब्‍लैक एंड व्‍हाइट तस्‍वीरें लगाई गयी हैं । इसी अध्‍याय से ये है देव आनंद और साथियों की तस्‍वीर जो फिल्‍म बाज़ी के सेट पर ली गयी है । बांई ओर गुरूदत्‍त हैं, फिर कैमेरा मैन जाल मिस्‍त्री, देव आनंद, चेतन आनंद और कैमेरामैन फली मिस्‍त्री । पीछे खड़े हैं रतन गौरंग, हबीब और जॉनी वॉकर । इस अध्‍याय में सैंया, ढाके की मलमल, सोलहवां साल, रेल का डिब्‍बा, अमर, छोटे बाबू, अमर, मदर इंडिया जैसी फिल्‍मों के सेट पर ली गयी तस्‍वीरें दिखाई गयी हैं ।

फिर अप्रदर्शित नामक अध्‍याय में कई अप्रदर्शित फिल्‍मों की तस्‍वीरें लगाई गयीं हैं । जैसे दिलीप कुमार और नूतन की फिल्‍म शिकवा । किशोर साहू की जहां मिलें धरती आकाश, जिसमें बीना राय और राजकुमार की जोड़ी थी । डिब्‍बे वालों की जिंदगी पर आधारित फिल्‍म ये बस्‍ती ये लोग, जिसमें बलराज साहनी डिब्‍बा पहुंचाने वाले का किरदार निभा रहे थे । निर्दशक बी.आर.चोपड़ा की फिल्‍म ‘चाणक्‍य और चंद्रगुप्‍त’ जिसमें दिलीप कुमार नायक थे । ये तस्‍वीर उसी फिल्‍म की है । इसके बाद इस पुस्‍तक में कई निर्देशकों का परिचय दिया गया है । जिसमें बी.आर.चोपड़ा, वी. शांताराम, चंदूलाल शाह, जे.बी.एच. वाडिया, ज्ञान मुखर्जी, के आसिफ, मेहबूब ख़ान, ए.आर.कारदार, केदार शर्मा, कमाल अमरोही, महेश कौल, के.ए. अब्‍बास, ओ.पी.दत्‍ता, नासिर हुसौन और जी.पी.सिप्‍पी जैसे कई निर्देशक शामिल हैं । साथ में हैं इन निर्देशकों को अनदेखी अनमोल तस्‍वीरें ।

इस पुस्‍तक का एक अध्‍याय उन तस्‍वीरों पर केंद्रित है जो फिल्‍मों की प्रीमियर पर खींची गयी थीं और फिर अतीत की गर्द में छिप गयीं ।

मुगले आजम के प्रीमियर की इस तस्‍वीर को देखिये । जिसमें के.आसिफ़, दिलीप कुमार, राज कपूर और पृथ्‍वीराज कपूर मौजूद हैं । यादों की गलियां, इस पुस्‍तक का अगला अध्‍याय है । जिसमें फिल्‍म जगत की कुछ दिलचस्‍प बातों के साथ दी गयी हैं कुछ अनोखी तस्‍वीरें । जैसे ये तस्‍वीर देखिए । इसमें भारतीय सिनेमा के दो अद्वितीय फिल्‍मकार नज़र आ रहे हैं । बाईं ओर हैं मेहबूब ख़ान और दाहिनी तरफ बिमल रॉय ।


जीवनसाथी, नामक अध्‍याय में उन कलाकारों की तस्‍वीरें हैं जिन्‍होंने साथ में काम करते करते विवाह रचा लिया । जैसे सुनील दत्‍त-नरगिस । सोहराब मोदी-मेहताब । नूर –जॉनी वाकर । शशि कपूर-जेनिफर । ‘हसीन हमसफर’ नामक अध्‍याय में उन कलाकारों की तस्‍वीरें जिनकी जोडियां परदे पर काफी पसंद की गईं । जैसे कुंदन लाल सहगल और सुमित्रा देवी । बलराज साहनी और नलिनी जयवंत । शम्‍मी कपूर और श्‍यामा वग़ैरह ।

इन तस्‍वीरों को देखकर सहज अंदाज़ा हो जाता है कि ज़फर आबिद ने इन्‍हें जमा करने के लिए कितना पसीना बहाया होगा । दो सौ इकहत्‍तर पन्‍नों की इस किताब से ये भी ज़ाहिर हो गया है कि फिल्‍म-संसार अपने पुराने कलाकारों के प्रति कितना निर्मम और नाशुक्रा बन जाता है । ये पुस्‍तक फिल्‍म-जगत के किसी मशहूर व्‍यक्ति की ओर से आनी चाहिये थी, उसके निजी संग्रह और प्रभाव से जमा की गयी तस्‍वीरों के साथ । पर ऐसा नहीं हुआ । और शायद होगा भी नहीं । ज़फ़र का ये प्रयास गुमनाम ना रह जाए इसलिये इस पुस्‍तक की ख़बर उन लोगों तक ज़रूर पहुंचाईये जिन्‍हें इसमें दिलचस्‍पी हो ।

आपको ये बता दूं कि हार्ड बाउंड कवर वाली इस पुस्‍तक को पूरी तरह ग्‍लॉसी पेपर पर छापा गया है ताकि तस्‍वीरों का असर बरक़रार रहे और किताब लंबे वक्‍त तक साथ दे ।
‘सदाबहार सिनेमा’ प्राप्‍त करने के लिए आप यहां संपर्क कर सकते हैं--
ज़फ़र आबिद/नीरज बालानी
एफ 6/8 सेक्‍टर पांच
बेलापुर सी.बी.डी. नवी मुंबई 400614
फोन 022-27573112

या फिर
ज़फर आबिद
24 मेराज को.ऑप.हॉ.सो.
690 गुरूवार पेठ
पुणे- 411042
फोन 09822439668.
ईमेल-
mazee@gmail.com

दो सौ इकहत्‍तर पेज की इस पुस्‍तक का मूल्‍य है 2999 रूपये ।








3 comments:

Anonymous,  July 4, 2007 at 11:54 AM  

Yeh sabhi tasveeren maine dekhi hai.

Lagbhag 8-10 saal pahale hyderabad main Film festial ka aayojan hua tha.

Tab main Aakashvaani Hyd. ki taraph se coverage kar rahi thi tab in sare photos ko corridor ke kinare se hall tak lagaya gaya tha.

First photo Zubeda ki thi. Maine baat bhi ki thi shaayad Zafar saheb ya kisi aur se yaad nahi aa rahaa.

Hum daily programme cover karte the jo raat main national level par broadcost hotha tha lekin samay nahi milane se inhe coverage nahi mil paya tha.

Annapurna

Manish July 5, 2007 at 10:33 AM  

बहुत अच्छा विवरण दिया है आपने इस पुस्तक के बारे में! शुक्रिया

ganand July 5, 2007 at 2:21 PM  

Aaapne bahut hin sahi likha hai ki
"दुनिया जुनूनी लोगों से भरी पड़ी है । कई ऐसे लोग हैं जिन्‍होंने अपने शौक़ के पीछे अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया है । परिवार की नाराज़गी झेली, नौकरी की परेशानियां झेलीं और ना जाने क्‍या-क्‍या सहा । लेकिन अपने जुनून को नहीं छोड़ा ।"
Aise hin ek aur jununi aadmi se aaplog ko main milwata hoon.

jara ye link dekhiye

Sayad inka sapna sach ho jaye


aur yahan main ek aur bat kahna chahta hoon ki ye anusuchit jati ke sabse pichde varg(Mushar)
se hain aur vo bhi nirakshar .

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if you want to comment in hindi here is the link for google indic transliteration
http://www.google.com/transliterate/indic/

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